Sunday, May 24, 2026

उसकी तेरहवीं पर- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 उसकी तेरहवीं पर


कोई भी नहीं आया था

शायद कोई समय नहीं पाया था

या फिर एक लावारिस के लिए

कौन थोड़ा सा समय निकाल पाया था

 आज उसकी 13वीं है

13 दिन हो गए हैं उसे

इस दुनिया से गए हुए

जो निशान उसने जमीन पर बनाए थे 

उनके मिटे हुए

जो सांस उसने ली थी

वह फिर से वायु में विलीन हो गई है 

जो मांस हड्डी उसको मिली थी

वह मिट्टी में मिल गई है

कल तक कोई भी उसको देखकर

 कुछ ना कुछ तो कहता था

पर वह अपनी मस्ती में रहता था

उसे मालूम था उसके अंधेरे को

मिटाने के लिए आलोक ही

सामने खड़ा मिलेगा

ठीक है जैसा है जीवन वैसा चलेगा

पर अचानक वह जब

आकर खड़ा हो जाता था

तो खाली मुट्ठी में आलोक भी

ठगा सा रह जाता था

उसका अंधेरा मिटाना

इतना आसान नहीं था

क्योंकि आलोक भी 

इतना महान नहीं था

अंतिम बार वह उसको

लेकर गया था मंदिर की चौखट पर 

जहां थोड़ा सा खीझ कर पूछा था

कि मेरी लाश तुम उठाओगे

या मैं तुम्हारी लाश उठाऊंगा

पर वह हंसते हुए बोला था

कैसे मैं यह बताऊं

और कैसे मैं समझा पाऊंगा

कौन किसकी लाश उठाएगा

यह तो सिर्फ यह भगवान

बतायेगा

देखा जाएगा जब मेरा समय आएगा 

या तेरा समय आएगा

और यह कहकर वह चला गया था

मेरे पीछे एक सन्नाटा रह गया था

मैं जानता भी नहीं था कि यह

मेरी उसकी अंतिम भेंट हो रही है 

सांसों की कहानी तो अब

खत्म हो रही है

अचानक चार दिन बाद ही

मुझे बताया गया था

कि वह सड़क पर मर गया है

इस गंदी जिंदगी से तर गया है

उसे लावारिस घोषित कर दिया गया है

 आओ और उसका अंतिम संस्कार कर जाओ

देखते देखते वह चिता की

आग में जल गया

सिर्फ अतीत में एक संबंधों का

अंधेरा रह गया

आज उसकी तेरहवीं हुई

पर भी कोई भी पूछने नहीं आया है

 क्या मानव ने संस्कृति बनाकर

बस इतना ही सच पाया है

क्या मानव ने संस्कृति बनाकर

बस इतना ही सच पाया है

डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Friday, May 22, 2026

कॉकरोच- कविता द्वारा डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन


 कॉकरोच


यह सच है मनुष्य के साथ रहते रहते

मनुष्य ही मुझे अपनी तरह समझने लगे हैं 

और मैं भी अपने को

मनुष्य की तरह समझने लगा हूं

इसीलिए कभी मुख्य न्यायाधीश तो

कभी राजनीति के अक्स में रहने लगा हूं 

चाहता भी नहीं है कोई अपने घर में

सीलन बदबू गंदगी फिर भी

आदमी से ज्यादा मौका परस्त भला

इस पृथ्वी पर कौन रह गया है

उसने अपने को गुलाम और

गाय को पालतू जानवर कह दिया है

मौका पाकर राजनीति के गंदे खेल में

गंदो को भी अपना कर लिया है

इसीलिए आज मैं बहुत

ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया हूं

क्योंकि कॉकरोच की तरह छिपकर

जीने वालों के लिए मैं आदर्श बन गया हूं 

संख्या के आधार पर बढ़ते हुए

परिवार के आकार से परेशान

जब सारे देश के लोग हो जाते हैं

जनसंख्या नीति पर न जाने

क्या-क्या बना जाते हैं

तब भी आज कॉकरोच की गिनती से

उसके ताकत होने का 

अंदाजा लगाया जा रहा है

प्रजातंत्र में सत्ता पाने को

आजमाया जा रहा है

मैं भी खुश हूं कि सनातन धर्म में

बिना मरे हुए में मानव योनि का

आनंद ले रहा हूं

चुपचाप एक कोने में बैठकर

खुद को मनुष्य और इन्हें 

कॉकरोच कह रहा हूं जानता हूं

 मैं बच भी जाऊंगा

यह कुचलकर मार दिए जाएंगे

या हिट स्प्रे से बर्बाद कर दिए जाएंगे

