Saturday, October 10, 2026

हवा का साथ छूट जाना जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी एक छोटी-सी हवा का दर्शन--डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’ अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 ### हवा का साथ छूट जाना


जीवन और मृत्यु के बीच खड़ी एक छोटी-सी हवा का दर्शन


जब घर का कोई अपना कहता है, कि वह मर गया है, या सफेद कपड़ों में खड़ा कोई डॉक्टर अपने तकनीकी ज्ञान की भाषा में उसके जीवन का अंतिम निर्णय सुनाता है, तो समझ में नहीं आता कि आखिर हुआ क्या है!


वह तो अभी भी सामने पड़ा है, उसका पूरा शरीर वहीं है, हाथ हैं, पैर हैं, चेहरा है, माथा है, आँखें हैं, होंठ हैं, जिन्हें देखकर कभी जीवन की असंख्य कहानियाँ जन्म लिया करती थीं।


उसके भीतर का मस्तिष्क, जिसने कभी संसार को समझा था, फेफड़े, जिन्होंने हवा को जीवन का संगीत बनाया था, दिल, जिसने धड़कनों के सहारे अपनों को अपना होने का भरोसा दिया था, किडनी, लीवर और शरीर के तमाम अंग, सब अपनी-अपनी कहानी के साथ उसके शरीर में मौजूद हैं, फिर भी घोषणा होती है— कि वह आदमी अब नहीं रहा!


आश्चर्य होता है, जिसके न होने की बात कही जा रही है, उसका शरीर तो अभी भी है, जिसे छूकर देखा जा सकता है, जिसके माथे पर हाथ रखकर उसकी गर्माहट खोजी जा सकती है, जिसके चेहरे में अब भी किसी अपने की छवि दिखाई देती है, फिर अचानक ऐसा क्या बदल गया कि एक जीवित मनुष्य सबकी निगाहों में एक निर्जीव शरीर बन गया?


और फिर शुरू होता है रोने, चीखने और विलाप करने का क्रम, कोई उसके पैरों से लिपट जाता है, कोई उसके सीने पर सिर रखकर अपनी दुनिया उजड़ने की बात कहता है, कोई बार-बार उसका नाम पुकारता है, मानो नाम की आवाज़ शरीर के भीतर कहीं सोए हुए जीवन को जगाकर फिर से खड़ा कर देगी।


लेकिन वह नहीं उठता, न किसी की पुकार का उत्तर देता है, न किसी के आँसुओं को पोंछता है, न किसी के कंधे पर हाथ रखकर यह कह पाता है कि रो मत, मैं यहीं हूँ!


आखिर वह कहाँ चला गया, जिसके होने का प्रमाण कुछ क्षण पहले तक यही शरीर हुआ करता था?


कहाँ खो गई वह पहचान, जिसके कारण इस शरीर को एक नाम दिया गया था, एक रिश्ता मिला था, एक घर मिला था, और संसार में एक जगह मिली थी?


शरीर तो वहीं है, लेकिन शरीर का होना अब उसके होने का प्रमाण क्यों नहीं है?


मैं सोचता हूँ, यह कैसी विचित्र पहेली है जिसे मनुष्य हजारों वर्षों से अपने आँसुओं में घोलकर समझने की कोशिश कर रहा है!


हवा की ओर देखिए, वह बाहर भी है, घर के कोने-कोने में भी है, खिड़की के पर्दों को हिलाती हुई, पेड़ों की पत्तियों को छूती हुई, कभी धूल उड़ाती हुई, तो कभी किसी के चेहरे पर ठंडक बनकर उतरती हुई।


हवा कहीं खत्म नहीं हुई, उसका अस्तित्व कहीं मिटा नहीं, वह बाहर अपनी पूरी दुनिया के साथ अब भी मौजूद है।


फिर भी इस शरीर के भीतर उस हवा का आना-जाना जब अपने जीवनदायी क्रम को खो देता है, तो संसार कहने लगता है— कि जीवन समाप्त हो गया!


कितनी अजीब बात है, जिस हवा को हम बिना देखे स्वीकार करते रहे, जिसके होने पर कभी ध्यान नहीं दिया, जिसे हमने जीवन की सबसे सामान्य और साधारण आवश्यकता समझा, उसी के साथ हमारा संबंध टूटते ही असाधारण हो जाती है हमारे जीवन की पूरी कहानी।


कल तक यही हवा हमारे भीतर आकर एक नई सुबह का हिस्सा बनती थी, और बाहर निकलकर किसी अगली साँस की प्रतीक्षा करती थी।


हम चलते थे, तो लगता था कि हम चल रहे हैं, हम बोलते थे, तो लगता था कि हम बोल रहे हैं, हम हँसते थे, तो लगता था कि हमारी हँसी सिर्फ हमारी अपनी है।


लेकिन शायद हम भूल जाते हैं कि हमारे होने की इस पूरी व्यवस्था में हम अकेले कभी थे ही नहीं, हमारे भीतर प्रकृति का भी हिस्सा था, हवा का भी योगदान था, धड़कनों का भी अनुशासन था, और उन अनगिनत जैविक प्रक्रियाओं का निरंतर सहयोग था, जिन्हें हमने कभी अपनी इच्छा से शुरू नहीं किया, न अपनी इच्छा से हर क्षण चलाते रहे।


