अक्सर जब मैं,
अकेला रह जाता हूं ,
अपने आसपास,
किसी को भी नहीं पाता हूं,
जो होते भी हैं सब ,
अपने लिए व्यस्त रहते हैं,
एक भी पल ना मेरी ,
बात सुनते हैं,
बस अपनी ही रहते रहते हैं,
ऐसे में फिर अपने में,
अपने को ढूंढने लगता हूं,
बाहर की दुनिया से दूर ,
अपने भीतर मैं फिर जगता हूं,
पाता हूं पूरा आधा-आधा,
अपनी मां को अपने भीतर,
और पूरा आधा-आधा,
अपने पिता को ,
बस दोनों को पाकर,
मैं खुश हो जाता हूं,
यह मैं नहीं कह रहा हूं,
विज्ञान कहता आया है,
अनुवांशिकी यही समझा पाया है ,
आधे आधे गुण के ,
मिल जाने से ही,
एक बच्चा बन जाता है,
पर दुनिया में आने के बाद,
वह भूल जाता है ,
कि उसके अंदर ही जब तक वह है,
उसकी मां उसके पिता,
उसके साथ रहेंगे ,
जब भी वह अकेला होगा,
तब उससे चुपचाप कहेंगे ,
हम तुम्हारे साथ रहते हैं,
क्यों चिंता करते हो ?
बस यही कहते हैं ,
और फिर मैं अपने अकेलेपन को ,
देखते ही देखते भूल जाता हूं,
जब मैं और मेरे माता-पिता को ,
सन्नाटो में अपने,
भीतर बात करते पाता हूं।
डॉ आलोक चांटिया रजनीश
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