मैं जीवन से हार गया या
जीवन ही मुझे हार गया
क्यों अपनी सांसों को रोक गया
क्यों अपनी सांसों को ले गया
मैं तो पूरा-पूरा चलना चाहता था
मैं तो पूरा-पूरा होना चाहता था
न जाने वह क्या पढ़ना चाहता था
ना जाने मैं क्या पढ़ाना चाहता था
उठ गया हुआ मुझे कुछ इस तरह से
कि अपनी सांसों को छीन ले गया
चाहे जिस तरह से जीवन जीकर भी मैं हूं
यह उसको मालूम है
वह यह भी जानता है कि कितनी देर
बिना मेरी सांसों के तुम
इस दुनिया में रह पाओगे
क्योंकि बिना सांसों के तो
शरीर कुछ घंटे में सड़ने लगता है
फिर भला इस दुनिया के
लोगों के साथ कैसे चल पाओगे
यह तुम्हें सिर्फ इसलिए
आज तक सम्मान दे रहे थे
मान दे रहे थे क्योंकि मैं
तुम्हारे साथ चल रहा था
मैं तुम्हारे इस निष्प्राण देह से
हर पल तुम्हारे साथ निकल रहा था
पर देखो जब मैं पूरा-पूरा
तुम्हारे इस शरीर के घमंड को
छोड़कर चला गया हूं
कितना बेबस सा तुमको छोड़ गया हूं
फिर भी तुम आज तक कहते रहे
कि मैं मैं मैं ही सब सच का अर्थ हूं
बिना सांसों के सोचो कि
आज में कितना तदर्थ हूं
रहते हो मैं रूठा हूं या जीवन रूठा है
सच तो यह है कि दुनिया में आने का
अर्थ ही ज्यादातर सब झूठ है
तुम उसे झूठ को ही
जीने की आदत डाल चुके थे
उसको ही अपना सब कुछ मान चुके थे
इसलिए आज जब सांस
तुम्हारे जीवन से चली गई है
देखो जीवन कितनी बेबसी के साथ
इस दुनिया में रह गई है
कभी अगर तुमने सास और
जीवन को जोड़कर देख लिया होता
तो जीवन का अर्थ
सांसों के साथ जी लिया होता
पर आप जब सांसे तुम्हारे जीवन से चली गई हैं
तब तुमको जीवन का अर्थ समझ में आ रहा है
पर अब कर भी क्या सकते हो
क्योंकि मुट्ठी में तो सिर्फ अंधेरा आ रहा है
सिर्फ अंधेरा आ रहा है
इसलिए जब भी तुम अगली बार
इस दुनिया में आने की कोशिश करना
तो सिर्फ जिंदा रहकर ही मरना
ताकि जब इस दुनिया को
फिर से छोड़ कर जाओगे तो
जीवन और सांसों का अर्थ
दुनिया को बता जाओगे
केवल जागकर खाकर रहकर
सोकर जीवन बिताना जीवन नहीं होता है
जो इस दुनिया को और सुंदर बना दे
वही मानव होता है वही मानव जीवन होता है
आलोक चांटिया "रजनीश"
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