Tuesday, April 7, 2026

फूल का दोष डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 फूल का दोष 


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


फूल सड़क पर क्या गिर गया

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

गलती से ले जाने वाले की थी

पर सजा एक फूल को दे दिया गया

फूल सड़क पर क्या गिरा

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

कल जब वह बीज के रूप में

मिट्टी के साथ ही मिलकर फूटा था

निकला था और अपने होने का

अर्थ समझाया था

तभी तो दुनिया का आदमी उसके

रंग रूप को समझ पाया था

पर आज इस मिट्टी में गिरे हुए

फूल को लोग मंदिर नहीं ले जाएंगे

क्योंकि गिरे हुए फूल को भला कहां

भगवान को समर्पित कर पाएंगे

भगवान जिसने सभी को बनाया है

इस पृथ्वी पर एक-एक

फूल पत्ता प्राणी उगाया है

उस भगवान से एक

फूल दूर हो जाया जाएगा

क्योंकि जमीन में गिरकर

जमीन से उगने वाला फूल

भला भगवान का साथ कहां पाएगा

केवल गिर जाने भर से

जिस फूल का जीवन ही

दलित का हो गया है

उस मानव के जीवन में क्या समझना

क्या से क्या हो गया है

फूल चुपचाप दूर सड़क पर पड़ा रहकर 

भगवान को देखता रहा

शायद यह पूछता भी रहा

कि जिस मिट्टी से निकलकर

वह फूल बना है

उसी मिट्टी में गिरकर वह

भगवान से दूर खड़ा है

यह जीवन का कौन सा दर्शन

फूल को देखना पड़ रहा है

चाहकर भी वह अपने

भगवान पर नहीं चढ रहा है

पाप पुण्य के खेल में वह

समझ ही नहीं पाया है

कि उसने कोई गलती की है

या मानव ने अपने कर्मों का फल पाया है

एक फूल को भगवान तक

कहां पहुंचा पाया है

प्रगति सभ्यता संस्कृति की कहानी में

क्या मानव होने का बस

इतना ही दर्शन सामने आया है

शायद फूल यही नहीं समझ पाया है


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Thursday, April 2, 2026

मेरे पास शब्दों के सिवा कुछ भी नहीं डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

मेरे पास शब्दों के सिवा ,
कुछ भी नहीं है ,
कुछ लोग कहते हैं कि ,
इससे बड़ा कुछ भी नहीं है ,
मैं सिर्फ तुमको दे सकता हूं ,
इन्हीं को जी भर के ,
तुम चाहो तो इससे नहा कर ,
अपने को ताजा कर लो ,
और जीवन के कुछ अर्थ ,
तुम भी अपने मुट्ठी में भर लो ,
मुझे नहीं मालूम मेरे शब्दों को,
देखकर तुम हंसते हो ,
रोते हो ,गाते हो या पागल समझकर ,
आगे निकल जाते हो,
मैंने तो सीखा है सिर्फ जो भी ,
तुम्हारी मुट्ठी में है ,
उसे देते चले जाओ ,
एक पल भी यह मत सोचो कि,
देने के बाद तुम क्या पाओ?
इस पृथ्वी पर जो भी ,
तुमको मिल रहा है ,
तुम्हारे अंदर उर्जा का ,
जो संचार खिल रहा है ,
वह सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं बना है !
उन्हें अपने जरूरत के अनुसार ,
प्रयोग करके इसी दुनिया में ,
वापस करके जाना है,
इसी का नाम जीवन है ,
और इसी का नाम ,
मानव का जीवन पाना है ,
इसीलिए मेरे शब्दों से अगर,
तुम नहाना चाहते हो ,
और जीवन के कुछ स्वर ,
संगीत की तरह सुन जाना चाहते हो ,
तो मेरे शब्दों को गीता, रामायण ,
कुरान, भागवत, बाइबल,
समझकर सुनकर ,
अपने मतलब का उसमें से चुनकर,
थोड़ा सा मुस्कुराने की तरफ चले जाओ, आओ आओ मेरे पास,
जो शब्द रखे हैं, पड़े हैं ,
जिन्हें मैंने सजा कर रखा है,
उनको तुम भी थोड़ा सा ले जाओ ,
क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म होते हैं ,
और उनके अर्थ कभी भी ,
कहां कम होते हैं ,
बस यही तुम अगर समझ जाओ ,
तो दुनिया की हर संपत्ति से ज्यादा,
मेरे अर्थ को तुम भर भर के ले जाओ ,
तुम भर भर के ले जाओ ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

