Saturday, October 10, 2026

हवा का साथ छूट जाना जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी एक छोटी-सी हवा का दर्शन--डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’ अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 ### हवा का साथ छूट जाना


जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी एक छोटी-सी हवा का दर्शन


जब घर का कोई अपना कहता है, कि वह मर गया है, या सफेद कपड़ों में खड़ा कोई डॉक्टर अपने तकनीकी ज्ञान की भाषा में उसके जीवन का अंतिम निर्णय सुनाता है, तो समझ में नहीं आता कि आखिर हुआ क्या है!


वह तो अभी भी सामने पड़ा है, उसका पूरा शरीर वहीं है, हाथ हैं, पैर हैं, चेहरा है, माथा है, आँखें हैं, होंठ हैं, जिन्हें देखकर कभी जीवन की असंख्य कहानियाँ जन्म लिया करती थीं।


उसके भीतर का मस्तिष्क, जिसने कभी संसार को समझा था, फेफड़े, जिन्होंने हवा को जीवन का संगीत बनाया था, दिल, जिसने धड़कनों के सहारे अपनों को अपना होने का भरोसा दिया था, किडनी, लीवर और शरीर के तमाम अंग, सब अपनी-अपनी कहानी के साथ उसके शरीर में मौजूद हैं, फिर भी घोषणा होती है— कि वह आदमी अब नहीं रहा!


आश्चर्य होता है, जिसके न होने की बात कही जा रही है, उसका शरीर तो अभी भी है, जिसे छूकर देखा जा सकता है, जिसके माथे पर हाथ रखकर उसकी गर्माहट खोजी जा सकती है, जिसके चेहरे में अब भी किसी अपने की छवि दिखाई देती है, फिर अचानक ऐसा क्या बदल गया कि एक जीवित मनुष्य सबकी निगाहों में एक निर्जीव शरीर बन गया?


और फिर शुरू होता है रोने, चीखने और विलाप करने का क्रम, कोई उसके पैरों से लिपट जाता है, कोई उसके सीने पर सिर रखकर अपनी दुनिया उजड़ने की बात कहता है, कोई बार-बार उसका नाम पुकारता है, मानो नाम की आवाज़ शरीर के भीतर कहीं सोए हुए जीवन को जगाकर फिर से खड़ा कर देगी।


लेकिन वह नहीं उठता, न किसी की पुकार का उत्तर देता है, न किसी के आँसुओं को पोंछता है, न किसी के कंधे पर हाथ रखकर यह कह पाता है कि रो मत, मैं यहीं हूँ!


आखिर वह कहाँ चला गया, जिसके होने का प्रमाण कुछ क्षण पहले तक यही शरीर हुआ करता था?


कहाँ खो गई वह पहचान, जिसके कारण इस शरीर को एक नाम दिया गया था, एक रिश्ता मिला था, एक घर मिला था, और संसार में एक जगह मिली थी?


शरीर तो वहीं है, लेकिन शरीर का होना अब उसके होने का प्रमाण क्यों नहीं है?


मैं सोचता हूँ, यह कैसी विचित्र पहेली है जिसे मनुष्य हजारों वर्षों से अपने आँसुओं में घोलकर समझने की कोशिश कर रहा है!


हवा की ओर देखिए, वह बाहर भी है, घर के कोने-कोने में भी है, खिड़की के पर्दों को हिलाती हुई, पेड़ों की पत्तियों को छूती हुई, कभी धूल उड़ाती हुई, तो कभी किसी के चेहरे पर ठंडक बनकर उतरती हुई।


हवा कहीं खत्म नहीं हुई, उसका अस्तित्व कहीं मिटा नहीं, वह बाहर अपनी पूरी दुनिया के साथ अब भी मौजूद है।


फिर भी इस शरीर के भीतर उस हवा का आना-जाना जब अपने जीवनदायी क्रम को खो देता है, तो संसार कहने लगता है— कि जीवन समाप्त हो गया!


