Monday, December 29, 2025

अक्सर जब मैं, अकेला रह जाता हूं ,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश

 

अक्सर जब मैं,
अकेला रह जाता हूं ,
अपने आसपास,
किसी को भी नहीं पाता हूं, 

जो होते भी हैं सब ,
अपने लिए व्यस्त रहते हैं, 

एक भी पल ना मेरी ,
बात सुनते हैं,
बस अपनी ही रहते रहते हैं, 

ऐसे में फिर अपने में,
अपने को ढूंढने लगता हूं, 

बाहर की दुनिया से दूर ,
अपने भीतर मैं फिर जगता हूं,
पाता हूं पूरा आधा-आधा, 

अपनी मां को अपने भीतर, 

और पूरा आधा-आधा,
अपने पिता को ,
बस दोनों को पाकर,
मैं खुश हो जाता हूं,
यह मैं नहीं कह रहा हूं,

 विज्ञान कहता आया है, 

अनुवांशिकी यही समझा पाया है ,
आधे आधे गुण के ,
मिल जाने से ही,
एक बच्चा बन जाता है,
पर दुनिया में आने के बाद, 

वह भूल जाता है ,
कि उसके अंदर ही जब तक वह है,
उसकी मां उसके पिता, 

उसके साथ रहेंगे ,
जब भी वह अकेला होगा, 

तब उससे चुपचाप कहेंगे ,
हम तुम्हारे साथ रहते हैं,
क्यों चिंता करते हो ?
बस यही कहते हैं ,
और फिर मैं अपने अकेलेपन को ,
देखते ही देखते भूल जाता हूं,
जब मैं और मेरे माता-पिता को ,
सन्नाटो में अपने,
भीतर बात करते पाता हूं।
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

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