साल नहीं, सार चाहिए
डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"
हर कोई आने वाले कल को ऐसे निहार रहा है,
जैसे आज उसे तिल-तिल कर मार रहा है।
उसे आशा है—कल जो दस्तक देगा द्वार,
वह ले आएगा कुछ, जो भर देगा जीवन का भार।
आशा के सहारे आदमी साँसें तो लेता है,
पर यह नहीं जानता—क्यों पृथ्वी पर रहता है।
दिन, महीने, साल बस गिनता ही जाता है,
कर्म का अर्थ जाने बिना जीता-मरता जाता है।
क्या उद्देश्य था जन्म का—किसने कभी पूछा?
या बस कैलेंडर पलटना ही जीवन का नुस्खा?
क्या किसी पशु ने किसी से यह कहा होगा,
“नौ साल की शुभकामनाएँ”—क्या ऐसा सुना होगा?
पशु जानता है कर्म बिना नाम जाने,
भाग्य सोया रहता है, श्रम के न जागने।
वह करता है जो करना उसे आया है,
उसने जीवन को उत्सव नहीं, कर्तव्य बनाया है।
फिर मनुष्य क्यों पशु से ऊपर उठने से डरे,
क्यों सिर्फ वर्षों की गिनती में जीवन सरे?
क्या वह बस साल बदलने को ही आया है,
या अपने होने का अर्थ समझने आया है?
जब तक कर्म से नहीं जुड़ेगी चेतना की डोर,
तब तक हर नया साल होगा बस एक और शोर।
साल नहीं बदलते—यदि मन वही पुराना है,
जीवन तब भी बोझ है, चाहे कल नया आना है।

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