Sunday, March 15, 2026

मिट्टी से शरीर बना होता है डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

मिट्टी से यह शरीर बना होता है,
यह तथ्य किसे नहीं पता होता है,
लेकिन मिट्टी में नंगे पांव चलना,
कब किस प्रिय होता है ?
मिट्टी ना होती तो पृथ्वी पर ,
जीवन का अर्थ हम जान ही ना पाते,
हमारे घरों में आलू टमाटर आम फूल,
भला आलोक कैसे आते ?
मिट्टी को मुट्ठी में लेकर हम ,
अक्सर सौगंध खाते हैं ,
तभी तो किसी देश के,
हम होकर रह जाते हैं ,
पर मिट्टी शरीर पर लग जाए तो,
हम यह सारे दर्शन भूल जाते हैं ,
हर पल बस अपने को ,
साफ करने में लगे रह जाते हैं ,
कितना भी अच्छा करके मिट्टी,
हमारे दिल में कभी बस नहीं पाती है,
उसके हिस्से में तो पांव की ,
सहभागिता एक दबाव बनकर आती है,
जो जितना करके इस दुनिया में,
अमर हो जाना चाहता है ,
उसके भी हिस्से में मिट्टी का ही ,
स्वर शेष रह जाता है,
हर कोई पूछता है कि तुमने,
मेरे लिए किया तो क्यों किया?
क्या कभी हमसे पूछ कर,
तुमने हमें कुछ दिया,
तुम्हें मन था इसलिए तुमने,
सब कुछ कर डाला है,
बस यही दर्शन का शेष है,
और अवशेष जीवन पथ पर ,
भावनाओं का हाला है ,
मिट्टी को मां बनाकर क्या मिल पाया?
क्या यह सत्य किसी को,
कभी किसी पल समझ में आया?
आलोक चांटिया रजनीश

Saturday, March 14, 2026

दर्द तुम्हारा भी मैं पहचानता हूं,- आलोक चांटिया रजनीश


 

दर्द तुम्हारा भी मैं पहचानता हूं,
अनकही कहानी मैं ,
तुम्हारी भी जानता हूं ,
मिट्टी के साथ जुड़कर भी स्पष्ट,
तुम पानी का ढूंढते रहते हो ,
पर भला अपनी सूनी आंखों से ,
यह बात किससे कहते हो,
सिर्फ एक इंतजार उन हाथों का,
या उस भगवान का जो ,
प्रकृति के सहारे तुम तक ,
दो बूंद पहुंच जाए ,
और तुम्हें भी जीवन का अर्थ ,
थोड़ा ही सही लेकिन समझ में आए, एक स्पर्श ही तो है,
पानी का तुम्हारे साथ ,
नहीं तो मिट्टी प्रकाश वायु ,
सब तो तुम्हारे साथ ही रहते हैं ,
लेकिन तुम्हारा अंतस में तो,
सिर्फ सरसतत का वह बीज,
जो पानी का इंतजार करते हैं ,
उन्हीं को स्पर्श करने को,
छूने को तरसते रहते हैं ,
जब भी तुम पानी का ,
स्पर्श कर जाते हो,
तुम पौधे कहां रहते हो,
तुम फल फूल खिली हुई ,
पत्तियों के सौंदर्य बन जाते हो ,
तुम्हें आज सूखा हुआ देखकर,
मैं तुम्हारी वेदना को समझ गया हूं, 

पानी तुम्हारे जीवन में नहीं है,
यह भी समझ गया हूं ,
प्रेम का अर्थ सरसता में ही तो रहता है,
पर जगत का यही सच,
भला कौन किससे कहता है ,
सभी मिथ्या बातों में लगे रहते हैं,
पर एक बूंद सरसता की,
एक बार भी नहीं कहते हैं,
इसीलिए पौधा, हृदय
सब कुछ,सूख जाता है ,
जब अपने जीवन में एक बूंद,
पानी और सरसता को नहीं पाता है, 

क्या मानव को यह दर्शन,
जो सच बनकर बह रहा है,
कभी भी समझ में आता है ,
या वह इसके करीब भी हो पाता है? 

