कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,
आज वह सड़क के किनारे पड़ा था,
कितना फूला नहीं समा रहा था ,
किसी को कुछ समझ भी नहीं पा रहा था,
क्योंकि उसे भगवान पर चढ़ाया जाएगा ,
और उसका स्थान भी उतना ही ऊंचा हो जाएगा,
पर कहां जानता था कि जिस संसार में,
वह भगवान तक पहुंचने की चाहत में,
किसी के हाथ में लिया गया है ,
वहीं दूसरे दिन उसको भगवान के,
प्रतिमा से निकाल कर सड़क पर फेंक गया है,
फूल का यह दर्शन कहां,
कोई भी समझ पाता है ,
हर कोई बस अपनी गुमान में यहां आता है,
कहता भी है कि तुम्हारी हैसियत क्या है ?
तुम क्या जानो मैं क्या हूं ?
मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं ?
मैं चंद मिनट में तुम्हें मिटा सकता हूं,
पर वह स्वयं यह नहीं जानता है,
कि आज जिस ऊंचाई पर पहुंचकर,
वह इतने बड़े-बड़े शब्द को बोले जा रहा है,
कल वह खुद फूल की तरह,
वहां से उतार भी लिया जाएगा,
और अकेलेपन, अंधेरे में ,
चुपचाप बैठा दिया जाएगा ,
जहां वह स्वयं अपने ,
अस्तित्व को ढूंढने की कोशिश करेगा,
हो सकता है कभी वह उदासी में,
तो कभी किसी वृद्ध आश्रम में मरेगा
पर जब उर्जा शरीर में बहती है,
तो कहां किसी को कुछ समझती है?
और कहती है फूलों की इस कहानी को,
जो स्वयं आदमी ही रोज ,
भगवान पर चढ़ा कर लिखता है,
पर क्या कभी उसका यह दर्शन,
उसके चेहरे पर ,
उसके व्यवहार में किसी को दिखता है?
डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"



