कुछ भी नहीं था छिपाने के लिए ,
सोचता हूँ क्या अब पाने के लिए ,
भूखा शरीर कब तक पखेरू रोके ,
सांस तरस रही फिर आने के लिए
...............आलोक चान्टिया
कोई सच कहे या झूठ पर जब भी आपसे कोई कहे मैं भूखा हूँ तो खाना अवश्य खिलाइए यही सच्ची पूजा है और आस्था है
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