शब्दों की प्रतिध्वनि
— डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"
मरना तो मुझको भी है,
मरना तुमको भी है,
कौन नहीं जानता यह सच—
फिर भी कहाँ हम चुपचाप
लेटे-बैठे रह जाते हैं।
कहाँ किसी को भूखा पाते हैं,
कहाँ बिना संघर्ष के
दिन गुजर जाते हैं।
मानते भी हैं कि चाहे
जितनी कोशिश कर लूँगा,
अपनी झोली मोती-हीरों से भर लूँगा,
फिर भी एक दिन
वह सीमा आ ही जाएगी,
साँस अपना मुकाम पा ही जाएगी।
चाहूँगा भी तो उसके बाद
साँस आगे नहीं जाएगी।
शरीर की कोशिश रहेगी भी तो
उसके हिस्से में
चिता या मिट्टी की ही
परछाई आएगी।
सब कुछ एक पल में ही
अतीत हो जाएगा,
भूतकाल हो जाएगा।
मैं भी इस दुनिया में आया था,
तुम भी इस दुनिया में आए थे—
यह भला बार-बार कौन गाएगा?
कभी-कभी याद भी आ जाएगी
कि वह होता तो ऐसा करता,
तुम होते तो ऐसा करते।
पर इससे किसी के जीवन का
ना तो कोई मतलब होगा,
ना ही कोई बैठकर आँसू गिराएगा।
बस एक कल्पना की तरह
कि पृथ्वी के अलावा भी
कहीं पर जीवन है—
तुम भी किसी के मन में
ऐसे ही आते-जाते रहोगे।
पर आज,
जब तुम ज़िंदा हो,
सोचते ही नहीं
कि मानव जीवन पाकर भी
तुम क्या अपनी मुट्ठी में
पाए रहोगे?
क्या केवल
एक चिड़िया की तरह
दाना चुगने का अर्थ लेकर ही
जीना चाहते हो?
या मानव होने के अर्थ में भी
कभी जीना चाहते हो?
छोड़ जाना चाहते हो
पत्थरों की तरह
अपने विचार को
अमरता की तरफ ले जाकर—
ताकि तुम रहो ना रहो,
तुम्हारे साथ यह दुनिया चलती रहे,
तुम्हारे शब्दों की प्रतिध्वनि पाकर,
तुम्हारे शब्दों की प्रतिध्वनि पाकर।
— डॉ॰ आलोक चांटिया "रजनीश"
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