सभी के अपने-अपने ,
दर्द होते हैं ,
दर्द हमेशा अपनों को ,
ढूंढता रहता है ।
अगर किसी अपने को,
पा भी जाता है ,
और अपना दर्द,
जैसे ही कहता है,
वह हैरान रह जाता है,
क्योंकि सामने वाले से टकराकर,
उसका दर्द वापस आ जाता है ।
और सामने वाले का ,
दर्द भी ले आता है ।
वह भी बताने लगता है कि, आजकल उसे कितना दर्द है,
उसकी जीवन की रातें, कितनी सर्द है ।
तब समझ में आता है कि,
हर कोई मुट्ठी बांध तो रहा है,
पर उसमें तो अंधेरा ही रह रहा है ।
कोई भी अपने दर्द के आगे, किसी दूसरे का ,
दर्द देख ही नहीं पा रहा है। जिसे भी देखो वह अपने,
सुख को भी दर्द कहता पा रहा है ।
क्योंकि अब उसे ,
इस बात का दर्द रहने लगा है,
कि जितना सुख ,
भगवान ने उसको दिया है,
वह पूरा नहीं दिया है ।
थोड़ा सा उसने रोक लिया है, अब दुनिया में जितना कुछ भी ,
अंधेरा दिखाई दे रहा है,
वह तो जलता हुआ ,
दर्द का दिया है,
जिसमें पढ़कर आदमी रास्ता भी,
नहीं खोज पा रहा है ,
जो आज जिंदा था कल,
वह आत्महत्या करके जा रहा है ।
क्योंकि उसे पूरी दुनिया में ,
या कहूं आदमी से भरी दुनिया में ,
कोई भी ऐसा नहीं मिला,
जिसको वह अपना दर्द सुना पाता !
और वह एक पल के लिए ही सही ,
उसके किसी काम आता ,
दर्द का जहर यूं ही,
बढ़ता चला जाएगा,
तो सचमुच एक दिन इस पृथ्वी पर,
फिर से जीवन का,
अर्थ समझा जाएगा ,
और हो सकता है ,
फिर से कोई एक अवतार, कोई एक भगवान कोई एक पैगंबर,
इस दुनिया में चला आएगा।
जो सिर्फ मुस्कुरा कर,
यह कह जाएगा कि,
दर्द के साथ जीने की ,
जो भी आदत डाल लेता है,
या अपने भीतर जो भी, अपना दर्द जी लेता है ,
वही तो राम कहलाता है,
वही कृष्णा कहलाता है ,
वही पैगंबर बन जाता है। भला दर्द के बिना,
कौन यहां रह पाता है?
और फिर दर्द में एक, मुस्कान निकलने लगेगी ,
और तपती धरती पर ,
जीवन की लकीर खिंचने लगेगी ।
आलोक चांटिया 'रजनीश'
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