मैं संस्कृति मानव हूँ
— डॉ आलोक चांटिया रजनीश
कब अपने कितनी दूर हुए,
यह कोई जान न पाता है,
जो कल तक थे बिल्कुल अपने,
वक़्त उन्हें बहा ले जाता है।
मैं भी इक मीठी भूल लिए,
हर रिश्ते को अपना समझा,
क्या तेरा है, क्या मेरा है,
सबको ही मैंने घर समझा।
सोचा था जब मन चाहेगा,
अपनी बातें कह जाऊँगा,
जैसे कल तक सुनते थे सब,
वैसे ही अब भी पाऊँगा।
पर सूरज डूबा, फिर निकला,
फिर निकला और फिर डूब गया,
इन आते-जाते मौसम में,
मेरा भी बचपन छूट गया।
गलतफ़हमी तब टूट गई,
जब सच का चेहरा सामने था,
हर कोई अपने घर में था,
हर कोई अपने दायरे में था।
कोई पत्नी में डूबा था,
कोई बच्चों में खोया था,
अपने छोटे से सुख में ही,
हर रिश्ता जैसे सोया था।
सब अपने दुख गिनवाते थे,
सब अपनी गाँठें खोल रहे,
और मैं अपने सूने मन में,
कुछ टूटे सपने ढो रहा।
अब अक्सर मेरे शब्द सभी,
मुझ तक वापस आ जाते हैं,
जब बच्चों से कुछ कहता हूँ,
चेहरे क्यों बदल से जाते हैं।
वे धीरे से कह देते हैं—
“अब बच्चों को मत टोका कीजिए,
आप अपने हैं, लेकिन बस
उन्हें अपने जैसा रहने दीजिए।”
किसी का बच्चा रूठ गया,
माँ ने उससे कुछ कह डाला,
कोई घर आकर चुप बैठा,
मन ने भीतर दर्द उछाला।
कोई बोला— “मामा आए”,
कोई बोला— “साए हैं”,
हर चेहरे की मुस्कानों में,
अपने-अपने सन्नाटे हैं।
तब आकर यह जान सका,
मैं वैसा मानव अब न रहा,
जो केवल प्रकृति में जीता,
मन से बिल्कुल सरल रहा।
मैं संस्कृति का मानव हूँ,
रिश्तों को लेकर चलता हूँ,
सूखी हुई संवेदनाओं में,
थोड़ा अपनापन भरता हूँ।
मैं अब भी मिलने जाता हूँ,
हालाँकि मन घबराता है,
इस तेज़ समय की दुनिया में,
अपनापन कम पड़ जाता है।
फिर भी रिश्तों की चौखट पर,
मैं दीप स्नेह का धरता हूँ,
क्योंकि अभी तलक इस जग में,
मैं संस्कृति मानव रहता हूँ।

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