शहर में कब अकेला हो गया,
यह जान ही नहीं पाया।
यह सच है जब घर से चला था ,
तब यहां अकेला ही था आया।
लगा ऐसे जैसे जानवरों की बस्ती में,
मैंने भी अपनी एक बस्ती बना ली है।
जीवन की हजारों ख्वाहिशें,
मैंने चुटकियों में पाली है ।
हर तरफ खिलखिलाते गुनगुनाते,
लोगों की महफिल सजती देखकर,
मैं मस्त हो जाता था ।
फिर भला कहां कब किसी की,
बात में सुन पाता था ।
पर यह जान ही नहीं पाया कि,
जो मेरे सामने आकर खड़े होते हैं ।
वह महज एक छलावा होते हैं ।
जो अपने कामों की,
गरज से खड़े रहते हैं ।
कुछ देर मेरे सामने या,
कभी-कभी बैठ भी जाते हैं।
पर उनके काम पूरे हो जाने के बाद,
वह कभी कहां नजर आते हैं?
इसी भ्रम में मैंने कभी ,
अपने बगल किसी को,
अपना कह कर खड़े होने की,
जरूरत ही कहां समझी थी?
यह भूल थी या सही रास्ता,
इस बात की बात को ,
सांस कहां समझी थी ?
दर्द तो तब हुआ जब,
कमरा खाली होता चला गया।
दरवाजे भी दस्तक की चाह में,
चुपचाप बंद ही रह गया।
कभी-कभी झींगुरों की तरह,
कुछ लोगों ने अपने होने का,
एहसास कराया।
पर उनकी आवाज से ना,
जीवन में कोई रास आया ,
ना मैंने कुछ बदलता हुआ पाया।
लगता रहा कि मैंने मुट्ठी में,
सब कुछ बंद कर लिया हूं ।
पर रेत कब रूकती है,
इसको ही नहीं समझ पाया।
अंधेरे के बाद उजाला होता है,
इस बात को सोच-सोच कर,
मुझे यह विश्वास रहता है।
क्योंकि जिसे देखिए वही,
इस दर्शन को कहता रहता है ।
परेशान मत हो एक दिन,
तुम्हारा भी अच्छा समय आएगा।
जब फिर से वही माहौल होगा।
वही दौर छाएगा ।
पर मझधार में फंसा हुआ,
मैं अभी अपने को,
किनारे पर कैसे लाऊं ?
डूबते को तिनके का सहारा होता है,
पर वह तिनका कहां से पाऊं?
बस इसीलिए शहर के ,
समुद्र में डूब कर अकेला हो गया,
कोई जान ही नहीं पाया कब,
अंधेरे में आलोक कहां खो गया ?
आलोक चांटिया "रजनीश"

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