हम सो जाते थे, लेकिन जीवन की व्यवस्था अपना काम करती रहती थी।


हम सपनों में खो जाते थे, लेकिन शरीर अपने भीतर जीवन की पहरेदारी करता रहता था।


हम संसार से बेखबर होते थे, लेकिन संसार का एक छोटा-सा हिस्सा हमारे भीतर जागता रहता था।


और जब वही व्यवस्था एक दिन हमेशा के लिए ठहर जाती है, तो हमें पता चलता है कि जिसे हम अपना जीवन कहते थे, वह वास्तव में कितने अनगिनत सहयोगों का परिणाम था!


लेकिन ठहरिए, क्या मृत्यु का अर्थ सिर्फ हवा का आना-जाना बंद हो जाना है?


क्या जीवन की पूरी परिभाषा साँसों की आवाजाही में सिमट जाती है?


नहीं, विज्ञान हमें इससे कहीं अधिक गंभीर और जटिल सत्य बताता है।


कभी-कभी साँस रुकने पर भी मनुष्य को वापस जीवन दिया जा सकता है, कभी धड़कन रुक जाने पर भी चिकित्सा का प्रयास उसे फिर से लौटा सकता है।


और कभी ऐसा भी होता है कि शरीर के कुछ अंग कुछ समय तक काम करते रहते हैं, लेकिन मस्तिष्क की वे क्षमताएँ, जो चेतना और जीवन की कुछ मूलभूत व्यवस्थाओं से जुड़ी हैं, स्थायी रूप से समाप्त हो चुकी होती हैं।


इसीलिए मृत्यु का निर्णय सिर्फ हवा को देखकर, सिर्फ धड़कन को सुनकर, या केवल शरीर को निश्चल पाकर नहीं किया जा सकता।


उसके लिए विज्ञान ने अपने मानदंड बनाए हैं, चिकित्सा ने अपनी कसौटियाँ निर्धारित की हैं, और कानून ने भी उन परिस्थितियों के लिए अपनी सीमाएँ तय की हैं।


पर मेरे भीतर एक प्रश्न फिर भी जीवित रहता है—


जब विज्ञान शरीर के भीतर जीवन की समाप्ति के प्रमाण खोजता है, तब मनुष्य अपने भीतर उसके होने की अनुभूति किस आधार पर खोजता है?


क्योंकि डॉक्टर के लिए मृत्यु एक चिकित्सकीय निष्कर्ष है, कानून के लिए एक निर्धारित स्थिति, और परिवार के लिए एक ऐसी अनुपस्थिति, जिसके सामने सारे तर्क धीरे-धीरे छोटे पड़ जाते हैं।


विज्ञान बता सकता है कि शरीर की कौन-सी व्यवस्था अब वापस नहीं लौटेगी, लेकिन वह आँसू किस प्रयोगशाला में मापे जाएँगे जो किसी बेटे की आँखों से अपने पिता के लिए गिरते हैं?


कौन-सा यंत्र बताएगा कि एक माँ की आवाज़ बेटे के भीतर कितने वर्षों तक जीवित रह सकती है?


और कौन-सा चिकित्सकीय मानदंड यह निर्धारित करेगा कि किसी के चले जाने के बाद उसकी स्मृतियाँ कितनी बार किसी को अकेले में रुलाएँगी?


यहीं मृत्यु शरीर से निकलकर संबंधों में प्रवेश कर जाती है।


वह एक व्यक्ति के लिए जीवन की समाप्ति हो सकती है, लेकिन दूसरे व्यक्ति के लिए जीवन भर चलने वाली एक नई कहानी की शुरुआत भी।


जिसके शरीर में हवा का आना-जाना बंद हो गया, उसके जाने के बाद भी उसके शब्द किसी के भीतर साँस लेते रहते हैं।


उसकी उँगलियों का स्पर्श, उसकी डाँट, उसकी हँसी, उसके अधूरे वादे, उसकी छोटी-छोटी आदतें, किसी पुराने कमरे की दीवारों में, किसी संदूक में रखे कपड़ों में, किसी तस्वीर के पीछे, या अचानक सुनाई पड़ जाने वाली किसी परिचित आवाज़ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं।


तब लगता है, मनुष्य के होने और न होने के बीच एक तीसरी दुनिया भी है, जहाँ शरीर उपस्थित नहीं होता, लेकिन उसका प्रभाव अपनी पूरी शक्ति के साथ जीवित रहता है।


शायद इसीलिए मृत्यु के बाद भी हम किसी को पूरी तरह भुला नहीं पाते।


क्योंकि मनुष्य केवल अपनी साँसों का नाम नहीं है, वह उन संबंधों का भी नाम है जिनमें उसकी साँसों ने कभी अर्थ पाया था।


