Monday, December 29, 2025

अक्सर जब मैं, अकेला रह जाता हूं ,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश

 

अक्सर जब मैं,
अकेला रह जाता हूं ,
अपने आसपास,
किसी को भी नहीं पाता हूं, 

जो होते भी हैं सब ,
अपने लिए व्यस्त रहते हैं, 

एक भी पल ना मेरी ,
बात सुनते हैं,
बस अपनी ही रहते रहते हैं, 

ऐसे में फिर अपने में,
अपने को ढूंढने लगता हूं, 

बाहर की दुनिया से दूर ,
अपने भीतर मैं फिर जगता हूं,
पाता हूं पूरा आधा-आधा, 

अपनी मां को अपने भीतर, 

और पूरा आधा-आधा,
अपने पिता को ,
बस दोनों को पाकर,
मैं खुश हो जाता हूं,
यह मैं नहीं कह रहा हूं,

 विज्ञान कहता आया है, 

अनुवांशिकी यही समझा पाया है ,
आधे आधे गुण के ,
मिल जाने से ही,
एक बच्चा बन जाता है,
पर दुनिया में आने के बाद, 

वह भूल जाता है ,
कि उसके अंदर ही जब तक वह है,
उसकी मां उसके पिता, 

उसके साथ रहेंगे ,
जब भी वह अकेला होगा, 

तब उससे चुपचाप कहेंगे ,
हम तुम्हारे साथ रहते हैं,
क्यों चिंता करते हो ?
बस यही कहते हैं ,
और फिर मैं अपने अकेलेपन को ,
देखते ही देखते भूल जाता हूं,
जब मैं और मेरे माता-पिता को ,
सन्नाटो में अपने,
भीतर बात करते पाता हूं।
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

साल नहीं, सार चाहिए डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

 

साल नहीं, सार चाहिए

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

हर कोई आने वाले कल को ऐसे निहार रहा है,

जैसे आज उसे तिल-तिल कर मार रहा है।

उसे आशा है—कल जो दस्तक देगा द्वार,

वह ले आएगा कुछ, जो भर देगा जीवन का भार।

आशा के सहारे आदमी साँसें तो लेता है,

पर यह नहीं जानता—क्यों पृथ्वी पर रहता है।

दिन, महीने, साल बस गिनता ही जाता है,

कर्म का अर्थ जाने बिना जीता-मरता जाता है।

क्या उद्देश्य था जन्म का—किसने कभी पूछा?

या बस कैलेंडर पलटना ही जीवन का नुस्खा?

क्या किसी पशु ने किसी से यह कहा होगा,

“नौ साल की शुभकामनाएँ”—क्या ऐसा सुना होगा?

पशु जानता है कर्म बिना नाम जाने,

भाग्य सोया रहता है, श्रम के न जागने।

वह करता है जो करना उसे आया है,

उसने जीवन को उत्सव नहीं, कर्तव्य बनाया है।

फिर मनुष्य क्यों पशु से ऊपर उठने से डरे,

क्यों सिर्फ वर्षों की गिनती में जीवन सरे?

क्या वह बस साल बदलने को ही आया है,

या अपने होने का अर्थ समझने आया है?

जब तक कर्म से नहीं जुड़ेगी चेतना की डोर,

तब तक हर नया साल होगा बस एक और शोर।

साल नहीं बदलते—यदि मन वही पुराना है,

जीवन तब भी बोझ है, चाहे कल नया आना है।

Saturday, December 27, 2025

सभी के अपने-अपने , दर्द होते हैं ,- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

सभी के अपने-अपने ,
दर्द होते हैं ,
दर्द हमेशा अपनों को ,
ढूंढता रहता है ।
अगर किसी अपने को,
पा भी जाता है ,
और अपना दर्द,
जैसे ही कहता है,
वह हैरान रह जाता है,
क्योंकि सामने वाले से टकराकर,
उसका दर्द वापस आ जाता है ।
और सामने वाले का ,
दर्द भी ले आता है ।
वह भी बताने लगता है कि, आजकल उसे कितना दर्द है,
उसकी जीवन की रातें, कितनी सर्द है ।
तब समझ में आता है कि,
हर कोई मुट्ठी बांध तो रहा है,
पर उसमें तो अंधेरा ही रह रहा है ।
कोई भी अपने दर्द के आगे, किसी दूसरे का ,
दर्द देख ही नहीं पा रहा है। जिसे भी देखो वह अपने,
सुख को भी दर्द कहता पा रहा है ।
क्योंकि अब उसे ,
इस बात का दर्द रहने लगा है,
कि जितना सुख ,
भगवान ने उसको दिया है,
वह पूरा नहीं दिया है ।
थोड़ा सा उसने रोक लिया है, अब दुनिया में जितना कुछ भी ,
अंधेरा दिखाई दे रहा है,
वह तो जलता हुआ ,
दर्द का दिया है,
जिसमें पढ़कर आदमी रास्ता भी,
नहीं खोज पा रहा है ,
जो आज जिंदा था कल,
वह आत्महत्या करके जा रहा है ।
क्योंकि उसे पूरी दुनिया में ,
या कहूं आदमी से भरी दुनिया में ,
कोई भी ऐसा नहीं मिला,
जिसको वह अपना दर्द सुना पाता !
और वह एक पल के लिए ही सही ,
उसके किसी काम आता ,
दर्द का जहर यूं ही,
बढ़ता चला जाएगा,
तो सचमुच एक दिन इस पृथ्वी पर,
फिर से जीवन का,
अर्थ समझा जाएगा ,
और हो सकता है ,
फिर से कोई एक अवतार, कोई एक भगवान कोई एक पैगंबर,
इस दुनिया में चला आएगा।
जो सिर्फ मुस्कुरा कर,
यह कह जाएगा कि,
दर्द के साथ जीने की ,
जो भी आदत डाल लेता है,
या अपने भीतर जो भी, अपना दर्द जी लेता है ,
वही तो राम कहलाता है,
वही कृष्णा कहलाता है ,
वही पैगंबर बन जाता है। भला दर्द के बिना,
कौन यहां रह पाता है?
और फिर दर्द में एक, मुस्कान निकलने लगेगी ,
और तपती धरती पर ,
जीवन की लकीर खिंचने लगेगी ।
आलोक चांटिया 'रजनीश'

Sunday, December 21, 2025

औरत — रिश्तों की भाषा में- डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

 

औरत — रिश्तों की भाषा में

कितना अजीब-सा सुख चल रहा है,
जब पूर्णता का अर्थ लिए दुख चल रहा है।

पानी से हाथ धोते हुए,
वह जीवन का अर्थ ढूँढ रही है—
क्या इसी का नाम औरत है?
क्या यही सही है?

मिलकर मिला भी क्या,
कि मैं कुछ कर ही नहीं पाया—
क्या इसी का नाम रिश्ता है,
और यही निभाना आया?

यह तो सिर्फ़ दिखावा था,
जो सब कर रहे हैं—
झूठ को जी रहे हैं,
और झूठ ही मर रहे हैं।

वह ठंड से काँपती रही,
अँधेरे में—
आलोक के सामने।

फिर कौन-सा अर्थ प्रेम का,
किस अर्थ को मानें?
इसी खोखले जीवन को
हम रिश्ता कहते चले आए हैं।

दूर कहीं उसकी आँख का
एक कतरा—
आँसू—
हम कहाँ मिटा पाए हैं?

दर्द में मुस्कुरा कर,
बातों के बीच
बस इतना कह जाती है—
यही रिश्ते का सच है,
और औरत
बस इतनी ही रह जाती है।

डॉ आलोक चांटिया रजनीश

Monday, December 15, 2025

उसके हाथों का शहर — आलोक चांटिया “रजनीश


 

उसके हाथों का शहर

— आलोक चांटिया “रजनीश”

उसके हाथों ने शहर में
अनगिनत मकान बनाए हैं,
पर आज भी रात के
रैन बसेरे ही उसके हिस्से आए हैं।

रोटी की तलाश में वह
अपना गाँव छोड़ आया,
दो पैसे ज़्यादा मिलेंगे—
यही दर्शन वह साथ लाया।

अब न घर की रोटी मिलती है,
न घर जैसी कोई छत,
ऐसे न जाने कितने हाथों के हिस्से
आए हैं जीवन के अधूरे सच।

वह सोचकर कभी मुस्कुरा भी लेता है—
कि कल जब कुछ पैसा जुड़ जाएगा,
वह भी अपने लिए
एक छोटा-सा घर बना लेगा।

पर कौन जाने किसके हिस्से
कितनी सुबहें लिखी हैं,
किसके हिस्से धूप है
और किसके हिस्से सर्द रातें ही बची हैं।

उसने शहर में आज भी
अनगिनत मकान बनाए,
पर ठंड की लंबी रातें
आज भी रैन बसेरे में सिमट आए।

दूर से जलती रोशनियों को देखकर
वह भी खुश हो लेता है,
गाँव की मिट्टी के कमरों में
उसने भी न जाने कितने दीप जलाए है ।

वह सोचता है—
इसी पैसे से लोग “शहर के” कहलाते हैं,
गाड़ी-घोड़े चलाते हैं,
इज़्ज़त और नाम कमाते हैं।

पर वह जान ही कहाँ पाता है
कि मुट्ठी भर पैसों से
आज तक कितने लोग
सच में मुस्कुरा पाए हैं।

शहर में उसने
न जाने कितने मकान बनाए,
पर कितने मकान वालों ने
उसे सड़क पर जाते पहचान पाए?

सबके लिए वह बस
एक मज़दूर, एक मिस्त्री भर है,
पैसों की इस दुनिया में
हम आदमी कहाँ बन पाए हैं?

बिल्कुल हमारी तरह
संवेदना, प्यास और खुशी लिए जीने वाला,
हमारे घर को खड़ा करने वाला इंसान—
हम उसे इंसान कहाँ देख पाए हैं?

Wednesday, December 10, 2025

मानवाधिकार का आलोक - डॉ आलोक चांटिया रजनीश

मानवाधिकार

आलोक के रास्ते सीधे नहीं है,

लोग सिर्फ पूर्व के ,

भरोसे रहते नहीं है ।

आलोक यूं तो ,

आसमान से सीधे चला आता है ।

पर इस तरह मुंह उठाकर आने पर,

वह किसे पसंद आता है ?

अब तो लोग सुबह ,

दरवाजा भी नहीं खोलते हैं,

कि आलोक आंख खोलते ही ,

सबसे पहले दिखाई दे ।

उन्हें तो आलोक कमरों के, 

अंदर वह वाला पसंद है ।

जो अपना हिसाब,

विद्युत को पाई पाई दे।

आलोक भी क्या करें ,

जब उसके प्रारब्ध में,

ना चाहते हुए भी निकलने की ,

फैलने की अवस्था है।

शायद यह गलती आलोक की है,

कि उसका स्पर्श,

हर किसी से लिए बिना मोल के,

खेलते रहने की व्यवस्था है।

इसीलिए दरवाजे बंद होने पर,

अब वह बिखरने लगा है ।

पर खुश है कि उसकी,

इस बिखराव से ,

खेतों में कम से कम ,

अनाज का कोई अर्थ देने लगा है।

कहीं फूल तो कहीं गेहूं ,

उस आलोक से मिलकर ,

न जाने कितनों की भूख मिटा जाते हैं ।

पर आदमी की ,

दुनिया में बहुत कम है ।

जो आलोक के इस रूप के साथ ,

खड़े नजर आते हैं ।

क्योंकि जब से पैसे से, 

आलोक मिलने लगा है।

हर पल सभी के घर में,

एक छोटा सा बल्ब चमकने लगा है।

बल्ब ना हुआ मानो गूगल, 

और ए आइ टूल हो गया है।

प्राकृतिक आलोक से हर कोई दूर,

बस कृत्रिम दुनिया में, 

मशगूल हो गया है।

अंतिम बार तुमने खुद बढ़कर,

आलोक से कब हाथ मिलाया था ?

सोच कर देखो क्या वह,

हर सुबह तुम्हारे घर,

निस्वार्थ भाव से नहीं आया था ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


 

Sunday, December 7, 2025

पैदल जाते हुए राहगीर को देखकर, एक रिक्शावाला अमीर समझ जाता है आलोक चांटिया "रजनीश"

 पैदल जाते हुए राहगीर को देखकर,

एक रिक्शावाला अमीर समझ जाता है ।

पर एक कार वाले को,

वह गरीबी नजर आता है।

पैदल चलने वाला अपनी,

 जेब को टटोल कर देखता है।

फिर अपने आप को ,

दिल ही दिल समझाता है, 

पैदल चलने के कितने,

ज्यादा फायदे होते हैं।

जो कारों पर चलते हैं वह,

पूरे उम्र अपने,

खराब स्वास्थ्य को रोते हैं।

इसीलिए वह धीरे-धीरे कई,

 किलोमीटर तक पैदल चला जाता है।

उसके पीछे-पीछे वह, 

रिक्शावाला भी चला जाता है।

जो यह सोचता है कि ,

कुछ देर चलने के बाद यह, 

निश्चित रूप से थक जाएगा।

और उसके हिस्से में भी आज ,

दो रोटी का निवाला आ जाएगा ।

पर पैदल चलने वाला इसी,

 गुणा भाग में अभी भी लगा रहता है।

कि अपनी पेट की आग को, 

बुझाने के लिए अगर कुछ देर,

वह और पैदल चल लेता !

