Monday, December 1, 2025

मैं कहां खो गया आलोक चांटिया "रजनीश"


 शहर में कब अकेला हो गया,

 यह जान ही नहीं पाया।

यह सच है जब घर से चला था ,

तब यहां अकेला ही था आया।

लगा ऐसे जैसे जानवरों की बस्ती में,

मैंने भी अपनी एक बस्ती बना ली है।

जीवन की हजारों ख्वाहिशें,

मैंने चुटकियों में पाली है ।

हर तरफ खिलखिलाते गुनगुनाते,

लोगों की महफिल सजती देखकर,

मैं मस्त हो जाता था ।

फिर भला कहां कब किसी की,

बात में सुन पाता था ।

पर यह जान ही नहीं पाया कि,

जो मेरे सामने आकर खड़े होते हैं ।

वह महज एक छलावा होते हैं ।

जो अपने कामों की,

गरज से खड़े रहते हैं ।

कुछ देर मेरे सामने या, 

कभी-कभी बैठ भी जाते हैं।

पर उनके काम पूरे हो जाने के बाद,

वह कभी कहां नजर आते हैं?

इसी भ्रम में मैंने कभी ,

अपने बगल किसी को,

अपना कह कर खड़े होने की,

जरूरत ही कहां समझी थी?

यह भूल थी या सही रास्ता,

इस बात की बात को ,

सांस कहां समझी थी ?

दर्द तो तब हुआ जब,

कमरा खाली होता चला गया।

दरवाजे भी दस्तक की चाह में,

चुपचाप बंद ही रह गया।

कभी-कभी झींगुरों की तरह,

कुछ लोगों ने अपने होने का,

एहसास कराया।

पर उनकी आवाज से ना, 

जीवन में कोई रास आया ,

ना मैंने कुछ बदलता हुआ पाया।

लगता रहा कि मैंने मुट्ठी में, 

सब कुछ बंद कर लिया हूं ।

पर रेत कब रूकती है,

इसको ही नहीं समझ पाया।

अंधेरे के बाद उजाला होता है,

इस बात को सोच-सोच कर, 

मुझे यह विश्वास रहता है।

 क्योंकि जिसे देखिए वही,

इस दर्शन को कहता रहता है ।

परेशान मत हो एक दिन,

 तुम्हारा भी अच्छा समय आएगा।

जब फिर से वही माहौल होगा।

वही दौर छाएगा ।

पर मझधार में फंसा हुआ,

मैं अभी अपने को,

किनारे पर कैसे लाऊं ?

डूबते को तिनके का सहारा होता है,

पर वह तिनका कहां से पाऊं?

बस इसीलिए शहर के ,

समुद्र में डूब कर अकेला हो गया,

कोई जान ही नहीं पाया कब,

अंधेरे में आलोक कहां खो गया ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


No comments:

Post a Comment