Friday, October 2, 2026

सूरज, बादल और समानता का दर्शन डॉ. आलोक चांटिया रजनीश कवि

 

सूरज, बादल और समानता का दर्शन

डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
कवि

सूरज को बादल के आने का,
कभी नहीं होता शोक।
न एक इंच वह कम होता,
न अपना खोता लोक।

कुछ पल उसका प्रकाश भले,
संसार से छिप जाता है,
बादल अपने भ्रम में फिर,
सूरज को हराता है।

पर सूरज कब हार मानता,
अपना धर्म निभाता है,
बादल चाहे घिरकर आए,
वह फिर प्रकाश लुटाता है।

बादल आता, जल लाता है,
धरती को भिगो जाता है,
शायद सूरज से ईर्ष्या कर,
नभ में छा जाता है।

सूरज की किरणें धरती पर,
जब आकर मुस्काती हैं,
सूखे जीवन के कण-कण में,
नई चेतना लाती हैं।

धरती के कोने-कोने में,
जब प्रकाश उतरता है,
मृत-सा दिखता जीवन भी,
फिर से साँसें भरता है।

इस प्रेमिल प्रकाश को देख,
बादल मन में जलता है,
जल की अपनी अतुल राशि ले,
धरती पर फिर ढलता है।

वर्षा करके वह धरती को,
जीवन-पथ दिखलाता है,
प्रेम के बाद अंकुरण का,
संबंध समझाता है।

सूखी धरती हरियाली का,
नव संदेश सुनाती है,
बीजों की सोई आँखों में,
आशा फिर मुस्काती है।

तब सूरज का प्रकाश भी,
और अधिक फल पाता है,
जीवन अपने महत्तम अर्थ,
तक धीरे बढ़ जाता है।

फिर भी सूरज बादल से,
कभी नहीं ईर्ष्या करता,
कुछ पल बाधित होने पर भी,
अपना पथ नहीं बदलता।

प्रकृति यही सिखाती हमको,
सबका अपना स्थान,
एक नहीं है दूसरे का,
फिर भी सबका मान।

जियो और जीने दो—
प्रकृति यही बतलाती है,
एक-दूसरे के अस्तित्व से,
सृष्टि सँवरती जाती है।

सूरज अपना जीवन जीता,
बादल अपना जीता है,
आकाश सभी को समान रूप से,
अवसर देता है।

न सूरज से कोई पूछे—
कितना प्रकाश लुटाना,
न बादल से कोई पूछे—
कितना जल बरसाना।

प्रकृति दोनों को देती है,
जीवन का अधिकार,
अपने-अपने कर्मों से ही,
होता जग साकार।

समानता का यह दर्शन,
मानव कब समझ पाएगा?
प्रकृति का यह सरल पाठ,
कब मन में बस पाएगा?

मनुष्य प्रकृति को देख रहा,
पर अर्थ नहीं समझता है,
इसीलिए तो मानव-मानव,
से ही दूर भटकता है।

ऊँच-नीच की दीवारें हैं,
अमीरी और गरीबी है,
जाति-वर्ग के बंधन हैं,
मन में कितनी दूरी है।

किसी को जीवन का प्रकाश,
किसी को घोर अँधेरा है,
किसी की धरती हरियाली,
किसी का जीवन बंजर है।

मनुष्य ने धरती बाँटी,
मनुष्य ने आकाश बाँटा,
जल बाँटा और राहें बाँटीं,
प्रेम का भी भाग्य बाँटा।

जिस प्रकृति ने सूरज-बादल,
को एक गगन में रखा,
उसी प्रकृति की संतान ने,
मानव को मानव से बाँटा।

प्रकृति कभी नहीं कहती—
सूरज धनवानों का हो,
बादल केवल शक्तिशाली,
लोगों के खेतों का हो।

सूरज जब भी निकल रहा हो,
भेद नहीं वह करता है,
महल, झोपड़ी, खेत, खलिहान—
सब पर प्रकाश धरता है।

न वह जाति किसी की पूछे,
न वह वर्ग किसी का जाने,
उसकी किरणें सबको छूकर,
जीवन के दीप जलाएँ।

बादल भी जब बरसता है,
भेदभाव नहीं करता है,
धरती की हर प्यास बुझाकर,
जीवन-ऋण को भरता है।

फिर मनुष्य ही क्यों मानव के,
राहों में दीवार बनाए?
क्यों किसी का जन्म किसी के,
अधिकारों का माप बताए?