तो नुक्कड़ पर खड़े,

चाय वाले को ₹1 दे देता!

और चाय पीकर अपनी भूख को,

थोड़ी देर और मिटा लेता!

खुश हो लेता कि,

आज वह अपनी यात्रा को भी,

पूरी कर आया ,

अपनी भूख भी मिटाया,

और अपनी जेब में,

कुछ पैसा भी बचा लाया ।

पर रिक्शा वाले के जीवन में,

 दूसरी कहानी चल रही होगी!

कि भगवान आज मैंने ऐसा,

क्या गलत काम किया है ?

जो तुमने मेरे सहारे को भी छीन लिया है ।

लोग पैदल चले जा रहे हैं,

पर मेरे रिक्शे पर बैठने नहीं आ रहे हैं ?

पर वह कार चलने वाला,

जो तेजी से दोनों को पार करके,

चला गया है ।

वह किसी समारोह में मंच पर,

बोल रहा होगा ।

कि अभी उसने रास्ते में ,

दो गरीब को देखा है ।

जिनके हाथों में नहीं अमीरी की रेखा है।

इस अमीरी गरीबी की लड़ाई में,

हर कोई यह सोच रहा है ।

कि कौन किस अमीर हो रहा है ?

कौन कितना गरीब हो रहा है?

कौन पेट भर के सो रहा है?

कौन खाली पेट ही रो रहा है?

सभी के अपने-अपने फसाने हैं,

बस यही को सुनना सुनाने,

जिंदगी कितने बहाने हैं। 

आलोक चांटिया "रजनीश"


Saturday, December 6, 2025

भगवान भी ऐंठ जाते हैं- आलोक चांटिया रजनीश

 

भगवान भी ऐंठ जाते हैं,
जब हम उनके ,
दरवाजों पर नहीं जाते हैं।
ऐसा मैं नहीं ,
हर लोग कहते रहते हैं।
इसीलिए कम से कम हफ्ते में ,
एक बार लोग भगवान से, 

मिलने जाते रहते हैं।
वह बात अलग है कि ,
उसके अलावा किसी भी दिन,
उन्हें ना भगवान की चिंता होती है ,
ना भगवान के भूख की चिंता होती है,
हर कोई अपने सांसों की,
दरिया में बस बहते रहते हैं।
सपनों में जिंदगी,
खोई खोई रहती है।
कभी-कभी जब मनुष्य,
यह जान ही नहीं पाता है कि,
उसके जीवन में दर्द कहां से आ गया ?
तब उसे कोई यह बता जाता है ।
कि लगता है कि तुम्हारा भगवान से,
कोई नहीं है नाटा !
तुम मंदिर क्यों नहीं जाते हो?
सारी परेशानियों का निचोड़, 

क्यों नहीं वहीं से पाते हो?
भगवान भी तो,
मनुष्य की तरह ही होता है।
उसमें भी घृणा ईर्ष्या,
द्वेष का भाव रहता है।
इसीलिए जब भी,
रास्ते से निकला करो ।
मंदिर को देखकर ,
निकल मत जाया करो ।
खुद ब खुद अपने कदम को, 

उसकी तरफ ले जाया करो।
थोड़ी देर रुका करो ,
अपने सर को झुकाया करो।
भगवान यह देखकर ,
खुश हो जाएगा ,
जब वह तुम्हें अपने कदमों में पाएगा।
क्योंकि वह भी यह ,
सोचकर खुश हो जाता है ।
कि अभी भी मनुष्य मुझसे,
बड़ा होने की कोशिश नहीं कर रहा है ,
मेरे आगे ही आकर अपने,
हर दर्द आंसू के लिए मर रहा है ।
इसीलिए कभी-कभी घर पर,

 लौटने पर ऐसा लगता है कि, 

अब जीवन मेरा सुधर जाएगा !
क्योंकि अब भगवान का क्रोध ,
हमारे हिस्से नहीं आएगा ।
हम उसके मंदिर में जाकर, 

उससे मिले हैं,
पत्थर में भी दिल होता है ,
यह महसूस कर आए हैं ।
और तब तो पूछो ही मत, 

कितनी खुशी का ,
जीवन में प्रसार दिखाई देता है ।
जब मंदिर से लौट के आने के बाद,
हमारे जीवन में खुशियों का,
ज्वार दो चार रहता है ।
हम लड़ते रहते हैं कि ,
हम कोई गुलाम नहीं रह गए हैं ।
हम गुलाम के रास्तों से ,

दूर निकल आए हैं ।
पर अगर भगवान के आगे अपना,
सर झुका कर नहीं आए हैं!
तो भला कितने पल ,
हम खुश रह पाए हैं ?
यही तो गीता भी हमको, 

समझा कर चलती जा रही है,
कि जो भी विश्वास तुम्हें दिखाना है ,
मुझ में ही दिखाना है ।
अगर अपने जीवन में सुख,
समृद्धि और ज्ञान को पाना है ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, December 2, 2025

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस और मानवाधिकार: मानव-शास्त्रीय दृष्टिकोण, सांस्कृतिक व्यवहार और वैश्विक संदर्भ** डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


 **अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस और मानवाधिकार:


मानव-शास्त्रीय दृष्टिकोण, सांस्कृतिक व्यवहार और वैश्विक संदर्भ**

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

अखिल भारतीय अधिकार संगठन


सारांश


डार्विन का “योग्यतम की उत्तरजीविता” सिद्धांत प्रकृति की प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाता है, परंतु मानव-सभ्यता का विकास सामाजिक-सांस्कृतिक पूरकता के आधार पर हुआ है। दिव्यांगता को यदि केवल जैविक अंतर मानकर छोड़ दिया जाए, तो यह प्रकृति की ओर वापसी होगी; जबकि आधुनिक राज्य, संस्कृति और मानवाधिकार इस जैविक विविधता को सामाजिक शक्ति में रूपांतरित करते हैं। अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस इसी सांस्कृतिक परिवर्तन का प्रतीक है।



1. मानव-शास्त्रीय प्रस्तावना


मानव-शास्त्र यह मानता है कि मानव का अस्तित्व केवल जैविक नहीं, बल्कि जैव-सांस्कृतिक (Bio-Cultural) है (Boas, 1911)।

अर्थात—


शरीर सीमाएँ निर्धारित करता है,


संस्कृति उन सीमाओं को बदल देती है।



दिव्यांगता भी जैविक कमी नहीं, बल्कि एक सामाजिक निर्माण (Social Construction) है—और इसका स्वरूप समाज द्वारा दी गई सुगम्यता, अवसर और स्वीकृति पर निर्भर करता है (Douglas, 1966; Ingstad & Whyte, 1995)।


इस दृष्टि से दिव्यांगजन को समाज की “कमजोर कड़ी” नहीं, बल्कि विविधता की अभिव्यक्ति माना जाता है।


2. जैविक अंतर और सामाजिक अर्थ: मानव-शास्त्रीय दृष्टिकोण


मानव-शास्त्र बताता है कि—


(1) शरीर के अंतर हमेशा से मानव समाज में मौजूद रहे हैं


शारीरिक भिन्नता मानव-प्रजाति की मूल विशेषता है। प्रागैतिहासिक काल की हड्डियों में भी विकृतियाँ, लिम्ब-डिफॉर्मिटी और चोटों के प्रमाण मिलते हैं (Tilley 2015)।


(2) फिर भी समाज उन्हें संरक्षण देता रहा है


निएंडरथल मानव के कंकाल में मिले साक्ष्य बताते हैं कि गंभीर शारीरिक अक्षमता वाले व्यक्तियों को भी समूह ने जीवनभर संरक्षण दिया (Shanidar Cave Skeleton, Solecki 1971)।

यह दर्शाता है कि मानव समाज स्वभाव से करुणाशील रहा है, और दिव्यांगजन की रक्षा हमारी जैविक बुनियाद का हिस्सा है।


(3) दिव्यांगता का अर्थ संस्कृति बनाती है


कुछ संस्कृतियों में—


अंधत्व को आध्यात्मिक शक्ति माना गया,


बहरापन सांकेतिक भाषा की एक परंपरा बना (Nyst, 2007),


मानसिक रोग को देवत्व या श्राप दोनों रूपों में देखा गया।



इसलिए मानव-शास्त्र का मूल सिद्धांत है—

“दिव्यांगता शरीर की नहीं, संस्कृति की व्याख्या है.”



3. भारतीय संदर्भ: दिव्यांगता का सांस्कृतिक आयाम


भारत में दिव्यांगता का सामाजिक अर्थ हमेशा एक जैसा नहीं रहा। मानव-शास्त्रीय अध्ययनों में तीन प्रमुख तथ्य उभरते हैं—


(1) पारंपरिक समाज में दिव्यांगता के प्रति द्वैत दृष्टिकोण


कुछ समुदाय दिव्यांग बच्चों को “दैवीय संकेत” मानते थे (Sax, 2010), जबकि कुछ स्थानों पर सामाजिक अलगाव पाया गया।


(2) संयुक्त परिवार मॉडल सहयोगी संरचना प्रदान करता था


ऐतिहासिक रूप से भारतीय परिवार संरचनाएँ दिव्यांगजन को


सुरक्षा


कामकाज में भूमिका


सामाजिक सम्मान

देती रही हैं।



(3) आधुनिक राज्य एक नए सांस्कृतिक बदलाव का वाहक है


2015 में “विकलांग” के बजाय “दिव्यांग” शब्द अपनाना भाषा के माध्यम से समानता की दिशा में एक सांस्कृतिक क्रांति है। भाषा सामाजिक अर्थ बदलती है—और अर्थ जीवन-बोध को।



4. दिव्यांगता और मानवाधिकार: मानव-शास्त्रीय तर्क


मानव-शास्त्र का केंद्रीय विचार है:

“मानव होने का अर्थ है—अंतर का सम्मान।”


दिव्यांगजन के अधिकार इसी विचार पर टिके हैं—


जीवन का मूल अधिकार (Right to Life)


समानता (Equality)


गतिशीलता की स्वतंत्रता (Mobility rights)


शिक्षा, आजीविका और सम्मान का अधिकार



ये अधिकार अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणाओं में भी स्थापित हैं—


UDHR (1948)


UNCRPD (2006)


RPwD Act India (2016)



ये सभी दस्तावेज कहते हैं कि दिव्यांगता सामाजिक चुनौती है, व्यक्ति की नहीं।



5. दिव्यांगता और संस्कृति: दया नहीं, सहभागिता


मानव-शास्त्रीय दृष्टि दिव्यांगजन को “सहायता के पात्र” नहीं, बल्कि सामाजिक संसाधन मानती है।


पैरालंपिक इसका सबसे बड़ा मानवीय उदाहरण है।


भारत में नौकरी आरक्षण, खेल, कला और शिक्षा में सहभागिता इसी सांस्कृतिक परिवर्तन का हिस्सा है।



यह “योग्यतम की उत्तरजीविता” की अवधारणा का विकल्प है—

यह सामाजिक उत्तरजीविता (Social Survival) का मॉडल है।



6. अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस की थीमें (मानव-शास्त्रीय विश्लेषण)


सभी वार्षिक थीमों का मूल संदेश यह है कि—


समाज की संरचना सुधारी जाए


अवसर तटस्थ बनाए जाएँ


दिव्यांगजन को विकास की धारा में बराबरी से जोड़ा जाए



यह स्पष्ट रूप से संरचनात्मक-कार्यात्मक मानव-शास्त्र (Structural Functionalism; Parsons 1951) का प्रतिबिंब है—

कि समाज का प्रत्येक सदस्य सामाजिक संतुलन का आवश्यक घटक है।



7. मानवाधिकार, अधिवक्ता दिवस और न्याय का Anthropological Ecosystem


3 दिसंबर को भारत में अधिवक्ता दिवस भी मनाया जाता है।

यह मानवाधिकारों की न्यायिक सुरक्षा का सांस्कृतिक प्रतीक है।


मानव-शास्त्र बताता है कि—

कानून मात्र नियम नहीं, बल्कि संस्कृति का जीवित दस्तावेज होता है (Malinowski 1926)।


इसलिए दिव्यांगजन अधिकार केवल शासन का विषय नहीं—

वे हमारे सांस्कृतिक दायित्व का हिस्सा हैं।


निष्कर्ष


दिव्यांगजन दिवस केवल “उत्सव” नहीं, बल्कि—


सांस्कृतिक चेतना,


सामाजिक बराबरी,


जैविक अंतर की स्वीकृति,


और मानवाधिकारों की पुनर्स्थापना



का दिन है।


मानव-शास्त्रीय दृष्टि स्पष्ट कहती है कि—

दिव्यांगता कमी नहीं, विविधता है।

दया नहीं, अधिकार है।

सहारा नहीं, समानता है।


और यही वह दृष्टि है जिसमें दिव्यांगजन स्वयं को पूर्ण मानव की तरह जीते हैं—सम्मान के साथ, अधिकारों के साथ, और गर्व के साथ।



संदर्भ (References)


(सभी प्रमुख मानव-शास्त्रीय एवं वैश्विक स्रोत)


1. Boas, Franz (1911). The Mind of Primitive Man.



2. Douglas, Mary (1966). Purity and Danger.



3. Ingstad, B. & Whyte, S. R. (1995). Disability and Culture.



4. Malinowski, Bronislaw (1926). Crime and Custom in Savage Society.



5. Parsons, Talcott (1951). The Social System.



6. Solecki, Ralph (1971). Shanidar: The First Flower People.



7. Tilley, L. (2015). “Theory and Practice in Paleopathology.” Journal of Archaeological Research.



8. Nyst, Victoria (2007). A Grammar of Adamorobe Sign Language.



9. Sax, William (2010). Gods and Healing in the Himalayas.



10. United Nations (1992–2023). International Day of Persons with Disabilities Themes.



11. UNCRPD (2006). Convention on the Rights of Persons with Disabilities.



12. RPwD Act (2016), Government of India.



13. WHO (2011). World Report on Disability.

Monday, December 1, 2025

मैं कहां खो गया आलोक चांटिया "रजनीश"


 शहर में कब अकेला हो गया,

 यह जान ही नहीं पाया।

यह सच है जब घर से चला था ,

तब यहां अकेला ही था आया।

लगा ऐसे जैसे जानवरों की बस्ती में,

मैंने भी अपनी एक बस्ती बना ली है।

जीवन की हजारों ख्वाहिशें,

मैंने चुटकियों में पाली है ।

हर तरफ खिलखिलाते गुनगुनाते,

लोगों की महफिल सजती देखकर,

मैं मस्त हो जाता था ।

फिर भला कहां कब किसी की,

बात में सुन पाता था ।

पर यह जान ही नहीं पाया कि,

जो मेरे सामने आकर खड़े होते हैं ।

वह महज एक छलावा होते हैं ।

जो अपने कामों की,

गरज से खड़े रहते हैं ।

कुछ देर मेरे सामने या, 

कभी-कभी बैठ भी जाते हैं।

पर उनके काम पूरे हो जाने के बाद,

वह कभी कहां नजर आते हैं?

