Sunday, July 19, 2026

पत्थरों से पहले इंसान डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

 

पत्थरों से पहले इंसान

डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन

सोने के सिंहासन चमकते हैं, दीपों का अनंत उजास,
बाहर भूखे बच्चे पूछ रहे, कब आएगा उनका प्रकाश।

घंटों तक आरती गूँज रही, गगन छूते जयकार,
सूनी आँखों में रोटी ढूँढ़े, जीवन का बेबस संसार।

चाँदी के कलश सजे हुए हैं, फूलों का अंबार,
बिना दवा के तड़प रहा है, चौखट पर बीमार।

मखमल की चादर ओढ़े हैं, श्रद्धा के सब द्वार,
सर्द हवाओं में काँप रही, माँ की बूढ़ी देह लाचार।

दानपात्र में लाखों गिरते, गूँज रहा सत्कार,
मेहनत करने वाले हाथों का, क्यों होता तिरस्कार?

प्रेम, दया और धर्म की बातें, हर मंच देता ज्ञान,
लेकिन घर के अपने रिश्तों में, क्यों सूख गया सम्मान?

माँ ने जीवन अर्पण करके, सपनों को आकार दिया,
बुढ़ापे में उसी जननी को, अकेलेपन का भार दिया।

बेटी को कहते घर की लक्ष्मी, देते बड़े बयान,
दहेज, हिंसा और अपमान से, छलनी होता मान।

भाग्य बताने वाले अक्सर, देते लंबा ज्ञान,
अपने ही जीवन की राहों से, रहते फिर अनजान।

दीवारें ऊँची होती जातीं, आँगन होता छोटा,
रिश्तों का बरगद सूख रहा, स्वार्थ बना है मोटा।

साँपों से अब क्या डरना है, विष तो मन में पलता,
चेहरे हँसते, भीतर छल का, हर दिन नया जंगल खिलता।

गिरगिट भी हैरान खड़ा है, रंग बदलते लोग,
सच की कीमत घटती जाए, झूठ पहनता भोग।

गिद्धों ने भी हार मानी है, छोड़ा अपना काम,
इंसानों की लालच ने ही, कर डाला बदनाम।

धर्म वही जो भूखे को रोटी, प्यासे को जल दे,
आँसू पोंछे, हाथ थाम ले, जीवन में संबल दे।

मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारा—सबका रहे सम्मान,
सबसे पहले पूजे जाएँ, धरती पर हर इंसान।

पत्थर में भगवान मिलें तो, मन में भी पहचान,
सेवा से बढ़कर नहीं कहीं, कोई दूसरा विधान।

चलो जलाएँ प्रेम का दीपक, मिटे घृणा की रात,
मानवता ही सबसे ऊँचा, यही सृष्टि का सत्य-व्रत।

Friday, July 10, 2026

बुढ़ापा - उम्र का पड़ाव


 

बरसात (उम्र) प्राकृतिक है शाश्वत है
चाह कर भी कौन भला कैसे रोक पाएगा
वह तो एक दस्तक है जिसको देखने का
अवसर हर किसी के जीवन में
कभी ना कभी तो आएगा
यह बात और है कि जर्जर हो चुके
मकान (बूढ़ा व्यक्ति) को बरसात में
बचाए रखने के लिए रात दिन
पथराई आंखों से दोनों हाथों से
अपनी सांसों से जर्जर मकान के साथ (संतान )
रहने वाला ना जाने कितने प्रयास करता है
कभी-कभी जर्जर मकान आने वाली
समय की गति में बह जाता है
और कभी-कभी जर्जर मकान को बचाने वाला
उसे उसे बरसात में बचा ले जाता है
मकान को देखकर उसके चारों तरफ के लोग
कुछ पल के लिए प्रसन्न भी हो जाते हैं
क्योंकि विरासत को बचाने में
वह सफल होता अपने को पाते हैं
और जर्जर हो चुका मकान भी यह
देखकर खुश प्रसन्न हो जाता है
कि जिनको उसने छत दिया छाया दिया
उनको अपने लिए जीता पाता है
बस बरसात और जर्जर मकान का
यह खेल चलता ही रहता है
यही संबंधों का ताना है यही संबंधों का बाना है
कभी आंसुओं की धार है
कभी खुशियों की झंकार है
यही सोचकर हर कोई प्रकृति के आनंद में
बरसात से बचने के लिए पहले घर बनाता है
फिर उस घर को गिरने से बचाने के लिए
घर को बहुत से हाथ दे जाता है
जो आने वाले कल में बरसात से
अपने को भी बचाने में सफल रहेंगे
बाढ़ जो बहा कर ले जाती घर को
हर व्यक्ति को और सब कुछ
वह जर्जर मकान में हंसकर जीते रहेंगे

डॉ आलोक चांटिया रजनीश

Saturday, July 4, 2026

समानांतर कहाँ है? — डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


 

समानांतर कहाँ है?

