Saturday, June 21, 2025

जीवन भी बहुत अजीब सा हो गया है- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

जीवन भी बहुत
अजीब सा हो गया है
किसी से कोई काम कह दो
तो वह अपने आप ही
बेतरतीब सा हो गया है
सभी को लगता है
कि कोई किसी से कुछ
इसलिए कह रहा है
क्योंकि वह कुछ उससे
पाना चाहता है
और इसी को सच मानकर
कोई भी किसी के पास
नहीं आना चाहता है
यह मानकर कि कुछ
कहने के पीछे सिर्फ
पैसे की बात कही जा रही है
जिसे देखिए उसके द्वारा
बैंक अकाउंट में एक छोटी सी धनराशि भेजी जा रही है
कोई नहीं समझ पाता
दो मनुष्यों का साथ बैठना
ज्यादा बड़ी बात होनी चाहिए
पैसे का क्या है वह तो
भीख मांगने से भी
किसी को भी मिल जानी चाहिए रिश्ते साथ-साथ चलना
और किसी काम को दूर तक
ले जाने के लिए
कोई आपको बुलाना चाहता है
वह सिर्फ आपसे कुछ रुपए
पाकर अकेले अपने
कार्यक्रम में खड़े
नहीं रहना चाहता है
पर मनुष्य आज पैसे में
इस कदर से डूब गया है
कि वह आदमी के पास
बैठने से ही उठ गया है
अब हर आदमी अकेला
खड़ा होकर सोशल मीडिया पर अपना जन्मदिन मृत्यु
कार्यक्रम सब मना लेता है
और वहीं पर दुनिया का
हर आदमी उसे शुभकामनाएं
सुख दुख संदेश दे देता है
भला कोई कहां अब
मानव होने के अर्थ में
किसी मानव को कंधा देता है
किसी का साथ देता है
बस अपने जीवन के अर्थ को
वह खुद ही समझता है
और खुद ही उसे जान लेता है
यह एक अजीब सा दौर
इस दुनिया में चल रहा है
आदमी तो सभी जगह
दिखाई दे रहे हैं
पर अब आदमी कहीं नहीं
मिल रहा है
आलोक चांटिया "रजनीश"

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