इसी भ्रम में मैंने कभी ,

अपने बगल किसी को,

अपना कह कर खड़े होने की,

जरूरत ही कहां समझी थी?

यह भूल थी या सही रास्ता,

इस बात की बात को ,

सांस कहां समझी थी ?

दर्द तो तब हुआ जब,

कमरा खाली होता चला गया।

दरवाजे भी दस्तक की चाह में,

चुपचाप बंद ही रह गया।

कभी-कभी झींगुरों की तरह,

कुछ लोगों ने अपने होने का,

एहसास कराया।

पर उनकी आवाज से ना, 

जीवन में कोई रास आया ,

ना मैंने कुछ बदलता हुआ पाया।

लगता रहा कि मैंने मुट्ठी में, 

सब कुछ बंद कर लिया हूं ।

पर रेत कब रूकती है,

इसको ही नहीं समझ पाया।

अंधेरे के बाद उजाला होता है,

इस बात को सोच-सोच कर, 

मुझे यह विश्वास रहता है।

 क्योंकि जिसे देखिए वही,

इस दर्शन को कहता रहता है ।

परेशान मत हो एक दिन,

 तुम्हारा भी अच्छा समय आएगा।

जब फिर से वही माहौल होगा।

वही दौर छाएगा ।

पर मझधार में फंसा हुआ,

मैं अभी अपने को,

किनारे पर कैसे लाऊं ?

डूबते को तिनके का सहारा होता है,

पर वह तिनका कहां से पाऊं?

बस इसीलिए शहर के ,

समुद्र में डूब कर अकेला हो गया,

कोई जान ही नहीं पाया कब,

अंधेरे में आलोक कहां खो गया ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


Sunday, November 30, 2025

मिट्टी और बीज का, कोई मेल कहां होता है?- आलोक चांटिया "रजनीश


 मिट्टी और बीज का,

कोई मेल कहां होता है?

रंग रूप गुण आकार प्रकार,

सब कुछ तो अलग होता है। 

फिर भी मिट्टी के साथ ही,

बीज के अंदर का ,

हर अर्थ छिपा होता है ।

बीज की दृष्टि यह पहचान जाती है ,

कि उसके जीवन की कहानी, 

मिट्टी से पहचानी जाती है।

वह कभी मिट्टी से,

दूरी नहीं बनाता है ।

उसे रंग रूप आकार प्रकार, 

में नहीं फसाता है।

समर्पित हो जाता है ,

मिट्टी के साथ जीवन जीने के लिए ,

तभी तो पृथ्वी पर प्रकृति ने,

 न जाने कितने अर्थ दिए।

अपने को जानवर से दूर करके,

आदमी भी बहुत दूर निकल आया है ।

पर उसने अपनों की ही बीच, 

एक ऐसा जगत बनाया है! 

जहां पर आदमी आदमी से, 

अलग दिखाई देने लगा है।

मिट्टी का शरीर पाकर भी, 

उसमें से भला कहां कुछ,

प्रेम सहयोग भाईचारा का,

अर्थ उगा पाया है ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Saturday, November 29, 2025

रिश्ते लौटते नहीं है डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 अब विवाह लोग अपने,

घरों से नहीं करते हैं।

सिर्फ और सिर्फ ज्यादातर, 

अपनी दहलीज पर मरते हैं।

क्योंकि विवाह के बाद के,

 संबंध अब स्थिर नहीं होते हैं।

इसीलिए लोग होटल पार्क, 

मैदान गेस्ट हाउस ढूंढ लेते हैं।

संबंध के नाम पर ,

उसी को घर का नाम देते हैं।

संबंध लाख ढूंढने पर फिर,

घर की तरफ लौट ही नहीं पाता है।

क्योंकि संबंधों का दायरा ही अपना,

जन्म घर के द्वारचार से नहीं,

होटल के रिसेप्शन से पाता है।

शहनाई की आवाज भी, 

होटल से आती है ।

सोहर बन्ना की गूंज ,

बड़ी-बड़ी महफिले पाती हैं।

कहां कोई अब,

ढोलक बजाता है ।

कहां घर के आंचल में लिपटी हुई,

औरतें कोई गाना बैठकर गाती हैं।

कहां कोई अपने बेटे बेटी के लिए,

सुंदर से गीत सुनाती हैं।

सब अब किराए के,

लोगों को लेकर चले आते हैं।

संबंध का यही अर्थ,

तो अब हम पाते हैं ।

कोई चाहता तक नहीं है कि,

मांग की लकीरें उसके, 

जीवन के अर्थ को,

दुनिया को बता जाएं ।

सौंदर्य के ललक में कुछ ,

ऐसा चल रहा है ,

कि उर्वशी मेनका भी शरमा जाए।

इसीलिए घरों में कमरे,

कम होने लगे हैं।

होटल और गेस्ट हाउस में, 

कमरों की संख्या बढ़ने लगी है ।

कुछ पल के लिए ही रिश्तेदार ,

रिश्ते चारों तरफ रहे।

तभी अच्छा लगता है ,

अब कोई भला रत जगा में, 

रात-रात कहां जगता है?

संबंध भी आत्मा की तरह, 

कपड़े बदलने वाला एक, 

सिलसिला होता जा रहा है।

आदमी आज फिर संस्कृति से ,

निकल पशु जगत में ,

खोता जा रहा है ।

अब घरों के दरवाजों से, 

विदाई का शोर सुनाई नहीं देता है ।

कोई किसी का हाथ पकड़ कर,

कार पर बिठा लेता है ।

लोग हाथ झाड़ कर फिर, 

अपने घरों को लौट आते हैं।

संबंध जो सड़क पर बनाए गए हैं ,

अब घर तक लौटकर नहीं आते हैं ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Monday, November 24, 2025

हर दर्द छुपा कर, मुस्कुराना था - आलोक चांटिया "रजनीश"

 

हर दर्द छुपा कर,
मुस्कुराना था ।
अच्छा होना तो ,
सिर्फ एक बहाना था।
सुबह शाम रात के बदलते,
रहने की तरह न जाने,
कितनों को मेरे ,
जीवन में आना था ।
ना जाने कितनों को ,
मेरे जीवन से जाना था ।
किसी के साथ,
रुकने का मन था ।
किसी को छोड़ जाना था। 

किसी का दरवाजा की तरफ,

 देखकर इंतजार करना था।

 किसी को सन्नाटे ,
रास्तों पर ढूंढ जाना था।
आसान था किसी के लिए,
यह कह देना कि,
झूठ है सब रिश्ता,
लगता है ऐसा सामानों की तरफ ,
दुनिया में सब कुछ,
कितना है सस्ता ।
पर भला किसे यह सब ,
अब बताना था ।
सच को झूठ ,
झूठ को सच कैसे बनाते हैं?
यही तो जाना था ।
जिनको अपना माना था,
वह सब झूठे निकलते चले गए ,
जिनको झूठा समझा था ,
वह अपने होते चले गए।
इस जादू के खेल को,
इस संसार में मैंने ,
पहली बार पहचाना था। 

आंखों से आंसू नहीं ,
सिर्फ जोर से खिल खिलाना था ।
क्योंकि हर दर्द को,
छुपा कर जी जाना था।
हंसना तो आज भी ,
एक बहाना था ।
क्यों है जीवन में कुछ,
ऐसा दर्द नहीं है,
बताते क्यों हैं कहता क्या,
जब हर किसी को दर्द से,
हाथ मिले हुए ही पाना था।
अपना दर्द दिखा कर ,
अपना प्रतिकर्षण,
क्यों बढ़ाना था ।
इसीलिए चुपचाप हर किसी को, 

देखकर मुस्कुराना था।
मैं एक अच्छा आदमी नहीं हूं ,
यही बताना था ।
पर इतना साफ सुनकर भी,
कोई कहां सच मान पाता है?
बचपन से जवानी बुढ़ापे तक,
झूठ को लेकर ही ,
ज्यादातर जीता है हर व्यक्ति,
इसीलिए सच को सच ,
कैसे मान पाना था?
चुपचाप मुस्कुराते रहना,
तो एक बहाना था ,
मुझे सिर्फ अपने भीतर,
एक दर्द छुपाना था।
डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

Friday, November 14, 2025

रिश्ते का हिसाब -डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 हर किसी के पास अपने

रिश्तों का हिसाब होता है।

दर्द-शिकायत का

एक कारवां भी बेहिसाब होता है।


जरा-से शब्द डोलते नहीं,

कि अचानक भीतर

एक हाहाकार होता है।


कोई पूछता है—

“तुमने मेरे लिए अब तक क्या किया?”

कोई सवाल करता है—

“तुमसे जुड़कर फायदा ही क्या मिला?”


क्या कभी तुमने

एक पल भी ठहरकर

मेरी ओर मुड़कर देखा?

कुछ को तो बस यही लगता है—

समय की बर्बादी से

ज़्यादा कुछ हासिल नहीं होता।


किसी को समझ पाना

वाकई मुश्किल होता है—

पर हर रिश्ते का हिसाब

ज़रूरी भी तो नहीं होता।


कुछ रिश्ते बस साथ-साथ

चलते रहने के लिए बने होते हैं;

यह हर दिल का छोटा-सा सपना होता है।

ज़रूरी नहीं कि

नापतोल कर चलें,

या किसी स्वार्थ-उद्देश्य के लिए

कभी मिलें।


बस इतना एहसास ही काफी है—

कि कोई कहीं दूर

मेरे लिए भी जी रहा है।

मिल नहीं पाता,

पर मिलने की बात

फिर भी करता है।


जब भी उससे मिलने की चर्चा आती है—

वह कहता है,

“अगली बार ज़रूर आऊंगा।

समय न भी मिला,

फिर भी कहीं से खोजकर ले आऊंगा।”


पर वह समय

आता ही नहीं।

दरवाज़ा उसकी आहट

सुन ही नहीं पाता।


और कोई चुपचाप

उस रिश्ते का इंतज़ार करता है—

जो है भी…

और नहीं भी।

जो एक झूठ भी है,

और एक सच भी।


बिना पानी के

पेड़ सूख जाता है।

बिना हवा के

दम घुट जाता है।

और फैलते हुए सन्नाटे को देखकर

कौन सच में समझ पाता है—

कि एक रिश्ता

उसका भी है,

और उससे जुड़ा

मेरा भी नाता है?