आलोक चांटिया रजनीश

Friday, March 13, 2026

मैं क्यों नहीं समझ पाया डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 कोई भी कभी भी

साथ नहीं आया

जब भी पलट कर देखा

खुद को अकेला पाया

पर हार नहीं सोचा

संसार में आने के लिए

मैं करोड़ के साथ चला था

मैं तो सिर्फ अकेला था

जो मां के गर्भ में

अपना अस्तित्व था पाया

वहां के निरंतर युद्ध में

मुझे अपने होने का

अर्थ दिखाना था

मां के हिस्से को

खुद के लिए पाना था

छोटी सी आयु

अस्तित्व का खतरा

सब कुछ जानकार भी

मैं कितनी बार

मां से टकराया था

तब जाकर गर्भ के

अंधेरों में मैंने अपना

यह अस्तित्व पाया था

फिर स्वीकारा सभी ने था

प्रसव पीड़ा के इंतजार में

हर कोई था

और एक दिन सबको

मैंने सुनाई भी थी

अपने किलकारी की कहानी

मैं कोई स्वर नहीं था

उस कहानी का जिसमें थे

राजा और रानी

जब उस अनंत पथ पर

मैं अकेला चला आया

तो फिर क्यों सोचता हूं

आज मैंने अपने को अकेला पाया 

जब भी पलट कर देखा

कोई भी पीछे नहीं था आया

यह सोच मुझे उस लड़ाई से

बार-बार क्यों दूर ले जाती है

जो मैंने गर्भ के अंधेरे में

अपने अस्तित्व के लिए लड़ा था

और यह सुंदर सा

जीवन था पाया

मैं पलट कर क्यों देखता हूं

मैं कितना अकेला हूं

और कौन है जो मेरे संग आया

एको अहं द्वितीयो नास्ति के

सिद्धांत पर चलने की

हिम्मत क्यों अब नहीं रह रही है 

भगवान भी होता है

इसको क्यों नहीं समझ पाया

अपनी सफलता की कहानी

अतीत में अस्तित्व के संघर्ष को

मैं क्यों भूल पाया

मैं मानव हूं मैं राम हूं

कृष्णा हूं ईसा हूं मूसा हूं

इतना सस भी क्यों नहीं समझ पाया 

पलट कर क्यों देखता हूं

मैं अकेला हूं और

मेरे संग कौन आया

आलोक चांटिया रजनीश


Wednesday, March 11, 2026

सत्य का शब्दार्थ आलोक चांटिया "रजनीश"

 


सत्य का शब्दार्थ

आलोक चांटिया "रजनीश"



एक मिट्टी जिस बीज को,

 उसके अस्तित्व के होने का,

 आभास कराती है,

उसके अंदर की सारी प्रतिभा को,

अंकुरित करके इस,

 संसार में सामने लाती है,

 पर वह बीज भी अपनी ,

सुषुप्त क्षमताओं के प्रदर्शन के बाद भला,

 कब मुड़ कर उस जमीन की ओर मुडता है,

या फिर अपनी हरी फूल पत्ती,

छाया के साथ उस मिट्टी से जुड़ता है?

वह तो मिट्टी को सिर्फ,

 अपने अस्तित्व को ,

बचाने का काम दे जाता है ,

अपने पीछे अपनी जड़ को,

मिट्टी में छोड़ जाता है,

मिट्टी उस बीज के होने के ,

एहसास में जड़ को,

 पकड़े रह जाती है,

और बीज की जीवन में,

 उसके विशाल वृक्ष होने की,

 कहानी चलती जाती है,

संसार जब भी देखता है तो,

उस वृक्ष को ही देखता है,

उसकी प्रशंसा करता है,

उसकी छाया का आनंद लेता है,

उससे हवन की संमिधा भी,

 एकत्र कर लेता है ,

पर संसार उस मिट्टी को,

 कभी नमन नहीं करता है,

जिसके सहारे बीज वृक्ष,

बनने की यात्रा पूरी करता है,

बस ऐसे ही जीवन की,

कहानी चलती रहती है,

जो किसी को भी आगे बढ़ाने का,

कार्य आलोक यहां पर करता है,

वह मिट्टी की तरह सबके,

सामने भी होता है,

पर गुमनाम सा ही मरता है।

पर गुमनाम सा ही मरता है।


Thursday, March 5, 2026

बीज का अकेलापन— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"