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

मैं जानता हूँ मेरे और
तुम्हारे बीच कोई भेद नहीं,
फिर भी इस जीवन-पथ पर
मेरा कोई समवेद नहीं।

लाख कोई बाएँ आ खड़ा हो,
दाएँ अपना हाथ बढ़ाए,
रिश्तों को नव नाम सजाकर
जीवन भर साथ निभाए।

किन्तु राहों की दूरी नापने का
एक ही शाश्वत मंत्र रहा—
मेरे और इस जग के मध्य
सदा एक गहरा अंतर रहा।

जिस मिट्टी के छोटे बीज से
अंकुर बनकर मैं निकला हूँ,
उस मूल को छोड़ किसी और का
कैसे होकर मैं बिखरा हूँ?

वही दर्शन बार-बार मुझे
भीड़ के बीच अकेला करता,
सबके पास खड़ा होकर भी
अपने भीतर मेला भरता।

कोई कहता—"यह अभिमानी है",
कोई कहता—"अपने में खोया",
पर अंतर का निर्मल आलोक
सत्य से कभी नहीं है रोया।

क्योंकि वह तो जन्म-जन्म से
लंबी राह अकेला चलता,
अपने जैसा दूसरा कोई
जीवन-पथ पर कहाँ मिलता?

इस कारण न वह रोता है,
न पीड़ा का गीत सुनाता,
मौन तपस्वी बनकर केवल
अपने सत्य को ही अपनाता।

धरती का जब साथ छूटेगा,
तन का हर बंधन टूटेगा,
तब फिर उसी प्रथम बीज के संग
मेरा अस्तित्व भी छूटेगा।

जो अब सूखकर मिट जाना चाहे,
फिर मिट्टी में सो जाना चाहे,
अंधकार की गहरी गोद में
शांत स्वयं हो जाना चाहे।

क्योंकि हर आलोक अंततः
अपने स्रोत में खो जाता है,
प्रकाश नहीं लौटता फिर से—
बस मौन अनंत हो जाता है।

आलोक कहीं नहीं आता है,
आलोक कहीं नहीं आता है।

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

Thursday, July 2, 2026

घर का सच — डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


 

घर का सच
— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

हर वह व्यक्ति
गरीब, लाचार और बेचारा कहलाने लगता है,
जिसके जीवन में
चारदीवारी और एक छत वाला घर
सिर्फ एक सपना बनकर रह जाता है।

इस संसार में
अक्सर आदमी का कद
उसके घर के कद से मापा जाता है।
जिन घरों की दीवारें ऊँची होती हैं,
उनके भीतर प्रवेश करने की
हैसियत भी हर किसी की नहीं होती।
उनके विशाल द्वार तक पहुँचने का साहस
सबके हिस्से में कहाँ आता है!

और जिनके हिस्से में
बौने, ठिगने, अविकसित
और छोटे-छोटे घर आते हैं,
वे जीवन भर
अपने सपनों को भी
दीवारों के बीच समेटना सीख जाते हैं।

उनके घरों में
बस इतना-सा अहसास बचा रहता है
कि सिर ढकने के लिए
एक छोटी-सी छत तो है,
पर खुला आकाश
उनकी नियति नहीं।

घर की इसी कहानी में उलझा मनुष्य
एक और घर को भूल जाता है—
वह घर,
जिसमें उसका मस्तिष्क,
हृदय,
फेफड़े,
यकृत (लीवर),
गुर्दे (किडनी)
और जीवन की हर धड़कन निवास करती है।

वह यह सोचने का समय भी नहीं निकाल पाता
कि उसके शरीर के इन निवासियों को
क्या चाहिए,
क्या नहीं चाहिए,
किस भोजन से वे स्वस्थ रहेंगे,
किस जीवनशैली से
यह शरीर रूपी घर अधिक
समय तक सुरक्षित रहेगा।

विडंबना यह है कि
दूसरों के लिए चिंतित रहने वाला मनुष्य
परोपकारी कहलाता है,
लेकिन अपने ही शरीर रूपी घर का
सबसे बड़ा भस्मासुर बन जाता है।

सच तो यह है कि
मनुष्य अपने शरीर के कारण
न अमीर कहलाता है,
न सम्राट।
फिर भी वह स्वयं को
सबसे बुद्धिमान प्राणी मानता है।

शायद इसलिए कि
वह ईंट, पत्थर और मिट्टी से बने घर को
अपना सर्वस्व समझ लेता है,
और उस जीवित घर को भूल जाता है
जिसके बिना
न कोई मकान अपना है,
न कोई संसार।

