उसकी तेरहवीं पर
कोई भी नहीं आया था
शायद कोई समय नहीं पाया था
या फिर एक लावारिस के लिए
कौन थोड़ा सा समय निकाल पाया था
आज उसकी 13वीं है
13 दिन हो गए हैं उसे
इस दुनिया से गए हुए
जो निशान उसने जमीन पर बनाए थे
उनके मिटे हुए
जो सांस उसने ली थी
वह फिर से वायु में विलीन हो गई है
जो मांस हड्डी उसको मिली थी
वह मिट्टी में मिल गई है
कल तक कोई भी उसको देखकर
कुछ ना कुछ तो कहता था
पर वह अपनी मस्ती में रहता था
उसे मालूम था उसके अंधेरे को
मिटाने के लिए आलोक ही
सामने खड़ा मिलेगा
ठीक है जैसा है जीवन वैसा चलेगा
पर अचानक वह जब
आकर खड़ा हो जाता था
तो खाली मुट्ठी में आलोक भी
ठगा सा रह जाता था
उसका अंधेरा मिटाना
इतना आसान नहीं था
क्योंकि आलोक भी
इतना महान नहीं था
अंतिम बार वह उसको
लेकर गया था मंदिर की चौखट पर
जहां थोड़ा सा खीझ कर पूछा था
कि मेरी लाश तुम उठाओगे
या मैं तुम्हारी लाश उठाऊंगा
पर वह हंसते हुए बोला था
कैसे मैं यह बताऊं
और कैसे मैं समझा पाऊंगा
कौन किसकी लाश उठाएगा
यह तो सिर्फ यह भगवान
बतायेगा
देखा जाएगा जब मेरा समय आएगा
या तेरा समय आएगा
और यह कहकर वह चला गया था
मेरे पीछे एक सन्नाटा रह गया था
मैं जानता भी नहीं था कि यह
मेरी उसकी अंतिम भेंट हो रही है
सांसों की कहानी तो अब
खत्म हो रही है
अचानक चार दिन बाद ही
मुझे बताया गया था
कि वह सड़क पर मर गया है
इस गंदी जिंदगी से तर गया है
उसे लावारिस घोषित कर दिया गया है
आओ और उसका अंतिम संस्कार कर जाओ
देखते देखते वह चिता की
आग में जल गया
सिर्फ अतीत में एक संबंधों का
अंधेरा रह गया
आज उसकी तेरहवीं हुई
पर भी कोई भी पूछने नहीं आया है
क्या मानव ने संस्कृति बनाकर
बस इतना ही सच पाया है
क्या मानव ने संस्कृति बनाकर
बस इतना ही सच पाया है
डॉ आलोक चांटिया रजनीश
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