कितनी अजीब बात है, जिस हवा को हम बिना देखे स्वीकार करते रहे, जिसके होने पर कभी ध्यान नहीं दिया, जिसे हमने जीवन की सबसे सामान्य और साधारण आवश्यकता समझा, उसी के साथ हमारा संबंध टूटते ही असाधारण हो जाती है हमारे जीवन की पूरी कहानी।


कल तक यही हवा हमारे भीतर आकर एक नई सुबह का हिस्सा बनती थी, और बाहर निकलकर किसी अगली साँस की प्रतीक्षा करती थी।


हम चलते थे, तो लगता था कि हम चल रहे हैं, हम बोलते थे, तो लगता था कि हम बोल रहे हैं, हम हँसते थे, तो लगता था कि हमारी हँसी सिर्फ हमारी अपनी है।


लेकिन शायद हम भूल जाते हैं कि हमारे होने की इस पूरी व्यवस्था में हम अकेले कभी थे ही नहीं, हमारे भीतर प्रकृति का भी हिस्सा था, हवा का भी योगदान था, धड़कनों का भी अनुशासन था, और उन अनगिनत जैविक प्रक्रियाओं का निरंतर सहयोग था, जिन्हें हमने कभी अपनी इच्छा से शुरू नहीं किया, न अपनी इच्छा से हर क्षण चलाते रहे।


हम सो जाते थे, लेकिन जीवन की व्यवस्था अपना काम करती रहती थी।


हम सपनों में खो जाते थे, लेकिन शरीर अपने भीतर जीवन की पहरेदारी करता रहता था।


हम संसार से बेखबर होते थे, लेकिन संसार का एक छोटा-सा हिस्सा हमारे भीतर जागता रहता था।


और जब वही व्यवस्था एक दिन हमेशा के लिए ठहर जाती है, तो हमें पता चलता है कि जिसे हम अपना जीवन कहते थे, वह वास्तव में कितने अनगिनत सहयोगों का परिणाम था!


लेकिन ठहरिए, क्या मृत्यु का अर्थ सिर्फ हवा का आना-जाना बंद हो जाना है?


क्या जीवन की पूरी परिभाषा साँसों की आवाजाही में सिमट जाती है?


नहीं, विज्ञान हमें इससे कहीं अधिक गंभीर और जटिल सत्य बताता है।


कभी-कभी साँस रुकने पर भी मनुष्य को वापस जीवन दिया जा सकता है, कभी धड़कन रुक जाने पर भी चिकित्सा का प्रयास उसे फिर से लौटा सकता है।


और कभी ऐसा भी होता है कि शरीर के कुछ अंग कुछ समय तक काम करते रहते हैं, लेकिन मस्तिष्क की वे क्षमताएँ, जो चेतना और जीवन की कुछ मूलभूत व्यवस्थाओं से जुड़ी हैं, स्थायी रूप से समाप्त हो चुकी होती हैं।


इसीलिए मृत्यु का निर्णय सिर्फ हवा को देखकर, सिर्फ धड़कन को सुनकर, या केवल शरीर को निश्चल पाकर नहीं किया जा सकता।


उसके लिए विज्ञान ने अपने मानदंड बनाए हैं, चिकित्सा ने अपनी कसौटियाँ निर्धारित की हैं, और कानून ने भी उन परिस्थितियों के लिए अपनी सीमाएँ तय की हैं।


पर मेरे भीतर एक प्रश्न फिर भी जीवित रहता है—


जब विज्ञान शरीर के भीतर जीवन की समाप्ति के प्रमाण खोजता है, तब मनुष्य अपने भीतर उसके होने की अनुभूति किस आधार पर खोजता है?


क्योंकि डॉक्टर के लिए मृत्यु एक चिकित्सकीय निष्कर्ष है, कानून के लिए एक निर्धारित स्थिति, और परिवार के लिए एक ऐसी अनुपस्थिति, जिसके सामने सारे तर्क धीरे-धीरे छोटे पड़ जाते हैं।


विज्ञान बता सकता है कि शरीर की कौन-सी व्यवस्था अब वापस नहीं लौटेगी, लेकिन वह आँसू किस प्रयोगशाला में मापे जाएँगे जो किसी बेटे की आँखों से अपने पिता के लिए गिरते हैं?


कौन-सा यंत्र बताएगा कि एक माँ की आवाज़ बेटे के भीतर कितने वर्षों तक जीवित रह सकती है?


और कौन-सा चिकित्सकीय मानदंड यह निर्धारित करेगा कि किसी के चले जाने के बाद उसकी स्मृतियाँ कितनी बार किसी को अकेले में रुलाएँगी?


