### शब्दों का कचरा और नमस्कार का पुरस्कार
— डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’
वह कई दिनों तक उसके भेजे हुए शब्दों को घर के कचरे की तरह एक कोने में इकट्ठा करती रहती है, न उन्हें पढ़ने की फुर्सत, न उनके अर्थों में उतरने की इच्छा, न उन भावनाओं को समझने की जरूरत, जिन्हें किसी ने अपने भीतर से निकालकर उसके सामने शब्दों में रख दिया था।
उधर लिखने वाला भी कितना अजीब है, हर दिन कुछ नया लिखता है, अपने मन की परतें खोलता है, भावनाओं को अक्षरों में पिरोता है, और इस भ्रम में जीता है कि शायद उसके शब्दों में किसी के दिल तक पहुँचने का रास्ता होगा!
लेकिन आज की दुनिया में भावनाओं से अधिक तकनीक का सम्मान है, शब्दों से अधिक इमोजी की पहचान है, और आत्मीयता की सबसे छोटी परिभाषा दोनों हाथ जोड़कर भेजी गई एक तस्वीर में कैद है!
फिर एक दिन अचानक उसके मोबाइल की दुनिया में एक सुंदर-सा नमस्कार प्रकट होता है, दोनों हाथ जुड़े होते हैं तस्वीर में, मानो कई दिनों की उपेक्षा का हिसाब एक ही क्लिक में पूरा होता है।
न कोई उत्तर शब्दों का, न भावनाओं का कोई स्वीकार, न यह एहसास कि किसी ने कितनी रातें जागकर लिखे थे ये विचार, बस एक तकनीकी अभिवादन और लिखने वाला खुश हो जाता है— शायद उसे अपनी मेहनत का यही प्रतिफल मिल पाता है!
पर ठहरिए, कहानी अभी बाकी है, लिखने वाले की भी अपनी बीमारी है!
वह जानता है कि उसके शब्द किसी की प्राथमिकता नहीं हैं, उसकी भावनाएँ किसी की व्यस्त दुनिया में कोई आवश्यक गतिविधि नहीं हैं, फिर भी वह लिखता है, बार-बार लिखता है, उपेक्षा के हर पत्थर को अपनी कविता का आधार बनाकर लिखता है।
क्योंकि उसे भी एक नशा है, कुछ कहने का, कुछ रचने का, अपने भीतर के समुद्र को कागज पर उतारने का।
उसे इस बात से भी शिकायत नहीं कि उसके शब्दों को पढ़ा नहीं गया, उसे तो इस बात में भी आनंद मिलता है कि उसने अपने मन का सच किसी छल के बिना लिख दिया।
वह जानता है— हर लिखा हुआ शब्द पढ़ा नहीं जाता, हर सच्चा भाव समझा नहीं जाता, हर समर्पण का पुरस्कार नहीं मिलता, और हर नमस्कार के पीछे सम्मान का भाव नहीं होता!
फिर भी कवि लिखता है, क्योंकि उसका धर्म लिखना है, किसी के उत्तर की प्रतीक्षा में अपने अस्तित्व को गिरवी रखना नहीं।
वह शब्दों को भेजता रहेगा, कोई पढ़े या न पढ़े, कोई समझे या न समझे, कोई हृदय से स्वीकार करे या केवल हाथ जोड़कर तकनीकी औपचारिकता निभा दे।
उसे मालूम है कि उसकी कविता का मूल्य किसी के उत्तर की लंबाई से नहीं, किसी की प्रतिक्रिया की तेजी से नहीं, और किसी तस्वीर में जुड़े हाथों से नहीं तय किया जा सकता।
क्योंकि कुछ लोग शब्दों को सिर्फ संदेश समझकर भेजते हैं, और कुछ लोग अपने पूरे अस्तित्व को शब्दों में बदलकर भेजते हैं।
पहले लोग उत्तर न मिलने पर संदेश मिटा देते हैं, दूसरे लोग उत्तर न मिलने पर एक नई कविता लिख देते हैं!
यही तो अंतर है अपेक्षा और सृजन में, प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति में, और शायद इसी अंतर में छिपा है एक कवि के जीवित होने का प्रमाण।
वह लिखता रहेगा, भले ही उसके शब्द किसी डिजिटल कोने में पड़े रहें, भले ही उसकी भावनाएँ कचरे की तरह उपेक्षित होती रहें, क्योंकि उसे किसी की स्वीकृति से अधिक अपने सृजन पर विश्वास है।
उपेक्षा उसका अंत नहीं, उसकी अगली कविता की शुरुआत है; और कभी-कभी, एक मौन नमस्कार से अधिक एक अनकही कविता की औकात है!
— डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’ कवि | अखिल भारतीय अधिकार संगठन
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