Sunday, May 24, 2026

उसकी तेरहवीं पर- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 उसकी तेरहवीं पर


कोई भी नहीं आया था

शायद कोई समय नहीं पाया था

या फिर एक लावारिस के लिए

कौन थोड़ा सा समय निकाल पाया था

 आज उसकी 13वीं है

13 दिन हो गए हैं उसे

इस दुनिया से गए हुए

जो निशान उसने जमीन पर बनाए थे 

उनके मिटे हुए

जो सांस उसने ली थी

वह फिर से वायु में विलीन हो गई है 

जो मांस हड्डी उसको मिली थी

वह मिट्टी में मिल गई है

कल तक कोई भी उसको देखकर

 कुछ ना कुछ तो कहता था

पर वह अपनी मस्ती में रहता था

उसे मालूम था उसके अंधेरे को

मिटाने के लिए आलोक ही

सामने खड़ा मिलेगा

ठीक है जैसा है जीवन वैसा चलेगा

पर अचानक वह जब

आकर खड़ा हो जाता था

तो खाली मुट्ठी में आलोक भी

ठगा सा रह जाता था

उसका अंधेरा मिटाना

इतना आसान नहीं था

क्योंकि आलोक भी 

इतना महान नहीं था

अंतिम बार वह उसको

लेकर गया था मंदिर की चौखट पर 

जहां थोड़ा सा खीझ कर पूछा था

कि मेरी लाश तुम उठाओगे

या मैं तुम्हारी लाश उठाऊंगा

पर वह हंसते हुए बोला था

कैसे मैं यह बताऊं

और कैसे मैं समझा पाऊंगा

कौन किसकी लाश उठाएगा

यह तो सिर्फ यह भगवान

बतायेगा

देखा जाएगा जब मेरा समय आएगा 

या तेरा समय आएगा

और यह कहकर वह चला गया था

मेरे पीछे एक सन्नाटा रह गया था

मैं जानता भी नहीं था कि यह

मेरी उसकी अंतिम भेंट हो रही है 

सांसों की कहानी तो अब

खत्म हो रही है

अचानक चार दिन बाद ही

मुझे बताया गया था

कि वह सड़क पर मर गया है

इस गंदी जिंदगी से तर गया है

उसे लावारिस घोषित कर दिया गया है

 आओ और उसका अंतिम संस्कार कर जाओ

देखते देखते वह चिता की

आग में जल गया

सिर्फ अतीत में एक संबंधों का

अंधेरा रह गया

आज उसकी तेरहवीं हुई

पर भी कोई भी पूछने नहीं आया है

 क्या मानव ने संस्कृति बनाकर

बस इतना ही सच पाया है

क्या मानव ने संस्कृति बनाकर

बस इतना ही सच पाया है

डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Friday, May 22, 2026

कॉकरोच- कविता द्वारा डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन


 कॉकरोच


यह सच है मनुष्य के साथ रहते रहते

मनुष्य ही मुझे अपनी तरह समझने लगे हैं 

और मैं भी अपने को

मनुष्य की तरह समझने लगा हूं

इसीलिए कभी मुख्य न्यायाधीश तो

कभी राजनीति के अक्स में रहने लगा हूं 

चाहता भी नहीं है कोई अपने घर में

सीलन बदबू गंदगी फिर भी

आदमी से ज्यादा मौका परस्त भला

इस पृथ्वी पर कौन रह गया है

उसने अपने को गुलाम और

गाय को पालतू जानवर कह दिया है

मौका पाकर राजनीति के गंदे खेल में

गंदो को भी अपना कर लिया है

इसीलिए आज मैं बहुत

ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया हूं

क्योंकि कॉकरोच की तरह छिपकर

जीने वालों के लिए मैं आदर्श बन गया हूं 

संख्या के आधार पर बढ़ते हुए

परिवार के आकार से परेशान

जब सारे देश के लोग हो जाते हैं

जनसंख्या नीति पर न जाने

क्या-क्या बना जाते हैं

तब भी आज कॉकरोच की गिनती से

उसके ताकत होने का 

अंदाजा लगाया जा रहा है

प्रजातंत्र में सत्ता पाने को

आजमाया जा रहा है

मैं भी खुश हूं कि सनातन धर्म में

बिना मरे हुए में मानव योनि का

आनंद ले रहा हूं

चुपचाप एक कोने में बैठकर

खुद को मनुष्य और इन्हें 

कॉकरोच कह रहा हूं जानता हूं

 मैं बच भी जाऊंगा

यह कुचलकर मार दिए जाएंगे

या हिट स्प्रे से बर्बाद कर दिए जाएंगे

पर यही तो मेरा प्रतिकार होगा

क्योंकि मैं करोड़ों साल से शिखंडी बनकर 

भीष्म पितामह को मारना चाहता हूं

इसीलिए आज कॉकरोच बनकर

फिर तुम्हारे सामने आना चाहता हूं

मां भारती को अबला बनाकर

छोड़ जाना चाहता हूं

क्योंकि मैं जानता हूं तुम

धृष्ट राष्ट्र के देश में रहकर संजय की

आंखों से सब कुछ सुनना चाहते हो

खुद अपनी मां भारती को कहां

अपना कहना चाहते हो

इसलिए कॉकरोच का तुम गुणगान करके 

अपना जीवन बचा रहे हो

देखो कैसे कीड़े मकोड़े की तरह

कॉकरोच जनता पार्टी में आ रहे हो

क्या तुम मानव होने का अर्थ

कहीं से अपने में पा रहे हो


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Thursday, May 21, 2026

शब्दों की प्रतिध्वनि — डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"

