Thursday, May 14, 2026

पैसे का अँधियारा — डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

पैसे का अँधियारा

— डॉ आलोक चांटिया रजनीश

मुट्ठी में जब पैसा आया,
मन का दीपक बुझता पाया,
चेहरों पर अँधियारा उतरा,
हर रिश्ता भी धुंधलाया।

अब न किसी को राह उजाली,
सबको अपनी पड़ी निराली,
सच्चे मन की बात करो तो,
हो जाती आवाज़ ख़ाली।

सुनकर भी सब मौन खड़े हैं,
पैसे के बस खेल बड़े हैं,
रिश्तों की बातें सुनते ही,
चेहरों पर संदेह पड़े हैं।

जब खुद का खर्चा भारी है,
जीवन की पीड़ा जारी है,
कौन किसी की बात सुनेगा,
सबकी अपनी लाचारी है।

बस यह सोच मनुज चुप रहता,
भीतर-भीतर दुख को सहता,
कोई अपना बिछुड़ भी जाए,
आँसू पीकर जीवन ढोता।

कोई लावारिस मर जाता,
कोई तन्हा जलता जाता,
श्मशान किनारे हर चेहरा,
लकड़ी का मूल्य बतलाता।

आत्मा-परमात्मा की बातें,
चलती रहती दिन और रातें,
पर जब अंतिम समय सामने,
जेबें पहले खुलती पाते।

हर मानव यह बोझ लिए है,
जीते-जी सौ मौत जिए है,
पैसों की इस अंधी दौड़ में,
अपना ही विश्वास पिए है।

मर-मर कर जीने की आदत,
सबने जैसे ओढ़ी राहत,
भीतर राख दबाए बैठे,
खो दी मन की सारी चाहत।

जिंदा होकर भी सब पत्थर,
सूनी आँखें, भीतर बंजर,
दर्द किसी का सुनते लेकिन,
मन रहता हिसाबों के घर।

पूछेंगे — “क्या दर्द तुम्हारा?”
फिर होगा चेहरा बेचारा,
जान गए हैं बात बढ़ी तो,
आएगा पैसों का धारा।

“अपने दुख क्या कम हैं भाई?”
कहकर दुनिया आँख चुराई,
इसीलिए अब लोग मनुज से,
धीरे-धीरे दूरी पाई।

घर-आँगन संवाद नहीं है,
रिश्तों में वह स्वाद नहीं है,
इसीलिए अब लोग यहाँ पर,
इंसानों पर विश्वास नहीं है।

कुत्तों में अपनापन पाकर,
मनुष्य स्वयं से हार गया,
पैसे के इस अँधे युग में,
मानव भीतर मार गया।

मैं संस्कृति मानव हूँ — डॉ आलोक चांटिया रजनीश

मैं संस्कृति मानव हूँ

— डॉ आलोक चांटिया रजनीश

कब अपने कितनी दूर हुए,
यह कोई जान न पाता है,
जो कल तक थे बिल्कुल अपने,
वक़्त उन्हें बहा ले जाता है।

मैं भी इक मीठी भूल लिए,
हर रिश्ते को अपना समझा,
क्या तेरा है, क्या मेरा है,
सबको ही मैंने घर समझा।

सोचा था जब मन चाहेगा,
अपनी बातें कह जाऊँगा,
जैसे कल तक सुनते थे सब,
वैसे ही अब भी पाऊँगा।

पर सूरज डूबा, फिर निकला,
फिर निकला और फिर डूब गया,
इन आते-जाते मौसम में,
मेरा भी बचपन छूट गया।

गलतफ़हमी तब टूट गई,
जब सच का चेहरा सामने था,
हर कोई अपने घर में था,
हर कोई अपने दायरे में था।

कोई पत्नी में डूबा था,
कोई बच्चों में खोया था,
अपने छोटे से सुख में ही,
हर रिश्ता जैसे सोया था।

सब अपने दुख गिनवाते थे,
सब अपनी गाँठें खोल रहे,
और मैं अपने सूने मन में,
कुछ टूटे सपने ढो रहा।

अब अक्सर मेरे शब्द सभी,
मुझ तक वापस आ जाते हैं,
जब बच्चों से कुछ कहता हूँ,
चेहरे क्यों बदल से जाते हैं।

