बरसात (उम्र) प्राकृतिक है शाश्वत है
चाह कर भी कौन भला कैसे रोक पाएगा
वह तो एक दस्तक है जिसको देखने का
अवसर हर किसी के जीवन में
कभी ना कभी तो आएगा
यह बात और है कि जर्जर हो चुके
मकान (बूढ़ा व्यक्ति) को बरसात में
बचाए रखने के लिए रात दिन
पथराई आंखों से दोनों हाथों से
अपनी सांसों से जर्जर मकान के साथ (संतान )
रहने वाला ना जाने कितने प्रयास करता है
कभी-कभी जर्जर मकान आने वाली
समय की गति में बह जाता है
और कभी-कभी जर्जर मकान को बचाने वाला
उसे उसे बरसात में बचा ले जाता है
मकान को देखकर उसके चारों तरफ के लोग
कुछ पल के लिए प्रसन्न भी हो जाते हैं
क्योंकि विरासत को बचाने में
वह सफल होता अपने को पाते हैं
और जर्जर हो चुका मकान भी यह
देखकर खुश प्रसन्न हो जाता है
कि जिनको उसने छत दिया छाया दिया
उनको अपने लिए जीता पाता है
बस बरसात और जर्जर मकान का
यह खेल चलता ही रहता है
यही संबंधों का ताना है यही संबंधों का बाना है
कभी आंसुओं की धार है
कभी खुशियों की झंकार है
यही सोचकर हर कोई प्रकृति के आनंद में
बरसात से बचने के लिए पहले घर बनाता है
फिर उस घर को गिरने से बचाने के लिए
घर को बहुत से हाथ दे जाता है
जो आने वाले कल में बरसात से
अपने को भी बचाने में सफल रहेंगे
बाढ़ जो बहा कर ले जाती घर को
हर व्यक्ति को और सब कुछ
वह जर्जर मकान में हंसकर जीते रहेंगे
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

No comments:
Post a Comment