लेकिन मेरा प्रश्न फिर भी हवा के पास लौट आता है।


वही हवा, जो बाहर कभी समाप्त नहीं हुई, वही हवा, जो पेड़ों को हिलाती रही, दीयों की लौ को काँपाती रही, और खिड़कियों से होकर घर के भीतर आती-जाती रही।


उस हवा ने हमारे साथ चलना बंद नहीं किया, उसने केवल हमारे शरीर के भीतर जीवन की उस विशेष व्यवस्था का हिस्सा बने रहना बंद कर दिया, जिसके सहारे हम इस संसार में सक्रिय थे।


हवा का अस्तित्व बना रहा, लेकिन उसके साथ हमारे होने का संबंध बदल गया।


और शायद जीवन का दर्शन इसी छोटे-से अंतर में छिपा है—


किसी वस्तु का संसार में होना और उसका हमारे लिए उपयोगी होना, दो अलग-अलग बातें हैं।


सूरज रोज निकलता है, लेकिन बंद आँखों के लिए उसका प्रकाश क्या अर्थ रखता है?


संगीत हवा में फैलता है, लेकिन सुनने की क्षमता खो चुके कानों के लिए उसकी मधुरता कहाँ बचती है?


प्रेम संसार में मौजूद रहता है, लेकिन महसूस करने की क्षमता खो चुके हृदय के लिए उसकी उपस्थिति का क्या अर्थ है?


इसी तरह हवा भी मौजूद रहती है, लेकिन जब शरीर उस हवा को जीवन की प्रक्रिया में बदल पाने की क्षमता खो देता है, तो वही हवा, जो कल तक जीवन का हिस्सा थी, आज केवल संसार की सामान्य हवा रह जाती है।


प्रकृति अपनी गति से चलती रहती है, और मनुष्य की गति उसके भीतर कहीं समाप्त हो जाती है।


कितना छोटा-सा अंतर है प्रकृति के बने रहने में और हमारे चले जाने में!


दुनिया वही रहती है, आकाश वही रहता है, हवा वही रहती है, सूरज की किरणें उसी तरह धरती पर उतरती हैं, लेकिन किसी एक घर के भीतर पूरा ब्रह्मांड बदल जाता है।


कल जिस कमरे में एक आवाज़ गूँजती थी, आज वहाँ सन्नाटा बैठा है।


कल जिस कुर्सी पर कोई अपना बैठा करता था, आज वहाँ खालीपन बैठा है।


कल जिस दरवाजे के खुलने पर किसी के आने की खुशी होती थी, आज उसी दरवाजे की आहट आँखों को भर देती है।


दरवाजा अब भी खुलता है, हवा अब भी आती है, समय अब भी चलता है, लेकिन प्रतीक्षा करने वाला वह व्यक्ति नहीं रहा।


और तब समझ में आता है कि मृत्यु केवल शरीर की किसी व्यवस्था का रुक जाना नहीं, जीवित लोगों के जीवन में किसी परिचित उपस्थिति का हमेशा के लिए बदल जाना भी है।


मैं नहीं जानता कि जीवन की पूरी व्याख्या किसी एक दर्शन में समा सकती है या नहीं, लेकिन इतना अवश्य समझता हूँ कि हम जीवन को तब तक बहुत साधारण मानते रहते हैं, जब तक वह हमारे भीतर असाधारण ढंग से काम करता रहता है।


हम साँस लेते हैं, लेकिन साँस लेने पर उत्सव नहीं मनाते।


हम जागते हैं, लेकिन आँखें खुलने को किसी चमत्कार की तरह नहीं देखते।


हम किसी अपने को देखते हैं, उससे बात करते हैं, कभी नाराज होते हैं, कभी उसे अनदेखा कर देते हैं, और सोचते हैं कि यह सब कल भी होगा।


पर जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह अपने बने रहने की कोई लिखित गारंटी नहीं देता।


जिसे हम कल का अधिकार समझते हैं, वह वास्तव में आज का अवसर होता है।


जिसे हम अपना स्थायी होना मानते हैं, वह प्रकृति की निरंतर चलती व्यवस्था में एक सीमित अवधि का हिस्सा होता है।


और जिस हवा को हम हर दिन बिना धन्यवाद दिए अपने भीतर आने देते हैं, वही हवा हमें चुपचाप याद दिलाती है कि जीवन पर हमारा अधिकार उतना निरंकुश नहीं है, जितना हम अपने अहंकार में समझ बैठते हैं।


इसलिए जब कोई कहता है कि वह मर गया है, तो मैं केवल उसके शरीर को नहीं देखता, मैं उन सभी अदृश्य प्रक्रियाओं को भी सोचता हूँ जिनके चलते वह कभी एक जीवित मनुष्य था।


मैं उस हवा को भी देखता हूँ जो अब भी उसके आसपास है, उस आकाश को भी जो उसके जाने से खाली नहीं हुआ, और उस परिवार को भी जिसकी दुनिया में एक ऐसी जगह खाली हो गई है जिसे कोई दूसरा शरीर कभी पूरी तरह नहीं भर पाएगा।


