उसके हाथों का शहर
— आलोक चांटिया “रजनीश”
उसके हाथों ने शहर में
अनगिनत मकान बनाए हैं,
पर आज भी रात के
रैन बसेरे ही उसके हिस्से आए हैं।
रोटी की तलाश में वह
अपना गाँव छोड़ आया,
दो पैसे ज़्यादा मिलेंगे—
यही दर्शन वह साथ लाया।
अब न घर की रोटी मिलती है,
न घर जैसी कोई छत,
ऐसे न जाने कितने हाथों के हिस्से
आए हैं जीवन के अधूरे सच।
वह सोचकर कभी मुस्कुरा भी लेता है—
कि कल जब कुछ पैसा जुड़ जाएगा,
वह भी अपने लिए
एक छोटा-सा घर बना लेगा।
पर कौन जाने किसके हिस्से
कितनी सुबहें लिखी हैं,
किसके हिस्से धूप है
और किसके हिस्से सर्द रातें ही बची हैं।
उसने शहर में आज भी
अनगिनत मकान बनाए,
पर ठंड की लंबी रातें
आज भी रैन बसेरे में सिमट आए।
दूर से जलती रोशनियों को देखकर
वह भी खुश हो लेता है,
गाँव की मिट्टी के कमरों में
उसने भी न जाने कितने दीप जलाए है ।
वह सोचता है—
इसी पैसे से लोग “शहर के” कहलाते हैं,
गाड़ी-घोड़े चलाते हैं,
इज़्ज़त और नाम कमाते हैं।
पर वह जान ही कहाँ पाता है
कि मुट्ठी भर पैसों से
आज तक कितने लोग
सच में मुस्कुरा पाए हैं।
शहर में उसने
न जाने कितने मकान बनाए,
पर कितने मकान वालों ने
उसे सड़क पर जाते पहचान पाए?
सबके लिए वह बस
एक मज़दूर, एक मिस्त्री भर है,
पैसों की इस दुनिया में
हम आदमी कहाँ बन पाए हैं?
बिल्कुल हमारी तरह
संवेदना, प्यास और खुशी लिए जीने वाला,
हमारे घर को खड़ा करने वाला इंसान—
हम उसे इंसान कहाँ देख पाए हैं?

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