Wednesday, March 11, 2026

सत्य का शब्दार्थ आलोक चांटिया "रजनीश"

 


सत्य का शब्दार्थ

आलोक चांटिया "रजनीश"



एक मिट्टी जिस बीज को,

 उसके अस्तित्व के होने का,

 आभास कराती है,

उसके अंदर की सारी प्रतिभा को,

अंकुरित करके इस,

 संसार में सामने लाती है,

 पर वह बीज भी अपनी ,

सुषुप्त क्षमताओं के प्रदर्शन के बाद भला,

 कब मुड़ कर उस जमीन की ओर मुडता है,

या फिर अपनी हरी फूल पत्ती,

छाया के साथ उस मिट्टी से जुड़ता है?

वह तो मिट्टी को सिर्फ,

 अपने अस्तित्व को ,

बचाने का काम दे जाता है ,

अपने पीछे अपनी जड़ को,

मिट्टी में छोड़ जाता है,

मिट्टी उस बीज के होने के ,

एहसास में जड़ को,

 पकड़े रह जाती है,

और बीज की जीवन में,

 उसके विशाल वृक्ष होने की,

 कहानी चलती जाती है,

संसार जब भी देखता है तो,

उस वृक्ष को ही देखता है,

उसकी प्रशंसा करता है,

उसकी छाया का आनंद लेता है,

उससे हवन की संमिधा भी,

 एकत्र कर लेता है ,

पर संसार उस मिट्टी को,

 कभी नमन नहीं करता है,

जिसके सहारे बीज वृक्ष,

बनने की यात्रा पूरी करता है,

बस ऐसे ही जीवन की,

कहानी चलती रहती है,

जो किसी को भी आगे बढ़ाने का,

कार्य आलोक यहां पर करता है,

वह मिट्टी की तरह सबके,

सामने भी होता है,

पर गुमनाम सा ही मरता है।

पर गुमनाम सा ही मरता है।


Thursday, March 5, 2026

बीज का अकेलापन— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

 

बीज का अकेलापन

एक बीज की स्वतंत्रता,

जमीन के अंधेरे में खो जाती है,

मिट्टी की चुप तहों में उसकी

पहली सांस ही सो जाती है।

वह अकेला है —

पर हार मानना उसे आता नहीं,

जड़ कह दे संसार भले,

वह जड़ होकर भी ठहरता नहीं।

धरती के गहरे अंधकार से

वह प्रतिरोध रचता है,

मौन में छिपे साहस से

हर बंद दरवाज़ा कचोटता है।

कहते हैं उसे जड़ सभी,

निष्प्राण, मौन, हारा हुआ—

पर भीतर उसका स्वप्न

अभी भी है अंगारा हुआ।

वह लड़ता है मिट्टी से,

वह लड़ता है रात से,

वह जूझता है अपने ही

भीतर के हर आघात से।

और एक दिन —

जड़ों की ताकत लेकर,

धरती की छाती चीर,

वह बाहर आता है बढ़कर।

पहली बार फिर से

सूरज को देख पाता है,

किरणों की उंगलियों से

जीवन को छू पाता है।

पर क्या संघर्ष यहीं थमता है?

नहीं — कहानी यहीं नहीं रुकती,

वह अपनी जड़ों से बंधा हुआ,

मिट्टी में ही अपनी नियति लिखती।

वह फिर भी बढ़ता जाता है,

अकेलेपन को पीछे छोड़ने को,

ऊपर, और ऊपर उठता है

आकाश को थोड़ा-सा तोड़ने को।

समय बीतता है —

वह पौधा कहलाता है,

टहनियों की भुजाएँ फैलाकर

पत्तों से भर जाता है।

फिर एक दिन

समाज उसे पेड़ कहता है,

उसकी छाया में थका पथिक

अपना माथा सहलाता है।

उस पर पक्षी घर बनाते हैं,

किसी को लकड़ी मिल जाती है,

किसी को फल, किसी को आस,

किसी की दुनिया बस जाती है।

पर जो आज विशाल वृक्ष है,

वह याद करे तो जानता है—

अपने अकेलेपन से लड़कर ही

वह इतना बड़ा बन पाता है।

और अंत में क्या उसके हिस्से?

ऊपर जाना फिर रुक जाता है,

एक ऊँचाई के बाद वृक्ष

आकाश नहीं छू पाता है।

वह चुपचाप खड़ा रहता है,

परिस्थितियों से समझौता कर,

संघर्ष में जो भी पाया था,

उसी को जीवन मानकर।

छाया, भोजन, आश्रय देकर

दुनिया को वह जीता है,

पर भीतर कहीं अकेलापन

अब भी मौन संगीत-सा रीता है।

वह अक्सर हवा से कहता है —

“जब जीवन तुम्हें भी अकेला करे,

जब विरोध के स्वर में

सब कुछ तुमसे ले ले जगत भरे,

तब हार मत मानना तुम,

भले ही सब कुछ खो जाए,

अपने भीतर एक बीज रोपना,

जो वृक्ष बनकर सो जाए।

अकेलापन शाप नहीं,

संघर्ष का प्रथम चरण है,

जमीन के अंधेरे से ही

उगता उजला जीवन है।”

पर प्रश्न अभी भी बाकी है —

क्या कोई मनुष्य समझ पाता है?