 

शब्दों की प्रतिध्वनि

— डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"

मरना तो मुझको भी है,
मरना तुमको भी है,
कौन नहीं जानता यह सच—
फिर भी कहाँ हम चुपचाप
लेटे-बैठे रह जाते हैं।

कहाँ किसी को भूखा पाते हैं,
कहाँ बिना संघर्ष के
दिन गुजर जाते हैं।
मानते भी हैं कि चाहे
जितनी कोशिश कर लूँगा,
अपनी झोली मोती-हीरों से भर लूँगा,
फिर भी एक दिन
वह सीमा आ ही जाएगी,
साँस अपना मुकाम पा ही जाएगी।

चाहूँगा भी तो उसके बाद
साँस आगे नहीं जाएगी।
शरीर की कोशिश रहेगी भी तो
उसके हिस्से में
चिता या मिट्टी की ही
परछाई आएगी।

सब कुछ एक पल में ही
अतीत हो जाएगा,
भूतकाल हो जाएगा।

मैं भी इस दुनिया में आया था,
तुम भी इस दुनिया में आए थे—
यह भला बार-बार कौन गाएगा?

कभी-कभी याद भी आ जाएगी
कि वह होता तो ऐसा करता,
तुम होते तो ऐसा करते।
पर इससे किसी के जीवन का
ना तो कोई मतलब होगा,
ना ही कोई बैठकर आँसू गिराएगा।

बस एक कल्पना की तरह
कि पृथ्वी के अलावा भी
कहीं पर जीवन है—
तुम भी किसी के मन में
ऐसे ही आते-जाते रहोगे।

पर आज,
जब तुम ज़िंदा हो,
सोचते ही नहीं
कि मानव जीवन पाकर भी
तुम क्या अपनी मुट्ठी में
पाए रहोगे?

क्या केवल
एक चिड़िया की तरह
दाना चुगने का अर्थ लेकर ही
जीना चाहते हो?
या मानव होने के अर्थ में भी
कभी जीना चाहते हो?

छोड़ जाना चाहते हो
पत्थरों की तरह
अपने विचार को
अमरता की तरफ ले जाकर—
ताकि तुम रहो ना रहो,
तुम्हारे साथ यह दुनिया चलती रहे,
तुम्हारे शब्दों की प्रतिध्वनि पाकर,
तुम्हारे शब्दों की प्रतिध्वनि पाकर।

डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"

Thursday, May 14, 2026

पैसे का अँधियारा — डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

पैसे का अँधियारा

— डॉ आलोक चांटिया रजनीश

मुट्ठी में जब पैसा आया,
मन का दीपक बुझता पाया,
चेहरों पर अँधियारा उतरा,
हर रिश्ता भी धुंधलाया।

अब न किसी को राह उजाली,
सबको अपनी पड़ी निराली,
सच्चे मन की बात करो तो,
हो जाती आवाज़ ख़ाली।

सुनकर भी सब मौन खड़े हैं,
पैसे के बस खेल बड़े हैं,
रिश्तों की बातें सुनते ही,
चेहरों पर संदेह पड़े हैं।

जब खुद का खर्चा भारी है,
जीवन की पीड़ा जारी है,
कौन किसी की बात सुनेगा,
सबकी अपनी लाचारी है।

बस यह सोच मनुज चुप रहता,
भीतर-भीतर दुख को सहता,
कोई अपना बिछुड़ भी जाए,
आँसू पीकर जीवन ढोता।

कोई लावारिस मर जाता,
कोई तन्हा जलता जाता,
श्मशान किनारे हर चेहरा,
लकड़ी का मूल्य बतलाता।

आत्मा-परमात्मा की बातें,
चलती रहती दिन और रातें,
पर जब अंतिम समय सामने,
जेबें पहले खुलती पाते।

हर मानव यह बोझ लिए है,
जीते-जी सौ मौत जिए है,
पैसों की इस अंधी दौड़ में,
अपना ही विश्वास पिए है।

मर-मर कर जीने की आदत,
सबने जैसे ओढ़ी राहत,
भीतर राख दबाए बैठे,
खो दी मन की सारी चाहत।

जिंदा होकर भी सब पत्थर,
सूनी आँखें, भीतर बंजर,
दर्द किसी का सुनते लेकिन,
मन रहता हिसाबों के घर।

पूछेंगे — “क्या दर्द तुम्हारा?”
फिर होगा चेहरा बेचारा,
जान गए हैं बात बढ़ी तो,
आएगा पैसों का धारा।

“अपने दुख क्या कम हैं भाई?”
कहकर दुनिया आँख चुराई,
इसीलिए अब लोग मनुज से,
धीरे-धीरे दूरी पाई।

घर-आँगन संवाद नहीं है,
रिश्तों में वह स्वाद नहीं है,
इसीलिए अब लोग यहाँ पर,
इंसानों पर विश्वास नहीं है।