तब मृत्यु मुझे हवा के समाप्त हो जाने का नाम नहीं लगती, बल्कि उस अनूठे संबंध के टूट जाने का नाम लगती है जिसके सहारे प्रकृति का एक छोटा-सा हिस्सा अपने आपको मनुष्य कहता था।


हवा अब भी है, शरीर भी कुछ समय तक अपनी पहचान का आकार बनाए रखता है, दुनिया भी अपनी जगह पर है, लेकिन वह जीवन, जो इन सबको जोड़कर एक व्यक्ति की कहानी बनाता था, अपनी अंतिम सीमा तक पहुँच चुका होता है।


और शायद इसी को समझना जीवन को समझने की शुरुआत है।


हम मृत्यु से इसलिए नहीं डरते कि हवा समाप्त हो जाएगी, बल्कि इसलिए डरते हैं कि हवा के साथ चलने वाली हमारी अपनी कहानी समाप्त हो जाएगी।


हम इस बात से नहीं रोते कि संसार से हवा चली गई, हम इस बात से रोते हैं कि उस हवा के सहारे जिस आवाज़ को सुनते थे, जिस हाथ को पकड़ते थे, जिस चेहरे में अपना संसार देखते थे, वह अब हमारे सामने वैसे लौटकर नहीं आएगा।


बस, जीवन का इतना-सा दर्शन है—


हवा बाहर भी थी, हवा भीतर भी थी, हवा आज भी बाहर है, लेकिन कल तक जिस हवा के साथ एक मनुष्य की दुनिया चलती थी, आज उसी हवा के बीच उसकी दुनिया थम गई है।


हवा ने संसार से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा, बस एक शरीर के भीतर जीवन का साथ छूट गया।


और मनुष्य ने उस साथ के छूट जाने को एक नाम दे दिया— मृत्यु।


लेकिन शायद मृत्यु का सबसे गहरा प्रश्न यह नहीं है कि हमारी हवा कब तक चलेगी,


बल्कि यह है कि \*\*जब तक हवा चल रही है, तब तक हम किसी के जीवन में कितनी जिंदगी बनकर चल रहे हैं?\*\*


क्योंकि अंत में सिर्फ यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि हमारे शरीर ने कितनी साँसें लीं,


बल्कि यह भी कि हमारी उपस्थिति ने कितने चेहरों पर मुस्कान रखी, कितने दुखों को सहारा दिया, कितने संबंधों को अर्थ दिया, और हमारे होने से किसी दूसरे मनुष्य को जीवन थोड़ा और सुंदर लगा या नहीं।


हवा तो चलती ही रहेगी, उसका अपना कोई शोक नहीं, उसकी अपनी कोई स्मृति नहीं, उसकी अपनी कोई प्रतीक्षा नहीं।


लेकिन मनुष्य के पास एक दुर्लभ अवसर है— वह अपनी साँसों के रहते किसी दूसरे मनुष्य की जिंदगी में ऐसा अर्थ छोड़ सकता है जो उसकी अनुपस्थिति में भी जीवित रहे।


शायद यही जीवन की सबसे सुंदर संभावना है, और मृत्यु के सामने मनुष्य की सबसे बड़ी सार्थकता भी।


डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’ अखिल भारतीय अधिकार संगठन



## शब्दों का कचरा और नमस्कार का पुरस्कार — डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’

 ### शब्दों का कचरा और नमस्कार का पुरस्कार


— डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’


वह कई दिनों तक उसके भेजे हुए शब्दों को घर के कचरे की तरह एक कोने में इकट्ठा करती रहती है, न उन्हें पढ़ने की फुर्सत, न उनके अर्थों में उतरने की इच्छा, न उन भावनाओं को समझने की जरूरत, जिन्हें किसी ने अपने भीतर से निकालकर उसके सामने शब्दों में रख दिया था।


उधर लिखने वाला भी कितना अजीब है, हर दिन कुछ नया लिखता है, अपने मन की परतें खोलता है, भावनाओं को अक्षरों में पिरोता है, और इस भ्रम में जीता है कि शायद उसके शब्दों में किसी के दिल तक पहुँचने का रास्ता होगा!


लेकिन आज की दुनिया में भावनाओं से अधिक तकनीक का सम्मान है, शब्दों से अधिक इमोजी की पहचान है, और आत्मीयता की सबसे छोटी परिभाषा दोनों हाथ जोड़कर भेजी गई एक तस्वीर में कैद है!


फिर एक दिन अचानक उसके मोबाइल की दुनिया में एक सुंदर-सा नमस्कार प्रकट होता है, दोनों हाथ जुड़े होते हैं तस्वीर में, मानो कई दिनों की उपेक्षा का हिसाब एक ही क्लिक में पूरा होता है।


न कोई उत्तर शब्दों का, न भावनाओं का कोई स्वीकार, न यह एहसास कि किसी ने कितनी रातें जागकर लिखे थे ये विचार, बस एक तकनीकी अभिवादन और लिखने वाला खुश हो जाता है— शायद उसे अपनी मेहनत का यही प्रतिफल मिल पाता है!


पर ठहरिए, कहानी अभी बाकी है, लिखने वाले की भी अपनी बीमारी है!


