"मानव का पतन: एक चेतावनी"
✍️ डॉ. आलोक चांटिया “रजनीश”
(समाजशास्त्री, लेखक व सामाजिक चिंतक)
चींटी जानती है —
अगर वह धीरे-धीरे, संभलकर चलती रही
तो शाम तक अपने घर लौट आएगी।
पर इंसान…
सभ्यता और संस्कृति की अंधी दौड़ में
इतना उलझ चुका है
कि अब उसे भरोसा नहीं
कि वह शाम तक ज़िंदा घर लौटेगा भी या नहीं।
कभी जानवरों से डरता था इंसान,
आज जानवर इंसान से डरता है।
कभी जंगल में
एक शेर पल में मनुष्य का अंत कर देता था,
अब शेर खुद इंसान के हाथों
तिल-तिल कर मर रहा है।
इंसान अब जानवर नहीं मारता,
इंसान अब इंसान को खा रहा है।
जो आदमी सुबह घर से निकलता है
सपनों और संघर्षों के साथ,
वो हर मोड़ पर डरता है—
कहीं कोई लूट न हो जाए,
कहीं कोई हत्या न हो जाए,
कहीं कोई सड़क, ट्रेन, या बम
उसे लील न जाए।
अब शव नहीं मिलते,
बस DNA टेस्ट से अपनों को पहचाना जाता है।
विज्ञान की ऊँचाई
इंसान को नहीं,
बस उसके मांस और हड्डी के बचे हिस्सों को
घर पहुँचाने में काम आती है।
इंसान ने जंगल काट डाले,
नस्लें मिटा दीं,
और अब अपने विनाश की ओर
खुद ही अग्रसर है।
उसने रावण की तरह जीना चुना है
पर चाहता है कि मरते समय उसे
राम की तरह सम्मान मिले।
वह ईश्वर नहीं बनना चाहता,
ना इंसान।
वह राक्षस बनकर जीना चाहता है—
शब्दों में नहीं, कर्मों में।
अब कोई
संस्कृति नहीं रचना चाहता,
कोई
मानवता नहीं बचाना चाहता।
वह बस
अपने भीतर के दानव को
पालना-पोसना चाहता है।
और जब ये दानव
उसे ही खा जाएगा,
तो वो भी नहीं कह पाएगा
कि वह कभी इंसान था।
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