मोहब्बत
रात की हया को कहां कोई समझ पाया है
जब भी उजाले पर उसका मन आया है
तो तुरंत उसका इजहार करने का
उसने कभी मन ही नहीं बनाया है
उसने भी इंतजार किया है तमाम
उन खुली हुई आंखों का जो रात को
आहिस्ता आहिस्ता आते हुए देख रहे हैं
और न जाने कितनी अल्फाज उनकी
आंखों में तैरते बिन कहे हैं
इसीलिए रात चुपचाप अपनी सारी
हया को बनाए रखकर चलती रहती है
बस दूर कहीं उसकी आहट में मचलती रहती है
जब जान लेती है की खुली हुई आंखें
अब नींद के गहरे आगोश में समा गई है
और उसके मोहब्बत के इजहार की बारी आ गई है
तो वह बढ़कर उजाले से लिपट जाती है
अपनी सारी अंधेरे की बातें उजाले में समा जाती है
और उजाले से लिपटकर कुछ इस तरह खो जाती है
कि जब दुनिया में हर किसी की
आंख दोबारा खुल पाती है
तो उसे अंधेरे की कोई बात नजर नहीं आती है
मोहब्बत में यूं समा जाना उसी में खो जाना
कहां कोई अंधेरे से सीख पाया है
उजाले के हिस्से में रात का
कितना खूबसूरत वह लम्हा आया है
जब दोनों मिलते हैं और रात को जाती है
क्या आज भी हम में से किसी को
इस तरह शर्म हया के साथ मोहब्बत की
बात साथ चलने की कहीं समझ में आती है
आलोक चांटिया "रजनीश"
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