वह जानता है कि उसके शब्द किसी की प्राथमिकता नहीं हैं, उसकी भावनाएँ किसी की व्यस्त दुनिया में कोई आवश्यक गतिविधि नहीं हैं, फिर भी वह लिखता है, बार-बार लिखता है, उपेक्षा के हर पत्थर को अपनी कविता का आधार बनाकर लिखता है।


क्योंकि उसे भी एक नशा है, कुछ कहने का, कुछ रचने का, अपने भीतर के समुद्र को कागज पर उतारने का।


उसे इस बात से भी शिकायत नहीं कि उसके शब्दों को पढ़ा नहीं गया, उसे तो इस बात में भी आनंद मिलता है कि उसने अपने मन का सच किसी छल के बिना लिख दिया।


वह जानता है— हर लिखा हुआ शब्द पढ़ा नहीं जाता, हर सच्चा भाव समझा नहीं जाता, हर समर्पण का पुरस्कार नहीं मिलता, और हर नमस्कार के पीछे सम्मान का भाव नहीं होता!


फिर भी कवि लिखता है, क्योंकि उसका धर्म लिखना है, किसी के उत्तर की प्रतीक्षा में अपने अस्तित्व को गिरवी रखना नहीं।


वह शब्दों को भेजता रहेगा, कोई पढ़े या न पढ़े, कोई समझे या न समझे, कोई हृदय से स्वीकार करे या केवल हाथ जोड़कर तकनीकी औपचारिकता निभा दे।


उसे मालूम है कि उसकी कविता का मूल्य किसी के उत्तर की लंबाई से नहीं, किसी की प्रतिक्रिया की तेजी से नहीं, और किसी तस्वीर में जुड़े हाथों से नहीं तय किया जा सकता।


क्योंकि कुछ लोग शब्दों को सिर्फ संदेश समझकर भेजते हैं, और कुछ लोग अपने पूरे अस्तित्व को शब्दों में बदलकर भेजते हैं।


पहले लोग उत्तर न मिलने पर संदेश मिटा देते हैं, दूसरे लोग उत्तर न मिलने पर एक नई कविता लिख देते हैं!


यही तो अंतर है अपेक्षा और सृजन में, प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति में, और शायद इसी अंतर में छिपा है एक कवि के जीवित होने का प्रमाण।


वह लिखता रहेगा, भले ही उसके शब्द किसी डिजिटल कोने में पड़े रहें, भले ही उसकी भावनाएँ कचरे की तरह उपेक्षित होती रहें, क्योंकि उसे किसी की स्वीकृति से अधिक अपने सृजन पर विश्वास है।


उपेक्षा उसका अंत नहीं, उसकी अगली कविता की शुरुआत है; और कभी-कभी, एक मौन नमस्कार से अधिक एक अनकही कविता की औकात है!


— डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’ कवि | अखिल भारतीय अधिकार संगठन


Friday, October 2, 2026

सूरज, बादल और समानता का दर्शन डॉ. आलोक चांटिया रजनीश कवि

 

सूरज, बादल और समानता का दर्शन

डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
कवि

सूरज को बादल के आने का,
कभी नहीं होता शोक।
न एक इंच वह कम होता,
न अपना खोता लोक।

कुछ पल उसका प्रकाश भले,
संसार से छिप जाता है,
बादल अपने भ्रम में फिर,
सूरज को हराता है।

पर सूरज कब हार मानता,
अपना धर्म निभाता है,
बादल चाहे घिरकर आए,
वह फिर प्रकाश लुटाता है।

बादल आता, जल लाता है,
धरती को भिगो जाता है,
शायद सूरज से ईर्ष्या कर,
नभ में छा जाता है।

सूरज की किरणें धरती पर,
जब आकर मुस्काती हैं,
सूखे जीवन के कण-कण में,
नई चेतना लाती हैं।

धरती के कोने-कोने में,
जब प्रकाश उतरता है,
मृत-सा दिखता जीवन भी,
फिर से साँसें भरता है।

इस प्रेमिल प्रकाश को देख,
बादल मन में जलता है,
जल की अपनी अतुल राशि ले,
धरती पर फिर ढलता है।

वर्षा करके वह धरती को,
जीवन-पथ दिखलाता है,
प्रेम के बाद अंकुरण का,
संबंध समझाता है।

सूखी धरती हरियाली का,
नव संदेश सुनाती है,
बीजों की सोई आँखों में,
आशा फिर मुस्काती है।

तब सूरज का प्रकाश भी,
और अधिक फल पाता है,
जीवन अपने महत्तम अर्थ,
तक धीरे बढ़ जाता है।

फिर भी सूरज बादल से,
कभी नहीं ईर्ष्या करता,
कुछ पल बाधित होने पर भी,
अपना पथ नहीं बदलता।

प्रकृति यही सिखाती हमको,
सबका अपना स्थान,
एक नहीं है दूसरे का,
फिर भी सबका मान।

जियो और जीने दो—
प्रकृति यही बतलाती है,
एक-दूसरे के अस्तित्व से,
सृष्टि सँवरती जाती है।

सूरज अपना जीवन जीता,
बादल अपना जीता है,
आकाश सभी को समान रूप से,
अवसर देता है।

न सूरज से कोई पूछे—
कितना प्रकाश लुटाना,
न बादल से कोई पूछे—
कितना जल बरसाना।

प्रकृति दोनों को देती है,
जीवन का अधिकार,
अपने-अपने कर्मों से ही,
होता जग साकार।

समानता का यह दर्शन,
मानव कब समझ पाएगा?
प्रकृति का यह सरल पाठ,
कब मन में बस पाएगा?

