फूल का दोष
डॉ आलोक चांटिया रजनीश
फूल सड़क पर क्या गिर गया
उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया
गलती से ले जाने वाले की थी
पर सजा एक फूल को दे दिया गया
फूल सड़क पर क्या गिरा
उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया
कल जब वह बीज के रूप में
मिट्टी के साथ ही मिलकर फूटा था
निकला था और अपने होने का
अर्थ समझाया था
तभी तो दुनिया का आदमी उसके
रंग रूप को समझ पाया था
पर आज इस मिट्टी में गिरे हुए
फूल को लोग मंदिर नहीं ले जाएंगे
क्योंकि गिरे हुए फूल को भला कहां
भगवान को समर्पित कर पाएंगे
भगवान जिसने सभी को बनाया है
इस पृथ्वी पर एक-एक
फूल पत्ता प्राणी उगाया है
उस भगवान से एक
फूल दूर हो जाया जाएगा
क्योंकि जमीन में गिरकर
जमीन से उगने वाला फूल
भला भगवान का साथ कहां पाएगा
केवल गिर जाने भर से
जिस फूल का जीवन ही
दलित का हो गया है
उस मानव के जीवन में क्या समझना
क्या से क्या हो गया है
फूल चुपचाप दूर सड़क पर पड़ा रहकर
भगवान को देखता रहा
शायद यह पूछता भी रहा
कि जिस मिट्टी से निकलकर
वह फूल बना है
उसी मिट्टी में गिरकर वह
भगवान से दूर खड़ा है
यह जीवन का कौन सा दर्शन
फूल को देखना पड़ रहा है
चाहकर भी वह अपने
भगवान पर नहीं चढ रहा है
पाप पुण्य के खेल में वह
समझ ही नहीं पाया है
कि उसने कोई गलती की है
या मानव ने अपने कर्मों का फल पाया है
एक फूल को भगवान तक
कहां पहुंचा पाया है
प्रगति सभ्यता संस्कृति की कहानी में
क्या मानव होने का बस
इतना ही दर्शन सामने आया है
शायद फूल यही नहीं समझ पाया है
डॉ आलोक चांटिया रजनीश