कुत्तों में अपनापन पाकर,
मनुष्य स्वयं से हार गया,
पैसे के इस अँधे युग में,
मानव भीतर मार गया।

मैं संस्कृति मानव हूँ — डॉ आलोक चांटिया रजनीश

मैं संस्कृति मानव हूँ

— डॉ आलोक चांटिया रजनीश

कब अपने कितनी दूर हुए,
यह कोई जान न पाता है,
जो कल तक थे बिल्कुल अपने,
वक़्त उन्हें बहा ले जाता है।

मैं भी इक मीठी भूल लिए,
हर रिश्ते को अपना समझा,
क्या तेरा है, क्या मेरा है,
सबको ही मैंने घर समझा।

सोचा था जब मन चाहेगा,
अपनी बातें कह जाऊँगा,
जैसे कल तक सुनते थे सब,
वैसे ही अब भी पाऊँगा।

पर सूरज डूबा, फिर निकला,
फिर निकला और फिर डूब गया,
इन आते-जाते मौसम में,
मेरा भी बचपन छूट गया।

गलतफ़हमी तब टूट गई,
जब सच का चेहरा सामने था,
हर कोई अपने घर में था,
हर कोई अपने दायरे में था।

कोई पत्नी में डूबा था,
कोई बच्चों में खोया था,
अपने छोटे से सुख में ही,
हर रिश्ता जैसे सोया था।

सब अपने दुख गिनवाते थे,
सब अपनी गाँठें खोल रहे,
और मैं अपने सूने मन में,
कुछ टूटे सपने ढो रहा।

अब अक्सर मेरे शब्द सभी,
मुझ तक वापस आ जाते हैं,
जब बच्चों से कुछ कहता हूँ,
चेहरे क्यों बदल से जाते हैं।

वे धीरे से कह देते हैं—
“अब बच्चों को मत टोका कीजिए,
आप अपने हैं, लेकिन बस
उन्हें अपने जैसा रहने दीजिए।”

किसी का बच्चा रूठ गया,
माँ ने उससे कुछ कह डाला,
कोई घर आकर चुप बैठा,
मन ने भीतर दर्द उछाला।

कोई बोला— “मामा आए”,
कोई बोला— “साए हैं”,
हर चेहरे की मुस्कानों में,
अपने-अपने सन्नाटे हैं।

तब आकर यह जान सका,
मैं वैसा मानव अब न रहा,
जो केवल प्रकृति में जीता,
मन से बिल्कुल सरल रहा।

मैं संस्कृति का मानव हूँ,
रिश्तों को लेकर चलता हूँ,
सूखी हुई संवेदनाओं में,
थोड़ा अपनापन भरता हूँ।

मैं अब भी मिलने जाता हूँ,
हालाँकि मन घबराता है,
इस तेज़ समय की दुनिया में,
अपनापन कम पड़ जाता है।

फिर भी रिश्तों की चौखट पर,
मैं दीप स्नेह का धरता हूँ,
क्योंकि अभी तलक इस जग में,
मैं संस्कृति मानव रहता हूँ।

 

Thursday, May 7, 2026

दर्द में भीगा हुआ जब भी मैं निकलता हूं- डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

दर्द में भीगा हुआ
जब भी मैं निकलता हूं
बहती हुई पानी की बूंद में
जब भी विकलता हूं
कितना सुंदर मैं लगता हूं
यह तुम अच्छी तरह से जानते हो
सच कहूं तो मानते भी हो
क्योंकि मेरी आह सुनकर ही
तो तुमको आनंद आता है
जब एक कतरा दर्द बहकर
तुम्हारे हाथों में रह जाता है
तुम्हें एहसास भी हो जाता है
कि तुम पूर्णता के पथ पर खड़े हो
भले ही कितने हताश निराश
और शून्य में पड़े हो
कोई विकल्प भी तो नहीं पाते हो
जब दर्द को सूखता हुआ
हवाओं के साथ पाते हो
दर्द की पपड़ियां जब उखड़कर
हवा में उड़ने लगती हैं
तब भी कहां किसी की आंखें जगती हैं
सब सोचते हैं जरूर इसके अंदर से
फिर कोई कल फूट रहा होगा
जो आज था वह फिर से छूट रहा होगा
बस दर्द की यही कहानी तो
मुझ में तुम में हर किसी में दिखाई देती है
दर्द की भीगी हुई छाती
अक्सर अंधेरे में सुनाई देती है
पर तुमने तो वह पाठ भी पढ़ लिया है
कि दर्द देकर ही प्रसव वेदना के बाद