यहीं मृत्यु शरीर से निकलकर संबंधों में प्रवेश कर जाती है।


वह एक व्यक्ति के लिए जीवन की समाप्ति हो सकती है, लेकिन दूसरे व्यक्ति के लिए जीवन भर चलने वाली एक नई कहानी की शुरुआत भी।


जिसके शरीर में हवा का आना-जाना बंद हो गया, उसके जाने के बाद भी उसके शब्द किसी के भीतर साँस लेते रहते हैं।


उसकी उँगलियों का स्पर्श, उसकी डाँट, उसकी हँसी, उसके अधूरे वादे, उसकी छोटी-छोटी आदतें, किसी पुराने कमरे की दीवारों में, किसी संदूक में रखे कपड़ों में, किसी तस्वीर के पीछे, या अचानक सुनाई पड़ जाने वाली किसी परिचित आवाज़ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं।


तब लगता है, मनुष्य के होने और न होने के बीच एक तीसरी दुनिया भी है, जहाँ शरीर उपस्थित नहीं होता, लेकिन उसका प्रभाव अपनी पूरी शक्ति के साथ जीवित रहता है।


शायद इसीलिए मृत्यु के बाद भी हम किसी को पूरी तरह भुला नहीं पाते।


क्योंकि मनुष्य केवल अपनी साँसों का नाम नहीं है, वह उन संबंधों का भी नाम है जिनमें उसकी साँसों ने कभी अर्थ पाया था।


लेकिन मेरा प्रश्न फिर भी हवा के पास लौट आता है।


वही हवा, जो बाहर कभी समाप्त नहीं हुई, वही हवा, जो पेड़ों को हिलाती रही, दीयों की लौ को काँपाती रही, और खिड़कियों से होकर घर के भीतर आती-जाती रही।


उस हवा ने हमारे साथ चलना बंद नहीं किया, उसने केवल हमारे शरीर के भीतर जीवन की उस विशेष व्यवस्था का हिस्सा बने रहना बंद कर दिया, जिसके सहारे हम इस संसार में सक्रिय थे।


हवा का अस्तित्व बना रहा, लेकिन उसके साथ हमारे होने का संबंध बदल गया।


और शायद जीवन का दर्शन इसी छोटे-से अंतर में छिपा है—


किसी वस्तु का संसार में होना और उसका हमारे लिए उपयोगी होना, दो अलग-अलग बातें हैं।


सूरज रोज निकलता है, लेकिन बंद आँखों के लिए उसका प्रकाश क्या अर्थ रखता है?


संगीत हवा में फैलता है, लेकिन सुनने की क्षमता खो चुके कानों के लिए उसकी मधुरता कहाँ बचती है?


प्रेम संसार में मौजूद रहता है, लेकिन महसूस करने की क्षमता खो चुके हृदय के लिए उसकी उपस्थिति का क्या अर्थ है?


इसी तरह हवा भी मौजूद रहती है, लेकिन जब शरीर उस हवा को जीवन की प्रक्रिया में बदल पाने की क्षमता खो देता है, तो वही हवा, जो कल तक जीवन का हिस्सा थी, आज केवल संसार की सामान्य हवा रह जाती है।


प्रकृति अपनी गति से चलती रहती है, और मनुष्य की गति उसके भीतर कहीं समाप्त हो जाती है।


कितना छोटा-सा अंतर है प्रकृति के बने रहने में और हमारे चले जाने में!


दुनिया वही रहती है, आकाश वही रहता है, हवा वही रहती है, सूरज की किरणें उसी तरह धरती पर उतरती हैं, लेकिन किसी एक घर के भीतर पूरा ब्रह्मांड बदल जाता है।


कल जिस कमरे में एक आवाज़ गूँजती थी, आज वहाँ सन्नाटा बैठा है।


कल जिस कुर्सी पर कोई अपना बैठा करता था, आज वहाँ खालीपन बैठा है।


कल जिस दरवाजे के खुलने पर किसी के आने की खुशी होती थी, आज उसी दरवाजे की आहट आँखों को भर देती है।


दरवाजा अब भी खुलता है, हवा अब भी आती है, समय अब भी चलता है, लेकिन प्रतीक्षा करने वाला वह व्यक्ति नहीं रहा।


और तब समझ में आता है कि मृत्यु केवल शरीर की किसी व्यवस्था का रुक जाना नहीं, जीवित लोगों के जीवन में किसी परिचित उपस्थिति का हमेशा के लिए बदल जाना भी है।


मैं नहीं जानता कि जीवन की पूरी व्याख्या किसी एक दर्शन में समा सकती है या नहीं, लेकिन इतना अवश्य समझता हूँ कि हम जीवन को तब तक बहुत साधारण मानते रहते हैं, जब तक वह हमारे भीतर असाधारण ढंग से काम करता रहता है।


हम साँस लेते हैं, लेकिन साँस लेने पर उत्सव नहीं मनाते।


हम जागते हैं, लेकिन आँखें खुलने को किसी चमत्कार की तरह नहीं देखते।


हम किसी अपने को देखते हैं, उससे बात करते हैं, कभी नाराज होते हैं, कभी उसे अनदेखा कर देते हैं, और सोचते हैं कि यह सब कल भी होगा।