क्यों निर्धनता किसी मनुष्य की,
गरिमा को घटाती है?
क्यों ऊँचाई दूसरे मानव को,
नीचा बतलाती है?

शायद मनुष्य प्रकृति को,
देख रहा बस आँखों से,
पर उसका गहरा दर्शन,
छूट गया है बातों से।

सूरज कहता—प्रकाश बाँटो,
प्रकाश कभी घटता नहीं,
प्रेम बाँटने से मानव का,
अपना प्रेम घटता नहीं।

बादल कहता—जल बरसाओ,
जल देने से क्या घटता?
धरती को जीवन देने वाला,
कभी स्वयं क्या सूखता?

धरती कहती—बीज किसी का,
हो अवसर तो खिलता है,
स्नेह, प्रकाश और जल पाकर,
अंकुर बनकर मिलता है।

आकाश कहता—मेरे नीचे,
सबको स्थान मिलेगा,
जिसे जहाँ भी जीवन चाहिए,
उसको मान मिलेगा।

रंग भले ही अलग-अलग हों,
प्रकाश सभी का है,
धरती चाहे अलग दिखे, पर,
आकाश सभी का है।

जीवन चाहे अलग-अलग हो,
जीने का अधिकार समान,
हर मानव की गरिमा का भी,
होना चाहिए सम्मान।

काश! मनुष्य प्रकृति की यह,
भाषा पढ़ना सीख सके,
सूरज से प्रकाश बाँटना,
बादल से बरसना सीख सके।

धरती से धैर्य ग्रहण करे,
आकाश से विस्तार,
अपने भीतर फिर से जागे,
मानवता का प्यार।

तब ऊँच-नीच की दीवारें,
धीरे-धीरे ढह जाएँगी,
अमीरी-गरीबी की सीमाएँ,
एक दिवस मिट जाएँगी।

जाति-वर्ग के बंधन टूटें,
भेदभाव सब मिट जाए,
मानव केवल मानव को,
मानव बनकर देख पाए।

तब सूरज को बादल से,
डरने की दरकार नहीं,
बादल को भी सूरज से,
करने की तकरार नहीं।

धरती सबके लिए खिलेगी,
सबके खेत हरे होंगे,
मानवता के आँगन में फिर,
समान अधिकार खिले होंगे।

तब मानव यह जान सकेगा,
प्रकृति का सच्चा ज्ञान—
अलग-अलग हैं रूप सभी के,
फिर भी सबका एक सम्मान।

जियो और जीने दो—
यही प्रकृति का सार,
प्रेम, समानता, मानवता—
जीवन का आधार।

प्रकाश बाँटो, प्रेम बरसाओ,
यही प्रकृति की वाणी,
हर मानव की गरिमा ही तो,
मानवता की निशानी।

सूरज, बादल, धरती, नभ,
सब हमको समझाते हैं—
सब अपने हैं, सब समान हैं,
सब जीने को आते हैं।

न ऊँच-नीच, न भेद रहे,
न कोई हो लाचार,
हर मानव को समान मिले,
जीवन का अधिकार।

प्रकृति यही संदेश दे—
सबका हो सम्मान,
प्रेम, समानता, मानवता—
यही मनुष्य की शान।

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
कवि

Wednesday, September 2, 2026

मैं फूल हूं , मुझे तोड़ लेने का तुम्हारे पास,- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 मैं फूल हूं ,

मुझे तोड़ लेने का तुम्हारे पास,

कोई मर्म ही नहीं है ,

तुम मानव हो,

तुम्हारे यहां तोड़ने के

निषेध का कोई धर्म ही नहीं है

तुम्हें सिखाया ही कहां गया है

कि पौधे में भी जान होती है

तुम एक फूल को तोड़कर

उसकी हत्या कर देते हो

पर विज्ञान को मानने और उसे

स्वीकार करने का जतन

तुम कब कर लेते हो

तुम तोड़ देते हो

मुझे तार तार कर देते हो

अपनों से बिछड़ कर मैं सिर्फ

तुम्हारी खुशी के लिए मर जाता हूं,

कभी किसी प्रेमिका के बालों में ,

तो कहीं भगवान के चरणों में चढ़ जाता हूं ,

अपने को मानव कहते हुए ,

मानव तुमको शर्म ही कहां आती है ?