वे धीरे से कह देते हैं—
“अब बच्चों को मत टोका कीजिए,
आप अपने हैं, लेकिन बस
उन्हें अपने जैसा रहने दीजिए।”

किसी का बच्चा रूठ गया,
माँ ने उससे कुछ कह डाला,
कोई घर आकर चुप बैठा,
मन ने भीतर दर्द उछाला।

कोई बोला— “मामा आए”,
कोई बोला— “साए हैं”,
हर चेहरे की मुस्कानों में,
अपने-अपने सन्नाटे हैं।

तब आकर यह जान सका,
मैं वैसा मानव अब न रहा,
जो केवल प्रकृति में जीता,
मन से बिल्कुल सरल रहा।

मैं संस्कृति का मानव हूँ,
रिश्तों को लेकर चलता हूँ,
सूखी हुई संवेदनाओं में,
थोड़ा अपनापन भरता हूँ।

मैं अब भी मिलने जाता हूँ,
हालाँकि मन घबराता है,
इस तेज़ समय की दुनिया में,
अपनापन कम पड़ जाता है।

फिर भी रिश्तों की चौखट पर,
मैं दीप स्नेह का धरता हूँ,
क्योंकि अभी तलक इस जग में,
मैं संस्कृति मानव रहता हूँ।

 

Thursday, May 7, 2026

दर्द में भीगा हुआ जब भी मैं निकलता हूं- डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

दर्द में भीगा हुआ
जब भी मैं निकलता हूं
बहती हुई पानी की बूंद में
जब भी विकलता हूं
कितना सुंदर मैं लगता हूं
यह तुम अच्छी तरह से जानते हो
सच कहूं तो मानते भी हो
क्योंकि मेरी आह सुनकर ही
तो तुमको आनंद आता है
जब एक कतरा दर्द बहकर
तुम्हारे हाथों में रह जाता है
तुम्हें एहसास भी हो जाता है
कि तुम पूर्णता के पथ पर खड़े हो
भले ही कितने हताश निराश
और शून्य में पड़े हो
कोई विकल्प भी तो नहीं पाते हो
जब दर्द को सूखता हुआ
हवाओं के साथ पाते हो
दर्द की पपड़ियां जब उखड़कर
हवा में उड़ने लगती हैं
तब भी कहां किसी की आंखें जगती हैं
सब सोचते हैं जरूर इसके अंदर से
फिर कोई कल फूट रहा होगा
जो आज था वह फिर से छूट रहा होगा
बस दर्द की यही कहानी तो
मुझ में तुम में हर किसी में दिखाई देती है
दर्द की भीगी हुई छाती
अक्सर अंधेरे में सुनाई देती है
पर तुमने तो वह पाठ भी पढ़ लिया है
कि दर्द देकर ही प्रसव वेदना के बाद

 किलकारी गूंजा करती हैं
कोई पौधे की पत्तियां तभी निकलती हैं
जब कोई मिट्टी किसी कुदाली से
घायल बार-बार की जाती हैं
इसीलिए दर्द देखकर अब
तुम मुस्कुराने की दर्शन में रहने लगे हो
कोई तोड़ ना सके कोई मोड ना सके
और दर्द में भीगे हुए उसे तन को
कोई देख ना सके शायद इसीलिए
कुछ इस तरह से रहने लगे हो
मेरे मुस्कुराने का अर्थ सिर्फ
दर्द में भीगा तन ही जान पाता है
दर्द का शोर पहाड़ से निकलती हुई एक
नदी को भी प्रकृति की
सुंदरता बना देता है
भला कब कौन एक टूटे पत्थर में
एक मूर्ति को निकल पाएगा
इसीलिए छीनी हथौड़े के साथ
लोग निरंतर रहने लगे हैं
क्योंकि तभी तो जो वह चाहते हैं
उसे निकाल पाएंगे
भला वे लोग दर्द को छोड़कर
तुम्हें मुस्कुराहट कैसे दे जाएंगे
इसीलिए तुम्हारा मुस्कुराना
मेरा मुस्कुराना जरूरी हो गया है
क्योंकि दर्द के साथ कोई अंजना सा
रिश्ता चुपचाप मेरे भीतर सो गया है
इसीलिए जब स्वप्न में वह दर्द
मेरे भीतर जाग जाता है
तो मेरा तन उस दर्द से भीग जाता है
जिसे देखकर तुम मेरी तरुणाई
यौवन को नोच लेना चाहते हो
शायद तुम भी दर्द क्या होता है
इसे जान लेना चाहते हो
इसे जान लेना चाहते हो
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

