घर का सच
— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
हर वह व्यक्ति
गरीब, लाचार और बेचारा कहलाने लगता है,
जिसके जीवन में
चारदीवारी और एक छत वाला घर
सिर्फ एक सपना बनकर रह जाता है।
इस संसार में
अक्सर आदमी का कद
उसके घर के कद से मापा जाता है।
जिन घरों की दीवारें ऊँची होती हैं,
उनके भीतर प्रवेश करने की
हैसियत भी हर किसी की नहीं होती।
उनके विशाल द्वार तक पहुँचने का साहस
सबके हिस्से में कहाँ आता है!
और जिनके हिस्से में
बौने, ठिगने, अविकसित
और छोटे-छोटे घर आते हैं,
वे जीवन भर
अपने सपनों को भी
दीवारों के बीच समेटना सीख जाते हैं।
उनके घरों में
बस इतना-सा अहसास बचा रहता है
कि सिर ढकने के लिए
एक छोटी-सी छत तो है,
पर खुला आकाश
उनकी नियति नहीं।
घर की इसी कहानी में उलझा मनुष्य
एक और घर को भूल जाता है—
वह घर,
जिसमें उसका मस्तिष्क,
हृदय,
फेफड़े,
यकृत (लीवर),
गुर्दे (किडनी)
और जीवन की हर धड़कन निवास करती है।
वह यह सोचने का समय भी नहीं निकाल पाता
कि उसके शरीर के इन निवासियों को
क्या चाहिए,
क्या नहीं चाहिए,
किस भोजन से वे स्वस्थ रहेंगे,
किस जीवनशैली से
यह शरीर रूपी घर अधिक
समय तक सुरक्षित रहेगा।
विडंबना यह है कि
दूसरों के लिए चिंतित रहने वाला मनुष्य
परोपकारी कहलाता है,
लेकिन अपने ही शरीर रूपी घर का
सबसे बड़ा भस्मासुर बन जाता है।
सच तो यह है कि
मनुष्य अपने शरीर के कारण
न अमीर कहलाता है,
न सम्राट।
फिर भी वह स्वयं को
सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है।
शायद इसलिए कि
वह ईंट, पत्थर और मिट्टी से बने घर को
अपना सर्वस्व समझ लेता है,
और उस जीवित घर को भूल जाता है
जिसके बिना
न कोई मकान अपना है,
न कोई संसार।
जिस दिन मनुष्य
शरीर रूपी घर और मिट्टी के घर
दोनों के महत्व का संतुलन सीख लेगा,
उसी दिन वह समझ पाएगा
कि वास्तविक समृद्धि
दीवारों की ऊँचाई में नहीं,
जीवन की गहराई में बसती है।
— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