इस पृथ्वी पर क्या कोई भी बात ,

ऐसी सुनी जाती है

जब किसी जानवर ने अपने प्रेम के लिए

अपनी पूजा के लिए

अपने सम्मान के लिए

किसी फूल की हत्या कर दी हो

फिर भी पशु जगत में

तुम सर्वश्रेष्ठ कहे जाते हो

मानव तुम तो संवेदन शून्य होकर,

पता नहीं क्यों किसी के लिए भी ,

नहीं जी पाते हो ?

मैं तो फूल हूं डाल से जुड़ा हूं,

डाल की खातिर निकल कर ,

पड़ा रह जाता हूं ।

पर तुम किस कीड़े मकोड़े पशु पक्षी को ,

अपने स्वाद के लिए नहीं मार डालते हो!

फिर भी अपने को धर्म परोपकार,

करुणा का प्रतिपालक मानते हो ,

तुम प्रकृति से, उस परम तत्व से ,

लगातार झूठ बोलते रहते हो ,

फिर भी अपने को हर पल धार्मिक कहते रहते हो!

 इसीलिए भगवान के सामने खड़े होकर भी ,

तुम दर्द में रह जाते हो ,

अपनी प्रार्थना आरती में न जाने ,

क्या-क्या कह जाते हो,

पर भगवान भी मुस्कुरा कर रह जाता है ,

जब तुमको वह अपने सामने पाता है !

क्योंकि मानव को तुम ,

ना जाने कहां छोड़ कर आए हो,

अपने अंदर एक रावण को

बसा कर ले आये हो।

इसीलिए हर दिन टूटा हुआ फूल भी ,

तुमको श्राप दे जाता है ,

और तुम्हारे हिस्से की वह सारी खुशी,

तुम्हारे ही सामने लेकर चला जाता है ।

तुम जान भी नहीं पाते कि तुमने,

किसी का ऐसा क्या बिगाड़ा है ,

जो तुम्हारे जीवन से भगवान ने,

हंसी खुशी प्रसन्नता शांति सब छीन लिया है !

पर क्या कभी तुमने हाथ फूल को,

तोड़ते हुए हाथ को एक बार भी ध्यान किया है ?

डॉ अलोक चांटिया रजनीश


Monday, July 20, 2026

तुम युवा नहीं, वायु हो डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 

तुम युवा नहीं, वायु हो

डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

तुम युवा नहीं, वायु हो, अपनी पहचान करो,
बिखरी शक्ति को समेटो, नव निर्माण करो।

ऊर्जा की हर एक किरण, इतिहास बदल सकती है,
जेम्स वाट की सोच बनो, दुनिया सँवर सकती है।

जो भीतर अग्नि जलती है, उसका सम्मान करो,
व्यर्थ न उसे लुटाओ, जीवन का उत्थान करो।

भीड़ के पीछे मत भागो, विवेक का दीप जलाओ,
अंधेरे के हर पथ पर, अपना सूरज ले आओ।

घर की आँखें राह निहारें, उनका भी अधिकार है,
देश तुम्हारे कंधों पर ही लिखता नया विचार है।

भगत, सुखदेव, आज़ादों का साहस फिर अपनाओ,
राजेंद्र लाहिड़ी के पथ पर जीवन सफल बनाओ।

कंस-रावण की राह नहीं, रामत्व का विस्तार करो,
भारत माँ के स्वर्णिम सपनों का साकार करो।

अंधियारे में आलोक बनो, हर मन में प्रकाश भरो,
मुट्ठी में अपनी शक्ति रखो, नवयुग का विश्वास भरो।

रेल बने यह शक्ति तुम्हारी, पत्थर नहीं गिराएगी,
सृजन की हर नई कहानी, भारत को मुस्काएगी।

यदि ऊर्जा का सही मार्ग तुम हर दिन चुनते जाओगे,
विकसित भारत के स्वप्न को सचमुच साकार बनाओगे।

Sunday, July 19, 2026

पत्थरों से पहले इंसान डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 

पत्थरों से पहले इंसान

डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

सोने के सिंहासन चमकते हैं, दीपों का अनंत उजास,
बाहर भूखे बच्चे पूछ रहे, कब आएगा उनका प्रकाश।

घंटों तक आरती गूँज रही, गगन छूते जयकार,
सूनी आँखों में रोटी ढूँढ़े, जीवन का बेबस संसार।

चाँदी के कलश सजे हुए हैं, फूलों का अंबार,
बिना दवा के तड़प रहा है, चौखट पर बीमार।

मखमल की चादर ओढ़े हैं, श्रद्धा के सब द्वार,
सर्द हवाओं में काँप रही, माँ की बूढ़ी देह लाचार।

दानपात्र में लाखों गिरते, गूँज रहा सत्कार,
मेहनत करने वाले हाथों का, क्यों होता तिरस्कार?

