Sunday, June 22, 2025

🗣️ मानव की हार – एक संस्कृति की जीत या विनाश? डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

 🗣️ मानव की हार – एक संस्कृति की जीत या विनाश?

डॉक्टर आलोक चांटिया "रजनीश"

मानव ने खुद को पशु जगत से अलग किया,

पर क्या पाया?

हाँ, एक अद्भुत संस्कृति बनाई—

पर  संस्कृति में इतना खो गया

कि बाकी सब कुछ,

खुद को भी, खो बैठा।


पेड़ काटे,

जंगल उजाड़े,

सीमेंट की इमारतें खड़ी कीं—

और अब उन्हीं के साये में

तिल-तिल कर जल रहा है।


जिस ऑक्सीजन से जीवन की परिभाषा बनी,

उसे भी इतना ज़हरीला बना दिया

कि अब हर सांस…

सज़ा जैसी लगती है।


धरती पर पहिए दौड़े,

आसमान में मिसाइलें उड़ीं,

मनुष्य उड़ता गया…

पर गिरता रहा—

नैतिकता में, संवेदना में, रिश्तों में।


आज वह संस्कृति का निर्माता नहीं—

एक स्वार्थी शासक बन बैठा है,

जो न समझ पाया जीवन का अर्थ,

न अपने ही बनाये राज्य का मूल्य।


राज्य!

जिसे सुरक्षा देनी थी,

अब वही सबसे बड़ा शिकारी बन गया है।

राज्य जो युद्ध चाहता है,

पर जनता बस जीना चाहती है।


और आदमी…

अब आदमी का ही दुश्मन बन गया है।

शेर-भालू नहीं मारते अब,

बल्कि आदमी, आदमी को ही मार देता है।


संस्कृति के नाम पर,

हमने जीवन को जंजीरों में जकड़ दिया है।

सांप बन गए हैं,

फुफकारते नहीं, बस डसते हैं—

चुपचाप, अपनों को।


कौन चाहता है कि उसके घर पर बम गिरें?

कौन चाहता है कि उसका भविष्य

सिर्फ मलबा बन जाए?


फिर भी,

राज्य चलते हैं…

अपने ‘राष्ट्रीय हित’ में

दूसरों की बर्बादी लिखते हैं।


कुछ ही लोग हैं जिन्हें जीवन का अर्थ समझ आता है,

बाकी चींटियों की तरह कुचले जाते हैं—

बिना नाम, बिना खबर, बिना मातम।


तो क्या यही है

मानव होने की परिभाषा?

क्या हम इसलिए पशु से अलग हुए थे?

कि एक दिन अपनी ही बनाई पृथ्वी

हम खुद नष्ट कर डालें?


अब सवाल है—

ये जो सब हो रहा है,

ये संकेत है किसी अंधेरे युग के आने का

या शायद…

किसी नई सुबह का?


तय हमें करना है।


No comments:

Post a Comment