 किलकारी गूंजा करती हैं
कोई पौधे की पत्तियां तभी निकलती हैं
जब कोई मिट्टी किसी कुदाली से
घायल बार-बार की जाती हैं
इसीलिए दर्द देखकर अब
तुम मुस्कुराने की दर्शन में रहने लगे हो
कोई तोड़ ना सके कोई मोड ना सके
और दर्द में भीगे हुए उसे तन को
कोई देख ना सके शायद इसीलिए
कुछ इस तरह से रहने लगे हो
मेरे मुस्कुराने का अर्थ सिर्फ
दर्द में भीगा तन ही जान पाता है
दर्द का शोर पहाड़ से निकलती हुई एक
नदी को भी प्रकृति की
सुंदरता बना देता है
भला कब कौन एक टूटे पत्थर में
एक मूर्ति को निकल पाएगा
इसीलिए छीनी हथौड़े के साथ
लोग निरंतर रहने लगे हैं
क्योंकि तभी तो जो वह चाहते हैं
उसे निकाल पाएंगे
भला वे लोग दर्द को छोड़कर
तुम्हें मुस्कुराहट कैसे दे जाएंगे
इसीलिए तुम्हारा मुस्कुराना
मेरा मुस्कुराना जरूरी हो गया है
क्योंकि दर्द के साथ कोई अंजना सा
रिश्ता चुपचाप मेरे भीतर सो गया है
इसीलिए जब स्वप्न में वह दर्द
मेरे भीतर जाग जाता है
तो मेरा तन उस दर्द से भीग जाता है
जिसे देखकर तुम मेरी तरुणाई
यौवन को नोच लेना चाहते हो
शायद तुम भी दर्द क्या होता है
इसे जान लेना चाहते हो
इसे जान लेना चाहते हो
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

Monday, April 20, 2026

कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन


 कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,


 आज वह सड़क के किनारे पड़ा था, 


कितना फूला नहीं समा रहा था ,


 किसी को कुछ समझ भी नहीं पा रहा था,


क्योंकि उसे भगवान पर चढ़ाया जाएगा ,


और उसका स्थान भी उतना ही ऊंचा हो जाएगा,


पर कहां जानता था कि जिस संसार में,


वह भगवान तक पहुंचने की चाहत में, 


किसी के हाथ में लिया गया है ,


वहीं दूसरे दिन उसको भगवान के,


 प्रतिमा से निकाल कर सड़क पर फेंक गया है,


फूल का यह दर्शन कहां,


कोई भी समझ पाता है ,


हर कोई बस अपनी गुमान में यहां आता है,


कहता भी है कि तुम्हारी हैसियत क्या है ?


तुम क्या जानो मैं क्या हूं ?


मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं ?


मैं चंद मिनट में तुम्हें मिटा सकता हूं, 


पर वह स्वयं यह नहीं जानता है,


कि आज जिस ऊंचाई पर पहुंचकर,


 वह इतने बड़े-बड़े शब्द को बोले जा रहा है,


कल वह खुद फूल की तरह,


वहां से उतार भी लिया जाएगा,

और अकेलेपन, अंधेरे में ,


चुपचाप बैठा दिया जाएगा ,


जहां वह स्वयं अपने ,


अस्तित्व को ढूंढने की कोशिश करेगा, 


हो सकता है कभी वह उदासी में,


तो कभी किसी वृद्ध आश्रम में मरेगा


पर जब उर्जा शरीर में बहती है,


तो कहां किसी को कुछ समझती है?


और कहती है फूलों की इस कहानी को,


जो स्वयं आदमी ही रोज ,


भगवान पर चढ़ा कर लिखता है,


पर क्या कभी उसका यह दर्शन,

उसके चेहरे पर ,


उसके व्यवहार में किसी को दिखता है?


डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, April 7, 2026

फूल का दोष डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 फूल का दोष 


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


फूल सड़क पर क्या गिर गया

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

गलती से ले जाने वाले की थी

पर सजा एक फूल को दे दिया गया

फूल सड़क पर क्या गिरा

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

कल जब वह बीज के रूप में

मिट्टी के साथ ही मिलकर फूटा था

निकला था और अपने होने का

अर्थ समझाया था

तभी तो दुनिया का आदमी उसके

रंग रूप को समझ पाया था

पर आज इस मिट्टी में गिरे हुए

फूल को लोग मंदिर नहीं ले जाएंगे

क्योंकि गिरे हुए फूल को भला कहां

भगवान को समर्पित कर पाएंगे

भगवान जिसने सभी को बनाया है

इस पृथ्वी पर एक-एक

फूल पत्ता प्राणी उगाया है

उस भगवान से एक

फूल दूर हो जाया जाएगा

क्योंकि जमीन में गिरकर

जमीन से उगने वाला फूल

भला भगवान का साथ कहां पाएगा

केवल गिर जाने भर से

जिस फूल का जीवन ही

दलित का हो गया है

उस मानव के जीवन में क्या समझना

क्या से क्या हो गया है

फूल चुपचाप दूर सड़क पर पड़ा रहकर 

भगवान को देखता रहा

शायद यह पूछता भी रहा

कि जिस मिट्टी से निकलकर

वह फूल बना है

उसी मिट्टी में गिरकर वह

भगवान से दूर खड़ा है

यह जीवन का कौन सा दर्शन

फूल को देखना पड़ रहा है

चाहकर भी वह अपने

भगवान पर नहीं चढ रहा है

पाप पुण्य के खेल में वह

समझ ही नहीं पाया है

कि उसने कोई गलती की है

या मानव ने अपने कर्मों का फल पाया है

एक फूल को भगवान तक

कहां पहुंचा पाया है

प्रगति सभ्यता संस्कृति की कहानी में

क्या मानव होने का बस

इतना ही दर्शन सामने आया है

शायद फूल यही नहीं समझ पाया है


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Thursday, April 2, 2026

मेरे पास शब्दों के सिवा कुछ भी नहीं डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

मेरे पास शब्दों के सिवा ,
कुछ भी नहीं है ,
कुछ लोग कहते हैं कि ,
इससे बड़ा कुछ भी नहीं है ,
मैं सिर्फ तुमको दे सकता हूं ,
इन्हीं को जी भर के ,
तुम चाहो तो इससे नहा कर ,
अपने को ताजा कर लो ,
और जीवन के कुछ अर्थ ,
तुम भी अपने मुट्ठी में भर लो ,
मुझे नहीं मालूम मेरे शब्दों को,
देखकर तुम हंसते हो ,
रोते हो ,गाते हो या पागल समझकर ,
आगे निकल जाते हो,
मैंने तो सीखा है सिर्फ जो भी ,
तुम्हारी मुट्ठी में है ,
उसे देते चले जाओ ,
एक पल भी यह मत सोचो कि,
देने के बाद तुम क्या पाओ?
इस पृथ्वी पर जो भी ,
तुमको मिल रहा है ,
तुम्हारे अंदर उर्जा का ,
जो संचार खिल रहा है ,
वह सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं बना है !
उन्हें अपने जरूरत के अनुसार ,
प्रयोग करके इसी दुनिया में ,
वापस करके जाना है,
इसी का नाम जीवन है ,
और इसी का नाम ,
मानव का जीवन पाना है ,
इसीलिए मेरे शब्दों से अगर,
तुम नहाना चाहते हो ,
और जीवन के कुछ स्वर ,
संगीत की तरह सुन जाना चाहते हो ,
तो मेरे शब्दों को गीता, रामायण ,
कुरान, भागवत, बाइबल,
समझकर सुनकर ,
अपने मतलब का उसमें से चुनकर,
थोड़ा सा मुस्कुराने की तरफ चले जाओ, आओ आओ मेरे पास,
जो शब्द रखे हैं, पड़े हैं ,
जिन्हें मैंने सजा कर रखा है,
उनको तुम भी थोड़ा सा ले जाओ ,
क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म होते हैं ,
और उनके अर्थ कभी भी ,
कहां कम होते हैं ,
बस यही तुम अगर समझ जाओ ,
तो दुनिया की हर संपत्ति से ज्यादा,
मेरे अर्थ को तुम भर भर के ले जाओ ,
तुम भर भर के ले जाओ ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

Sunday, March 15, 2026

मिट्टी से शरीर बना होता है डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

मिट्टी से यह शरीर बना होता है,
यह तथ्य किसे नहीं पता होता है,
लेकिन मिट्टी में नंगे पांव चलना,
कब किस प्रिय होता है ?
मिट्टी ना होती तो पृथ्वी पर ,
जीवन का अर्थ हम जान ही ना पाते,
हमारे घरों में आलू टमाटर आम फूल,
भला आलोक कैसे आते ?
मिट्टी को मुट्ठी में लेकर हम ,
अक्सर सौगंध खाते हैं ,
तभी तो किसी देश के,
हम होकर रह जाते हैं ,
पर मिट्टी शरीर पर लग जाए तो,
हम यह सारे दर्शन भूल जाते हैं ,
हर पल बस अपने को ,
साफ करने में लगे रह जाते हैं ,
कितना भी अच्छा करके मिट्टी,
हमारे दिल में कभी बस नहीं पाती है,
उसके हिस्से में तो पांव की ,
सहभागिता एक दबाव बनकर आती है,
जो जितना करके इस दुनिया में,
अमर हो जाना चाहता है ,
उसके भी हिस्से में मिट्टी का ही ,
स्वर शेष रह जाता है,
हर कोई पूछता है कि तुमने,
मेरे लिए किया तो क्यों किया?
क्या कभी हमसे पूछ कर,
तुमने हमें कुछ दिया,
तुम्हें मन था इसलिए तुमने,
सब कुछ कर डाला है,
बस यही दर्शन का शेष है,
और अवशेष जीवन पथ पर ,
भावनाओं का हाला है ,
मिट्टी को मां बनाकर क्या मिल पाया?
क्या यह सत्य किसी को,
कभी किसी पल समझ में आया?
आलोक चांटिया रजनीश

Saturday, March 14, 2026

दर्द तुम्हारा भी मैं पहचानता हूं,- आलोक चांटिया रजनीश


 

दर्द तुम्हारा भी मैं पहचानता हूं,
अनकही कहानी मैं ,
तुम्हारी भी जानता हूं ,
मिट्टी के साथ जुड़कर भी स्पष्ट,
तुम पानी का ढूंढते रहते हो ,
पर भला अपनी सूनी आंखों से ,
यह बात किससे कहते हो,
सिर्फ एक इंतजार उन हाथों का,
या उस भगवान का जो ,
प्रकृति के सहारे तुम तक ,
दो बूंद पहुंच जाए ,
और तुम्हें भी जीवन का अर्थ ,
थोड़ा ही सही लेकिन समझ में आए, एक स्पर्श ही तो है,
पानी का तुम्हारे साथ ,
नहीं तो मिट्टी प्रकाश वायु ,
सब तो तुम्हारे साथ ही रहते हैं ,
लेकिन तुम्हारा अंतस में तो,
सिर्फ सरसतत का वह बीज,
जो पानी का इंतजार करते हैं ,
उन्हीं को स्पर्श करने को,
छूने को तरसते रहते हैं ,
जब भी तुम पानी का ,
स्पर्श कर जाते हो,
तुम पौधे कहां रहते हो,
तुम फल फूल खिली हुई ,
पत्तियों के सौंदर्य बन जाते हो ,
तुम्हें आज सूखा हुआ देखकर,
मैं तुम्हारी वेदना को समझ गया हूं, 

पानी तुम्हारे जीवन में नहीं है,
यह भी समझ गया हूं ,
प्रेम का अर्थ सरसता में ही तो रहता है,
पर जगत का यही सच,
भला कौन किससे कहता है ,
सभी मिथ्या बातों में लगे रहते हैं,
पर एक बूंद सरसता की,
एक बार भी नहीं कहते हैं,
इसीलिए पौधा, हृदय
सब कुछ,सूख जाता है ,
जब अपने जीवन में एक बूंद,
पानी और सरसता को नहीं पाता है, 

क्या मानव को यह दर्शन,
जो सच बनकर बह रहा है,
कभी भी समझ में आता है ,
या वह इसके करीब भी हो पाता है? 

आलोक चांटिया रजनीश

Friday, March 13, 2026

मैं क्यों नहीं समझ पाया डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 कोई भी कभी भी

साथ नहीं आया

जब भी पलट कर देखा

खुद को अकेला पाया

पर हार नहीं सोचा

संसार में आने के लिए

मैं करोड़ के साथ चला था

मैं तो सिर्फ अकेला था

जो मां के गर्भ में

अपना अस्तित्व था पाया

वहां के निरंतर युद्ध में

मुझे अपने होने का

अर्थ दिखाना था

मां के हिस्से को

खुद के लिए पाना था

छोटी सी आयु

अस्तित्व का खतरा

सब कुछ जानकार भी

मैं कितनी बार

मां से टकराया था

तब जाकर गर्भ के

अंधेरों में मैंने अपना

यह अस्तित्व पाया था

फिर स्वीकारा सभी ने था

प्रसव पीड़ा के इंतजार में

हर कोई था

और एक दिन सबको

मैंने सुनाई भी थी

अपने किलकारी की कहानी

मैं कोई स्वर नहीं था

उस कहानी का जिसमें थे

राजा और रानी

जब उस अनंत पथ पर

मैं अकेला चला आया

तो फिर क्यों सोचता हूं

आज मैंने अपने को अकेला पाया 

जब भी पलट कर देखा

कोई भी पीछे नहीं था आया

यह सोच मुझे उस लड़ाई से

बार-बार क्यों दूर ले जाती है

जो मैंने गर्भ के अंधेरे में

अपने अस्तित्व के लिए लड़ा था

और यह सुंदर सा

जीवन था पाया

मैं पलट कर क्यों देखता हूं

मैं कितना अकेला हूं

और कौन है जो मेरे संग आया

एको अहं द्वितीयो नास्ति के

सिद्धांत पर चलने की

हिम्मत क्यों अब नहीं रह रही है 

भगवान भी होता है

इसको क्यों नहीं समझ पाया

अपनी सफलता की कहानी

अतीत में अस्तित्व के संघर्ष को

मैं क्यों भूल पाया

मैं मानव हूं मैं राम हूं

कृष्णा हूं ईसा हूं मूसा हूं

इतना सस भी क्यों नहीं समझ पाया 

पलट कर क्यों देखता हूं

मैं अकेला हूं और

मेरे संग कौन आया

आलोक चांटिया रजनीश


Wednesday, March 11, 2026

सत्य का शब्दार्थ आलोक चांटिया "रजनीश"

 


सत्य का शब्दार्थ

आलोक चांटिया "रजनीश"



एक मिट्टी जिस बीज को,

 उसके अस्तित्व के होने का,

 आभास कराती है,

उसके अंदर की सारी प्रतिभा को,

अंकुरित करके इस,

 संसार में सामने लाती है,

 पर वह बीज भी अपनी ,

सुषुप्त क्षमताओं के प्रदर्शन के बाद भला,

 कब मुड़ कर उस जमीन की ओर मुडता है,

या फिर अपनी हरी फूल पत्ती,

छाया के साथ उस मिट्टी से जुड़ता है?