Monday, April 20, 2026

कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन


 कल जो फूल भगवान पर चढ़ा था,


 आज वह सड़क के किनारे पड़ा था, 


कितना फूला नहीं समा रहा था ,


 किसी को कुछ समझ भी नहीं पा रहा था,


क्योंकि उसे भगवान पर चढ़ाया जाएगा ,


और उसका स्थान भी उतना ही ऊंचा हो जाएगा,


पर कहां जानता था कि जिस संसार में,


वह भगवान तक पहुंचने की चाहत में, 


किसी के हाथ में लिया गया है ,


वहीं दूसरे दिन उसको भगवान के,


 प्रतिमा से निकाल कर सड़क पर फेंक गया है,


फूल का यह दर्शन कहां,


कोई भी समझ पाता है ,


हर कोई बस अपनी गुमान में यहां आता है,


कहता भी है कि तुम्हारी हैसियत क्या है ?


तुम क्या जानो मैं क्या हूं ?


मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं ?


मैं चंद मिनट में तुम्हें मिटा सकता हूं, 


पर वह स्वयं यह नहीं जानता है,


कि आज जिस ऊंचाई पर पहुंचकर,


 वह इतने बड़े-बड़े शब्द को बोले जा रहा है,


कल वह खुद फूल की तरह,


वहां से उतार भी लिया जाएगा,

और अकेलेपन, अंधेरे में ,


चुपचाप बैठा दिया जाएगा ,


जहां वह स्वयं अपने ,


अस्तित्व को ढूंढने की कोशिश करेगा, 


हो सकता है कभी वह उदासी में,


तो कभी किसी वृद्ध आश्रम में मरेगा


पर जब उर्जा शरीर में बहती है,


तो कहां किसी को कुछ समझती है?


और कहती है फूलों की इस कहानी को,


जो स्वयं आदमी ही रोज ,


भगवान पर चढ़ा कर लिखता है,


पर क्या कभी उसका यह दर्शन,

उसके चेहरे पर ,


उसके व्यवहार में किसी को दिखता है?


डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, April 7, 2026

फूल का दोष डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 फूल का दोष 


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


फूल सड़क पर क्या गिर गया

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

गलती से ले जाने वाले की थी

पर सजा एक फूल को दे दिया गया

फूल सड़क पर क्या गिरा

उसे मंदिर जाने से ही रोक दिया गया

कल जब वह बीज के रूप में

मिट्टी के साथ ही मिलकर फूटा था

निकला था और अपने होने का

अर्थ समझाया था

तभी तो दुनिया का आदमी उसके

रंग रूप को समझ पाया था

पर आज इस मिट्टी में गिरे हुए

फूल को लोग मंदिर नहीं ले जाएंगे

क्योंकि गिरे हुए फूल को भला कहां

भगवान को समर्पित कर पाएंगे

भगवान जिसने सभी को बनाया है

इस पृथ्वी पर एक-एक

फूल पत्ता प्राणी उगाया है

उस भगवान से एक

फूल दूर हो जाया जाएगा

क्योंकि जमीन में गिरकर

जमीन से उगने वाला फूल

भला भगवान का साथ कहां पाएगा

केवल गिर जाने भर से

जिस फूल का जीवन ही

दलित का हो गया है

उस मानव के जीवन में क्या समझना

क्या से क्या हो गया है

फूल चुपचाप दूर सड़क पर पड़ा रहकर 

भगवान को देखता रहा

शायद यह पूछता भी रहा

कि जिस मिट्टी से निकलकर

वह फूल बना है

उसी मिट्टी में गिरकर वह

भगवान से दूर खड़ा है

यह जीवन का कौन सा दर्शन

फूल को देखना पड़ रहा है

चाहकर भी वह अपने

भगवान पर नहीं चढ रहा है

पाप पुण्य के खेल में वह

समझ ही नहीं पाया है

कि उसने कोई गलती की है

या मानव ने अपने कर्मों का फल पाया है

एक फूल को भगवान तक

कहां पहुंचा पाया है

प्रगति सभ्यता संस्कृति की कहानी में

क्या मानव होने का बस

इतना ही दर्शन सामने आया है

शायद फूल यही नहीं समझ पाया है


डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Thursday, April 2, 2026

मेरे पास शब्दों के सिवा कुछ भी नहीं डॉ आलोक चांटिया रजनीश


 

