पैसे का अँधियारा
— डॉ आलोक चांटिया रजनीश
मुट्ठी में जब पैसा आया,
मन का दीपक बुझता पाया,
चेहरों पर अँधियारा उतरा,
हर रिश्ता भी धुंधलाया।
अब न किसी को राह उजाली,
सबको अपनी पड़ी निराली,
सच्चे मन की बात करो तो,
हो जाती आवाज़ ख़ाली।
सुनकर भी सब मौन खड़े हैं,
पैसे के बस खेल बड़े हैं,
रिश्तों की बातें सुनते ही,
चेहरों पर संदेह पड़े हैं।
जब खुद का खर्चा भारी है,
जीवन की पीड़ा जारी है,
कौन किसी की बात सुनेगा,
सबकी अपनी लाचारी है।
बस यह सोच मनुज चुप रहता,
भीतर-भीतर दुख को सहता,
कोई अपना बिछुड़ भी जाए,
आँसू पीकर जीवन ढोता।
कोई लावारिस मर जाता,
कोई तन्हा जलता जाता,
श्मशान किनारे हर चेहरा,
लकड़ी का मूल्य बतलाता।
आत्मा-परमात्मा की बातें,
चलती रहती दिन और रातें,
पर जब अंतिम समय सामने,
जेबें पहले खुलती पाते।
हर मानव यह बोझ लिए है,
जीते-जी सौ मौत जिए है,
पैसों की इस अंधी दौड़ में,
अपना ही विश्वास पिए है।
मर-मर कर जीने की आदत,
सबने जैसे ओढ़ी राहत,
भीतर राख दबाए बैठे,
खो दी मन की सारी चाहत।
जिंदा होकर भी सब पत्थर,
सूनी आँखें, भीतर बंजर,
दर्द किसी का सुनते लेकिन,
मन रहता हिसाबों के घर।
पूछेंगे — “क्या दर्द तुम्हारा?”
फिर होगा चेहरा बेचारा,
जान गए हैं बात बढ़ी तो,
आएगा पैसों का धारा।
“अपने दुख क्या कम हैं भाई?”
कहकर दुनिया आँख चुराई,
इसीलिए अब लोग मनुज से,
धीरे-धीरे दूरी पाई।
घर-आँगन संवाद नहीं है,
रिश्तों में वह स्वाद नहीं है,
इसीलिए अब लोग यहाँ पर,
इंसानों पर विश्वास नहीं है।
कुत्तों में अपनापन पाकर,
मनुष्य स्वयं से हार गया,
पैसे के इस अँधे युग में,
मानव भीतर मार गया।




