Friday, May 9, 2025

माँ का सच-

 माँ का सच

काव्यात्मक अनुवाद


मन है बोझिल, व्यथित, उदास,

जैसे माँ नहीं रही मेरे पास।

फिर सोचूं—क्यों रहती वो यहाँ,

जब हर कोई कहता है दुनिया को अलविदा?


पर दिल क्यों अब भी उसे बुलाए,

उसकी ममता क्यों भूला न जाए?

नज़रें टिकती हैं उस पौधे पर,

जो उगा है मिट्टी के भीतर।


एक बीज था, चुपचाप सोया,

धरती में गहरा दफ़न जो हुआ।

तभी तो पत्ते, फूल खिलाए,

अपनी छटा से जग को भाए।


पर सोचूं—इसकी माँ कहाँ है?

जिससे जीवन की पहली शपथ पाई है।

जिस कोख से जन्म लिया इसने,

वो तो मिट्टी में सो गई चुपचाप सने।


धरती बन गई उसकी चादर,

माँ की ममता हुई अमर।

बीज से पौधा जो बन पाया,

माँ के जाने से ही मुस्काया।


वो माँ कभी देख न पाएगा,

क्योंकि उसी की छाती पर जी पाएगा।

फिर भी कहता है—मैं हूँ पेड़,

छिपा लेता है सच का भेद।


पर कैसे कोई इसको झुठलाए,

कि माँ के बिना जीवन कैसे आए?

माँ के मिटने से जीवन पाता है रंग,

उसी की कुर्बानी से है यह संग।


और मेरा दिल भी चैन में है,

कि माँ की मिट्टी ही जीवन का सेहरा है।

वो खो गई, पर हमें मिला जहाँ,

उस त्याग में बसी है उसकी पहचान।


पर कौन समझे इस दिल की बात,

कब, कहाँ, और किसके साथ?

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