बीज के इस मौन युद्ध को

क्या कोई पढ़ पाता है?

धरती के अंधेरे से उठकर

जो वृक्ष विशाल बन जाता है,

क्या कोई उसके अकेलेपन का

मूल्य कभी जान पाता है?

— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

मुट्ठी में अंधेरा-— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

 मुट्ठी में अंधेरा

मैं अपना दर्द

किसी को बताता नहीं हूं।

हंसने के सिवा,

किसी के सामने आता नहीं हूं।

जानता हूं सभी के,

चेहरे पर उदासी ही तो छा रही है।

एक दर्द की लकीर भी,

खींची सी चली जा रही है।

हर कोई दूसरे को देखकर,

बस कुछ सुनाना चाहता है।

दर्द न जाने कितने

रूपों में बाहर आना चाहता है।

रोशनी में रहकर भी,

सभी अंधेरे में खड़े नजर आ रहे हैं।

टटोलते हुए न जाने,

किसे ढूंढते जा रहे हैं।

आंख है पर दिखाई,

कुछ भी नहीं दे रहा है।

समय यह कैसा,

सभी का इम्तिहान ले रहा है।

मनुष्य हंस सकता है,

जानते सभी हैं।

पर क्या चेहरे पर,

उन्हें लाते भी कभी हैं?

यह कौन सा श्राप मनुष्य

जीने के लिए विवश हो गया है?

आलोक फिर से मुट्ठी में,

अंधेरा लेकर रह गया है?

कौन गीता का अर्थ बताकर,

फिर अर्जुन को खड़ा करेगा?

कौन मोह से दूर ले जाकर,

जीवन का अर्थ कहेगा?

कब कोई भागीरथ मनुष्य के,

पूर्वजों की थाती को फिर से वर्तमान में लायेगा?

और एक बार फिर मनुष्य,

अपने कर्म पथ पर मुस्कुरा पाएगा?

— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

Wednesday, January 28, 2026

मन इतना क्यों हारा है डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

 मन इतना क्यों हारा है

 डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


मन इतना क्यों हारा है?

क्या जीत सच में सहारा है?

दूर गगन का छोटा तारा,

क्या सच में कोई इशारा है?

पता नहीं क्या देखा जग में,

या जग ने मुझको क्या देखा?

क्यों हर सच अधूरा लगता,

जब प्रश्नों ने ही आँखें सेंका?

क्या अंधियारा बाहर फैला,

या भीतर ही विस्तार हुआ?

जिस डर को नाम न दे पाया,

क्या वही मेरा संसार हुआ?

मुट्ठी में जो कुछ भी आया,

क्या वह मेरा हो पाया है?

या पाने की इस हड़बड़ी में,

सब छिनता ही चला आया है?

क्या संतोष कोई वस्तु है,

जो थैले में भर लाई जाए?

या वह ठहराव की वह घड़ी है,

जिससे हम रोज़ ही घबराएँ?

सुबह से लेकर शाम तलक,

क्यों लगता कुछ छूट गया?

क्या समय मुझसे आगे निकला,

या मैं ही पीछे छूट गया?

जो देखा इन नैनों ने,

वह प्यारा क्यों न लग पाया?

क्या आँखें सच देख न सकीं,

या मन ने देखना ठुकराया?

हर जन क्यों दुखियारा दिखता,

क्या पीड़ा ही पहचान बनी?

या अपने ही अधूरेपन की,

परछाईं सबमें जान पड़ी?

अगर जीवन एक प्रश्न है,

तो उत्तर किससे माँगा जाए?

और अगर मौन ही सत्य है,

तो फिर यह चीख क्यों दोहराए?

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

Tuesday, January 27, 2026

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


 