पर यही तो मेरा प्रतिकार होगा

क्योंकि मैं करोड़ों साल से शिखंडी बनकर 

भीष्म पितामह को मारना चाहता हूं

इसीलिए आज कॉकरोच बनकर

फिर तुम्हारे सामने आना चाहता हूं

मां भारती को अबला बनाकर

छोड़ जाना चाहता हूं

क्योंकि मैं जानता हूं तुम

धृष्ट राष्ट्र के देश में रहकर संजय की

आंखों से सब कुछ सुनना चाहते हो

खुद अपनी मां भारती को कहां

अपना कहना चाहते हो

इसलिए कॉकरोच का तुम गुणगान करके 

अपना जीवन बचा रहे हो

देखो कैसे कीड़े मकोड़े की तरह

कॉकरोच जनता पार्टी में आ रहे हो

क्या तुम मानव होने का अर्थ

कहीं से अपने में पा रहे हो


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Thursday, May 21, 2026

शब्दों की प्रतिध्वनि — डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"

 

शब्दों की प्रतिध्वनि

— डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"

मरना तो मुझको भी है,
मरना तुमको भी है,
कौन नहीं जानता यह सच—
फिर भी कहाँ हम चुपचाप
लेटे-बैठे रह जाते हैं।

कहाँ किसी को भूखा पाते हैं,
कहाँ बिना संघर्ष के
दिन गुजर जाते हैं।
मानते भी हैं कि चाहे
जितनी कोशिश कर लूँगा,
अपनी झोली मोती-हीरों से भर लूँगा,
फिर भी एक दिन
वह सीमा आ ही जाएगी,
साँस अपना मुकाम पा ही जाएगी।

चाहूँगा भी तो उसके बाद
साँस आगे नहीं जाएगी।
शरीर की कोशिश रहेगी भी तो
उसके हिस्से में
चिता या मिट्टी की ही
परछाई आएगी।

सब कुछ एक पल में ही
अतीत हो जाएगा,
भूतकाल हो जाएगा।

मैं भी इस दुनिया में आया था,
तुम भी इस दुनिया में आए थे—
यह भला बार-बार कौन गाएगा?

कभी-कभी याद भी आ जाएगी
कि वह होता तो ऐसा करता,
तुम होते तो ऐसा करते।
पर इससे किसी के जीवन का
ना तो कोई मतलब होगा,
ना ही कोई बैठकर आँसू गिराएगा।

बस एक कल्पना की तरह
कि पृथ्वी के अलावा भी
कहीं पर जीवन है—
तुम भी किसी के मन में
ऐसे ही आते-जाते रहोगे।

पर आज,
जब तुम ज़िंदा हो,
सोचते ही नहीं
कि मानव जीवन पाकर भी
तुम क्या अपनी मुट्ठी में
पाए रहोगे?

क्या केवल
एक चिड़िया की तरह
दाना चुगने का अर्थ लेकर ही
जीना चाहते हो?
या मानव होने के अर्थ में भी
कभी जीना चाहते हो?

छोड़ जाना चाहते हो
पत्थरों की तरह
अपने विचार को
अमरता की तरफ ले जाकर—
ताकि तुम रहो ना रहो,
तुम्हारे साथ यह दुनिया चलती रहे,
तुम्हारे शब्दों की प्रतिध्वनि पाकर,
तुम्हारे शब्दों की प्रतिध्वनि पाकर।

डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"

Thursday, May 14, 2026

पैसे का अँधियारा — डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

पैसे का अँधियारा

— डॉ आलोक चांटिया रजनीश

मुट्ठी में जब पैसा आया,
मन का दीपक बुझता पाया,
चेहरों पर अँधियारा उतरा,
हर रिश्ता भी धुंधलाया।

अब न किसी को राह उजाली,
सबको अपनी पड़ी निराली,
सच्चे मन की बात करो तो,
हो जाती आवाज़ ख़ाली।

सुनकर भी सब मौन खड़े हैं,
पैसे के बस खेल बड़े हैं,
रिश्तों की बातें सुनते ही,
चेहरों पर संदेह पड़े हैं।

जब खुद का खर्चा भारी है,
जीवन की पीड़ा जारी है,
कौन किसी की बात सुनेगा,
सबकी अपनी लाचारी है।

बस यह सोच मनुज चुप रहता,
भीतर-भीतर दुख को सहता,
कोई अपना बिछुड़ भी जाए,
आँसू पीकर जीवन ढोता।

कोई लावारिस मर जाता,
कोई तन्हा जलता जाता,
श्मशान किनारे हर चेहरा,
लकड़ी का मूल्य बतलाता।

आत्मा-परमात्मा की बातें,
चलती रहती दिन और रातें,
पर जब अंतिम समय सामने,
जेबें पहले खुलती पाते।

