औरत — रिश्तों की भाषा में
कितना अजीब-सा सुख चल रहा है,
जब पूर्णता का अर्थ लिए दुख चल रहा है।
पानी से हाथ धोते हुए,
वह जीवन का अर्थ ढूँढ रही है—
क्या इसी का नाम औरत है?
क्या यही सही है?
मिलकर मिला भी क्या,
कि मैं कुछ कर ही नहीं पाया—
क्या इसी का नाम रिश्ता है,
और यही निभाना आया?
यह तो सिर्फ़ दिखावा था,
जो सब कर रहे हैं—
झूठ को जी रहे हैं,
और झूठ ही मर रहे हैं।
वह ठंड से काँपती रही,
अँधेरे में—
आलोक के सामने।
फिर कौन-सा अर्थ प्रेम का,
किस अर्थ को मानें?
इसी खोखले जीवन को
हम रिश्ता कहते चले आए हैं।
दूर कहीं उसकी आँख का
एक कतरा—
आँसू—
हम कहाँ मिटा पाए हैं?
दर्द में मुस्कुरा कर,
बातों के बीच
बस इतना कह जाती है—
यही रिश्ते का सच है,
और औरत
बस इतनी ही रह जाती है।
डॉ आलोक चांटिया रजनीश
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