Sunday, December 11, 2022

घोड़े की गर्मी से

 मुझे भी जीने दो ...........


कूड़े की गर्मी से ,

जाड़े की रात ,

जा रही है ,

पुल पर सिमटे ,

सिकुड़ी आँख ,

जाग रही है ,

कमरे के अंदर ,

लिहाफ में सिमटी ,

सर्द सी ठिठुरन ,

दरवाजे पर कोई ,

अपने हिस्से की ,

सांस मांग रही है ,

याद करना अपनी ,

माँ का ठण्ड में ,

पानी में काम करना ,

खुली हवा में आज ,

जब तुम्हारी ऊँगली ,

जमी जा रही है ,

क्यों नहीं दर्द ,

किसी का किसी को ,

आज सर्द आलोक ,

जिंदगी क्यों सभी की ,

बर्फ सी बनती ,

पिघलती जा रही है ...................




आप अपने उन कपड़ों को उन गरीबों को दे दीजिये जो इस सर्दी के कारण मर जाते है हो सकता है आपके बेकार कपडे उनको अगली सर्दी देखने का मौका दे , क्या आप ऐसे मानवता के कार्य नहीं करना चाहेंगे ??????? विश्व के कुल गरीबों के २५% सिर्फ आप के देश में रहते है इस लिए ये मत कहिये कि ढूँढू कहाँ ?? आलोक चांटिया अखिल भारतीय अधिकार संगठन

Saturday, December 10, 2022

फेंकी हुई रोटी

 घर के बाहर ,

अक्सर दो चार ,

रोटी फेंकी जाती है ,

कभी उसको ,

गाय खाती है ,

कभी कुत्ते खाते,

मिल जाते है ,

घर के बाहर ,

खड़ा एक भूखा ,

आदमी भूख की ,

गुहार लगाता है ,

उसे झिड़की ,दुत्कार ,

नसीहत मिलती है ,

पर वो घर की ,

रोटी नहीं पाता है ,

आदमी के साथ ,

आदमी का यह कैसा, 

रिश्ता चलता है ,

हर आदमी दूसरे को, 

क्यों पैसे से तोलता, 

यहां मिलता है...



जब आपके पास रोज घर के बाहर फेकने के लिए रोटी है तो क्यों नहीं रोज दो ताजी रोटी किसी भूखे को खिलाना शुरू कर देते है क्या मानवता का ये काम आपको पसंद नहीं कब तक गाय और कुत्तो को रोटी खिलाएंगे , ये मत कहियेगा जानवर वफादार होता है , आप बस घर के बाहर पड़ी रोटी पर सोचिये ........... आलोक चांटिया अखिल भारतीय अधिकार संगठन

Wednesday, December 7, 2022

क्यों मानव हम कहलाए

 चारों तरफ मोती ,

बिखरे रहे मैं ही ,

पपीहा न बन पाया ,

स्वाति को न देख ,

और न समझ पाया ,

मानव बन कर ,,

भला मैंने क्या पाया ?

ना नीर क्षीर ,

को हंस सा कभी ,

अलग ही कर पाया ,

ना चींटी , कौवों ,

की तरह ही ,

ना ही श्वानों की ,

तरह भी ,

संकट में नहीं ,

कंधे से कन्धा मिला ,

लड़ क्यों ना पाया ,

मैं मानव क्यों ,

बन नहीं पाया ?

सोचता हूँ अक्सर ,

मानव सियार क्यों ,

नहीं कहलाया ,

हिंसक शेर , भालू ,

विषधर क्यों ,

नहीं कहलाया ?

अपनों के बीच ,

रहकर उनको ही ,

खंजर मार देने के , 

गुण में कही मानव ,

जानवरों से इतर ,

मानव तो नहीं कहलाया ............



मुझे नहीं मालूम कि क्यों मनुष्य है हम और किसके लिए है हम कोई कि अगर आपको जरूरत है है तो तो आप किसी मनुष्य के बारे में जानने की कोशिश करते भी है कि वो जिन्दा है या मर गया वरना आप किसी दूसरे मनुष्य में अपना मतलब ढूंढने लगे रहते है | मैं भी इसका हिस्सा हूँ मैं किसी को दोष नही दे रहा बस समझना चाहता हूँ कि जानवर के गुण तो हमें पता है पर हम!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!आज मैं पूरी तरह स्वस्थ हो गया थोड़े घाव है जो एक दो दिन में भर जायेंगे

Monday, December 5, 2022

सुबह का असर

 निकलकर अंधेरों से सुबह दस्तक तक दे रही है

ठंडी हवाओं से हर दिशा हर सांस खिल रही है 

तुम भी उजालों में आज खोज लेना अपने रास्ते आलोक

 डगर पर सूरज की किरणें तेरे साथ हो रही है 

आलोक चांटिया




हवाओं का रुख कुछ इस तरह हो गया है 


सूरज का रुख आलोक जिस तरह हो गया है 


कभी तपिश तो कभी ठंड का एहसास करा जाती है 


ताल्लुकात का असर अब सरेआम हो गया है 


आलोक चांटिया

सुबह के साथ होने का मजा

 निकलकर अंधेरों से सुबह दस्तक तक दे रही है

ठंडी हवाओं से हर दिशा हर सांस खिल रही है 

तुम भी उजालों में आज खोज लेना अपने रास्ते आलोक

 डगर पर सूरज की किरणें तेरे साथ हो रही है 

आलोक चांटिया

Saturday, December 3, 2022

सच से दूर

 मानते क्यों नहीं 

इस दुनिया में आने के लिए 

हर बीज ने एक अंधेरा 

गर्भ में जिया है 

पृथ्वी को तोड़कर या

 गर्भ की असीम प्रसव पीड़ा

के बाद ही किसी ने 

इस दुनिया में जन्म लिया है

 फिर क्यों भागते हो 

कोई भी दर्द या अंधेरा देखकर 

प्रकृति ने तुम्हें इस 

दुनिया का सच तुम्हें 

दुनिया में लाने से पहले ही दे दिया है 

जी लो इनको भी 

जीवन का असीम पहलू समझकर

 यही तो दर्शन मां,

 प्रकृति, भगवान सभी ने 

इस पृथ्वी के हर प्राणी को दिया है

आलोक चांटिया

अर्थ से दूर

 जब सुबह होने का 

अर्थ जानते हो तो ,

क्यों नहीं उजाले का

अर्थ जीवन में मानते हो l

आंखें बंद करके क्यों ,

पड़े रहते हो कमरो में ,

गति से ही सबकुछ बदलता है 

जब यह खुद मानते हो l