क्या उसके दरवाज़े पर कोई उसके लिए भी आता है?
एक दार्शनिक कविता — डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
जब हार ही लिखी हो भाग्य में, तो हार को ही जीवन बना लेना चाहिए, दर्द चाहे कितना भी गहरा हो, होंठों पर मुस्कान सजा लेना चाहिए।
आँखों में चाहे सावन ठहरा हो, चेहरे पर धूप खिलानी चाहिए, अपने भीतर कितनी भी रातें हों, दुनिया को सुबह दिखानी चाहिए।
यही तो जीवन का दर्शन है, जिसे जीने की आदत पड़ जाती है, वह अपने ही आँसुओं को पीकर, दूसरों की प्यास बुझाता जाता है।
उसे देखकर दुनिया कहती है, यह कितना शांत, कितना ज्ञानी है, इसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं, इसके भीतर कैसी रवानी है!
कोई उसे संत कहकर जाता है, कोई महात्मा, कोई योगी बताता है, कोई पीर-फकीर कहकर उसके आगे, अपना सारा दुखड़ा सुनाता है।
कोई अपने टूटे सपनों को लेकर, उसके दरवाज़े पर आ जाता है, कोई जीवन से हारा हुआ मन लेकर, उससे जीने की राह पूछ जाता है।
वह सबकी बातें सुनता है, सबके आँसू पोंछने का प्रयास करता है, जिसके पास स्वयं नहीं उत्तर कोई, वह भी सबको उत्तर दिया करता है।
वह कहता है—तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारा जीवन सुखमय हो जाए, जो चाहो, वह तुम्हें मिल जाए, हर सपना तुम्हारा सच हो जाए।
तुम्हारी राहों में फूल खिलें, हर मुश्किल तुमसे दूर रहे, तुम जिसको चाहो, वह साथ चले, तुम्हारे मन में न कोई अधूरापन रहे।
वह दूसरों के लिए दुआ करता है, अपने हिस्से की रात छिपाकर, वह सबके घर में दीप जलाता है, अपने आँगन का अँधेरा अपनाकर।
वह दूसरों की नाव किनारे करता, अपनी पतवार सँभाले रहता है, सबको डूबने से बचाने वाला, खुद भीतर-भीतर डूबता रहता है।
कितना विचित्र विधान है जीवन का, कितना अनजाना संसार है, जो सबके दर्द को समझ रहा है, क्या उसका दर्द भी किसी को स्वीकार है?
जिसके पास हर प्रश्न का उत्तर है, क्या उसका प्रश्न कोई सुनता है? जो सबके मन की गाँठें खोलता है, क्या कोई उसका मन भी बुनता है?
जो सबको हिम्मत देता है, क्या कोई उसे हिम्मत देता है? जो सबके टूटे मन को जोड़ता है, क्या कोई उसे भी जोड़ता है?
जो सबकी आँखों के आँसू पढ़ता, क्या कोई उसकी आँखें पढ़ पाता है? जो मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को जाने, क्या कोई उसके मौन को समझ पाता है?
वह भी तो कभी थक जाता होगा, वह भी तो कभी बिखरता होगा, जब रात अकेले में पूछती होगी, तू कब तक यूँ ही सँवरता होगा?
जब कोई अपना पास न हो, जब कोई हाल पूछने वाला न हो, जब मन में उमड़े सागर को, सुनने वाला कोई किनारा न हो।
तब वह किसके पास जाएगा? अपना दुख किसे सुनाएगा? जिसने सबको सहारा देना सीखा, वह खुद सहारा कहाँ से लाएगा?
जिसके दरवाज़े पर रोज़ कोई, अपनी पीड़ा लेकर आता है, क्या उसके दरवाज़े पर भी कोई, उसका हाल पूछने आता है?
क्या कोई कभी यह पूछता है, कि आज तुम्हारा मन कैसा है? सबकी चिंता करने वाले इंसान, तुम्हारे भीतर क्या बचा है?
क्या तुम्हें भी कभी रोने का मन होता है? क्या तुम्हें भी किसी का इंतज़ार रहता है? क्या तुम्हारे भीतर भी कोई बच्चा, किसी अपने के लिए उदास रहता है?
या तुमने भी अपनी इच्छाओं को, कर्तव्यों की चादर में ढक डाला है? दुनिया को सुख देने की खातिर, खुद को ही खुद से अलग कर डाला है?