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


पता नहीं
रास्ते कब तक हमारे साथ चलेंगे,
या हम ही कब तक
इन पत्थरों को प्रगति कहकर
अपने पैरों से पूजा करते रहेंगे।
सभ्यता ने हमें चलना सिखाया,
पर रुकना कभी नहीं सिखाया।
हर मोड़ पर एक नया नियम,
हर नियम के पीछे एक डर—
और डर के नाम पर
इतिहास की सबसे बड़ी इमारतें खड़ी कर दीं।
हमने रास्ते बनाए
ताकि जंगल पीछे छूट जाए,
पर जंगल हमारे भीतर
और घना होता चला गया।
मनुष्य ने कहा—
“मैं प्रकाश हूँ”,
और सभ्यता ने ताली बजाई।
पर उसी ताली की गूँज में
कई सदियों तक
अँधेरा चुपचाप ताली बजाता रहा।
यह आलोक की तरह
हर जगह, हर समय रहने की ज़िद है—
देखने की, समझने की,
और जवाबदेह बने रहने की।
पर सच यह है
कि हर प्रकाश के ठीक पीछे
अँधेरा खड़ा रहता है,
क्योंकि सभ्यता ने
प्रकाश को शक्ति बना दिया
और शक्ति ने अँधेरे को जन्म दे दिया।
हमने नैतिकता को किताबों में बाँध दिया,
और व्यवहार को सुविधा के हवाले छोड़ दिया।
यहीं से शुरू हुआ मानव द्वंद्व—
अंदर कुछ और, बाहर कुछ और;
आस्था मंच पर,
और विवेक बैकस्टेज में।
सभ्यता कहती रही—
“आगे बढ़ो”,
मनुष्य पूछता रहा—
“पर किस कीमत पर?”
और हर बार जवाब आया—
“इतिहास तय करेगा।”
पर इतिहास तो
हमेशा विजेताओं की स्मृति रहा है,
और हारने वालों की
अनकही चीख।
आज भी हम चल रहे हैं—
सड़कों पर नहीं,
विचारधाराओं पर।
हर विचार एक रास्ता है,
और हर रास्ता
किसी न किसी मनुष्य को
पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है।
यह द्वंद्व खत्म नहीं होगा,
क्योंकि यही मनुष्य होने की शर्त है।
जो इसे मिटाने निकलेगा,
वही सबसे ख़तरनाक सभ्यता बनाएगा।
शायद सवाल यह नहीं है
कि अँधेरा क्यों है,
सवाल यह है—
क्या हम अपने प्रकाश से
अँधेरे को देखने का साहस रखते हैं?
क्योंकि जिस दिन
मनुष्य ने अपने भीतर के अँधेरे को
सभ्यता की जिम्मेदारी मान लिया,
उसी दिन
रास्ते भी इंसानियत सीखेंगे,
और सफ़र भी
थोड़ा कम हिंसक होगा।

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


Monday, December 29, 2025

अक्सर जब मैं, अकेला रह जाता हूं ,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश

 

अक्सर जब मैं,
अकेला रह जाता हूं ,
अपने आसपास,
किसी को भी नहीं पाता हूं, 

जो होते भी हैं सब ,
अपने लिए व्यस्त रहते हैं, 

एक भी पल ना मेरी ,
बात सुनते हैं,
बस अपनी ही रहते रहते हैं, 

ऐसे में फिर अपने में,
अपने को ढूंढने लगता हूं, 

बाहर की दुनिया से दूर ,
अपने भीतर मैं फिर जगता हूं,
पाता हूं पूरा आधा-आधा, 

अपनी मां को अपने भीतर, 

और पूरा आधा-आधा,
अपने पिता को ,
बस दोनों को पाकर,
मैं खुश हो जाता हूं,
यह मैं नहीं कह रहा हूं,

 विज्ञान कहता आया है, 

अनुवांशिकी यही समझा पाया है ,
आधे आधे गुण के ,
मिल जाने से ही,
एक बच्चा बन जाता है,
पर दुनिया में आने के बाद, 

वह भूल जाता है ,
कि उसके अंदर ही जब तक वह है,
उसकी मां उसके पिता, 

उसके साथ रहेंगे ,
जब भी वह अकेला होगा, 

तब उससे चुपचाप कहेंगे ,
हम तुम्हारे साथ रहते हैं,
क्यों चिंता करते हो ?
बस यही कहते हैं ,
और फिर मैं अपने अकेलेपन को ,
देखते ही देखते भूल जाता हूं,
जब मैं और मेरे माता-पिता को ,
सन्नाटो में अपने,
भीतर बात करते पाता हूं।
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

साल नहीं, सार चाहिए डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

 

साल नहीं, सार चाहिए

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

हर कोई आने वाले कल को ऐसे निहार रहा है,

जैसे आज उसे तिल-तिल कर मार रहा है।

उसे आशा है—कल जो दस्तक देगा द्वार,

वह ले आएगा कुछ, जो भर देगा जीवन का भार।

आशा के सहारे आदमी साँसें तो लेता है,

पर यह नहीं जानता—क्यों पृथ्वी पर रहता है।

दिन, महीने, साल बस गिनता ही जाता है,

कर्म का अर्थ जाने बिना जीता-मरता जाता है।

क्या उद्देश्य था जन्म का—किसने कभी पूछा?

या बस कैलेंडर पलटना ही जीवन का नुस्खा?

क्या किसी पशु ने किसी से यह कहा होगा,

“नौ साल की शुभकामनाएँ”—क्या ऐसा सुना होगा?

पशु जानता है कर्म बिना नाम जाने,

भाग्य सोया रहता है, श्रम के न जागने।

वह करता है जो करना उसे आया है,

उसने जीवन को उत्सव नहीं, कर्तव्य बनाया है।

फिर मनुष्य क्यों पशु से ऊपर उठने से डरे,

क्यों सिर्फ वर्षों की गिनती में जीवन सरे?

क्या वह बस साल बदलने को ही आया है,

या अपने होने का अर्थ समझने आया है?

जब तक कर्म से नहीं जुड़ेगी चेतना की डोर,

तब तक हर नया साल होगा बस एक और शोर।

साल नहीं बदलते—यदि मन वही पुराना है,

जीवन तब भी बोझ है, चाहे कल नया आना है।