मेरे पास शब्दों के सिवा ,
कुछ भी नहीं है ,
कुछ लोग कहते हैं कि ,
इससे बड़ा कुछ भी नहीं है ,
मैं सिर्फ तुमको दे सकता हूं ,
इन्हीं को जी भर के ,
तुम चाहो तो इससे नहा कर ,
अपने को ताजा कर लो ,
और जीवन के कुछ अर्थ ,
तुम भी अपने मुट्ठी में भर लो ,
मुझे नहीं मालूम मेरे शब्दों को,
देखकर तुम हंसते हो ,
रोते हो ,गाते हो या पागल समझकर ,
आगे निकल जाते हो,
मैंने तो सीखा है सिर्फ जो भी ,
तुम्हारी मुट्ठी में है ,
उसे देते चले जाओ ,
एक पल भी यह मत सोचो कि,
देने के बाद तुम क्या पाओ?
इस पृथ्वी पर जो भी ,
तुमको मिल रहा है ,
तुम्हारे अंदर उर्जा का ,
जो संचार खिल रहा है ,
वह सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं बना है !
उन्हें अपने जरूरत के अनुसार ,
प्रयोग करके इसी दुनिया में ,
वापस करके जाना है,
इसी का नाम जीवन है ,
और इसी का नाम ,
मानव का जीवन पाना है ,
इसीलिए मेरे शब्दों से अगर,
तुम नहाना चाहते हो ,
और जीवन के कुछ स्वर ,
संगीत की तरह सुन जाना चाहते हो ,
तो मेरे शब्दों को गीता, रामायण ,
कुरान, भागवत, बाइबल,
समझकर सुनकर ,
अपने मतलब का उसमें से चुनकर,
थोड़ा सा मुस्कुराने की तरफ चले जाओ, आओ आओ मेरे पास,
जो शब्द रखे हैं, पड़े हैं ,
जिन्हें मैंने सजा कर रखा है,
उनको तुम भी थोड़ा सा ले जाओ ,
क्योंकि शब्द ही तो ब्रह्म होते हैं ,
और उनके अर्थ कभी भी ,
कहां कम होते हैं ,
बस यही तुम अगर समझ जाओ ,
तो दुनिया की हर संपत्ति से ज्यादा,
मेरे अर्थ को तुम भर भर के ले जाओ ,
तुम भर भर के ले जाओ ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

Sunday, March 15, 2026

मिट्टी से शरीर बना होता है डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

मिट्टी से यह शरीर बना होता है,
यह तथ्य किसे नहीं पता होता है,
लेकिन मिट्टी में नंगे पांव चलना,
कब किस प्रिय होता है ?
मिट्टी ना होती तो पृथ्वी पर ,
जीवन का अर्थ हम जान ही ना पाते,
हमारे घरों में आलू टमाटर आम फूल,
भला आलोक कैसे आते ?
मिट्टी को मुट्ठी में लेकर हम ,
अक्सर सौगंध खाते हैं ,
तभी तो किसी देश के,
हम होकर रह जाते हैं ,
पर मिट्टी शरीर पर लग जाए तो,
हम यह सारे दर्शन भूल जाते हैं ,
हर पल बस अपने को ,
साफ करने में लगे रह जाते हैं ,
कितना भी अच्छा करके मिट्टी,
हमारे दिल में कभी बस नहीं पाती है,
उसके हिस्से में तो पांव की ,
सहभागिता एक दबाव बनकर आती है,
जो जितना करके इस दुनिया में,
अमर हो जाना चाहता है ,
उसके भी हिस्से में मिट्टी का ही ,
स्वर शेष रह जाता है,
हर कोई पूछता है कि तुमने,
मेरे लिए किया तो क्यों किया?
क्या कभी हमसे पूछ कर,
तुमने हमें कुछ दिया,
तुम्हें मन था इसलिए तुमने,
सब कुछ कर डाला है,
बस यही दर्शन का शेष है,
और अवशेष जीवन पथ पर ,
भावनाओं का हाला है ,
मिट्टी को मां बनाकर क्या मिल पाया?
क्या यह सत्य किसी को,
कभी किसी पल समझ में आया?
आलोक चांटिया रजनीश