इसीलिए अक्सर

खुद से ही

एक अनकहा हिसाब चलता रहता है।

जहाँ रिश्ता न सामने होता है,

न कोई ख्वाब।

पर सवाल-जवाबों के बीच

एक एहसास—

बेहिसाब होता जाता है।


— आलोक चांटिया “रजनीश”

Thursday, November 6, 2025

जब वह कमरा खोलता है डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

जब वह थक हार कर,
अपने कमरे को खोलता है,
फिर वहां उससे ,
कोई नहीं बोलता है।
एक सन्नाटा सा पसरा रहता है,
वहां सिर्फ कुछ फोटो ,
कुछ बिखरी हुई ,
किताबें के साथ डोलता है ।
न जाने कितने दर्द ,
पूरे दिन उसके फोन पर बहे।
लेकिन वह अपना दर्द, 

आलोक किससे कहे ।
रात दिन सब अपनी ही,
खुशी को ढूंढने की,
कोशिश करते रहे हैं ।
जिसे देखिए उसने ही बताया,
संघर्ष रोटी घर दर्द विवाह,
न जाने सबने सहे हैं।
बस इन्हीं सबको अब,
बहुत पीछे छोड़ आया है, 

इसीलिए इस भीड़ में उसने, 

एक भी ऐसा नहीं पाया है ,
जो यह सोचकर हिम्मत जुटा लेता ,
कि जिसको हम लोग दर्द का रहे हैं,
उसके बिना यह कैसे ,
हर पल रह रहे हैं ।
इसीलिए कमरे का सन्नाटा उसके,
दिल के सन्नाटे से जुड़कर, 

एक संगीत पैदा कर जाता है।
जब अकेलेपन का स्वर, 

अपने सुरों में एक गीत गाता है ।
पूरे शहर का दर्द सुनकर ,
जब लौट के कमरे पर आता है,
तो सुकून के रास्तों में ,

सिर्फ वह अपने साथ,
तन मन और सांसों को पाता है ।
क्योंकि वह जानता है कि, 

यही वह है जिससे ,
उसका सच्चा नाता है ।
यह जब तक रहेंगे,
तभी तक लोग भी उसे, 

जानने की कोशिश करते रहेंगे ।
अपने हर दर्द को बताने की,

 जताने की बात करते रहेंगे।
धड़कते दिल में अपने,
खून के अलावा सबके दर्द समेटकर,
फिर वह शहर से निकलकर ,

जब भी अपने कमरे पर आता है ,
और अपने अकेलेपन का ताला खोलता है ।
तो सच मानिए उस समय, 

उससे कोई नहीं बोलता है।
सिर्फ कमरे की दीवारें जो खुद,
अकेलेपन में नीरस जीवन के साथ ,
उसका इंतजार करती रहती हैं ।
वही मुस्कुरा कर ,
सिर्फ यह कहती है ।
कि अब कुछ देर दीवारों को भी ,
किसी के होने का एहसास तो रहेगा,
कोई इस कमरे को,
तनहा तो नहीं रहेगा ।
और वह मुस्कुरा कर,
उन दीवारों की तनहाई को, 

दूर करने में उलझ जाता है।
भला कमरा भी उसके, 

अकेलेपन को कहां समझ पाता है ?
उसके आने से विस्थापित होती हुई ,
शरीर से उस हवा का दबाव, 

कमरे में कुछ हलचल कर जाता है ।
एक रखा हुआ कागज ,
अपने आप गिर जाता है ।
एक दरवाजा उस दबाव से, 

अपने आप बंद हो जाता है।
बस एक अकेले आदमी के कमरे में,
आने से इतना ही हो पाता है।
दर्द सुनने वाले का दर्द ,
कोई नहीं जान पाता है ।
धूल पड़े हुए चूल्हे की,
आग कब जली थी ?
कोई जानना भी कहां चाहता है ?
सबके अपने जीवन का, 

अपना ही अलग-अलग रायता है ।
गैस वाला भी समझ नहीं पाता है ,
कि इस घर में आदमी रहता है ,
या कोई भगवान,
जिसका भूख से क्यों नहीं कोई नाता है।
वह कभी कबार पूछ भी लेता है,
भैया क्या गैस की कोई जरूरत नहीं है?
क्या आपके घर में ,
आपके सिवा कोई नहीं है?
यह सुनकर वह,

 मुस्कुराकर रह जाता है ।
फिर फोटो में रहती हुई, 

अपनी मां की तरफ देख लेता है ।
सूनी आंखों से जीवन का,

 अर्थ जता देता है ।
जिसमें उसका दर्द खो जाता है ,
और लोगों का दर्द रह जाता है ,
जिसको मिटाने का सपना, 

लेकर उसे चलना है ।
कल के सूरज के साथ फिर से ,
उसे भगवान से मिलना है।
अभी तो सूरज की तलाश में, 

दौड़ती रात से उसे मिलना है।
अभी उसे थोड़ा और चलना है।

आलोक चांटिया रजनीश

Tuesday, November 4, 2025

रोटी का भाग्य डॉक्टर आलोक चांटिया "रजनीश"


 शहर में आज फिर एक भूखा,

बिना रोटी के सो जाएगा।

शहर में रोटी तो थी पर,

वह भला उसे कहां पाएगा?

फुर्सत ही कहां है किसी को,

अपनी भूख के बाद,

दूसरे भूखे को ढूंढने की ।

बस घर से एक हाथ निकलेगा,

और एक रोटी का टुकड़ा,

सड़क पर फेंक दिया जाएगा।

पैसे से खरीदी गई,

रोटी का मोल भी कोई,

कैसे समझे ?

किसी किसान के पसीने से,

धरती फोड़ कर निकलने वाले,

दाने का दर्द कौन समझ पाएगा ?

समय ही कहां है किसी के पास,

कि शहर में कोई आज,

फिर से भूखा सो जाएगा?

उस घर के दरवाजे को,

ताकता हुआ जानवर,

फिर भी एक रोटी का जाएगा !

क्योंकि वह मनुष्य की, 

भावना को समझने लगा है।

इसीलिए वह एक टकटकी लगाकर,

घर के सामने जागने लगा है।

वह जानता है कि हाथ से, 

रोटी फेंकी तो जा सकती हैं। 

पर किसी भूखे को,

खिलाई नहीं जा सकती हैं!

जिस रोटी के न मिलने पर, 

उसने भगवान के आगे ,

आंसू गिरा कर पूछा था ?

कि मैं ऐसा कौन सा अपराध किया है ?

जो मेरे हाथ में एक,

रोटी भी नहीं आई है ।

पर पीड़ा के पार आज ,

जब उसके हाथ में रोटी है ,

तो उसे यह बात ,

स्वयं कहां समझ में आई है?

किसान के पसीने से निकलने वाले,

दानों में सिर्फ पैसे का, 

अहंकार नहीं होता है ।

उसके एक छोटे से प्रयास से,

शहर का कोई भूखा भी, 

रोटी खाकर सोता है ।

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में जाने वाले,

एक बार भी भगवान को,

 सड़क के किनारे नहीं देख पाते हैं ।

जहां भगवान नहीं है,

वहां माथा टेक कर चले आते हैं ।

भूख मांगा करता है कि,

मुझे भूख लगी है एक रोटी दे दो !

आज इस तड़पते दिल से, 

थोड़ा सा सच्चा आशीर्वाद ले लो !

पर घर पहुंचने की जल्दी में, 

कोई कहां सोच पाता है कि,

उसके अनसुने पन से शहर में ,

एक भूखा सड़क पर,

पड़ी रोटी भी नहीं पाता है?

भगवान को पाने का ,

सरल सा तरीका,

तुम्हारे हाथ में आया था ,

पर तब तुमने भूखे को ,

कहां खाना खिलाया था ?

एक भूखा शहर में,

पानी पीकर फिर से सो लिया है ।

मानव की संस्कृति में ,

खेतों से निकली रोटी का टुकड़ा किसी,

गाय किसी कुत्ते के साथ हो लिया है।

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

Friday, October 31, 2025

नींद की यात्रा डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 हर कोई चाहता है,

सोने के बाद इस दुनिया की,

कोई बात याद ना रह जाए।

यहां तक की सपनों में भी, 

कोई ना आए ।

ताकि वह एक बार फिर वह, 

उस दुनिया से जुड़ जाए,

 जिसे छोड़कर वह ,

इस दुनिया में आया है ।

और बता सके उस परम तत्व को,

कि अभी तक उसने यहां क्या पाया है?

सुकून की गहरी नींद की,

यह यात्रा ही सुबह का,

सार बताने के लिए फिर से,

सूरज के किरण की,

दस्तक दे जाती है ।

सांसों की यह कहानी ,।

किसी दूर गगन से आने के बाद,

बस ऐसे ही चलती जाती है।

समझना आसान नहीं है,

इस तिलिस्म को ,

किसी के लिए भी यहां पर, 

जो समझ जाते हैं उनके लिए ही,

यह अपने सारे अर्थ बता जाती है ।

नींद एक बार जब ,

गहराई में डूब कर चली जाती है ,

तो शरीर तो यही छोड़ जाती है,

पर वह उस पिया से, 

मिलकर चली आती है।

जिसे देख पाना आसान कहां है?

किसी के लिए,

समय ही कहां है जो कोई, उ

सके लिए जिए ।

पर रोज यह नींद की कहानी,

 हमें यह बताती है ,

कि वह इस दुनिया में ,

उसी रास्ते से होकर आती है,

जहां से सांसों की यात्रा ,

इस पृथ्वी पर अपनी दस्तक दे जाती है ।

उपासना साधना तपस्या का,

यह मंत्र हमें वह रोज बताती है।

पर यह सुंदर बात हर व्यक्ति को,

कहां समझ में आती है? 

आलोक चांटिया रजनीश

मेरी कविता मेरी समीक्षा डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

मुझको क्यों बनाया तुमने

कविता की समीक्षा

मेरे दर्द को क्यों उकेरा तुमने ,
क्यों अपने को दिखाया तुमने ,
कोई ख़ुशी मिली दरिया से तुम्हे ,
क्यों आँखों से आंसू बहाया तुमने ,
जमीं को दर्द देते देते आज क्यों ,
मुझे ही अपनी बातो से खोद गए ,
क्या कोई गुलाब खिलेगा कभी ,
कौन कलम आज बो गए मुझमे ,
एक बीज सा जीवन था मेरा ,
जो गिर कर भी कोपल देता है ,
क्यों पैरो से कुचल डाला तुमने ,
बस कुछ मिटटी ही तो लेता है ,
आज जान मिला जान का अर्थ ,
जब तुमने किया मुझसे अनर्थ ,
कोई बात नही स्याह में आलोक ,
अपने को उजाला बनाया तुमने ,
कह भी तो नही सकते धरती हूँ ,
हर सृजन को मैं भी करती हूँ ,
क्योकि मैं दुनिया में रहती हूँ ,
ये कैसा मुझको बनाया तुमने ,
माँ होकर भी आज कुचल गई है ,
मेरी ममता कही चली गयी है ,
किसी ने बताया है नाले के किनारे ,
माली ऐसा बीज क्यों लगाया तुमने ,
बंजर कहलाती मगर अपनी होती ,
जीती मगर अपने सपने में होती ,
अब तो जिन्दा लाश हूँ पानी में ,
मुझे साँसों बिन क्यों बनाया तुमने ।
डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

.आज न जाने कितने युवा सिर्फ इस लिए लडकियों का शोषण करते है क्योकि यह एक प्रतिस्पर्धात्मक खेल हो गया है .....पर वो लड़की भी इस ख़ुशी में कि कोई तो उसको पसंद करता है .....अपना सब कुछ समर्पित करती है ...पर परिणाम गर्भपात के बढ़ते बाज़ार और लड़कियों में बढती कुंठा जिसमे उनको विकास होने के बजाये एक डर का जन्म ज्यादा हो रहा है .....................
शायद आपको यह सिर्फ एक फर्जी बात लगे पर पाने को अंदर टटोल कर इसको पढ़िए और फिर?

इसकी समीक्षा एक शब्दार्थ उत्पन्न करती है

🌾 जब प्रेम खेल बन गया: स्त्री, समाज और सभ्यता का क्षरण

प्रस्तावना

कविता हमेशा समाज का आईना होती है। पर कभी-कभी यह आईना खून से लिखा जाता है। “मुझे साँसों बिन क्यों बनाया तुमने” — यह सवाल सिर्फ एक स्त्री का नहीं, बल्कि पूरी धरती का है, जो अपने ही बच्चों के हाथों कुचली जा रही है।

आज के युवा वर्ग में प्रेम, संवेदना और संबंध जैसे शब्द अक्सर प्रतिस्पर्धा, दिखावा, और वर्चस्व में बदल गए हैं। प्रेम एक भावना नहीं, बल्कि एक खेल बन गया है — जिसमें कोई जीतता नहीं, दोनों हारते हैं — एक अपनी अस्मिता से और दूसरा अपने मानवत्व से।

मानवशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य: जब संबंधों का बाज़ार बन गया

मानव सभ्यता में प्रेम हमेशा से सृजन का प्रतीक रहा है। किंतु आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में प्रेम का स्वरूप बदल गया है।

अब यह ‘स्वामित्व’ और ‘प्रदर्शन’ का साधन बन गया है।

युवाओं में “कितने रिश्ते” और “कितनी जीत” जैसी मानसिकता ने संबंधों को प्रतियोगिता में बदल दिया है।

डिजिटल माध्यमों ने इस प्रवृत्ति को और गहराई दी है — जहाँ आकर्षण क्षणिक है, पर उसका असर जीवनपर्यंत।

इस सामाजिक विकृति ने स्त्रियों को एक “उपभोग्य वस्तु” के रूप में प्रस्तुत किया है, न कि एक सृजनकर्ता, संवेदना-स्रोत या व्यक्तित्व के रूप में।

स्त्री का दर्द: धरती के समान मौन पीड़ा

कविता में “माँ होकर भी आज कुचल गई है” — यह पंक्ति हर उस स्त्री का प्रतीक है जो समाज की क्रूरताओं के नीचे दबकर भी मुस्कुराती है।
वह धरती की तरह है —
जिसे बार-बार खोदा जाता है,
पर वह हर बार कोपल देती है।

