रास्ता हो ना हो कहीं भी
फिर भी अगर प्रवाह निरंतर है
तो रास्ते बन ही जाते हैं
हम कहां कब गंगा के लिए
कोई रास्ते बनाते हैं
हिमालय की गंगोत्री से निकलकर
उसके जल रश्मियों का प्रवाह
एक अनकहे रास्ते बना जाते हैं
और फिर हम उस गंगा का
रास्ता भी समझ पाते हैं
उन रास्तों पर चलकर हम अमर हो जाते हैं
जरूरी नहीं हम हर पल
इसी बात का इंतजार करते रहे
कि हमें अभी कोई रास्ता
समझ में नहीं आ रहा है
मालूम नहीं हमारा जीवन
अब कब किधर जा रहा है
सिर्फ प्रवाह का ध्यान कर लेना ही
रास्ते का निर्माण हो जाएगा
एक बार अंतस में जब उस
प्रवाह का उद्दीपन आ जाएगा
रास्ते स्वयं ही बनते चले जाएंगे
और जीवन में गंगा जमुना सरस्वती
रेवा महानदी गोदावरी की तरह हम
अपने-अपने होने के अर्थ में
रहते चले जाएंगे
इसीलिए रास्तों का इंतजार करने की
आदत छोड़ देना है
सिर्फ अपने अंदर के प्रवाह को
अंदर से बाहर की तरफ दे देना है
आलोक चांटिया रजनीश
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