प्रेम, दया और धर्म की बातें, हर मंच देता ज्ञान,
लेकिन घर के अपने रिश्तों में, क्यों सूख गया सम्मान?

माँ ने जीवन अर्पण करके, सपनों को आकार दिया,
बुढ़ापे में उसी जननी को, अकेलेपन का भार दिया।

बेटी को कहते घर की लक्ष्मी, देते बड़े बयान,
दहेज, हिंसा और अपमान से, छलनी होता मान।

भाग्य बताने वाले अक्सर, देते लंबा ज्ञान,
अपने ही जीवन की राहों से, रहते फिर अनजान।

दीवारें ऊँची होती जातीं, आँगन होता छोटा,
रिश्तों का बरगद सूख रहा, स्वार्थ बना है मोटा।

साँपों से अब क्या डरना है, विष तो मन में पलता,
चेहरे हँसते, भीतर छल का, हर दिन नया जंगल खिलता।

गिरगिट भी हैरान खड़ा है, रंग बदलते लोग,
सच की कीमत घटती जाए, झूठ पहनता भोग।

गिद्धों ने भी हार मानी है, छोड़ा अपना काम,
इंसानों की लालच ने ही, कर डाला बदनाम।

धर्म वही जो भूखे को रोटी, प्यासे को जल दे,
आँसू पोंछे, हाथ थाम ले, जीवन में संबल दे।

मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा—सबका रहे सम्मान,
सबसे पहले पूजे जाएँ, धरती पर हर इंसान।

पत्थर में भगवान मिलें तो, मन में भी पहचान,
सेवा से बढ़कर नहीं कहीं, कोई दूसरा विधान।

चलो जलाएँ प्रेम का दीपक, मिटे घृणा की रात,
मानवता ही सबसे ऊँचा, यही सृष्टि का सत्य-व्रत।

Friday, July 10, 2026

बुढ़ापा - उम्र का पड़ाव


 

बरसात (उम्र) प्राकृतिक है शाश्वत है
चाह कर भी कौन भला कैसे रोक पाएगा
वह तो एक दस्तक है जिसको देखने का
अवसर हर किसी के जीवन में
कभी ना कभी तो आएगा
यह बात और है कि जर्जर हो चुके
मकान (बूढ़ा व्यक्ति) को बरसात में
बचाए रखने के लिए रात दिन
पथराई आंखों से दोनों हाथों से
अपनी सांसों से जर्जर मकान के साथ (संतान )
रहने वाला ना जाने कितने प्रयास करता है
कभी-कभी जर्जर मकान आने वाली
समय की गति में बह जाता है
और कभी-कभी जर्जर मकान को बचाने वाला
उसे उसे बरसात में बचा ले जाता है
मकान को देखकर उसके चारों तरफ के लोग
कुछ पल के लिए प्रसन्न भी हो जाते हैं
क्योंकि विरासत को बचाने में
वह सफल होता अपने को पाते हैं
और जर्जर हो चुका मकान भी यह
देखकर खुश प्रसन्न हो जाता है
कि जिनको उसने छत दिया छाया दिया
उनको अपने लिए जीता पाता है
बस बरसात और जर्जर मकान का
यह खेल चलता ही रहता है
यही संबंधों का ताना है यही संबंधों का बाना है
कभी आंसुओं की धार है
कभी खुशियों की झंकार है
यही सोचकर हर कोई प्रकृति के आनंद में
बरसात से बचने के लिए पहले घर बनाता है
फिर उस घर को गिरने से बचाने के लिए
घर को बहुत से हाथ दे जाता है
जो आने वाले कल में बरसात से
अपने को भी बचाने में सफल रहेंगे
बाढ़ जो बहा कर ले जाती घर को
हर व्यक्ति को और सब कुछ
वह जर्जर मकान में हंसकर जीते रहेंगे

डॉ आलोक चांटिया रजनीश

Saturday, July 4, 2026

समानांतर कहाँ है? — डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


 

समानांतर कहाँ है?

