Monday, April 20, 2026

कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन


 कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,


 आज वह सड़क के किनारे पड़ा था, 


कितना फूला नहीं समा रहा था ,


 किसी को कुछ समझ भी नहीं पा रहा था,


क्योंकि उसे भगवान पर चढ़ाया जाएगा ,


और उसका स्थान भी उतना ही ऊंचा हो जाएगा,


पर कहां जानता था कि जिस संसार में,


वह भगवान तक पहुंचने की चाहत में, 


किसी के हाथ में लिया गया है ,


वहीं दूसरे दिन उसको भगवान के,


 प्रतिमा से निकाल कर सड़क पर फेंक गया है,


फूल का यह दर्शन कहां,


कोई भी समझ पाता है ,


हर कोई बस अपनी गुमान में यहां आता है,


कहता भी है कि तुम्हारी हैसियत क्या है ?


तुम क्या जानो मैं क्या हूं ?


मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं ?


मैं चंद मिनट में तुम्हें मिटा सकता हूं, 


पर वह स्वयं यह नहीं जानता है,


कि आज जिस ऊंचाई पर पहुंचकर,


 वह इतने बड़े-बड़े शब्द को बोले जा रहा है,


कल वह खुद फूल की तरह,


वहां से उतार भी लिया जाएगा,

और अकेलेपन, अंधेरे में ,


चुपचाप बैठा दिया जाएगा ,


जहां वह स्वयं अपने ,


अस्तित्व को ढूंढने की कोशिश करेगा, 


हो सकता है कभी वह उदासी में,


तो कभी किसी वृद्ध आश्रम में मरेगा


पर जब उर्जा शरीर में बहती है,


तो कहां किसी को कुछ समझती है?


और कहती है फूलों की इस कहानी को,


जो स्वयं आदमी ही रोज ,


भगवान पर चढ़ा कर लिखता है,


पर क्या कभी उसका यह दर्शन,

उसके चेहरे पर ,


उसके व्यवहार में किसी को दिखता है?


डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, April 7, 2026

फूल का दोष डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 फूल का दोष 


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


फूल सड़क पर क्या गिर गया

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

गलती से ले जाने वाले की थी

पर सजा एक फूल को दे दिया गया

फूल सड़क पर क्या गिरा

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

कल जब वह बीज के रूप में

मिट्टी के साथ ही मिलकर फूटा था

निकला था और अपने होने का

अर्थ समझाया था

तभी तो दुनिया का आदमी उसके

रंग रूप को समझ पाया था

पर आज इस मिट्टी में गिरे हुए

फूल को लोग मंदिर नहीं ले जाएंगे

क्योंकि गिरे हुए फूल को भला कहां

भगवान को समर्पित कर पाएंगे

भगवान जिसने सभी को बनाया है

इस पृथ्वी पर एक-एक

फूल पत्ता प्राणी उगाया है

उस भगवान से एक

फूल दूर हो जाया जाएगा

क्योंकि जमीन में गिरकर

जमीन से उगने वाला फूल

भला भगवान का साथ कहां पाएगा

केवल गिर जाने भर से

जिस फूल का जीवन ही

दलित का हो गया है

उस मानव के जीवन में क्या समझना

क्या से क्या हो गया है

फूल चुपचाप दूर सड़क पर पड़ा रहकर 

भगवान को देखता रहा

शायद यह पूछता भी रहा

कि जिस मिट्टी से निकलकर

वह फूल बना है

उसी मिट्टी में गिरकर वह

भगवान से दूर खड़ा है

यह जीवन का कौन सा दर्शन

फूल को देखना पड़ रहा है

चाहकर भी वह अपने

भगवान पर नहीं चढ रहा है

पाप पुण्य के खेल में वह

समझ ही नहीं पाया है

कि उसने कोई गलती की है

या मानव ने अपने कर्मों का फल पाया है

एक फूल को भगवान तक

कहां पहुंचा पाया है

प्रगति सभ्यता संस्कृति की कहानी में

क्या मानव होने का बस

इतना ही दर्शन सामने आया है

शायद फूल यही नहीं समझ पाया है


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Thursday, April 2, 2026

मेरे पास शब्दों के सिवा कुछ भी नहीं डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

मेरे पास शब्दों के सिवा ,
कुछ भी नहीं है ,
कुछ लोग कहते हैं कि ,
इससे बड़ा कुछ भी नहीं है ,
मैं सिर्फ तुमको दे सकता हूं ,
इन्हीं को जी भर के ,
तुम चाहो तो इससे नहा कर ,
अपने को ताजा कर लो ,
और जीवन के कुछ अर्थ ,
तुम भी अपने मुट्ठी में भर लो ,
मुझे नहीं मालूम मेरे शब्दों को,
देखकर तुम हंसते हो ,
रोते हो ,गाते हो या पागल समझकर ,
आगे निकल जाते हो,
मैंने तो सीखा है सिर्फ जो भी ,
तुम्हारी मुट्ठी में है ,
उसे देते चले जाओ ,
एक पल भी यह मत सोचो कि,
देने के बाद तुम क्या पाओ?
इस पृथ्वी पर जो भी ,
तुमको मिल रहा है ,
तुम्हारे अंदर उर्जा का ,
जो संचार खिल रहा है ,
वह सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं बना है !
उन्हें अपने जरूरत के अनुसार ,
प्रयोग करके इसी दुनिया में ,
वापस करके जाना है,
इसी का नाम जीवन है ,
और इसी का नाम ,
मानव का जीवन पाना है ,
इसीलिए मेरे शब्दों से अगर,
तुम नहाना चाहते हो ,
और जीवन के कुछ स्वर ,
संगीत की तरह सुन जाना चाहते हो ,
तो मेरे शब्दों को गीता, रामायण ,
कुरान, भागवत, बाइबल,
समझकर सुनकर ,
अपने मतलब का उसमें से चुनकर,
थोड़ा सा मुस्कुराने की तरफ चले जाओ, आओ आओ मेरे पास,
जो शब्द रखे हैं, पड़े हैं ,
जिन्हें मैंने सजा कर रखा है,
उनको तुम भी थोड़ा सा ले जाओ ,
क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म होते हैं ,
और उनके अर्थ कभी भी ,
कहां कम होते हैं ,
बस यही तुम अगर समझ जाओ ,
तो दुनिया की हर संपत्ति से ज्यादा,
मेरे अर्थ को तुम भर भर के ले जाओ ,
तुम भर भर के ले जाओ ।
आलोक चांटिया "रजनीश"