हर मानव यह बोझ लिए है,
जीते-जी सौ मौत जिए है,
पैसों की इस अंधी दौड़ में,
अपना ही विश्वास पिए है।

मर-मर कर जीने की आदत,
सबने जैसे ओढ़ी राहत,
भीतर राख दबाए बैठे,
खो दी मन की सारी चाहत।

जिंदा होकर भी सब पत्थर,
सूनी आँखें, भीतर बंजर,
दर्द किसी का सुनते लेकिन,
मन रहता हिसाबों के घर।

पूछेंगे — “क्या दर्द तुम्हारा?”
फिर होगा चेहरा बेचारा,
जान गए हैं बात बढ़ी तो,
आएगा पैसों का धारा।

“अपने दुख क्या कम हैं भाई?”
कहकर दुनिया आँख चुराई,
इसीलिए अब लोग मनुज से,
धीरे-धीरे दूरी पाई।

घर-आँगन संवाद नहीं है,
रिश्तों में वह स्वाद नहीं है,
इसीलिए अब लोग यहाँ पर,
इंसानों पर विश्वास नहीं है।

कुत्तों में अपनापन पाकर,
मनुष्य स्वयं से हार गया,
पैसे के इस अँधे युग में,
मानव भीतर मार गया।

मैं संस्कृति मानव हूँ — डॉ आलोक चांटिया रजनीश

मैं संस्कृति मानव हूँ

— डॉ आलोक चांटिया रजनीश

कब अपने कितनी दूर हुए,
यह कोई जान न पाता है,
जो कल तक थे बिल्कुल अपने,
वक़्त उन्हें बहा ले जाता है।

मैं भी इक मीठी भूल लिए,
हर रिश्ते को अपना समझा,
क्या तेरा है, क्या मेरा है,
सबको ही मैंने घर समझा।

सोचा था जब मन चाहेगा,
अपनी बातें कह जाऊँगा,
जैसे कल तक सुनते थे सब,
वैसे ही अब भी पाऊँगा।

पर सूरज डूबा, फिर निकला,
फिर निकला और फिर डूब गया,
इन आते-जाते मौसम में,
मेरा भी बचपन छूट गया।

गलतफ़हमी तब टूट गई,
जब सच का चेहरा सामने था,
हर कोई अपने घर में था,
हर कोई अपने दायरे में था।

कोई पत्नी में डूबा था,
कोई बच्चों में खोया था,
अपने छोटे से सुख में ही,
हर रिश्ता जैसे सोया था।

सब अपने दुख गिनवाते थे,
सब अपनी गाँठें खोल रहे,
और मैं अपने सूने मन में,
कुछ टूटे सपने ढो रहा।

अब अक्सर मेरे शब्द सभी,
मुझ तक वापस आ जाते हैं,
जब बच्चों से कुछ कहता हूँ,
चेहरे क्यों बदल से जाते हैं।

वे धीरे से कह देते हैं—
“अब बच्चों को मत टोका कीजिए,
आप अपने हैं, लेकिन बस
उन्हें अपने जैसा रहने दीजिए।”

किसी का बच्चा रूठ गया,
माँ ने उससे कुछ कह डाला,
कोई घर आकर चुप बैठा,
मन ने भीतर दर्द उछाला।

कोई बोला— “मामा आए”,
कोई बोला— “साए हैं”,
हर चेहरे की मुस्कानों में,
अपने-अपने सन्नाटे हैं।

तब आकर यह जान सका,
मैं वैसा मानव अब न रहा,
जो केवल प्रकृति में जीता,
मन से बिल्कुल सरल रहा।

मैं संस्कृति का मानव हूँ,
रिश्तों को लेकर चलता हूँ,
सूखी हुई संवेदनाओं में,
थोड़ा अपनापन भरता हूँ।

मैं अब भी मिलने जाता हूँ,
हालाँकि मन घबराता है,
इस तेज़ समय की दुनिया में,
अपनापन कम पड़ जाता है।

फिर भी रिश्तों की चौखट पर,
मैं दीप स्नेह का धरता हूँ,
क्योंकि अभी तलक इस जग में,
मैं संस्कृति मानव रहता हूँ।

 

Thursday, May 7, 2026

दर्द में भीगा हुआ जब भी मैं निकलता हूं- डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

