पत्थरों से पहले इंसान
डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन
सोने के सिंहासन चमकते हैं, दीपों का अनंत उजास,
बाहर भूखे बच्चे पूछ रहे, कब आएगा उनका प्रकाश।
घंटों तक आरती गूँज रही, गगन छूते जयकार,
सूनी आँखों में रोटी ढूँढ़े, जीवन का बेबस संसार।
चाँदी के कलश सजे हुए हैं, फूलों का अंबार,
बिना दवा के तड़प रहा है, चौखट पर बीमार।
मखमल की चादर ओढ़े हैं, श्रद्धा के सब द्वार,
सर्द हवाओं में काँप रही, माँ की बूढ़ी देह लाचार।
दानपात्र में लाखों गिरते, गूँज रहा सत्कार,
मेहनत करने वाले हाथों का, क्यों होता तिरस्कार?
प्रेम, दया और धर्म की बातें, हर मंच देता ज्ञान,
लेकिन घर के अपने रिश्तों में, क्यों सूख गया सम्मान?
माँ ने जीवन अर्पण करके, सपनों को आकार दिया,
बुढ़ापे में उसी जननी को, अकेलेपन का भार दिया।
बेटी को कहते घर की लक्ष्मी, देते बड़े बयान,
दहेज, हिंसा और अपमान से, छलनी होता मान।
भाग्य बताने वाले अक्सर, देते लंबा ज्ञान,
अपने ही जीवन की राहों से, रहते फिर अनजान।
दीवारें ऊँची होती जातीं, आँगन होता छोटा,
रिश्तों का बरगद सूख रहा, स्वार्थ बना है मोटा।
साँपों से अब क्या डरना है, विष तो मन में पलता,
चेहरे हँसते, भीतर छल का, हर दिन नया जंगल खिलता।
गिरगिट भी हैरान खड़ा है, रंग बदलते लोग,
सच की कीमत घटती जाए, झूठ पहनता भोग।
गिद्धों ने भी हार मानी है, छोड़ा अपना काम,
इंसानों की लालच ने ही, कर डाला बदनाम।
धर्म वही जो भूखे को रोटी, प्यासे को जल दे,
आँसू पोंछे, हाथ थाम ले, जीवन में संबल दे।
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा—सबका रहे सम्मान,
सबसे पहले पूजे जाएँ, धरती पर हर इंसान।
पत्थर में भगवान मिलें तो, मन में भी पहचान,
सेवा से बढ़कर नहीं कहीं, कोई दूसरा विधान।
चलो जलाएँ प्रेम का दीपक, मिटे घृणा की रात,
मानवता ही सबसे ऊँचा, यही सृष्टि का सत्य-व्रत।



