Monday, October 19, 2026

एक किलो रिश्ता रिश्तों को दीमक क्यों लग रही है? आलोक चांटिया रजनीश

 

एक किलो रिश्ता

रिश्तों को दीमक क्यों लग रही है?

आलोक चांटिया रजनीश

आज एक किलो रिश्ता
खरीदकर लाया हूँ,
पचास किलो के शरीर में
किसी को रखने की
फ़ुर्सत ही नहीं मिलती,
इसीलिए बाज़ार से
जीने के लिए उठा लाया हूँ।

ये देखो, एक किलो रिश्ता
तुम्हारे लिए भी ले आया हूँ,
बता भी डालो, कितना दूँ?
क्या कुछ भी नहीं चाहते?
फिर मानव क्यों हो बताते?

सिर्फ़ जिस्म में गोश्त ही नहीं,
एक भावना भी खेलती है,
जो बनाती है मुझको यहाँ
पिता, चाचा, मामा, फूफा,
दादा, नाना और पति, प्रेमी भी।

तुम भी तो बनती हो यहाँ
माँ, चाची, मामी, बुआ,
दादी, नानी और पत्नी, प्रेमिका भी।

पर आज हम क्यों भाग रहे हैं?
दिन-रात क्यों जाग रहे हैं?
कहाँ और कब खो गए रिश्ते?
क्या मिल पाएँगे कभी रिश्ते?

सुना है, अब कंपनी भी बेचती है,
कुछ रंगीन दुनिया खींचती है,
और हम फिर से बिकने लगे,
आदमी में जानवर दिखने लगे।

देखो, आज मैं रिश्ते ताज़े लाया हूँ,
आओ, जल्दी ले लो, दौड़ो-दौड़ो!
बड़ी मुश्किल से एक किलो पाया हूँ।

चाहो तो काटकर खा लो,
या पी लो एक गिलास में भरकर,
पर रिश्ते की ख़ुराक लेना न छोड़ो,
इस दुनिया को फिर न मोड़ो।

वरना जानवर हम पर हँसने लगेंगे,
फ़ब्तियाँ हम पर कसने लगेंगे।
कैसे कहेंगे हम हैं इनसे बेहतर,
जब पाएँगे हमको ही कमतर?

तो लो, अब मुँह न मोड़ो रिश्तों से,
जी लो थोड़ा अब रिश्तों से।
कब तक चलोगे किश्तों से?
आओ, हमसे कुछ रिश्ते ले लो,
रिश्तों को रिसने से तौबा कर लो!

रिश्तों को दीमक क्यों लग रही है?

हम रिश्तों से ज़्यादा ‘मैं’ में डूबकर
बस एक शरीर से ज़्यादा कुछ नहीं रह गए हैं।

— डॉ. आलोक चांटिया ‘रजनीश’

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