मनुष्य प्रकृति को देख रहा,
पर अर्थ नहीं समझता है,
इसीलिए तो मानव-मानव,
से ही दूर भटकता है।

ऊँच-नीच की दीवारें हैं,
अमीरी और गरीबी है,
जाति-वर्ग के बंधन हैं,
मन में कितनी दूरी है।

किसी को जीवन का प्रकाश,
किसी को घोर अँधेरा है,
किसी की धरती हरियाली,
किसी का जीवन बंजर है।

मनुष्य ने धरती बाँटी,
मनुष्य ने आकाश बाँटा,
जल बाँटा और राहें बाँटीं,
प्रेम का भी भाग्य बाँटा।

जिस प्रकृति ने सूरज-बादल,
को एक गगन में रखा,
उसी प्रकृति की संतान ने,
मानव को मानव से बाँटा।

प्रकृति कभी नहीं कहती—
सूरज धनवानों का हो,
बादल केवल शक्तिशाली,
लोगों के खेतों का हो।

सूरज जब भी निकल रहा हो,
भेद नहीं वह करता है,
महल, झोपड़ी, खेत, खलिहान—
सब पर प्रकाश धरता है।

न वह जाति किसी की पूछे,
न वह वर्ग किसी का जाने,
उसकी किरणें सबको छूकर,
जीवन के दीप जलाएँ।

बादल भी जब बरसता है,
भेदभाव नहीं करता है,
धरती की हर प्यास बुझाकर,
जीवन-ऋण को भरता है।

फिर मनुष्य ही क्यों मानव के,
राहों में दीवार बनाए?
क्यों किसी का जन्म किसी के,
अधिकारों का माप बताए?

क्यों निर्धनता किसी मनुष्य की,
गरिमा को घटाती है?
क्यों ऊँचाई दूसरे मानव को,
नीचा बतलाती है?

शायद मनुष्य प्रकृति को,
देख रहा बस आँखों से,
पर उसका गहरा दर्शन,
छूट गया है बातों से।

सूरज कहता—प्रकाश बाँटो,
प्रकाश कभी घटता नहीं,
प्रेम बाँटने से मानव का,
अपना प्रेम घटता नहीं।

बादल कहता—जल बरसाओ,
जल देने से क्या घटता?
धरती को जीवन देने वाला,
कभी स्वयं क्या सूखता?

धरती कहती—बीज किसी का,
हो अवसर तो खिलता है,
स्नेह, प्रकाश और जल पाकर,
अंकुर बनकर मिलता है।

आकाश कहता—मेरे नीचे,
सबको स्थान मिलेगा,
जिसे जहाँ भी जीवन चाहिए,
उसको मान मिलेगा।

रंग भले ही अलग-अलग हों,
प्रकाश सभी का है,
धरती चाहे अलग दिखे, पर,
आकाश सभी का है।

जीवन चाहे अलग-अलग हो,
जीने का अधिकार समान,
हर मानव की गरिमा का भी,
होना चाहिए सम्मान।

काश! मनुष्य प्रकृति की यह,
भाषा पढ़ना सीख सके,
सूरज से प्रकाश बाँटना,
बादल से बरसना सीख सके।

धरती से धैर्य ग्रहण करे,
आकाश से विस्तार,
अपने भीतर फिर से जागे,
मानवता का प्यार।

तब ऊँच-नीच की दीवारें,
धीरे-धीरे ढह जाएँगी,
अमीरी-गरीबी की सीमाएँ,
एक दिवस मिट जाएँगी।

जाति-वर्ग के बंधन टूटें,
भेदभाव सब मिट जाए,
मानव केवल मानव को,
मानव बनकर देख पाए।

तब सूरज को बादल से,
डरने की दरकार नहीं,
बादल को भी सूरज से,
करने की तकरार नहीं।

धरती सबके लिए खिलेगी,
सबके खेत हरे होंगे,
मानवता के आँगन में फिर,
समान अधिकार खिले होंगे।

तब मानव यह जान सकेगा,
प्रकृति का सच्चा ज्ञान—
अलग-अलग हैं रूप सभी के,
फिर भी सबका एक सम्मान।

जियो और जीने दो—
यही प्रकृति का सार,
प्रेम, समानता, मानवता—
जीवन का आधार।

प्रकाश बाँटो, प्रेम बरसाओ,
यही प्रकृति की वाणी,
हर मानव की गरिमा ही तो,
मानवता की निशानी।