तुम्हारे त्याग को लोग तप कहते हैं, तुम्हारी चुप्पी को ज्ञान बताते हैं, तुम्हारी सहनशीलता को महानता कहकर, तुम्हारे हिस्से के प्रश्न भुलाते हैं।
कितना आसान है किसी को, संत और महात्मा कह देना, कितना कठिन है उसके भीतर उतरकर, उसका एक आँसू पढ़ लेना।
दुनिया को उसकी मुस्कान चाहिए, उसकी पीड़ा से क्या लेना-देना? सबको अपने दुख का उपचार चाहिए, किसी को उसका दुख नहीं है सहना।
जब तक वह सबकी सुनता रहेगा, तब तक वह सबको प्यारा होगा, जिस दिन अपने दर्द की बात करेगा, शायद वह दुनिया को बेचारा होगा।
यह कैसा संसार रचा हमने, जहाँ संवेदना भी व्यापार बनी? जो सबको बाँट रहा था जीवन भर, उसकी पीड़ा ही लाचार बनी।
जो हर चेहरे पर हँसी सजाता है, उसके चेहरे को कौन निहारेगा? जो सबके लिए दुआ माँगता है, उसके लिए कौन हाथ पसारेगा?
फिर भी वह अपनी राह चलेगा, अपने धर्म से विमुख नहीं होगा, दर्द भले ही भीतर पलता रहे, वह दूसरों के लिए दुख नहीं होगा।
वह फिर भी यही दुआ देगा, तुम्हारा जीवन आबाद रहे, तुम्हारे हिस्से में खुशियाँ आएँ, तुम्हारे घर में सदा प्रकाश रहे।
पर जब रात बहुत गहरी होगी, और कोई आवाज़ नहीं आएगी, तब उसके मन की सूनी चौखट पर, एक ही बात लौटकर आएगी—
क्या उसके दरवाज़े पर कोई, उसके लिए भी कभी आएगा? क्या कोई उसकी चुप्पी सुनकर, उसके मन का दर्द समझ पाएगा?
क्या कोई उसके हाथों को थामकर, बस इतना कहने वाला होगा— बहुतों के लिए जी चुके तुम, अब तुम्हारे लिए भी कोई होगा।
तुम्हें हर बार मजबूत नहीं होना, तुम्हें हर बार मुस्काना नहीं है, तुम भी इंसान हो, कोई प्रतिमा नहीं, तुम्हें हर दर्द छिपाना नहीं है।
तुम्हें भी अधिकार है रोने का, तुम्हें भी अधिकार है टूट जाने का, तुम्हें भी अधिकार है किसी अपने के, कंधे पर सिर रखकर सो जाने का।
क्योंकि संत होना पत्थर होना नहीं, महान होना संवेदनहीन होना नहीं, दूसरों के घावों पर मरहम रखना, अपने घावों को अनदेखा करना नहीं।
और जीवन का सबसे बड़ा दर्शन, शायद इतना-सा ही तो है— जो सबके लिए दीपक बनता है, उसके लिए भी उजाला होना चाहिए।
जो सबकी पीड़ा को अपना समझे, उसकी पीड़ा भी अपनी होनी चाहिए, जो सबको जीने की राह दिखाए, उसकी राह में भी रोशनी होनी चाहिए।
क्योंकि हर मुस्कुराता चेहरा सुखी नहीं होता, हर मौन व्यक्ति ज्ञानी नहीं होता, और जो सबको जीना सिखाता है, वह भी भीतर से कभी-कभी जीवन से अनजान नहीं होता।
इसलिए जब अगली बार कोई, तुम्हारे सामने मुस्कुराता मिले, और अपने दुख की जगह तुम्हें, तुम्हारे दुख का हल बताता मिले—
तो केवल उसके शब्द मत सुनना, उसकी आँखों में भी उतर जाना, हो सकता है वह तुम्हें राह दिखाते-दिखाते, अपनी राह कहीं भूल आया हो।
हो सकता है वह तुम्हें दुआ देते-देते, अपनी दुआ से वंचित रह गया हो, हो सकता है वह सबको सँभालते-सँभालते, अपने ही भीतर बिखर गया हो।
उससे यह मत कहना कि तुम संत हो, बस इतना कहना—मैं तुम्हारे साथ हूँ। तुमने सबके लिए बहुत कुछ किया, आज कुछ पल केवल तुम्हारे नाम हैं।
शायद उस दिन पहली बार, उसकी मुस्कान सचमुच मुस्काएगी, शायद उसके भीतर वर्षों से सोई, कोई उम्मीद फिर लौट आएगी।
और तब वह जान सकेगा कि संसार में, केवल दुख बाँटना ही धर्म नहीं, किसी दुखी मन का दुख सुन लेना भी, किसी पूजा से कम कर्म नहीं।
क्योंकि अंततः जीवन की हार में भी, मनुष्य को मनुष्य की जरूरत होती है, और सबसे अधिक मुस्कुराने वाले चेहरे को भी, कभी किसी की मोहब्बत की जरूरत होती है।
डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
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