Friday, October 16, 2026

अँधेरा मुझे बहुत भाता है! डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”

 

अँधेरा मुझे बहुत भाता है!

डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”

रात ही हमको बतलाती, कितनी तन्हा अपनी रात, दिन के उजले भ्रम में छिपती, मन की अनकही हर बात।

दिन तो चेहरे खूब सजाता, झूठी हँसी सजाता है, रात का गहरा मौन मगर, हर सच सामने लाता है।

अँधेरा मुझे बहुत भाता है, मुझको मुझसे मिलवाता है।

जब दीवारें पास खड़ी हों, कोई अपना पास न हो, दर्द सुनाने को मन चाहे, सुनने वाला ख़ास न हो।

जब सुख-दुःख में साथ निभाने, कोई नज़र न आता है, तब एकाकीपन का साथी, अँधेरा बनकर आता है।

अँधेरा मुझे बहुत भाता है, चुप रहकर साथ निभाता है।

माँ की कोख के अँधियारे में, जीवन आकार बनाता है, बंद पलकों के सन्नाटे में, सपना फूल खिलाता है।

नयनों में काजल सज जाए, रूप निखरकर आता है, फिर भी जाने क्यों मन अपना, केवल उजियारा चाहता है।

अँधेरा मुझे बहुत भाता है, जीवन का भेद बताता है।

जब दुनिया से हार के मन, अपने भीतर जाता है, अँधियारे के मौन में बैठा, खुद को पहचान पाता है।

कितना गहरा तम हो चाहे, पथ फिर नज़र ही आता है, ठहरी आँखों को कुछ पल में, नया सवेरा भाता है।

अँधेरा मुझे बहुत भाता है, जीने का अर्थ सिखाता है।

थाम के देखो हाथ अँधेरे का, डर को दूर भगाकर तो, अपने मन के बंद कपाटों, को इक बार खोलकर तो।

भीतर छिपी हुई ज्योति का, दर्शन हो ही जाता है, “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का, अर्थ समझ में आता है।

अँधेरा मुझे बहुत भाता है, भीतर दीप जलाता है।

दिन की अपनी चकाचौंध है, रात का अपना नाता है, दिन जग को दिखलाता है, रात स्वयं से मिलवाता है।

भीड़ भरी इस दुनिया में, मन जब तन्हा हो जाता है, अँधियारे की गोद में आकर, दर्द सुकून बन जाता है।

अँधेरा मुझे बहुत भाता है, मुझको मुझसे मिलवाता है।

अब तुम भी इतना बतलाना, क्या ऐसा तुम्हें भी भाता है? रात के इस गहरेपन में, क्या मन अपना घर पाता है?

क्या तुमको भी रात कभी, अपना सच दिखलाती है? क्या तुम्हारे हिस्से में भी, ऐसी रात कभी आती है?

अँधेरा मुझे बहुत भाता है, क्या तुमको भी भाता है?

— डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”

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