Tuesday, January 27, 2026

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


 

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


पता नहीं
रास्ते कब तक हमारे साथ चलेंगे,
या हम ही कब तक
इन पत्थरों को प्रगति कहकर
अपने पैरों से पूजा करते रहेंगे।
सभ्यता ने हमें चलना सिखाया,
पर रुकना कभी नहीं सिखाया।
हर मोड़ पर एक नया नियम,
हर नियम के पीछे एक डर—
और डर के नाम पर
इतिहास की सबसे बड़ी इमारतें खड़ी कर दीं।
हमने रास्ते बनाए
ताकि जंगल पीछे छूट जाए,
पर जंगल हमारे भीतर
और घना होता चला गया।
मनुष्य ने कहा—
“मैं प्रकाश हूँ”,
और सभ्यता ने ताली बजाई।
पर उसी ताली की गूँज में
कई सदियों तक
अँधेरा चुपचाप ताली बजाता रहा।
यह आलोक की तरह
हर जगह, हर समय रहने की ज़िद है—
देखने की, समझने की,
और जवाबदेह बने रहने की।
पर सच यह है
कि हर प्रकाश के ठीक पीछे
अँधेरा खड़ा रहता है,
क्योंकि सभ्यता ने
प्रकाश को शक्ति बना दिया
और शक्ति ने अँधेरे को जन्म दे दिया।
हमने नैतिकता को किताबों में बाँध दिया,
और व्यवहार को सुविधा के हवाले छोड़ दिया।
यहीं से शुरू हुआ मानव द्वंद्व—
अंदर कुछ और, बाहर कुछ और;
आस्था मंच पर,
और विवेक बैकस्टेज में।
सभ्यता कहती रही—
“आगे बढ़ो”,
मनुष्य पूछता रहा—
“पर किस कीमत पर?”
और हर बार जवाब आया—
“इतिहास तय करेगा।”
पर इतिहास तो
हमेशा विजेताओं की स्मृति रहा है,
और हारने वालों की
अनकही चीख।
आज भी हम चल रहे हैं—
सड़कों पर नहीं,
विचारधाराओं पर।
हर विचार एक रास्ता है,
और हर रास्ता
किसी न किसी मनुष्य को
पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है।
यह द्वंद्व खत्म नहीं होगा,
क्योंकि यही मनुष्य होने की शर्त है।
जो इसे मिटाने निकलेगा,
वही सबसे ख़तरनाक सभ्यता बनाएगा।
शायद सवाल यह नहीं है
कि अँधेरा क्यों है,
सवाल यह है—
क्या हम अपने प्रकाश से
अँधेरे को देखने का साहस रखते हैं?
क्योंकि जिस दिन
मनुष्य ने अपने भीतर के अँधेरे को
सभ्यता की जिम्मेदारी मान लिया,
उसी दिन
रास्ते भी इंसानियत सीखेंगे,
और सफ़र भी
थोड़ा कम हिंसक होगा।

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


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