दर्द में भीगा हुआ
जब भी मैं निकलता हूं
बहती हुई पानी की बूंद में
जब भी विकलता हूं
कितना सुंदर मैं लगता हूं
यह तुम अच्छी तरह से जानते हो
सच कहूं तो मानते भी हो
क्योंकि मेरी आह सुनकर ही
तो तुमको आनंद आता है
जब एक कतरा दर्द बहकर
तुम्हारे हाथों में रह जाता है
तुम्हें एहसास भी हो जाता है
कि तुम पूर्णता के पथ पर खड़े हो
भले ही कितने हताश निराश
और शून्य में पड़े हो
कोई विकल्प भी तो नहीं पाते हो
जब दर्द को सूखता हुआ
हवाओं के साथ पाते हो
दर्द की पपड़ियां जब उखड़कर
हवा में उड़ने लगती हैं
तब भी कहां किसी की आंखें जगती हैं
सब सोचते हैं जरूर इसके अंदर से
फिर कोई कल फूट रहा होगा
जो आज था वह फिर से छूट रहा होगा
बस दर्द की यही कहानी तो
मुझ में तुम में हर किसी में दिखाई देती है
दर्द की भीगी हुई छाती
अक्सर अंधेरे में सुनाई देती है
पर तुमने तो वह पाठ भी पढ़ लिया है
कि दर्द देकर ही प्रसव वेदना के बाद

 किलकारी गूंजा करती हैं
कोई पौधे की पत्तियां तभी निकलती हैं
जब कोई मिट्टी किसी कुदाली से
घायल बार-बार की जाती हैं
इसीलिए दर्द देखकर अब
तुम मुस्कुराने की दर्शन में रहने लगे हो
कोई तोड़ ना सके कोई मोड ना सके
और दर्द में भीगे हुए उसे तन को
कोई देख ना सके शायद इसीलिए
कुछ इस तरह से रहने लगे हो
मेरे मुस्कुराने का अर्थ सिर्फ
दर्द में भीगा तन ही जान पाता है
दर्द का शोर पहाड़ से निकलती हुई एक
नदी को भी प्रकृति की
सुंदरता बना देता है
भला कब कौन एक टूटे पत्थर में
एक मूर्ति को निकल पाएगा
इसीलिए छीनी हथौड़े के साथ
लोग निरंतर रहने लगे हैं
क्योंकि तभी तो जो वह चाहते हैं
उसे निकाल पाएंगे
भला वे लोग दर्द को छोड़कर
तुम्हें मुस्कुराहट कैसे दे जाएंगे
इसीलिए तुम्हारा मुस्कुराना
मेरा मुस्कुराना जरूरी हो गया है
क्योंकि दर्द के साथ कोई अंजना सा
रिश्ता चुपचाप मेरे भीतर सो गया है
इसीलिए जब स्वप्न में वह दर्द
मेरे भीतर जाग जाता है
तो मेरा तन उस दर्द से भीग जाता है
जिसे देखकर तुम मेरी तरुणाई
यौवन को नोच लेना चाहते हो
शायद तुम भी दर्द क्या होता है
इसे जान लेना चाहते हो
इसे जान लेना चाहते हो
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

Monday, April 20, 2026

कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन


 कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,


 आज वह सड़क के किनारे पड़ा था, 


कितना फूला नहीं समा रहा था ,


 किसी को कुछ समझ भी नहीं पा रहा था,


क्योंकि उसे भगवान पर चढ़ाया जाएगा ,


और उसका स्थान भी उतना ही ऊंचा हो जाएगा,


पर कहां जानता था कि जिस संसार में,


वह भगवान तक पहुंचने की चाहत में, 


किसी के हाथ में लिया गया है ,


वहीं दूसरे दिन उसको भगवान के,


 प्रतिमा से निकाल कर सड़क पर फेंक गया है,


फूल का यह दर्शन कहां,


कोई भी समझ पाता है ,


हर कोई बस अपनी गुमान में यहां आता है,


कहता भी है कि तुम्हारी हैसियत क्या है ?


तुम क्या जानो मैं क्या हूं ?


मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं ?


मैं चंद मिनट में तुम्हें मिटा सकता हूं, 


पर वह स्वयं यह नहीं जानता है,


कि आज जिस ऊंचाई पर पहुंचकर,


 वह इतने बड़े-बड़े शब्द को बोले जा रहा है,


कल वह खुद फूल की तरह,


वहां से उतार भी लिया जाएगा,

और अकेलेपन, अंधेरे में ,


चुपचाप बैठा दिया जाएगा ,


जहां वह स्वयं अपने ,


अस्तित्व को ढूंढने की कोशिश करेगा, 


हो सकता है कभी वह उदासी में,


तो कभी किसी वृद्ध आश्रम में मरेगा


पर जब उर्जा शरीर में बहती है,


तो कहां किसी को कुछ समझती है?


और कहती है फूलों की इस कहानी को,


जो स्वयं आदमी ही रोज ,


भगवान पर चढ़ा कर लिखता है,


पर क्या कभी उसका यह दर्शन,

उसके चेहरे पर ,


उसके व्यवहार में किसी को दिखता है?


डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"