Monday, November 2, 2026

भीड़ से निकलकर जीवन को ढूँढ़ता मनुष्य डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’

 

भीड़ से निकलकर जीवन को ढूँढ़ता मनुष्य

डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’

भीड़ से निकलने में हर कोई
पूरे प्रयास से जुटा हुआ है।
एक मनुष्य अपने को
शहरी कहलाने में मिटा हुआ है।

चाहता हर कोई है कुछ घंटे सिर्फ
अपनी और अपनों के लिए मिल पाएँ,
पर गाड़ियों की लंबी कतारों से
पहले कोई निकल तो पाए!

बस फिर से जंगल में रहने वाले
पक्षी की तरह मनुष्य सुबह होते ही
कर्म के आसमान में उड़ने लगा है।

थका-हारा, पसीने से भीगा,
शाम को डूबते सूरज में
थोड़ा अँधेरा और थोड़ा कृत्रिम प्रकाश लेकर
लौटने लगा है।

जान भी नहीं पाता है कि घोंसले में
अब जीवन के स्वर
किस तरफ चले गए हैं?

यह क्या कम है कि इन्हीं घोंसलों से
जीवन के नन्हे-नन्हे पंख
आसमान में उड़ना सीख गए हैं।

अब सूरज भी सिर्फ प्रकृति में
प्राकृतिक रूप से नहीं डूबता है।
शहर में उठते हुए धुएँ और कालिख से
वह भी पश्चिम की तरफ जल्दी डूबता है।

अब किसी के पास
समय ही नहीं है
उस जाते हुए सूरज की लालिमा को
देखने का एक भी पल।

ट्रैफिक पुलिस वाले के
हाथों से निकलते इशारे
या ट्रैफिक सिग्नल के संकेतों में
डूबा हुआ मनुष्य
सोचता रहता है—
कैसा होगा कल?

कोई भी अब आज से ज्यादा
प्रसन्न रह नहीं पा रहा है।
बस ऊपर आसमान में
जो रहता है, उससे यही
रात-दिन कहता जा रहा है—

कि मेरी तरफ भी एक बार
आशीर्वाद का वह स्वर सुना दो।
मैं मनुष्य क्यों बना हूँ,
मुस्कुराहट में यह तो बता दो।

बस किसी ओवरब्रिज पर
जाम में फँसा हुआ मनुष्य
भीड़ से निकलने की कोशिश में
यही रोज सुबह से शाम तक
स्वयं के जीवन को
ढूँढ़ता हुआ रह जाता है।

बस कुछ ही लोग हैं
जिनके हिस्से में
सुख-दुख, रात-दिन के बाद
ओस की बूँद की तरह
किसी पेड़ की पत्ती पर
खुशी का स्वर आता है।