दर्द में भीगा हुआ
जब भी मैं निकलता हूं
बहती हुई पानी की बूंद में
जब भी विकलता हूं
कितना सुंदर मैं लगता हूं
यह तुम अच्छी तरह से जानते हो
सच कहूं तो मानते भी हो
क्योंकि मेरी आह सुनकर ही
तो तुमको आनंद आता है
जब एक कतरा दर्द बहकर
तुम्हारे हाथों में रह जाता है
तुम्हें एहसास भी हो जाता है
कि तुम पूर्णता के पथ पर खड़े हो
भले ही कितने हताश निराश
और शून्य में पड़े हो
कोई विकल्प भी तो नहीं पाते हो
जब दर्द को सूखता हुआ
हवाओं के साथ पाते हो
दर्द की पपड़ियां जब उखड़कर
हवा में उड़ने लगती हैं
तब भी कहां किसी की आंखें जगती हैं
सब सोचते हैं जरूर इसके अंदर से
फिर कोई कल फूट रहा होगा
जो आज था वह फिर से छूट रहा होगा
बस दर्द की यही कहानी तो
मुझ में तुम में हर किसी में दिखाई देती है
दर्द की भीगी हुई छाती
अक्सर अंधेरे में सुनाई देती है
पर तुमने तो वह पाठ भी पढ़ लिया है
कि दर्द देकर ही प्रसव वेदना के बाद
किलकारी गूंजा करती हैं
कोई पौधे की पत्तियां तभी निकलती हैं
जब कोई मिट्टी किसी कुदाली से
घायल बार-बार की जाती हैं
इसीलिए दर्द देखकर अब
तुम मुस्कुराने की दर्शन में रहने लगे हो
कोई तोड़ ना सके कोई मोड ना सके
और दर्द में भीगे हुए उसे तन को
कोई देख ना सके शायद इसीलिए
कुछ इस तरह से रहने लगे हो
मेरे मुस्कुराने का अर्थ सिर्फ
दर्द में भीगा तन ही जान पाता है
दर्द का शोर पहाड़ से निकलती हुई एक
नदी को भी प्रकृति की
सुंदरता बना देता है
भला कब कौन एक टूटे पत्थर में
एक मूर्ति को निकल पाएगा
इसीलिए छीनी हथौड़े के साथ
लोग निरंतर रहने लगे हैं
क्योंकि तभी तो जो वह चाहते हैं
उसे निकाल पाएंगे
भला वे लोग दर्द को छोड़कर
तुम्हें मुस्कुराहट कैसे दे जाएंगे
इसीलिए तुम्हारा मुस्कुराना
मेरा मुस्कुराना जरूरी हो गया है
क्योंकि दर्द के साथ कोई अंजना सा
रिश्ता चुपचाप मेरे भीतर सो गया है
इसीलिए जब स्वप्न में वह दर्द
मेरे भीतर जाग जाता है
तो मेरा तन उस दर्द से भीग जाता है
जिसे देखकर तुम मेरी तरुणाई
यौवन को नोच लेना चाहते हो
शायद तुम भी दर्द क्या होता है
इसे जान लेना चाहते हो
इसे जान लेना चाहते हो
डॉ आलोक चांटिया रजनीश