जिस दिन मनुष्य
शरीर रूपी घर और मिट्टी के घर
दोनों के महत्व का संतुलन सीख लेगा,
उसी दिन वह समझ पाएगा
कि वास्तविक समृद्धि
दीवारों की ऊँचाई में नहीं,
जीवन की गहराई में बसती है।

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

Wednesday, July 1, 2026

जीवन हार गया या हराया गया — डॉ. आलोक चांटिया 'रजनीश'

 

जीवन हार गया या हराया गया

— डॉ. आलोक चांटिया 'रजनीश'

जीवन हार गया या हराया गया,
क्यों उसे फिर द्रौपदी बनाया गया?
था स्वयं में मग्न, सहज, संतुष्ट वह,
फिर सभा बीच क्यों बुलाया गया?

पाँच इन्द्रियों के दृढ़ प्रहरी साथ थे,
फिर भी बालों से घसीटा क्यों गया?
देह नहीं, सम्मान का था प्रश्न यह,
क्यों उसे अपमान में जीता गया?

रो रहा था मौन बनकर हर श्वास में,
पर न कोई भी सहारा बन सका।
धर्म बैठे देखता था आँख मूँदकर,
सत्य भी उस दिन अकेला रह गया।

जीवन हार गया या हराया गया,
क्यों उसे फिर द्रौपदी बनाया गया?

चीर केवल वस्त्र का उतरा नहीं,
शब्द का, विश्वास का भी चीर था।
भावनाएँ नंगी होकर रो उठीं,
संबंधों का टूटता ज़ंजीर था।

जानते थे सब कि भीतर क्या छिपा,
फिर तमाशे का नगर सजता रहा।
भीड़ ताली पीटती ही रह गई,
मौन हर चेहरा मुखौटा बन गया।

सबके अपने अर्थ थे, अनर्थ थे,
यथार्थ थे और निजी स्वार्थ थे।
साँस अपनी, अपना कल, अपना सफ़र—
इसीलिए सब मौन के ही साथ थे।

जीतकर भी हारता जीवन रहा,
हर समय द्रौपदी बनता रहा।
कृष्ण भी आते तभी हैं मित्र बन,
जब मनुष्य अंतिम किनारे आ गया।

अब न आँसू हैं, न कोई याचना,
अब प्रतिकारों का ही संकल्प है।
घाव लेकर भी खड़ी है दृढ़ वही,
यही जीवन का अमर विकल्प है।

अंधकारों में टटोलूँ जब स्वयं,
हर तरफ़ बस झुकी हुई आँखें मिलीं।
हर किसी को अपनी पीड़ा थी बड़ी,
इसलिए सबकी जुबाँ पत्थर बनी।

तब समझ में एक गहरा सत्य आया—
जीवन हारा कम, अधिक हरवाया गया।
धर्म जब सत्ता के आगे झुक गया,
हर युग में द्रौपदी बनाया गया।

शब्दों का चीरहरण, संबंधों का,
भावनाओं का निरंतर क्षरण हुआ।
मनुष्यता की चिता धधकती ही रही,
और विवेक भीतर ही दफ़्न हुआ।

पूछता हूँ आज तुमसे एक प्रश्न—
क्या कभी यह पीर भी जागेगी?
द्रौपदी की भीगी पलकों का नीर
क्या तुम्हारी आँख से भी बहेगी?

यदि नहीं, तो याद रखना मित्र मेरे,
हर युग अपना महाभारत लाएगा।
जब-जब मौन रहेगा धर्म यहाँ,
जीवन फिर द्रौपदी कहलाएगा।

Sunday, May 24, 2026

उसकी तेरहवीं पर- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 उसकी तेरहवीं पर