किन्तु जब यह धरती भी मौन हो जाए — तो समझिए कि सभ्यता अपने अंतिम चरण में है।

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: झूठी स्वीकृति की भूख

कई बार शोषण के पीछे सिर्फ वासना नहीं, बल्कि स्वीकृति की भूख होती है। युवाओं के भीतर प्रेम नहीं, बल्कि “मान्यता पाने” की लालसा पल रही है।
लड़कियाँ यह सोचती हैं कि “कोई तो है जो मुझे पसंद करता है”, और इस भ्रम में वे खुद को समर्पित कर देती हैं —
जबकि लड़के इस “जीत” को अपनी पुरुषत्व की ट्रॉफी मान लेते हैं।

परिणाम —

गर्भपात के बढ़ते मामले,

मानसिक अवसाद,

आत्म-सम्मान की गिरावट,

और सबसे भयावह — संवेदनशीलता का क्षय।

नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्विचार की आवश्यकता

भारतीय संस्कृति में स्त्री को “शक्ति” कहा गया है — न कि “संपत्ति”।
जब समाज इस मूल दर्शन को भूल जाता है, तब विकास नहीं, विनाश शुरू होता है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि “आधुनिकता” का अर्थ चरित्रहीन स्वतंत्रता नहीं है।
यदि हम सच्चे अर्थों में आधुनिक बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें संवेदना और मर्यादा को पुनर्स्थापित करना होगा।

निष्कर्ष: धरती और स्त्री — दोनों को सांस लेने दो

डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश” की यह कविता एक चेतावनी है
धरती की बेटी बोल रही है, पर हम सुन नहीं रहे।
वह कहती है —

“अब तो जिन्दा लाश हूँ पानी में,
मुझे साँसों बिन क्यों बनाया तुमने।”

अगर समाज इस पुकार को नहीं सुनता, तो अगली पीढ़ियाँ सिर्फ तकनीकी रूप से जीवित होंगी —
भावनात्मक रूप से नहीं।

Thursday, October 30, 2025

एकांत और भगवान डॉक्टर आलोक चांटिया "रजनीश"


 मेरे कमरे के ठीक बाहर,

पूरा संसार चलता रहता है।

कभी कोई गाड़ी निकलती है,

कभी कोई ठेले वाला निकलता है।

कभी कुछ हंसने की, 

आवाज भी आ जाती है ।

कुछ देर को संसार की बातों से ,

जीवन की कई बातें ठहर सी जाती है ।

पर कमरे के अंदर भी तो,

एक दुनिया ही रहती है ।

जो यादों की दुनिया होती है,

बातों की दुनिया होती है, 

सोचने को मजबूर करती रहती है,

कि कल जिनके साथ मैं,

जी रहा था ।

जिनको मैं अपना कह रहा था।

आज जब वह मेरे जीवन में, 

कहीं नहीं रह गए हैं।

लौटने की बात भी,

फिर से नहीं कह गए हैं।

दिल दिमाग सब कुछ शायद,

उनकी छाप के साथ यही रह गए हैं ।

इसीलिए अब कोई नई तस्वीर मैं,

दिल में नहीं बना पाता हूं।

दिमाग में भी किसी के साथ,

नए जीवन की बात,

नहीं सोच पाता हूं ।

इसीलिए दो दुनिया के बीच मझधार में ,

अपने को खड़ा पाता हूं ।

कमरे की दुनिया से निकल कर,

कमरे की ठीक बाहर की, 

दुनिया में कहां आ पाता हूं?

यह सोचकर,

संतोष भी करना सीख गया हूं ।

कि मेरी तरह ही मंदिरों के,

दरवाजों के भीतर जो बंद रहता है।

संसार का हर आदमी ,

जिसे भगवान कहता है।

वह भी तो एकांत में रहकर ही,

दुनिया की प्रसन्नता को ,

देने का प्रयास करता रहता है।

खुद पत्थर की मूर्ति बन जाता है ।

लेकिन मुस्कुराता रहता है।

कब वह जिंदा लोगों के बीच,

अपने भी जीवन की,

कोई बात सुनने को पाता है।

जो भी आता है बस वह उसे,

पत्थर को भगवान कहकर, 

अपनी बात सुना जाता है।

एक बंद कमरे में भगवान भी ,

अपने कमरे की बाहर की दुनिया को,

कहां यह बात पाता है ,

कि जब तुमने मुझे,

मनुष्य सा ही समझ लिया है।

तो क्या कभी मुझे भी मेरे जीवन का,

थोड़ा सा हिस्सा मेरे लिए दिया है ।

बस यही सोच कर मैं कमरे में,

चुपचाप अपनी दुनिया में रह जाता हूं।

कमरे के बाहर दौड़ती भागती ,

दुनिया में मैं कुछ भी नहीं पाता हूं ।

शायद मैं भी भगवान बन जाता हूं ?

शायद मैं भी भगवान बन जाता हूं ?

आलोक चांटिया "रजनीश"

Saturday, October 25, 2025

जीवन पथ पर पिता डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

घर की दहलीज से निकलते हुए पैर,
तब अचानक ही रुक जाते हैं ।
जब वह कानों में ,
एक ऐसी आवाज पाते हैं।
जो कह रहा होता है,
क्या तुम्हारा जाना जरूरी है?
मुझे लगता है मेरी तबीयत,
कुछ खराब चल रही है, 

शरीर की सारी ऊर्जा ,
कुछ अजीब सी निकल रही है।
वहां लखनऊ में तुम्हारा,
ऐसा क्या काम है?
जो तुम्हारा जाना जरूरी है, 

जाते हुए पैर थम से जरूर जाते हैं।
पर वह कहां यह समझा पाते हैं ?
कि दो रोटी की तलाश,
हर पेट को रहती है।
सम्मान की बात,
हर आंख हर पाले रहती है।
हाथ फैला कर तो,
भीख भी मिल जाती है,
इस दुनिया में ।
पर पसीने की रोटी,
बड़ी मुश्किल से मिलती है। 

इसीलिए घर की दहलीज, 

छोड़ना जरूरी हो जाता है। 

वरना कोई अपनों को ,
कहां आसानी से छोड़ पाता है ?
लेकिन यह बात पिता को,
समझा पाना कोई आसान बात तो नहीं है?
क्योंकि आज मेरी मां इस दुनिया में ,
नश्वर शरीर से नहीं है ,
जो मुझे उंगली पकड़ कर,
यह समझा गई थी ।
और मेरे आश्वसन पर,
चुपचाप अपना उत्तर पा गई थी ।
कि किसी भी परिस्थिति में, 

आपके बाबू को मैं ,
छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।
जब भी वह आवाज देंगे ,
मैं बार-बार लौट कर आऊंगा।
भले ही कितने जीवन के, 

रिश्ते बिखर जाए टूट जाए।
मेरे हाथों से ही मेरे,
कल के सपने निकल जाए,
फिर भी मैं आपको,
निराश नहीं करूंगा।
मां मैं आपके बाबू के साथ,
हर पल रहूंगा ।
और फिर मैं दहलीज से निकले हुए,
पैर को वापस ले आता हूं।
मुस्कुराते हुए अपने पिता की ओर,
यह कह भी जाता हूं ,
नहीं ऐसा कोई जरूरी काम नहीं है,
मुझे लखनऊ में ।
आप कहते हैं तो मैं ,
यही और रह जाता हूं, बहराइच में ।
बस यह सुनते ही पिता को,

 एक अजीब सा सुकून मिल जाता है ।
और वह फिर से बेपरवाह हो जाते हैं ।
और मेरी तरफ से अपना,
ध्यान हटाकर फिर रूस यूक्रेन,
अफगानिस्तान पाकिस्तान की,
बहस में फंस जाते हैं ।
रिश्ते कई बार आपके ,
होने से ही स्थिर रह जाते हैं। 

बने रह जाते हैं ।
मंदिरों के देवता ,
जिंदा ही घर में मिल जाते हैं ।
इसीलिए अंधेरे में आलोक, 

सभी को बहुत भातें हैं। 

आलोक चांटिया रजनीश


Monday, October 20, 2025

दीपक का विद्रोह डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”

दीपक का विद्रोह

 डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”


अमावस की रात से लड़ने आ गया,

एक दीपक को भी आज जोश आ गया।

दुनिया का अंधेरा देखकर उसने भी,

आज खुद को ही आग लगा डाला।


पी गया अंधेरे का हाला —

सच है, चारों ओर अब था बस काला।

पर अमावस को क्या मालूम था,

किससे पाला पड़ा है आज निराला!


पूरी रात यूँ लड़ने का त्यौहार,

सिर्फ दीपक ही मना सकता है।

खुद को जलाकर दुनिया को,

उजाला बना सकता है।


मानव की संगत का यह प्रतिफल,

इससे सुंदर और क्या हो सकता है?

जिस मानव ने उसे रचा था,

आज उसी के काम वह आ सकता है।


सुबह क्या होगा — इसकी न चिंता,

ना कोई हिसाब, ना कोई सवेरा।

बस एक चिराग, अपनी लौ में डटा,

अंधियारी रात में बना सवेरा।


 

Sunday, October 19, 2025

दीपक कहता है आलोक चांटिया "रजनीश"



दीपक कहता है

सूरज का घमंड तोड़ने के लिए,

 मैं कभी नहीं जलता हूं।

 मुझे जलाकर तुम्हें खुशी मिलती है,

 इसलिए मैं जलता हूं ।

जानता हूं तुम स्वयं से,

 अंधेरा मिटाने की कोई, 

कोशिश नहीं करना चाहते हो।

 तुम सिर्फ उजाले के लिए, 

मेरे अंदर दुनिया भर का,

 अंधेरा समेटना चाहते हो ।

मैं भी जानता हूं कि तुम्हीं ने, 

अपने हाथों से कुम्हार बनकर,

 मेरी रचना को जन्म दिया है।

 तभी तो इस धरा पर ,

सभी ने मुझे दिया कहकर, 

उसका नाम लिया है।

 फिर कैसे अपने मालिक की इच्छा को,

 मैं महसूस ना कर पाऊं ?

ठीक है उजाला करने में मैं,

 कितना ही अंधेरा क्यों ना हो जाऊं ?

पर दर्द होता है जब तुम ,

झूठ बोलकर दुनिया से,

 यह रहते हो कि एक चिराग ,

 सूरज को रोशनी देने के लिए जलता है ।

कुछ घंटे के प्रकाश में ,

भला सूरज के बराबरी में,

 वह कहां मिलता है ?

लेकिन तुम्हें कभी भी, 

जिम्मेदारी लेने की ,

आदत नहीं रही है ।

कैसे कह दो चिराग के,

 सीने पर पैर रखकर तुमने,

 उजाले की कहानी कही है। 

फिर भी मैं चार दिवारी में,

 बंद औरत की तरह खुश हो जाता हूं।

 क्योंकि मैं भी तुम्हारे जीवन को एक,

 स्वर प्रदान करने के काम तो आता हूं ।

उजाले के इस जन्म लेने को, 

तुम बस याद करते रहना। 

अंधेरा मुझ में कितना छोड़ा,

 यह किसी से ना कहना। 

किसी से ना कहना ।

आलोक चांटिया "रजनीश"

 

Friday, October 17, 2025

एक दीपक मेरे लिए जलने जा रहा है आलोक चांटिया "रजनीश"


 आज एक दीपक,

मेरे लिए भी जलने जा रहा है ।

मेरे अंधेरे को,

अपने साथ ले जा रहा है। 

कितनी खूबसूरती से,

इस झूठ को छिपा ले गया। 

कि खुद के जीवन में ,

एक अंधेरा किया जा रहा है।

इतना आसान भी नहीं था, 

दूसरे के जीवन में रोशनी को फैला देना ।

एक दीपक अपने भीतर, 

अंधेरे को समेटे जा रहा था।

चाहते सभी हैं कोई दूसरा, 

मेरे जिंदगी में उजाला कर जाए ।

उसके जीवन में कितना, 

अंधेरा रह गया?

क्या कभी यह जान पाए? 