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

मैं जानता हूँ मेरे और
तुम्हारे बीच कोई भेद नहीं,
फिर भी इस जीवन-पथ पर
मेरा कोई समवेद नहीं।

लाख कोई बाएँ आ खड़ा हो,
दाएँ अपना हाथ बढ़ाए,
रिश्तों को नव नाम सजाकर
जीवन भर साथ निभाए।

किन्तु राहों की दूरी नापने का
एक ही शाश्वत मंत्र रहा—
मेरे और इस जग के मध्य
सदा एक गहरा अंतर रहा।

जिस मिट्टी के छोटे बीज से
अंकुर बनकर मैं निकला हूँ,
उस मूल को छोड़ किसी और का
कैसे होकर मैं बिखरा हूँ?

वही दर्शन बार-बार मुझे
भीड़ के बीच अकेला करता,
सबके पास खड़ा होकर भी
अपने भीतर मेला भरता।

कोई कहता—"यह अभिमानी है",
कोई कहता—"अपने में खोया",
पर अंतर का निर्मल आलोक
सत्य से कभी नहीं है रोया।

क्योंकि वह तो जन्म-जन्म से
लंबी राह अकेला चलता,
अपने जैसा दूसरा कोई
जीवन-पथ पर कहाँ मिलता?

इस कारण न वह रोता है,
न पीड़ा का गीत सुनाता,
मौन तपस्वी बनकर केवल
अपने सत्य को ही अपनाता।

धरती का जब साथ छूटेगा,
तन का हर बंधन टूटेगा,
तब फिर उसी प्रथम बीज के संग
मेरा अस्तित्व भी छूटेगा।

जो अब सूखकर मिट जाना चाहे,
फिर मिट्टी में सो जाना चाहे,
अंधकार की गहरी गोद में
शांत स्वयं हो जाना चाहे।

क्योंकि हर आलोक अंततः
अपने स्रोत में खो जाता है,
प्रकाश नहीं लौटता फिर से—
बस मौन अनंत हो जाता है।

आलोक कहीं नहीं आता है,
आलोक कहीं नहीं आता है।

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

Thursday, July 2, 2026

घर का सच — डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


 

घर का सच
— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

हर वह व्यक्ति
गरीब, लाचार और बेचारा कहलाने लगता है,
जिसके जीवन में
चारदीवारी और एक छत वाला घर
सिर्फ एक सपना बनकर रह जाता है।

इस संसार में
अक्सर आदमी का कद
उसके घर के कद से मापा जाता है।
जिन घरों की दीवारें ऊँची होती हैं,
उनके भीतर प्रवेश करने की
हैसियत भी हर किसी की नहीं होती।
उनके विशाल द्वार तक पहुँचने का साहस
सबके हिस्से में कहाँ आता है!

और जिनके हिस्से में
बौने, ठिगने, अविकसित
और छोटे-छोटे घर आते हैं,
वे जीवन भर
अपने सपनों को भी
दीवारों के बीच समेटना सीख जाते हैं।

उनके घरों में
बस इतना-सा अहसास बचा रहता है
कि सिर ढकने के लिए
एक छोटी-सी छत तो है,
पर खुला आकाश
उनकी नियति नहीं।

घर की इसी कहानी में उलझा मनुष्य
एक और घर को भूल जाता है—
वह घर,
जिसमें उसका मस्तिष्क,
हृदय,
फेफड़े,
यकृत (लीवर),
गुर्दे (किडनी)
और जीवन की हर धड़कन निवास करती है।

वह यह सोचने का समय भी नहीं निकाल पाता
कि उसके शरीर के इन निवासियों को
क्या चाहिए,
क्या नहीं चाहिए,
किस भोजन से वे स्वस्थ रहेंगे,
किस जीवनशैली से
यह शरीर रूपी घर अधिक
समय तक सुरक्षित रहेगा।

विडंबना यह है कि
दूसरों के लिए चिंतित रहने वाला मनुष्य
परोपकारी कहलाता है,
लेकिन अपने ही शरीर रूपी घर का
सबसे बड़ा भस्मासुर बन जाता है।

सच तो यह है कि
मनुष्य अपने शरीर के कारण
न अमीर कहलाता है,
न सम्राट।
फिर भी वह स्वयं को
सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है।

शायद इसलिए कि
वह ईंट, पत्थर और मिट्टी से बने घर को
अपना सर्वस्व समझ लेता है,
और उस जीवित घर को भूल जाता है
जिसके बिना
न कोई मकान अपना है,
न कोई संसार।

जिस दिन मनुष्य
शरीर रूपी घर और मिट्टी के घर
दोनों के महत्व का संतुलन सीख लेगा,
उसी दिन वह समझ पाएगा
कि वास्तविक समृद्धि
दीवारों की ऊँचाई में नहीं,
जीवन की गहराई में बसती है।

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश