मिट्टी से यह शरीर बना होता है,
यह तथ्य किसे नहीं पता होता है,
लेकिन मिट्टी में नंगे पांव चलना,
कब किस प्रिय होता है ?
मिट्टी ना होती तो पृथ्वी पर ,
जीवन का अर्थ हम जान ही ना पाते,
हमारे घरों में आलू टमाटर आम फूल,
भला आलोक कैसे आते ?
मिट्टी को मुट्ठी में लेकर हम ,
अक्सर सौगंध खाते हैं ,
तभी तो किसी देश के,
हम होकर रह जाते हैं ,
पर मिट्टी शरीर पर लग जाए तो,
हम यह सारे दर्शन भूल जाते हैं ,
हर पल बस अपने को ,
साफ करने में लगे रह जाते हैं ,
कितना भी अच्छा करके मिट्टी,
हमारे दिल में कभी बस नहीं पाती है,
उसके हिस्से में तो पांव की ,
सहभागिता एक दबाव बनकर आती है,
जो जितना करके इस दुनिया में,
अमर हो जाना चाहता है ,
उसके भी हिस्से में मिट्टी का ही ,
स्वर शेष रह जाता है,
हर कोई पूछता है कि तुमने,
मेरे लिए किया तो क्यों किया?
क्या कभी हमसे पूछ कर,
तुमने हमें कुछ दिया,
तुम्हें मन था इसलिए तुमने,
सब कुछ कर डाला है,
बस यही दर्शन का शेष है,
और अवशेष जीवन पथ पर ,
भावनाओं का हाला है ,
मिट्टी को मां बनाकर क्या मिल पाया?
क्या यह सत्य किसी को,
कभी किसी पल समझ में आया?
आलोक चांटिया रजनीश