आलोक चांटिया "रजनीश"

Monday, October 13, 2025

चींटी की तरह कुचले जा रहे हो ,- आलोक चांटिया "रजनीश"

 


चींटी की तरह कुचले जा रहे हो ,
मेरी लाश से होकर कहा जा रहे हो ,
मैं भी तो निकली थी एक सपना लिए ,
मेरी हकीकत को भी मिटा जा रहे हो ,
सिर्फ मुझको मसलने के लिए ही क्यों ,
मेरे अस्तित्व तक को नकारे जा रहे हो ,
क्यों नही है दूर तक जाने का मेरा सच ,
बस अपने को अपनों में पुकारे जा रहे हो ,
मालूम है मेरे भी अपने रोते है न आने पर ,
मेरी शाम को क्यों आंसू दिए जा रहे हो ,
कहा ढूंढे मेरे होने के निशान इस दुनिया में ,
तुम हत्यारे होकर भी मुस्काए जा रहे हो ,
मेरी नियत यही तो न थी कि कोई मुझे मारे,
अपनी ख़ुशी में मेरी ख़ुशी क्यों जला रहे हो ,
मैं भी हसने के लिए तुझे से होकर ही गुजरी ,
अपने दामन से क्यों मुझे रगड़े जा रहे हो ,
कब तक चींटी कह कर मुझे मिटाते रहोगे ,
औरत को आज ये क्या दिखाते जा रहे हो ,
मेरी ही तरह तो है तेरी माँ भी घर में देखो ,
फिर मुझे मादा कह क्यों जलाते जा रहे हो
.आइये हम समझे इनका दर्द और कुछ बदल कर दिखाए इनका भी कल और आज ...........................आखिर ये है तभी तो है मेरा आपका वजूद
आलोक चांटिया" रजनीश"


Friday, October 10, 2025

सड़क पर खड़ा हुआ एक आदमी,- आलोक चांटिया "रजनीश"

 सड़क पर खड़ा हुआ एक आदमी,

हमको अच्छा लगता है।

जब वह उदास हो,

फटे कपड़े पहने हो,

पैरों में जूते भी ना हो ,

तो कुछ जानने का मन जगता है ।

पर उससे कभी डर नहीं लगता है ,

क्योंकि वह आपके अंदर स्वाभिमान और,

समाज में ऊंचा होने का भाव जगा जाता है।

जब उसकी पथरायी सी आंखों में,

कोई प्रश्न भरता है और एक,

खुला हुआ हाथ आपके सामने आता है।

ऐसा लगता है मानों दुनिया का सबसे ,

अमीर आदमी वह मुझे बना गया है ।

क्योंकि आपके दृष्टिकोण में आपके,

सामने भिखारी आ गया है। 

चुपचाप जेब से एक, पांच,

 ₹10 निकाल कर दे देते हैं।

यह सोचकर कि आज आपने,

कुछ अच्छा कर लिया है। 

धन्यवाद भी आप दे देते हैं भगवान को,

कि कम से कम उसने, 

आपको ऐसा बनाया है ।

कि आपने किसी को चँद रुपया दे दिया है ।

पर आप कभी नहीं सोच पाते हैं ,

कि उस गरीबों के हाथ से छीन हुए रुपए,

उसके श्रम को ही आपने अपनी,

मुट्ठी में बंद कर लिया है।

इसीलिए आज वह एक प्रश्न बनकर,

आपके सामने जिया है।

पर आपको अभी भी उससे,

डर नहीं लगता है ।

पर जिस दिन उसे इस बात का,

आभास हो जाएगा ।

कि उसके श्रम का जमा हुआ हिस्सा ,

आपकी तिजोरी में रहता है।

और इसीलिए वह सड़कों पर ,

भूखा प्यास रहता है ।

उस दिन निश्चित रूप से आप,

उससे डर जाएंगे। 

अराजकता आतंक की,

बात भी कर जाएंगे ।

पर आप यह नहीं मन पाएंगे?

कि आपके द्वारा मुट्ठी बंद कर लेने के,

कारण ही किसी ने अपनी मुट्ठी को,

पाने के लिए बंद करना आरंभ कर दिया है।

उसने गरीब होने का मंत्र आपसे ही लिया है ।

उस मंत्र का असर ना दिखाई दे,

इसलिए आदमी में आदमी, 

देखने की बात होनी चाहिए। 

हमारे जीवन से मानवता की,

बात नहीं खोनी चाहिए। 

क्योंकि कण-कण में, 

भगवान रहते हैं।

यह दर्शन वह भी समझना चाहता है ।

अपने हाथ में आपके जीवन से,

लक्ष्मी को पाना चाहता है।

हमें जल्दी ही एक जैसा मानव,

होने का प्रयोग आरंभ करना होगा।

अमीर गरीब उच्च नीच से हटकर,

सिर्फ समानता का बोध करना होगा।

हमें एक बार फिर सिर्फ और सिर्फ ,

आदमी बनना होगा ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Thursday, October 9, 2025

हर कोई बंद मुट्ठी का- आलोक चांटिया "रजनीश"


 

हर कोई बंद मुट्ठी का, 

भरोसा दिला जाता है। 

चुपचाप आता है ,
मुस्कुरा कर चला जाता है।

 दुनिया में सब मुट्ठी,
बांधकर ही आते हैं ।
क्योंकि भगवान के घर से हर कोई,
कुछ ना कुछ लाता है। 

इसीलिए लकीरें,
खिंच जाती हैं हथेलियां पर।
क्योंकि उनके भीतर न जाने,
क्या कुछ लिखा जाता है। 

बस इंतजार करना होता है, 

उन लकीरों पर लिखी हुई उन ,
लाइन के अर्थ को,
जो मिटाती है जीवन के तदर्थ को।
खुश भी हो जाता है मन, 

यह सोच सोच कर,
कि बंद मुट्ठी लेकर ही हर कोई आता है ।
पर मेरा तो मन ना जाने क्यों,
एक विचलन सा पाता है। 

जब बंद मुट्ठी का स्वर,
उसके कानों में आता है। 

क्योंकि मुट्ठी में भला उजाला,
कब कोई बांध पाया है?
मुट्ठी में तो सिर्फ,
अंधेरे का ही साया है। 

इसीलिए जब कोई इस संसार में,
गर्भ के अंधकार को,
चीरता हुआ आता है,
तो उसे गर्भ के अंधेरे को भी,
मुट्ठी में लेकर चला आता है।
क्योंकि गर्भ ही सब कुछ है, 

यही किलकारी में वह मान पाता है।
धीरे-धीरे जीवन की बढ़ती जटिलता में,
जब वह मुट्ठी को खोलता है,
इधर-उधर प्रकृति के साथ डोलता है।
तब जान पाता है कि,
मुट्ठी में बंद अंधेरे से,
जीवन को जिया नहीं जाता है।
कर्म के सिद्धांत पर चलते हुए,
उजाले को हाथ खोल कर लिया जाता है।
तभी जीवन का स्वर,
पूरा हो पाता है।
फिर भी इस सच से दूर हर पल ,
बंद मुट्ठी का सहारा लोग दे जाते हैं ।
सच कहूं तो अंधेरे के साथ, 

जीना सीखा जाते हैं।

 इसीलिए मुट्ठी को ताकत का,
सार कहा जाता है ।
खुली उंगली को,
लाचार कहा जाता है ।
पर सच तो इसका,
उल्टा ही होता है ।
जैसे-जैसे हाथ खुलता जाता है ।
अंधेरा दूर होता जाता है।

 उजाला नजदीक होता जाता है ।
यही अर्थ जब भी कोई,
समझ जाता है,
उसका जीवन पूरा हो जाता है ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

जब भी मैंने तुम्हारी तरफ देखा है,-आलोक चांटिया रजनीश

 जब भी मैंने तुम्हारी तरफ देखा है,

तुमने बड़ी बेरुखी से मुझसे कहा है,

मेरे पास समय नहीं है।

समझने की लाख कोशिश के बाद भी,

यह समझना आसान नहीं है ,

कि उसके पास जीवन नहीं है।

क्योंकि उसके पास समय नहीं है ।

आज तक यही सुनता, 

समझता चला आया था।

समय जिसका प्रदर्शन करने का,

अवसर दे जाता है,।

वही तो जीवन कहलाता है।

जिनके जीवन में समय ही,

नहीं रह गया है ।

उसे मृतक के सिवा,

भला क्या कहा गया है?

गर् समय किसी के जीवन में ,

चलता रहता है ,

तभी तो वह अपने को,

 जीवित कहता रहता है।

पर जब देखो तब तुम,

यही मुझे बता जाते हो,

 अपने जीवन में समय,

न होने की बात दिखा जाते हो।

तो फिर मैं कैसे मान लूं,

कि तुम जीवन का अर्थ समझ पाते हो,

तुम तो न जाने कब के मर गए थे,

बस सिर्फ एक लाश की तरह ,

मेरे जीवन में रह जाते हो। 

और यह मैं सिर्फ तुम्हें,

नहीं बताने का जतन नहीं है ,

कि तुम्हारे पास जब समय नहीं है,

तो फिर जीवन ही कहां है? 

मैं तो अपने चारों तरफ,

उन सबको यह बता रहा हूं,

 उनको यह जता रहा हूं ,

कि जब तुम यह कहते हो,

मेरे पास समय नहीं है।

अपनी भूख भूल गए हो, 

अपनी प्यास भूल गए हो, 

सुबह से शाम तक दौड़ते रहते हो,

तो सोच कर देखो कि जिस,

शरीर को तुम जिंदा कह रहे हो !

क्या सच में तुम उसके साथ,

जिंदा रह रहे हो?

उसमें से समय तो तुमने,

न जाने कब का खो दिया है।

सिर्फ एक लाश को ढो लिया है।

समय का अर्थ तुम संबंधों के दायरे में,

कहां समझ पाए हो? 

इसीलिए मेरे पास समय नहीं है,

जिंदा शरीर में मैं कब का,

मर गया हूं यह कहते आए हो ।

पर कभी यह जान नहीं पाए हो।

आलोक चांटिया रजनीश


Friday, October 3, 2025

चींटी का दर्शन डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


 एक चींटी लड़ती है मरती है, 

कटती है पर झुकती नहीं है। 

उसे जीवन जीने का,

अर्थ मालूम हो गया है।

कर्म ही सब कुछ है,

यही उसके साथ रह गया है।

निकल पड़ती है घर से, 

बिना कुचल जाने के डर से। 

जानती भी है कि हो सकता है,

कि शाम को घर भी ना लौट पाऊं ?

पर इस डर से कभी नहीं कहती,

कि मैं घर से बाहर क्यों जाऊं?

मनुष्य के पैर से कुचल जाने,

चीनी गुड़ और शहद में मिल जाने,

उसके लालच में कुछ ही पलों में,

मर जाने बंद धब्बों के अंधेरों में,

आजीवन कारावास की तरह ,

खत्म हो जाने का आभास भी,

उसे कहां डरा पाता है ?

वह जानती है कि उसके मृत्यु के बाद,

उसके हिस्से में ना किसी का,

दर्द आता है संवेदना आती है,

ना ही कोई उसके पास,

दुख जताने भी आता है, 

बस डिब्बे से निकालकर,

 उसके मृत्यु शरीर को ,

फेंक दिया जाता है ।

इतना अपमानित जीवन पाकर भी,

भला चींटी को कौन डरा पाता है ?

उसके हिस्से में नियत का वह,

अदम्य साहस आता है।

जिसमें मानव की संस्कृति में ,

अनगिनत असंख्य चीटियां का,

बलिदान चलता चला जाता है ।

मजबूर हो जाता है मनुष्य भी,

एक दिन इस चींटी के साथ चलने को,

अपने घर के सामानों में, 

उसके साथ रहने को। 

अनवरत चींटी का यह प्रयास उसे,

मानव के जीवन में शामिल कर देता है ।

और फिर एक दिन चींटी का संसार,

अपनी तरह का जीवन सुख स्वाद,

सब मनुष्य से ही लेता है।

 क्योंकि चींटी यह जान जाती है,

कि बिना कर्म के,

बिना त्याग के बलिदान के,

 बिना मौत के स्वागत के, 

सांसों के पथ पर मुक्ति नहीं आती है।

इसीलिए कुछ न होकर भी, 

अस्तित्व हीन की तरह रहकर भी,

एक चींटी अपनी तरह से, 

पूरा जीवन की जाती है।

और मानव के सामने खड़े होकर,

उसे यह समझा जाती है ,

कि जीवन का मूल्य ,

सिर्फ अकर्मण्य होकर बैठ जाना नहीं है।

हर दुख दर्द को सहते हुए,

 सिर्फ सुख पाना नहीं है।

कर्म को करते हुए मिट जाना ही ,

जीवन का अंतिम सार है।

 किसी भी प्राणी का यही अंतिम,

चेतना और आलोक प्रसार है।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Sunday, September 28, 2025

जो हर दिन खत्म हो रहा है आलोक चांटिया "रजनीश"

जो हर दिन खत्म हो रहा है, 
इस संसार में वह और,
कुछ भी नहीं जीवन है ।
हम चाह कर भी जिसे ,
रोक नहीं सकते इस संसार में ,
वह कुछ भी नहीं जीवन है।
सिर्फ और सिर्फ एक ही,
 रास्ता शेष है उसे रोक पाने का,
इस संसार में वह कर्म है।
जो हर पल है निभाना ,
बस यही मानव का धर्म है। 
छोड़कर जो भी जाएगा, 
अपने पीछे एक विचार, 
आने वाली पीढ़ियां के लिए।
वही तो रोशनी देंगे समय के साथ,
बनाकर एक दिए।
इसीलिए मुट्ठी में हम बांध कर,
क्या ले आये यह
समझना जरूरी नहीं है। 
मुट्ठी में हमने कर्म की जो रेखाएं,
खींच रखी है उन्हें कितना इस धरा पर,
खींचा है यह जरूरी है। 
आओ मिलकर एक बार, 
यह जतन कर ले अपने कर्म को,
निभाते हुए इस नश्वर जीवन को,
कर्म के धर्म को।
मरे क्यों हम चार दिवारी परिवार तक ही,
याद रखने की जुगत में, 
फंसे रहते हैं ?
क्यों नहीं हम पूरी दुनिया के हैं,
यह हर पल कहते हैं! 
इसीलिए धरा पुत्र बनकर, 
जीने का प्रयास कर डालो। 
और नश्वर शरीर को अपने कर्मों से,
यहां अमर कर डालो। 
आलोक चांटिया "रजनीश"

 

Thursday, September 25, 2025

जिन रास्तों पर तुम, चले जा रहे हो- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

जिन रास्तों पर तुम,
चले जा रहे हो.
उन रास्तों पर समय को, 

पीछे छोड़ जा रहे हो ।
चाहोगे तो फिर मुठ्ठी में,
नहीं बांध पाओगे,
इस समय को अपने लिए। 

