कॉकरोच
यह सच है मनुष्य के साथ रहते रहते
मनुष्य ही मुझे अपनी तरह समझने लगे हैं
और मैं भी अपने को
मनुष्य की तरह समझने लगा हूं
इसीलिए कभी मुख्य न्यायाधीश तो
कभी राजनीति के अक्स में रहने लगा हूं
चाहता भी नहीं है कोई अपने घर में
सीलन बदबू गंदगी फिर भी
आदमी से ज्यादा मौका परस्त भला
इस पृथ्वी पर कौन रह गया है
उसने अपने को गुलाम और
गाय को पालतू जानवर कह दिया है
मौका पाकर राजनीति के गंदे खेल में
गंदो को भी अपना कर लिया है
इसीलिए आज मैं बहुत
ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया हूं
क्योंकि कॉकरोच की तरह छिपकर
जीने वालों के लिए मैं आदर्श बन गया हूं
संख्या के आधार पर बढ़ते हुए
परिवार के आकार से परेशान
जब सारे देश के लोग हो जाते हैं
जनसंख्या नीति पर न जाने
क्या-क्या बना जाते हैं
तब भी आज कॉकरोच की गिनती से
उसके ताकत होने का
अंदाजा लगाया जा रहा है
प्रजातंत्र में सत्ता पाने को
आजमाया जा रहा है
मैं भी खुश हूं कि सनातन धर्म में
बिना मरे हुए में मानव योनि का
आनंद ले रहा हूं
चुपचाप एक कोने में बैठकर
खुद को मनुष्य और इन्हें
कॉकरोच कह रहा हूं जानता हूं
मैं बच भी जाऊंगा
यह कुचलकर मार दिए जाएंगे
या हिट स्प्रे से बर्बाद कर दिए जाएंगे
पर यही तो मेरा प्रतिकार होगा
क्योंकि मैं करोड़ों साल से शिखंडी बनकर
भीष्म पितामह को मारना चाहता हूं
इसीलिए आज कॉकरोच बनकर
फिर तुम्हारे सामने आना चाहता हूं
मां भारती को अबला बनाकर
छोड़ जाना चाहता हूं
क्योंकि मैं जानता हूं तुम
धृष्ट राष्ट्र के देश में रहकर संजय की
आंखों से सब कुछ सुनना चाहते हो
खुद अपनी मां भारती को कहां
अपना कहना चाहते हो
इसलिए कॉकरोच का तुम गुणगान करके
अपना जीवन बचा रहे हो
देखो कैसे कीड़े मकोड़े की तरह
कॉकरोच जनता पार्टी में आ रहे हो
क्या तुम मानव होने का अर्थ
कहीं से अपने में पा रहे हो
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

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