कोई भी नहीं आया था

शायद कोई समय नहीं पाया था

या फिर एक लावारिस के लिए

कौन थोड़ा सा समय निकाल पाया था

 आज उसकी 13वीं है

13 दिन हो गए हैं उसे

इस दुनिया से गए हुए

जो निशान उसने जमीन पर बनाए थे 

उनके मिटे हुए

जो सांस उसने ली थी

वह फिर से वायु में विलीन हो गई है 

जो मांस हड्डी उसको मिली थी

वह मिट्टी में मिल गई है

कल तक कोई भी उसको देखकर

 कुछ ना कुछ तो कहता था

पर वह अपनी मस्ती में रहता था

उसे मालूम था उसके अंधेरे को

मिटाने के लिए आलोक ही

सामने खड़ा मिलेगा

ठीक है जैसा है जीवन वैसा चलेगा

पर अचानक वह जब

आकर खड़ा हो जाता था

तो खाली मुट्ठी में आलोक भी

ठगा सा रह जाता था

उसका अंधेरा मिटाना

इतना आसान नहीं था

क्योंकि आलोक भी 

इतना महान नहीं था

अंतिम बार वह उसको

लेकर गया था मंदिर की चौखट पर 

जहां थोड़ा सा खीझ कर पूछा था

कि मेरी लाश तुम उठाओगे

या मैं तुम्हारी लाश उठाऊंगा

पर वह हंसते हुए बोला था

कैसे मैं यह बताऊं

और कैसे मैं समझा पाऊंगा

कौन किसकी लाश उठाएगा

यह तो सिर्फ यह भगवान

बतायेगा

देखा जाएगा जब मेरा समय आएगा 

या तेरा समय आएगा

और यह कहकर वह चला गया था

मेरे पीछे एक सन्नाटा रह गया था

मैं जानता भी नहीं था कि यह

मेरी उसकी अंतिम भेंट हो रही है 

सांसों की कहानी तो अब

खत्म हो रही है

अचानक चार दिन बाद ही

मुझे बताया गया था

कि वह सड़क पर मर गया है

इस गंदी जिंदगी से तर गया है

उसे लावारिस घोषित कर दिया गया है

 आओ और उसका अंतिम संस्कार कर जाओ

देखते देखते वह चिता की

आग में जल गया

सिर्फ अतीत में एक संबंधों का

अंधेरा रह गया

आज उसकी तेरहवीं हुई

पर भी कोई भी पूछने नहीं आया है

 क्या मानव ने संस्कृति बनाकर

बस इतना ही सच पाया है

क्या मानव ने संस्कृति बनाकर

बस इतना ही सच पाया है

डॉ आलोक चांटिया रजनीश


Friday, May 22, 2026

कॉकरोच- कविता द्वारा डॉ आलोक चांटिया रजनीश अखिल भारतीय अधिकार संगठन


 कॉकरोच


यह सच है मनुष्य के साथ रहते रहते

मनुष्य ही मुझे अपनी तरह समझने लगे हैं 

और मैं भी अपने को

मनुष्य की तरह समझने लगा हूं

इसीलिए कभी मुख्य न्यायाधीश तो

कभी राजनीति के अक्स में रहने लगा हूं 

चाहता भी नहीं है कोई अपने घर में

सीलन बदबू गंदगी फिर भी

आदमी से ज्यादा मौका परस्त भला

इस पृथ्वी पर कौन रह गया है

उसने अपने को गुलाम और

गाय को पालतू जानवर कह दिया है

मौका पाकर राजनीति के गंदे खेल में

गंदो को भी अपना कर लिया है

इसीलिए आज मैं बहुत

ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया हूं

क्योंकि कॉकरोच की तरह छिपकर

जीने वालों के लिए मैं आदर्श बन गया हूं 

संख्या के आधार पर बढ़ते हुए

परिवार के आकार से परेशान

जब सारे देश के लोग हो जाते हैं

जनसंख्या नीति पर न जाने

क्या-क्या बना जाते हैं

तब भी आज कॉकरोच की गिनती से

उसके ताकत होने का 

अंदाजा लगाया जा रहा है

प्रजातंत्र में सत्ता पाने को

आजमाया जा रहा है

मैं भी खुश हूं कि सनातन धर्म में

बिना मरे हुए में मानव योनि का

आनंद ले रहा हूं

चुपचाप एक कोने में बैठकर

खुद को मनुष्य और इन्हें 

कॉकरोच कह रहा हूं जानता हूं

 मैं बच भी जाऊंगा

यह कुचलकर मार दिए जाएंगे

या हिट स्प्रे से बर्बाद कर दिए जाएंगे

पर यही तो मेरा प्रतिकार होगा

क्योंकि मैं करोड़ों साल से शिखंडी बनकर 

भीष्म पितामह को मारना चाहता हूं

इसीलिए आज कॉकरोच बनकर

फिर तुम्हारे सामने आना चाहता हूं

मां भारती को अबला बनाकर

छोड़ जाना चाहता हूं

क्योंकि मैं जानता हूं तुम

धृष्ट राष्ट्र के देश में रहकर संजय की

आंखों से सब कुछ सुनना चाहते हो

खुद अपनी मां भारती को कहां

अपना कहना चाहते हो

इसलिए कॉकरोच का तुम गुणगान करके 

अपना जीवन बचा रहे हो

देखो कैसे कीड़े मकोड़े की तरह

कॉकरोच जनता पार्टी में आ रहे हो

क्या तुम मानव होने का अर्थ

कहीं से अपने में पा रहे हो


डॉ आलोक चांटिया रजनीश