जी जाओ आज इस दुनिया में,
और सोचो आए हो किसके लिए?
समय का आभास भी,
जब तुमको हो पाएगा,
तो दर्पण का संदेश,
तुम्हें यही बात जाएगा। 

झुकी हुई कमर,
चेहरे पर छाई झुर्रियां,
और कमजोर होती दृष्टि में,
एक पश्चाताप रह जाएगा। 

इसीलिए रुक कर सोचो,

 समझो और करो ,
उस पथ का निर्माण ।
जिस पर तुम स्वयं हो और वह हो ,
जिसे समाज द्वारा सराहा जाएगा ।
यह समय फिर से,
वापस नहीं आएगा। 

यह वह खोया हुआ धन नहीं है, 

जो तुम ढूंढ कर फिर से, 

पाने की जुगत कर लो।
फिर से इसे किसी तिजोरी में,
या अपनी मुट्ठी में कर लो। 

यह तो हवा भी नहीं है,
जो फिर से चलकर आ जाए।
यह समय है एक ,
और सिर्फ एक बार आता है,
किसी के भी जीवन में।
फिर क्या पता यह तुमसे, 

क्या अच्छा क्या बुरा करा जाए ।
इसीलिए इस समय को महसूस करने की,
एक आदत आज से ही पाल लो ।
यही ईश्वर है यही ब्रह्मांड है, 

इसे ही सब कुछ मान लो ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

Thursday, September 11, 2025

संबंधों का रेगिस्तान -आलोक चांटिया "रजनीश"


 संबंधों का रेगिस्तान बड़ा है,

 अंतहीन इंसान सामने खड़ा है ।

है भी और नहीं भी है,

किसी तरह से मेरे लिए।

 उजाला सा संबंधों का वीरान पड़ा है ।

हर कोई जीता है बस रात दिन,

हर पल यही सोच कर।

जी लूंगा मैं भी थोड़ा संबंधों को,

किसी के साथ जोड़कर।

पर बंद मुट्ठी में अंधेरा ही आता है।

जब कोई चुपचाप संबंधों को,

ले जाता है नोच कर ।

जितनी भी हरियाली छाया संबंधों की,

सोच कर आगे बढ़ता रहता है ।

कोई भी तप्ती बालू की रेत में,

तन जलता है मन जलता है, 

जल जाते हैं पैर,

बस यही सोचकर ।

संबंधों का रेगिस्तान ही,

क्यों बढ़ रहा है?

क्यों आदमी जीकर,

इसके साथ भी मर रहा है।

इसके न होने पर भी खुश, 

कहां रह पा रहा था ?

इसको बनाकर भी ,

शहर क्यों जल जा रहा था? 

संबंध कश्मीर से कन्याकुमारी की तरह,

फैल गए हैं ।

फिर भी रेगिस्तान में एक बूंद,

पानी को हम क्यों तरस गए हैं?

क्यों नहीं इस रेगिस्तान में कभी,

सरसता का एहसास भी आता है ?

मनुष्य पशु जगत में संबंधों का,

बोझ लेकर कहां से आता है?

उसे बस संबंधों से थोड़ी सी ठंडक ,

ढलते सूरज के साथ ,

रात के अंधेरे में,

ठंडी होती रेत में मिल भी जाती है ।

पर संबंधों का रेगिस्तान, 

उजाला चाहता है ।

और उजाले में सिर्फ और सिर्फ,

फिर वही गर्मी आई है जिससे ,

बचने का तरीका ढूंढा जाता है ।

समझ में नहीं आता प्रकृति में,

यह रेगिस्तान क्यों बनाया जाता है ?

संबंधों का गान क्यों गया जाता है ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


Monday, September 8, 2025

मेरी नींद आज न जाने, कहां भाग गई है - आलोक चांटिया रजनीश

मेरी नींद आज न जाने,
कहां भाग गई है ।
शायद एक बार फिर,
मेरी आत्मा जाग गई है। 

मदहोश जब बेखबर होकर, 

दुनिया से मैं सो जाता हूं। 

किसको बताऊं सपनों में,
मैं किसे पाता हूं ?
अक्सर मेरी मां आकर,
अभी भी मुझे समझा जाती है ।
क्या तुम्हें यह न्यूनतम सी बात भी,
समझ में नहीं आती है! 

फस जाते हो बार-बार,
उन्हीं भंवर जाल में,
तुम क्यों इस तरह।
जबकि रास्ता सिर्फ एक ही सच है,
क्यों नहीं मिलते तुम उस तरह ।
इस तरह मुट्ठी को बार-बार खोलकर,
देखना अच्छी बात नहीं है। 

अंधेरे से भागना,
कोई सच्ची बात नहीं है।

 पकड़ कर कब तक रखोगे? 

प्रकाश को इस भ्रम में,
कि वह मुट्ठी में बंद हो जाता है ?
जब सब छोड़ देते हो,
तब खुले हाथों में ही वह रह पाता है ।
बंद मुट्ठी तो अंधेरों का सागर है ।
पकड़ने के लिए दौड़ना ही, 

एक भवसागर है ।
इसलिए चुपचाप जिस आत्मा को,
शरीर में बंद किया है ।
उसको ही सच मानकर चलते रहना,
और किसी भी चीज को बार-बार,
अपना कहने के भ्रम में ना रहना ।
यह दुनिया ना कल तुम्हारी थी।
ना आज है ना कल रहेगी। 

शरीर भी यही रह जाएगा। 

सड जाएगा गल जाएगा।

 कोई को याद भी नहीं रह जाएगा।
खत्म होने से पहले उस शरीर को,
तुम आत्मा के साथ जितना घिस डालोगे।
उतना ही सुंदर सुख शांति का रत्न,
तुम अपनी उस यात्रा में पा डालोगे ।
इसलिए जब भी तुम्हारी नींद,
तुम्हारे पास से भाग जाए।
और शरीर में बैठी आत्मा, 

फिर से जाग जाए ।
तो समझ लेना तुमने एक बार फिर से ,
सच को समझ लिया है।

 मानव होने का अर्थ सच में ,
इस पृथ्वी को दिया है आलोक चांटिया "रजनीश"

 

थक हार कर अंधेरे का, - आलोक चांटिया "रजनीश"


 

थक हार कर अंधेरे का, 

सहारा लेना ही पड़ता है ।
कुछ ना समझ आने पर, 

आंख बंद करना ही पड़ता है।
मान लेना पड़ता है कि कल सुबह,
फिर से अपने लोगों को मैं देख पाऊंगा ।
जब आंख खोल कर,
सभी के सामने आऊंगा। 

इतने विश्वास के बाद भी कोई,
कह नहीं पाता कि,
सभी को भगवान पर विश्वास रहता है।
और जिसे भी देखो वह,
यह पूछता रहता है ।
भगवान कहां रहता है? 

भगवान को देखा किसने है?

 चरम सुख की चाहत का यह प्रश्न,
जीवन में हर तरफ चल रहा है।
जिसे भी देखिये वह,
सत्य की खोज कर रहा है। 

मुट्ठी बंद करना मुट्ठी खोलकर देखना,
सुबह से शाम तक ,
आदमी का प्रयास रह जाता है।
मनचाहा ना पाने पर कोई अपने,
घर के दरवाजों में सिमट जाता है।
कोई सब कुछ कल पर छोड़कर ,
सो जाता है ।
कल को देखने का सपना, 

पूरा होगा या अधूरा रह जाएगा,
यह सिर्फ और सिर्फ समय बताता है ।
फिर भी समय का आभास, उसकी महत्ता,
कहां कोई समझ पाता है? 

रोज रात को आंख बंद करके,
सोने वाला यह एहसास दिखा जाता है ,
अपनों के साथ होने का आभास,
दूसरे दिन की सुबह में लेकर कोई,
चुपचाप गहरी नींद में खो जाता है।
आदमी हमेशा किसी और के सहारे,
जीता रहा है जीता रहेगा, 

यह कभी कह नहीं पाता है। 

आलोक चांटिया "रजनीश"

जब मुझको जाना ही है एक दिन,- आलोक चांटिया रजनीश

जब मुझको जाना ही है एक दिन,

तो कब तक बटोरता रहूं?

जो अपने मुट्ठी में इकट्ठा कर लिया है ,

उसको किसी से तो कहूं!

पर हर कोई इकट्ठा करने में ही,

लगा दिखाई देता है।

फिर उससे मैं रुकने के लिए कैसे कहूं ?

मालूम सभी को है कि दौड़ते दौड़ते,

एक दिन किनारा आ जाएगा ।

और लौट के सिवा,

फिर कुछ ना रह पाएगा।

फिर भी कोई ना सुनना चाहता है,

ना भूलना चाहता है, 

ना गुनना चाहता है।

बस एक जिद है सब कुछ, 

इकट्ठा कर लेने की ।

इसी में डूब जाना चाहता है।

 शायद यही कारण है कि एक दिन,

जब वह पलट कर देखता है,

तो दूर तक एक सन्नाटे के सिवा,

कुछ भी नहीं पाता है ।

और स्वयं गूंगा हो जाता है, 

यह बता नहीं पाता है कि वह,

इस संसार में क्यों आता है?

मनुष्य इकट्ठा करने में एक चिड़िया,

क्यों नहीं बन पाता है?

जो सिर्फ सुबह उड़कर शाम को अपने,

घोंसले में लौट आई है ।

चोंच में दबे हुए भूख के ज्ञान से सिर्फ,

उसी दिन का हिसाब लगाती है ।

इस ज्ञान को मानव,

क्यों नहीं समझ पाता है ?


वह चींटी की तरह इकट्ठा करने में ही,

क्यों लगा रह जाता है ?

और अचानक एक दिन, 

कुचल दिया जाता है ।

मसल दिया जाता है,

जो उसने इकट्ठा किया था, 

वह कहां किसी को दिखा पाता है?

कहां किसी को बता पता है?

मानव मानव होने के अर्थ को ,

इस पृथ्वी पर कहां समझा पाता है?

एक चिड़िया से बौना और, 

एक चींटी का जीवन,

लेकर चला जाता है ।

इकट्ठा करने की जुगत में, 

आखिर मानव किस अनंत काल के लिए,

इस संसार में आता है ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


 

Thursday, September 4, 2025

जैसे-जैसे मन ज्ञान में, डूबता चला जाता है - आलोक चांटिया रजनीश


 

जैसे-जैसे मन ज्ञान में,
डूबता चला जाता है ।
जीवन उतना ही,
ऊबता चला जाता है।
लगता है हाथ की सारी रेखाएं ,
मेरी ही हथेली में निकल आई है ।
पर दौड़ते भागते डगर में,
भला वह क्या पाई है?

 जानकार हर दिन कि कौन सा,
दर्द क्या कहलाता है ?
पूरा शरीर ही ऐसा लगता है,
जैसे बीमारी में बंधा चला जाता है।
ज्ञान की खुदाई कर,
दिमाग यह समझ जाता है।

 किसी के दिल के साथ,
फरेब कैसे किया जाता है?

 न्यायालय कचहरी में भी ज्ञान का,
असर ऐसा दिखाई देता है।

 कि हत्या करने वाला भी , 

बाइज्जत बरी हो जाता है। 

कभी-कभी ऐसा लगता है,

 परम तत्व के बहुत नजदीक पहुंच गया हूं।
उस पल सब कुछ,
इस दुनिया में झूठ नजर आता है ।
समझ में आता ही नहीं,
फिर हर कोई ज्ञान क्यों चाहता है ?
अगर पाप को सर चढ़कर ही बोलना है ?
तो भला पाप किया ही क्यों जाता है?
ज्ञान बूंद बूंद करके,
इतना ज्यादा हो गया है।
गर्भ में पलता बच्चा ,
अब नदी नाले में खो गया है।
कोई नहीं मानता कि गर्भ में कोई,
भगवान पल रहा होगा! 

उसके ज्ञान के विस्तार में,

 गर्भ को बर्बाद कर दिया जाता है ।
किसी भूखे को देखकर हम अपना निवाला,
छुपाने की आदत में चलने लगे हैं।
क्योंकि कल के ज्ञान से, 

इतना डरा दिया जाता है। 

स्वर्ग नरक अब कहीं नहीं होता है,
यह जान गए हैं सब ।
क्योंकि एक अपराधी का जीवन,
राजा की तरह जिया जाता है।
इसीलिए शायद दुनिया के लोग,
ज्यादातर अनपढ़ रह जाते हैं ।
ज्ञान के बाद तो वह,
और ज्यादा दर्द पाते हैं। 

आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, September 2, 2025

सच तो बस यही है आलोक चांटिया "रजनीश"


 हर कोई निकलते बैठते,

सोते जागते चलते गिरते,

 यही समझा कर निकल जाता है।
काम अच्छा करते रहो,
यही काम सबके आता है। 

पर यही सोचकर गंगा भी, 

गंगोत्री से निकलकर लोगों को,
अमर करने चली आई।

 बदले में सिर्फ और सिर्फ, 

अपने आंचल को मैला करने के सिवा,
यहां क्या वह पाई ?
सांस बनकर मलय समीर भी बिना,
किसी लाभ हानि के लोगों के,
जीवन से होकर बहने लगी सांस बनकर।
पर उसकी अच्छे कामों को लोगों ने,
लौटाया है प्रदूषण बनकर।
मिट्टी भी तो यही चाहती है रही,
कि वहां अपने अंदर से सृजन की,
देवी बनकर रह जाए।

 हरियाली का एक ,
सुंदर सा अर्थ बन जाए।
पर बदले में उसके गोद में सिर्फ,
बंजर होना सूखा होना, 

रेगिस्तान बन जाना ही क्यों आए ?
इस भ्रम में रखकर ही शायद,
प्रकृति में हम अच्छे को अच्छा बनाकर,
रखने का प्रयास करते रहते हैं ।
पशु जगत में आदमी को, 

पशु से थोड़ा ऊपर लाने का, 

प्रयास करते रहते हैं।
बस यही एक दर्शन इस, 

जीवन का सच बन जाता है। 

वरना गंगा वायु पानी मिट्टी, 

सभी के हिस्से में क्या आता है ?
भला यह कौन नहीं जानता है !
और कौन इस कड़वे सच को कह पाता है
आलोक चांटिया "रजनीश"


Saturday, August 30, 2025

मिट्टी कब कहां यह देेखती है?- आलोक चांटिया "रजनीश"


 

मिट्टी कब कहां यह देेखती है?
कि किस बीज को उसने, 

अपने घर में जगह दे दिया है?
किसको उसने इस संसार में,
खिलने फैलने बढ़ाने का, 

अवसर दे दिया है।
मिट्टी को कहां पता होता है, 

कि किसी बीज से बाद में, 

उसके चारों तरफ कांटे निकलेंगे ?
या फूल निकलेंगे फल निकलेगा?
या सब्जी होगी या सिर्फ, 

पत्तियां ही पत्तियां होगी ?