सूरज, बादल, धरती, नभ,
सब हमको समझाते हैं—
सब अपने हैं, सब समान हैं,
सब जीने को आते हैं।

न ऊँच-नीच, न भेद रहे,
न कोई हो लाचार,
हर मानव को समान मिले,
जीवन का अधिकार।

प्रकृति यही संदेश दे—
सबका हो सम्मान,
प्रेम, समानता, मानवता—
यही मनुष्य की शान।

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
कवि

Wednesday, September 2, 2026

मैं फूल हूं , मुझे तोड़ लेने का तुम्हारे पास,- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 मैं फूल हूं ,

मुझे तोड़ लेने का तुम्हारे पास,

कोई मर्म ही नहीं है ,

तुम मानव हो,

तुम्हारे यहां तोड़ने के

निषेध का कोई धर्म ही नहीं है

तुम्हें सिखाया ही कहां गया है

कि पौधे में भी जान होती है

तुम एक फूल को तोड़कर

उसकी हत्या कर देते हो

पर विज्ञान को मानने और उसे

स्वीकार करने का जतन

तुम कब कर लेते हो

तुम तोड़ देते हो

मुझे तार तार कर देते हो

अपनों से बिछड़ कर मैं सिर्फ

तुम्हारी खुशी के लिए मर जाता हूं,

कभी किसी प्रेमिका के बालों में ,

तो कहीं भगवान के चरणों में चढ़ जाता हूं ,

अपने को मानव कहते हुए ,

मानव तुमको शर्म ही कहां आती है ?

इस पृथ्वी पर क्या कोई भी बात ,

ऐसी सुनी जाती है

जब किसी जानवर ने अपने प्रेम के लिए

अपनी पूजा के लिए

अपने सम्मान के लिए

किसी फूल की हत्या कर दी हो

फिर भी पशु जगत में

तुम सर्वश्रेष्ठ कहे जाते हो

मानव तुम तो संवेदन शून्य होकर,

पता नहीं क्यों किसी के लिए भी ,

नहीं जी पाते हो ?

मैं तो फूल हूं डाल से जुड़ा हूं,

डाल की खातिर निकल कर ,

पड़ा रह जाता हूं ।

पर तुम किस कीड़े मकोड़े पशु पक्षी को ,

अपने स्वाद के लिए नहीं मार डालते हो!

फिर भी अपने को धर्म परोपकार,

करुणा का प्रतिपालक मानते हो ,

तुम प्रकृति से, उस परम तत्व से ,

लगातार झूठ बोलते रहते हो ,

फिर भी अपने को हर पल धार्मिक कहते रहते हो!

 इसीलिए भगवान के सामने खड़े होकर भी ,

तुम दर्द में रह जाते हो ,

अपनी प्रार्थना आरती में न जाने ,

क्या-क्या कह जाते हो,

पर भगवान भी मुस्कुरा कर रह जाता है ,

जब तुमको वह अपने सामने पाता है !

क्योंकि मानव को तुम ,

ना जाने कहां छोड़ कर आए हो,

अपने अंदर एक रावण को

बसा कर ले आये हो।

इसीलिए हर दिन टूटा हुआ फूल भी ,

तुमको श्राप दे जाता है ,

और तुम्हारे हिस्से की वह सारी खुशी,

तुम्हारे ही सामने लेकर चला जाता है ।

तुम जान भी नहीं पाते कि तुमने,

किसी का ऐसा क्या बिगाड़ा है ,

जो तुम्हारे जीवन से भगवान ने,

हंसी खुशी प्रसन्नता शांति सब छीन लिया है !

पर क्या कभी तुमने हाथ फूल को,

तोड़ते हुए हाथ को एक बार भी ध्यान किया है ?

डॉ अलोक चांटिया रजनीश


Monday, July 20, 2026

तुम युवा नहीं, वायु हो डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 

तुम युवा नहीं, वायु हो

डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

तुम युवा नहीं, वायु हो, अपनी पहचान करो,
बिखरी शक्ति को समेटो, नव निर्माण करो।

ऊर्जा की हर एक किरण, इतिहास बदल सकती है,
जेम्स वाट की सोच बनो, दुनिया सँवर सकती है।

जो भीतर अग्नि जलती है, उसका सम्मान करो,
व्यर्थ न उसे लुटाओ, जीवन का उत्थान करो।

भीड़ के पीछे मत भागो, विवेक का दीप जलाओ,
अंधेरे के हर पथ पर, अपना सूरज ले आओ।

घर की आँखें राह निहारें, उनका भी अधिकार है,
देश तुम्हारे कंधों पर ही लिखता नया विचार है।

भगत, सुखदेव, आज़ादों का साहस फिर अपनाओ,
राजेंद्र लाहिड़ी के पथ पर जीवन सफल बनाओ।

कंस-रावण की राह नहीं, रामत्व का विस्तार करो,
भारत माँ के स्वर्णिम सपनों का साकार करो।

अंधियारे में आलोक बनो, हर मन में प्रकाश भरो,
मुट्ठी में अपनी शक्ति रखो, नवयुग का विश्वास भरो।

