समानांतर कहाँ है?
— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
मैं जानता हूँ मेरे और
तुम्हारे बीच कोई भेद नहीं,
फिर भी इस जीवन-पथ पर
मेरा कोई समवेद नहीं।
लाख कोई बाएँ आ खड़ा हो,
दाएँ अपना हाथ बढ़ाए,
रिश्तों को नव नाम सजाकर
जीवन भर साथ निभाए।
किन्तु राहों की दूरी नापने का
एक ही शाश्वत मंत्र रहा—
मेरे और इस जग के मध्य
सदा एक गहरा अंतर रहा।
जिस मिट्टी के छोटे बीज से
अंकुर बनकर मैं निकला हूँ,
उस मूल को छोड़ किसी और का
कैसे होकर मैं बिखरा हूँ?
वही दर्शन बार-बार मुझे
भीड़ के बीच अकेला करता,
सबके पास खड़ा होकर भी
अपने भीतर मेला भरता।
कोई कहता—"यह अभिमानी है",
कोई कहता—"अपने में खोया",
पर अंतर का निर्मल आलोक
सत्य से कभी नहीं है रोया।
क्योंकि वह तो जन्म-जन्म से
लंबी राह अकेला चलता,
अपने जैसा दूसरा कोई
जीवन-पथ पर कहाँ मिलता?
इस कारण न वह रोता है,
न पीड़ा का गीत सुनाता,
मौन तपस्वी बनकर केवल
अपने सत्य को ही अपनाता।
धरती का जब साथ छूटेगा,
तन का हर बंधन टूटेगा,
तब फिर उसी प्रथम बीज के संग
मेरा अस्तित्व भी छूटेगा।
जो अब सूखकर मिट जाना चाहे,
फिर मिट्टी में सो जाना चाहे,
अंधकार की गहरी गोद में
शांत स्वयं हो जाना चाहे।
क्योंकि हर आलोक अंततः
अपने स्रोत में खो जाता है,
प्रकाश नहीं लौटता फिर से—
बस मौन अनंत हो जाता है।
आलोक कहीं नहीं आता है,
आलोक कहीं नहीं आता है।
— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

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