मिट्टी तो बस सिर्फ और सिर्फ,
यह जानती है,
और कर्म के दायरे में,
यह मानती है,
कि उसे जो भी बीज,
प्रेम से मिल जाएगा।
उसी के लिए उसका हर, 

कर्तव्य प्रयास हो जाएगा।

प्रेम का यही अनूठा दर्शन, 

हर कहीं चल रहा है। 

इसीलिए मिट्टी से,
हर कोई डर रहा है।
हर कोई घर में मिट्टी को ,
बंद करके रख लेना चाहता है।
अनेको घेरा बनाकर उसे, 

रोक लेना चाहता है ।
क्योंकि मिट्टी को इस बात का,
कोई भी असर नहीं होता है।
कि जो भी उसे मिला है,
उससे खरपतवार पैदा होगा, 

या एक सुंदर सा फूल निकल जाएगा ।
इसीलिए मिट्टी के जीवन में, 

न जाने रोक-टोक के कितने अवसर,
समय के साथ आएगा ।
पर मिट्टी कभी भी इस,
दर्शन को लेकर कहां जी पाएगी?
बाद में क्या होगा?
वह कब इस बात से मतलब रखती है ?
वह तो सिर्फ उस एक,
बीज का इंतजार करती है। 

जिसके लिए वह नमी के साथ,
हर पल संवरती है।
हर पल जगती है।
और प्रेम का सत्य,
सभी के सामने रखती है 

आलोक चांटिया "रजनीश"

Friday, August 29, 2025

मिट्टी ही तो है जिसमेंआलोक चांटिया "रजनीश"


 मिट्टी ही तो है जिसमें,

वह ऊर्जा होती है,

जो एक बीज के अंदर छिपी हुई ना जाने,

कितनी बातों से दो-चार होती है।

फिर उन सारी बातों को दुनिया के सामने ,

मिट्टी ही लेकर सामने आती है।

यह बात एक बीज को,

तब समझ में आती है।

जब वह पौधा बनता है ,

पेड़ बनता है,

उसमें फूल पत्ती निकल आते हैं।

लेकिन हम इस छोटी सी बात को,

कभी नहीं समझ पाते हैं,

कि मरकर इस मिट्टी में मिल जाना,

फिर से हमारी ऊर्जा को बाहर ले आना,

एक बीज की तरह फिर से इस दुनिया में,

उगने के लिए मिट्टी का ,

एक प्रयास आरंभ हो जाना।

शायद बड़ा कठिन होता है, 

यह समझ पाना।

कि मरकर हम कहीं नहीं जाते हैं ।

सिर्फ मिट्टी में मिलकर,

अपने अंदर एक बीज की तरह,

सोई हुई ताकत को फिर से जगाते हैं ।

और निकल पड़ते हैं इसी धरा पर फिर कहीं,

एक पौधा बनकर एक पेड़ बनकर ।

जब एक मां देती है एक बच्चे को,

इस दुनिया में जनकर।

इसीलिए मिट्टी के शरीर से मिट्टी में मिलने की,

इस कहानी को रोज याद कर लो।

और एक शरीर छोड़कर, 

दूसरे शरीर को मिट्टी से निकलने की,

कहानी खुद अपने में भर लो ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Wednesday, August 27, 2025

दुनिया में एक अजीब सा, जादू चल रहा है - आलोक चांटिया "रजनीश"


 दुनिया में एक अजीब सा, 

जादू चल रहा है ।

मूर्ति को लगाकर हर कोई,

 यही समझ रहा है ।

कि अब उसके घर भगवान,

आकर बैठ गए हैं।

पर धड़कते दिल चलती सांसों पर बैठे,

बुजुर्ग को वह कभी ,

भगवान समझ नहीं पाता है ।

उसके हिस्से में कभी भी स्वागत का,

वह स्वर नहीं आता है।

जिसमें भगवान के होने का,

आभास हो ,।

जिसके कारण हम सब, 

इस दुनिया में आए हैं। 

उनके लिए कृतज्ञता का, 

एहसास हो ।

कितनी आसानी से भगवान की बात करके, 

आदमी अपने को गणेश के सामने ही ,

झूठ मान लेता है।

क्योंकि जो सच है जो सर्वोच्च है,

उन गणेश की तरह ही माता-पिता को,

वह कहां भगवान का मान देता है?

आलोक चांटिया "रजनीश"


Friday, August 22, 2025

पिता हिमालय बन जाता है -आलोक चांटिया "रजनीश"


 इस दुनिया में रिश्ते न जाने कितने,

बनते हैं बिगड़ते हैं।

पर जिस रिश्ते की उंगली पकडकर,

आप इस दुनिया में आते है।

हर दुख मुसीबत में उसको ,

अपने सामने पाते हैं ।

वह सिर्फ और सिर्फ एक पिता होता है ।

जो अपने बच्चों के लिए जीता है ।

अपने बच्चों के लिए रात दिन मेहनत करता है ।

और फिर एक दिन अपनी बगिया के,

फूल की तरह उन्हें समाज के लिए तैयार करता है।

पर बदले में उसको क्या मिलता है ?

एक अकेलापन एक सन्नाटा और,

इस बात का दर्द कि,

कोई भी अपने पिता के इस त्याग को ,

कहां समझ पाता है ?

जिसे भी देखिए,

यह कहते हुए मिल जाता है।

कि यह कौन सा बहुत बड़ा काम है?

सभी करते हैं और यह सुनकर ,

एक पिता मुस्कुरा कर रह जाता है।

क्योंकि वह फिर भी अपने ,

बच्चों के लिए जी जाता है।

वह इसी में खुश हो जाता है,

कि उसके परिवार का नाम चलता रहेगा ।

आने वाली पीढ़ी में कोई तो उसे ,

सपने में मिलता रहेगा।

पिता का दिल इतना बड़ा हो जाता है ।

जिसमें पूरा परिवार समा जाता है ।

इसीलिए पिता कभी-कभी ,

अपना जन्मदिन भी भूल जाता है ।

क्योंकि उसके हिस्से में जिम्मेदारियां का,

एक ऐसा बोझ आता है। 

जिससे वह चाहकर भी, 

कभी नहीं निकल पाता है।

सांसों के रथ पर बैठा हुआ ,

ना जाने कितनी दूर निकल जाता है ?

और जब रुकता है तो एक सन्नाटा,

अकेलापन बुढ़ापा और अपने पास ,

कोई न बैठने वाला वातावरण पाता है ।

फिर भी पिता पिता रह जाता है ।

क्योंकि वह हम सबको बनाता है ।

वह बच्चों के लिए ब्रह्मा ,

विष्णु महेश हो जाता है। 

इसीलिए पिता समुद्र सा ,

गहरा बन जाता है। 

कभी-कभी हिमालय से ऊंचा हो जाता है।

आकाश की तरह ,

अपनी बाहों को पसारकर,

पूरे परिवार की खुशी बन जाता है ।

वह सिर्फ पिता होता है जो अपने,

दर्द को समेट कर सिर्फ, 

बच्चों के लिए जी जाता है।


आलोक चांटिया "रजनीश:


Thursday, August 21, 2025

रिश्ते मर गए आलोक चांटिया "रजनीश"


 शहर जल्दी मरा नहीं करते,

मरते हैं तो वह लोग, 

जिनको हमने जन्म के बाद से,

अपने चारों तरफ देखा है। 

जिनके लिए हमारे मन में, 

न जाने कितना लेखा जोखा है!

कोई चाचा तो कोई चाची, 

कोई मामा कोई मामी,

कोई फूफा कोई बुआ, 

कोई भाई कोई भाभी, 

कोई भैया कोई मम्मी,

कोई पापा कोई मित्र,

तो कोई शत्रु बन जाता है। 

लेकिन जैसे-जैसे समय, बीतता जाता है।

और आयु का तना, 

मजबूत होता जाता है ।

वैसे वैसे शहर में न जाने, 

कितने रिश्ते खो जाते हैं। 

चाह कर भी हम ना देख पाते हैं।

ना याद कर पाते हैं। 

कभी-कभी किसी सड़क को,

देखकर लगता है।

यहां चाचा रहा करते थे। 

उस तरफ मोड़ पर मामा, रहा करते थे।

आगे कुछ दूर ही पर तो, बुआ रहती थी ।

जाती हुई सड़क पर,

दादी चला करती थी ।

पर अब तो कहीं कोई भी,

नहीं दिखाई देता है। 

बचपन में जिनके साथ, 

स्कूल में बैठकर खेला करता था।

खाना खाया करता था। 

वह अब जाने किस,

शहर में चले गए हैं ।

शायद अब सिर्फ यादों में रह गए हैं।

उन्हें भी अपनी शहर की, 

सड़क पर कहां पाता हूं? 

क्योंकि मैं रिश्तो के, 

नए-नए परिभाषा में चलने लगा हूं।

किसी ऑफिस में बाबू ,

तो कहीं अधिकारी कहीं पति,

कहीं जीजा कहीं साला भी तो बन गया हूं ।

अब इन्हीं के कर्तव्य में, इतना उलझा रहता हूं ।

कि जब मैं शहर में उग रहा था ,

और मेरे उगाने में न जाने कितने रिश्ते ,

मेरे चारों तरफ मुझे बचा कर रख रहे थे ।

वह सब तो अब चिता पर, 

या जमीन के नीचे ही रह रहे थे।

मैं ही अब ज्यादा लंबी नींद में सो गया हूं ।

तभी तो समय के साथ, 

रिश्तों से बहुत दूर हो गया हूं ।

रिश्ते शहर की हवाओं में अभी भी जिंदा है।

पर हम में से कोई कहां शर्मिंदा है?

क्यूंकि रिश्तो को जीने की लत,

अब किसी में नहीं रह गई है ।

बस किसी तरह जी लेना है,

इसी की जुगत रह गई है।

अब सिर्फ रिश्ते दिमाग में रह गए हैं।

किसी त्योहार किसी शादी तक,

सिमट के रह गए हैं। 

आदमी तो बस सरपट, 

भागता चला जा रहा है। 

सिंधु घाटी सभ्यता की तरह ,

कुछ अवशेष पर जीवन को टिका जा रहा है।

शहर की स्मृति में अक्सर मैं आ जाता हूं।

जब जिस शहर में पला  खेला,

वहां पर भी अपने को अकेला पाता हूं ।

रिश्तो की इन लताओं पर लिपट कर ही,

सभ्यता की दौड़ आज चली जा रही है।

बाप की उंगली बेटे के बिना,

मां का आंचल परिवार के बिना ,

एक अजीब सी कहानी कहती चली जा रही है।

 फिर भी मनुष्य को अपने को,

अलग दिखाने का गुमान, 

अभी भी दिखाई देता है। 

इसीलिए सब्जी वाला ठेला वाला,

रिक्शावाला कभी-कभी भैया की,

पुकार के साथ होता है। 

रक्षा से दूर हर बंधन, दिखाई देता है ।

जगता हुआ शहर ,

अब भी दिखाई देता है।

डर कर निकलता है।

पहले से ज्यादा आज का आदमी,

घर से बाहर मदद के लिए पुकारने पर,

कहां कोई अब खड़ा होता है ?

फिर भी मानव ने अपने को,

बहुत अलग कर लिया है।

 रिश्ते को बनाना तोड़ना और स्वयं को,

अकेला दिखा कर भी सर्वश्रेष्ठ,

कहना सीख लिया है। 

खुदाई करके शहर के बहुत से अवशेष,

अस्थियां मिल भी जाती हैं।

पर जो रिश्ते हमने शब्दों में पुकारे थे ।

उनकी महक सिर्फ मिट्टी में आती है।

चार दिवारी के सन्नाटे में, 

जब रहने की बारी आती है।

तो शहर में खोए हुए रिश्तो की,

याद बहुत आती है।

रिश्तो की याद बहुत आती है।


आलोक चांटिया "रजनीश"