मानव होने का सच
एक मनुष्य होने की खुशी
पशु जगत में किसे नहीं होती है
लेकिन एक दिन ऐसा भी आता है
जब पशु जगत की बात झूठी होती है
आदमी स्वयं को पशु से ज्यादा
अच्छा कहीं नहीं पाता है
क्योंकि उसके हिस्से में निराशा दुख
अवसाद और भूख का रास्ता भी आता है
वह जान ही नहीं पाता
मनुष्य बनकर उसने क्या पा लिया है
फिर से एक कल की चिंता ने
उसे बीमार कर दिया है
अब मानव मानव होकर खुश नहीं रहता है
हर पल हर बात पर डरा डरा सा रहता है
बस किसी भी बात को पूछने पर
यही कहता रहता है
सब भगवान की मर्जी है
देखो भगवान क्या चाहता है
दिन के उजाले में भी रात के अंधेरे में रहता है
अब वह यह समझ ही नहीं पा रहा है
कि पशु जगत में उसे आदमी होने का
भ्रम क्यों चलाया गया
जब एक जानवर से बेहतर
उसे कहीं नहीं पाया गया
यह सच है कि कल अच्छे दिन लाने के चक्कर में
उसने प्रकृति से इतना ज्यादा खेल कर डाला है
कि आज उसके मुट्ठी में
उसका ही जीवन उसका हाला है
जिससे निकलने के लिए उसने न जाने कितने
आविष्कार कर डाले हैं
अपने चारों तरफ सुख समृद्धि
सभ्यता के न जाने कितने भ्रमजाल फैला डाले हैं
पर इन सब से उसकी मुट्ठी में
अक्सर अंधेरा ही रह जाता है
और कल अच्छा होगा इसी बात को
वह बड़े बुजुर्ग सरकार से कहता पाता है
पर जीवन तो जल्दी-जल्दी
दौड़कर किनारे पर जा रहा है
मानव जरा सोच के देख
तेरे हाथ में क्या आ रहा है
क्या अभी भी तू पशु जगत में
अपने को सर्वश्रेष्ठ का पा रहा है
या सिर्फ एक प्राणी की एक तरह निरीह होकर
कल की कल्पना में जीता जा रहा है
बस किसी तरह जीता जा रहा है
आलोक चांटिया "रजनीश"
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