पर जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अपने बने रहने की कोई लिखित गारंटी नहीं देता।


जिसे हम कल का अधिकार समझते हैं, वह वास्तव में आज का अवसर होता है।


जिसे हम अपना स्थायी होना मानते हैं, वह प्रकृति की निरंतर चलती व्यवस्था में एक सीमित अवधि का हिस्सा होता है।


और जिस हवा को हम हर दिन बिना धन्यवाद दिए अपने भीतर आने देते हैं, वही हवा हमें चुपचाप याद दिलाती है कि जीवन पर हमारा अधिकार उतना निरंकुश नहीं है, जितना हम अपने अहंकार में समझ बैठते हैं।


इसलिए जब कोई कहता है कि वह मर गया है, तो मैं केवल उसके शरीर को नहीं देखता, मैं उन सभी अदृश्य प्रक्रियाओं को भी सोचता हूँ जिनके चलते वह कभी एक जीवित मनुष्य था।


मैं उस हवा को भी देखता हूँ जो अब भी उसके आसपास है, उस आकाश को भी जो उसके जाने से खाली नहीं हुआ, और उस परिवार को भी जिसकी दुनिया में एक ऐसी जगह खाली हो गई है जिसे कोई दूसरा शरीर कभी पूरी तरह नहीं भर पाएगा।


तब मृत्यु मुझे हवा के समाप्त हो जाने का नाम नहीं लगती, बल्कि उस अनूठे संबंध के टूट जाने का नाम लगती है जिसके सहारे प्रकृति का एक छोटा-सा हिस्सा अपने आपको मनुष्य कहता था।


हवा अब भी है, शरीर भी कुछ समय तक अपनी पहचान का आकार बनाए रखता है, दुनिया भी अपनी जगह पर है, लेकिन वह जीवन, जो इन सबको जोड़कर एक व्यक्ति की कहानी बनाता था, अपनी अंतिम सीमा तक पहुँच चुका होता है।


और शायद इसी को समझना जीवन को समझने की शुरुआत है।


हम मृत्यु से इसलिए नहीं डरते कि हवा समाप्त हो जाएगी, बल्कि इसलिए डरते हैं कि हवा के साथ चलने वाली हमारी अपनी कहानी समाप्त हो जाएगी।


हम इस बात से नहीं रोते कि संसार से हवा चली गई, हम इस बात से रोते हैं कि उस हवा के सहारे जिस आवाज़ को सुनते थे, जिस हाथ को पकड़ते थे, जिस चेहरे में अपना संसार देखते थे, वह अब हमारे सामने वैसे लौटकर नहीं आएगा।


बस, जीवन का इतना-सा दर्शन है—


हवा बाहर भी थी, हवा भीतर भी थी, हवा आज भी बाहर है, लेकिन कल तक जिस हवा के साथ एक मनुष्य की दुनिया चलती थी, आज उसी हवा के बीच उसकी दुनिया थम गई है।


हवा ने संसार से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा, बस एक शरीर के भीतर जीवन का साथ छूट गया।


और मनुष्य ने उस साथ के छूट जाने को एक नाम दे दिया— मृत्यु।


लेकिन शायद मृत्यु का सबसे गहरा प्रश्न यह नहीं है कि हमारी हवा कब तक चलेगी,


बल्कि यह है कि \*\*जब तक हवा चल रही है, तब तक हम किसी के जीवन में कितनी जिंदगी बनकर चल रहे हैं?\*\*


क्योंकि अंत में सिर्फ यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि हमारे शरीर ने कितनी साँसें लीं,


बल्कि यह भी कि हमारी उपस्थिति ने कितने चेहरों पर मुस्कान रखी, कितने दुखों को सहारा दिया, कितने संबंधों को अर्थ दिया, और हमारे होने से किसी दूसरे मनुष्य को जीवन थोड़ा और सुंदर लगा या नहीं।


हवा तो चलती ही रहेगी, उसका अपना कोई शोक नहीं, उसकी अपनी कोई स्मृति नहीं, उसकी अपनी कोई प्रतीक्षा नहीं।


लेकिन मनुष्य के पास एक दुर्लभ अवसर है— वह अपनी साँसों के रहते किसी दूसरे मनुष्य की जिंदगी में ऐसा अर्थ छोड़ सकता है जो उसकी अनुपस्थिति में भी जीवित रहे।


शायद यही जीवन की सबसे सुंदर संभावना है, और मृत्यु के सामने मनुष्य की सबसे बड़ी सार्थकता भी।


डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’ अखिल भारतीय अधिकार संगठन



No comments:

Post a Comment