 

बीज का अकेलापन

एक बीज की स्वतंत्रता,

जमीन के अंधेरे में खो जाती है,

मिट्टी की चुप तहों में उसकी

पहली सांस ही सो जाती है।

वह अकेला है —

पर हार मानना उसे आता नहीं,

जड़ कह दे संसार भले,

वह जड़ होकर भी ठहरता नहीं।

धरती के गहरे अंधकार से

वह प्रतिरोध रचता है,

मौन में छिपे साहस से

हर बंद दरवाज़ा कचोटता है।

कहते हैं उसे जड़ सभी,

निष्प्राण, मौन, हारा हुआ—

पर भीतर उसका स्वप्न

अभी भी है अंगारा हुआ।

वह लड़ता है मिट्टी से,

वह लड़ता है रात से,

वह जूझता है अपने ही

भीतर के हर आघात से।

और एक दिन —

जड़ों की ताकत लेकर,

धरती की छाती चीर,

वह बाहर आता है बढ़कर।

पहली बार फिर से

सूरज को देख पाता है,

किरणों की उंगलियों से

जीवन को छू पाता है।

पर क्या संघर्ष यहीं थमता है?

नहीं — कहानी यहीं नहीं रुकती,

वह अपनी जड़ों से बंधा हुआ,

मिट्टी में ही अपनी नियति लिखती।

वह फिर भी बढ़ता जाता है,

अकेलेपन को पीछे छोड़ने को,

ऊपर, और ऊपर उठता है

आकाश को थोड़ा-सा तोड़ने को।

समय बीतता है —

वह पौधा कहलाता है,

टहनियों की भुजाएँ फैलाकर

पत्तों से भर जाता है।

फिर एक दिन

समाज उसे पेड़ कहता है,

उसकी छाया में थका पथिक

अपना माथा सहलाता है।

उस पर पक्षी घर बनाते हैं,

किसी को लकड़ी मिल जाती है,

किसी को फल, किसी को आस,

किसी की दुनिया बस जाती है।

पर जो आज विशाल वृक्ष है,

वह याद करे तो जानता है—

अपने अकेलेपन से लड़कर ही

वह इतना बड़ा बन पाता है।

और अंत में क्या उसके हिस्से?

ऊपर जाना फिर रुक जाता है,

एक ऊँचाई के बाद वृक्ष

आकाश नहीं छू पाता है।

वह चुपचाप खड़ा रहता है,

परिस्थितियों से समझौता कर,

संघर्ष में जो भी पाया था,

उसी को जीवन मानकर।

छाया, भोजन, आश्रय देकर

दुनिया को वह जीता है,

पर भीतर कहीं अकेलापन

अब भी मौन संगीत-सा रीता है।

वह अक्सर हवा से कहता है —

“जब जीवन तुम्हें भी अकेला करे,

जब विरोध के स्वर में

सब कुछ तुमसे ले ले जगत भरे,

तब हार मत मानना तुम,

भले ही सब कुछ खो जाए,

अपने भीतर एक बीज रोपना,

जो वृक्ष बनकर सो जाए।

अकेलापन शाप नहीं,

संघर्ष का प्रथम चरण है,

जमीन के अंधेरे से ही

उगता उजला जीवन है।”

पर प्रश्न अभी भी बाकी है —

क्या कोई मनुष्य समझ पाता है?

बीज के इस मौन युद्ध को

क्या कोई पढ़ पाता है?

धरती के अंधेरे से उठकर

जो वृक्ष विशाल बन जाता है,

क्या कोई उसके अकेलेपन का

मूल्य कभी जान पाता है?

— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"