रेल बने यह शक्ति तुम्हारी, पत्थर नहीं गिराएगी,
सृजन की हर नई कहानी, भारत को मुस्काएगी।

यदि ऊर्जा का सही मार्ग तुम हर दिन चुनते जाओगे,
विकसित भारत के स्वप्न को सचमुच साकार बनाओगे।

Sunday, July 19, 2026

पत्थरों से पहले इंसान डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 

पत्थरों से पहले इंसान

डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

सोने के सिंहासन चमकते हैं, दीपों का अनंत उजास,
बाहर भूखे बच्चे पूछ रहे, कब आएगा उनका प्रकाश।

घंटों तक आरती गूँज रही, गगन छूते जयकार,
सूनी आँखों में रोटी ढूँढ़े, जीवन का बेबस संसार।

चाँदी के कलश सजे हुए हैं, फूलों का अंबार,
बिना दवा के तड़प रहा है, चौखट पर बीमार।

मखमल की चादर ओढ़े हैं, श्रद्धा के सब द्वार,
सर्द हवाओं में काँप रही, माँ की बूढ़ी देह लाचार।

दानपात्र में लाखों गिरते, गूँज रहा सत्कार,
मेहनत करने वाले हाथों का, क्यों होता तिरस्कार?

प्रेम, दया और धर्म की बातें, हर मंच देता ज्ञान,
लेकिन घर के अपने रिश्तों में, क्यों सूख गया सम्मान?

माँ ने जीवन अर्पण करके, सपनों को आकार दिया,
बुढ़ापे में उसी जननी को, अकेलेपन का भार दिया।

बेटी को कहते घर की लक्ष्मी, देते बड़े बयान,
दहेज, हिंसा और अपमान से, छलनी होता मान।

भाग्य बताने वाले अक्सर, देते लंबा ज्ञान,
अपने ही जीवन की राहों से, रहते फिर अनजान।

दीवारें ऊँची होती जातीं, आँगन होता छोटा,
रिश्तों का बरगद सूख रहा, स्वार्थ बना है मोटा।

साँपों से अब क्या डरना है, विष तो मन में पलता,
चेहरे हँसते, भीतर छल का, हर दिन नया जंगल खिलता।

गिरगिट भी हैरान खड़ा है, रंग बदलते लोग,
सच की कीमत घटती जाए, झूठ पहनता भोग।

गिद्धों ने भी हार मानी है, छोड़ा अपना काम,
इंसानों की लालच ने ही, कर डाला बदनाम।

धर्म वही जो भूखे को रोटी, प्यासे को जल दे,
आँसू पोंछे, हाथ थाम ले, जीवन में संबल दे।

मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा—सबका रहे सम्मान,
सबसे पहले पूजे जाएँ, धरती पर हर इंसान।

पत्थर में भगवान मिलें तो, मन में भी पहचान,
सेवा से बढ़कर नहीं कहीं, कोई दूसरा विधान।

चलो जलाएँ प्रेम का दीपक, मिटे घृणा की रात,
मानवता ही सबसे ऊँचा, यही सृष्टि का सत्य-व्रत।

Friday, July 10, 2026

बुढ़ापा - उम्र का पड़ाव


 

बरसात (उम्र) प्राकृतिक है शाश्वत है
चाह कर भी कौन भला कैसे रोक पाएगा
वह तो एक दस्तक है जिसको देखने का
अवसर हर किसी के जीवन में
कभी ना कभी तो आएगा
यह बात और है कि जर्जर हो चुके
मकान (बूढ़ा व्यक्ति) को बरसात में
बचाए रखने के लिए रात दिन
पथराई आंखों से दोनों हाथों से
अपनी सांसों से जर्जर मकान के साथ (संतान )
रहने वाला ना जाने कितने प्रयास करता है
कभी-कभी जर्जर मकान आने वाली
समय की गति में बह जाता है
और कभी-कभी जर्जर मकान को बचाने वाला
उसे उसे बरसात में बचा ले जाता है
मकान को देखकर उसके चारों तरफ के लोग
कुछ पल के लिए प्रसन्न भी हो जाते हैं
क्योंकि विरासत को बचाने में
वह सफल होता अपने को पाते हैं
और जर्जर हो चुका मकान भी यह
देखकर खुश प्रसन्न हो जाता है
कि जिनको उसने छत दिया छाया दिया
उनको अपने लिए जीता पाता है
बस बरसात और जर्जर मकान का
यह खेल चलता ही रहता है
यही संबंधों का ताना है यही संबंधों का बाना है
कभी आंसुओं की धार है
कभी खुशियों की झंकार है
यही सोचकर हर कोई प्रकृति के आनंद में
बरसात से बचने के लिए पहले घर बनाता है
फिर उस घर को गिरने से बचाने के लिए
घर को बहुत से हाथ दे जाता है
जो आने वाले कल में बरसात से
अपने को भी बचाने में सफल रहेंगे
बाढ़ जो बहा कर ले जाती घर को
हर व्यक्ति को और सब कुछ
वह जर्जर मकान में हंसकर जीते रहेंगे

डॉ आलोक चांटिया रजनीश