वह तो मिट्टी को सिर्फ,

 अपने अस्तित्व को ,

बचाने का काम दे जाता है ,

अपने पीछे अपनी जड़ को,

मिट्टी में छोड़ जाता है,

मिट्टी उस बीज के होने के ,

एहसास में जड़ को,

 पकड़े रह जाती है,

और बीज की जीवन में,

 उसके विशाल वृक्ष होने की,

 कहानी चलती जाती है,

संसार जब भी देखता है तो,

उस वृक्ष को ही देखता है,

उसकी प्रशंसा करता है,

उसकी छाया का आनंद लेता है,

उससे हवन की संमिधा भी,

 एकत्र कर लेता है ,

पर संसार उस मिट्टी को,

 कभी नमन नहीं करता है,

जिसके सहारे बीज वृक्ष,

बनने की यात्रा पूरी करता है,

बस ऐसे ही जीवन की,

कहानी चलती रहती है,

जो किसी को भी आगे बढ़ाने का,

कार्य आलोक यहां पर करता है,

वह मिट्टी की तरह सबके,

सामने भी होता है,

पर गुमनाम सा ही मरता है।

पर गुमनाम सा ही मरता है।


Thursday, March 5, 2026

बीज का अकेलापन— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

 

बीज का अकेलापन

एक बीज की स्वतंत्रता,

जमीन के अंधेरे में खो जाती है,

मिट्टी की चुप तहों में उसकी

पहली सांस ही सो जाती है।

वह अकेला है —

पर हार मानना उसे आता नहीं,

जड़ कह दे संसार भले,

वह जड़ होकर भी ठहरता नहीं।

धरती के गहरे अंधकार से

वह प्रतिरोध रचता है,

मौन में छिपे साहस से

हर बंद दरवाज़ा कचोटता है।

कहते हैं उसे जड़ सभी,

निष्प्राण, मौन, हारा हुआ—

पर भीतर उसका स्वप्न

अभी भी है अंगारा हुआ।

वह लड़ता है मिट्टी से,

वह लड़ता है रात से,

वह जूझता है अपने ही

भीतर के हर आघात से।

और एक दिन —

जड़ों की ताकत लेकर,

धरती की छाती चीर,

वह बाहर आता है बढ़कर।

पहली बार फिर से

सूरज को देख पाता है,

किरणों की उंगलियों से

जीवन को छू पाता है।

पर क्या संघर्ष यहीं थमता है?

नहीं — कहानी यहीं नहीं रुकती,

वह अपनी जड़ों से बंधा हुआ,

मिट्टी में ही अपनी नियति लिखती।

वह फिर भी बढ़ता जाता है,

अकेलेपन को पीछे छोड़ने को,

ऊपर, और ऊपर उठता है

आकाश को थोड़ा-सा तोड़ने को।

समय बीतता है —

वह पौधा कहलाता है,

टहनियों की भुजाएँ फैलाकर

पत्तों से भर जाता है।

फिर एक दिन

समाज उसे पेड़ कहता है,

उसकी छाया में थका पथिक

अपना माथा सहलाता है।

उस पर पक्षी घर बनाते हैं,

किसी को लकड़ी मिल जाती है,

किसी को फल, किसी को आस,

किसी की दुनिया बस जाती है।

पर जो आज विशाल वृक्ष है,

वह याद करे तो जानता है—

अपने अकेलेपन से लड़कर ही

वह इतना बड़ा बन पाता है।

और अंत में क्या उसके हिस्से?

ऊपर जाना फिर रुक जाता है,

एक ऊँचाई के बाद वृक्ष

आकाश नहीं छू पाता है।

वह चुपचाप खड़ा रहता है,

परिस्थितियों से समझौता कर,

संघर्ष में जो भी पाया था,

उसी को जीवन मानकर।

छाया, भोजन, आश्रय देकर

दुनिया को वह जीता है,

पर भीतर कहीं अकेलापन

अब भी मौन संगीत-सा रीता है।

वह अक्सर हवा से कहता है —

“जब जीवन तुम्हें भी अकेला करे,

जब विरोध के स्वर में

सब कुछ तुमसे ले ले जगत भरे,

तब हार मत मानना तुम,

भले ही सब कुछ खो जाए,

अपने भीतर एक बीज रोपना,

जो वृक्ष बनकर सो जाए।

अकेलापन शाप नहीं,

संघर्ष का प्रथम चरण है,

जमीन के अंधेरे से ही

उगता उजला जीवन है।”

पर प्रश्न अभी भी बाकी है —

क्या कोई मनुष्य समझ पाता है?

बीज के इस मौन युद्ध को

क्या कोई पढ़ पाता है?

धरती के अंधेरे से उठकर

जो वृक्ष विशाल बन जाता है,

क्या कोई उसके अकेलेपन का

मूल्य कभी जान पाता है?

— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

मुट्ठी में अंधेरा-— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

 मुट्ठी में अंधेरा

मैं अपना दर्द

किसी को बताता नहीं हूं।

हंसने के सिवा,

किसी के सामने आता नहीं हूं।

जानता हूं सभी के,

चेहरे पर उदासी ही तो छा रही है।

एक दर्द की लकीर भी,

खींची सी चली जा रही है।

हर कोई दूसरे को देखकर,

बस कुछ सुनाना चाहता है।

दर्द न जाने कितने

रूपों में बाहर आना चाहता है।

रोशनी में रहकर भी,

सभी अंधेरे में खड़े नजर आ रहे हैं।

टटोलते हुए न जाने,

किसे ढूंढते जा रहे हैं।

आंख है पर दिखाई,

कुछ भी नहीं दे रहा है।

समय यह कैसा,

सभी का इम्तिहान ले रहा है।

मनुष्य हंस सकता है,

जानते सभी हैं।

पर क्या चेहरे पर,

उन्हें लाते भी कभी हैं?

यह कौन सा श्राप मनुष्य

जीने के लिए विवश हो गया है?

