जीवन हार गया या हराया गया
— डॉ. आलोक चांटिया 'रजनीश'
जीवन हार गया या हराया गया,
क्यों उसे फिर द्रौपदी बनाया गया?
था स्वयं में मग्न, सहज, संतुष्ट वह,
फिर सभा बीच क्यों बुलाया गया?
पाँच इन्द्रियों के दृढ़ प्रहरी साथ थे,
फिर भी बालों से घसीटा क्यों गया?
देह नहीं, सम्मान का था प्रश्न यह,
क्यों उसे अपमान में जीता गया?
रो रहा था मौन बनकर हर श्वास में,
पर न कोई भी सहारा बन सका।
धर्म बैठे देखता था आँख मूँदकर,
सत्य भी उस दिन अकेला रह गया।
जीवन हार गया या हराया गया,
क्यों उसे फिर द्रौपदी बनाया गया?
चीर केवल वस्त्र का उतरा नहीं,
शब्द का, विश्वास का भी चीर था।
भावनाएँ नंगी होकर रो उठीं,
संबंधों का टूटता ज़ंजीर था।
जानते थे सब कि भीतर क्या छिपा,
फिर तमाशे का नगर सजता रहा।
भीड़ ताली पीटती ही रह गई,
मौन हर चेहरा मुखौटा बन गया।
सबके अपने अर्थ थे, अनर्थ थे,
यथार्थ थे और निजी स्वार्थ थे।
साँस अपनी, अपना कल, अपना सफ़र—
इसीलिए सब मौन के ही साथ थे।
जीतकर भी हारता जीवन रहा,
हर समय द्रौपदी बनता रहा।
कृष्ण भी आते तभी हैं मित्र बन,
जब मनुष्य अंतिम किनारे आ गया।
अब न आँसू हैं, न कोई याचना,
अब प्रतिकारों का ही संकल्प है।
घाव लेकर भी खड़ी है दृढ़ वही,
यही जीवन का अमर विकल्प है।
अंधकारों में टटोलूँ जब स्वयं,
हर तरफ़ बस झुकी हुई आँखें मिलीं।
हर किसी को अपनी पीड़ा थी बड़ी,
इसलिए सबकी जुबाँ पत्थर बनी।
तब समझ में एक गहरा सत्य आया—
जीवन हारा कम, अधिक हरवाया गया।
धर्म जब सत्ता के आगे झुक गया,
हर युग में द्रौपदी बनाया गया।
शब्दों का चीरहरण, संबंधों का,
भावनाओं का निरंतर क्षरण हुआ।
मनुष्यता की चिता धधकती ही रही,
और विवेक भीतर ही दफ़्न हुआ।
पूछता हूँ आज तुमसे एक प्रश्न—
क्या कभी यह पीर भी जागेगी?
द्रौपदी की भीगी पलकों का नीर
क्या तुम्हारी आँख से भी बहेगी?
यदि नहीं, तो याद रखना मित्र मेरे,
हर युग अपना महाभारत लाएगा।
जब-जब मौन रहेगा धर्म यहाँ,
जीवन फिर द्रौपदी कहलाएगा।