आलोक फिर से मुट्ठी में,

अंधेरा लेकर रह गया है?

कौन गीता का अर्थ बताकर,

फिर अर्जुन को खड़ा करेगा?

कौन मोह से दूर ले जाकर,

जीवन का अर्थ कहेगा?

कब कोई भागीरथ मनुष्य के,

पूर्वजों की थाती को फिर से वर्तमान में लायेगा?

और एक बार फिर मनुष्य,

अपने कर्म पथ पर मुस्कुरा पाएगा?

— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

Wednesday, January 28, 2026

मन इतना क्यों हारा है डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

 मन इतना क्यों हारा है

 डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


मन इतना क्यों हारा है?

क्या जीत सच में सहारा है?

दूर गगन का छोटा तारा,

क्या सच में कोई इशारा है?

पता नहीं क्या देखा जग में,

या जग ने मुझको क्या देखा?

क्यों हर सच अधूरा लगता,

जब प्रश्नों ने ही आँखें सेंका?

क्या अंधियारा बाहर फैला,

या भीतर ही विस्तार हुआ?

जिस डर को नाम न दे पाया,

क्या वही मेरा संसार हुआ?

मुट्ठी में जो कुछ भी आया,

क्या वह मेरा हो पाया है?

या पाने की इस हड़बड़ी में,

सब छिनता ही चला आया है?

क्या संतोष कोई वस्तु है,

जो थैले में भर लाई जाए?

या वह ठहराव की वह घड़ी है,

जिससे हम रोज़ ही घबराएँ?

सुबह से लेकर शाम तलक,

क्यों लगता कुछ छूट गया?

क्या समय मुझसे आगे निकला,

या मैं ही पीछे छूट गया?

जो देखा इन नैनों ने,

वह प्यारा क्यों न लग पाया?

क्या आँखें सच देख न सकीं,

या मन ने देखना ठुकराया?

हर जन क्यों दुखियारा दिखता,

क्या पीड़ा ही पहचान बनी?

या अपने ही अधूरेपन की,

परछाईं सबमें जान पड़ी?

अगर जीवन एक प्रश्न है,

तो उत्तर किससे माँगा जाए?

और अगर मौन ही सत्य है,

तो फिर यह चीख क्यों दोहराए?

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

Tuesday, January 27, 2026

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


 

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


पता नहीं
रास्ते कब तक हमारे साथ चलेंगे,
या हम ही कब तक
इन पत्थरों को प्रगति कहकर
अपने पैरों से पूजा करते रहेंगे।
सभ्यता ने हमें चलना सिखाया,
पर रुकना कभी नहीं सिखाया।
हर मोड़ पर एक नया नियम,
हर नियम के पीछे एक डर—
और डर के नाम पर
इतिहास की सबसे बड़ी इमारतें खड़ी कर दीं।
हमने रास्ते बनाए
ताकि जंगल पीछे छूट जाए,
पर जंगल हमारे भीतर
और घना होता चला गया।
मनुष्य ने कहा—
“मैं प्रकाश हूँ”,
और सभ्यता ने ताली बजाई।
पर उसी ताली की गूँज में
कई सदियों तक
अँधेरा चुपचाप ताली बजाता रहा।
यह आलोक की तरह
हर जगह, हर समय रहने की ज़िद है—
देखने की, समझने की,
और जवाबदेह बने रहने की।
पर सच यह है
कि हर प्रकाश के ठीक पीछे
अँधेरा खड़ा रहता है,
क्योंकि सभ्यता ने
प्रकाश को शक्ति बना दिया
और शक्ति ने अँधेरे को जन्म दे दिया।
हमने नैतिकता को किताबों में बाँध दिया,
और व्यवहार को सुविधा के हवाले छोड़ दिया।
यहीं से शुरू हुआ मानव द्वंद्व—
अंदर कुछ और, बाहर कुछ और;
आस्था मंच पर,
और विवेक बैकस्टेज में।
सभ्यता कहती रही—
“आगे बढ़ो”,
मनुष्य पूछता रहा—
“पर किस कीमत पर?”
और हर बार जवाब आया—
“इतिहास तय करेगा।”
पर इतिहास तो
हमेशा विजेताओं की स्मृति रहा है,
और हारने वालों की
अनकही चीख।
आज भी हम चल रहे हैं—
सड़कों पर नहीं,
विचारधाराओं पर।
हर विचार एक रास्ता है,
और हर रास्ता
किसी न किसी मनुष्य को
पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है।
यह द्वंद्व खत्म नहीं होगा,
क्योंकि यही मनुष्य होने की शर्त है।
जो इसे मिटाने निकलेगा,
वही सबसे ख़तरनाक सभ्यता बनाएगा।
शायद सवाल यह नहीं है
कि अँधेरा क्यों है,
सवाल यह है—
क्या हम अपने प्रकाश से
अँधेरे को देखने का साहस रखते हैं?
क्योंकि जिस दिन
मनुष्य ने अपने भीतर के अँधेरे को
सभ्यता की जिम्मेदारी मान लिया,
उसी दिन
रास्ते भी इंसानियत सीखेंगे,
और सफ़र भी
थोड़ा कम हिंसक होगा।

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"