Tuesday, July 22, 2025

कौन निकलना चाहता है आलोक चांटिया "रजनीश"

 हर दिन मेरे अंदर कोई चीखना चाहता है

न जाने वह कौन है जो

निकलना चाहता है बाहर

उसके अंदर एक तड़प है जुनून है

वह अब मेरे साथ रुकना नहीं चाहता है

वह चाहता है वह हर पल जी लेना

ताकि वह दे सके जो है उसे देना

उसके भीतर अब वह

संयम भी नहीं रह गया है

निरंतर चलते-चलते वह थक सा गया है

सोच रहा है कब तक

सिर्फ इस बात का इंतजार करते रहना होगा

 कि एक दिन मेरा भी अपना होगा

इसीलिए मेरे अंदर वह रोज

चीखने की कोशिश करता है

मेरी पकड़ में तिल तिल करके मरता है

वह नहीं चाहता है कि वह चुपचाप

बैठा बैठा रोज पूर्व से उगते हुए

सूरज को और शाम को डूबते हुए

सूरज को देखता रहे

और जीवन में भाग्य होता है

प्रारब्ध होता है बस इसको कहे

वह चाहता है अपने श्रम को

जी भर के जी लेना

ताकि कर्म पथ पर वह मानव था

इसका अर्थ चाहता है देना

इसीलिए वह मुझे छोड़ देना चाहता है

मेरे अंदर का मनुष्य

बाहर निकलना चाहता है

डर-डर कर जीने वाला आलोक

अब उसे अच्छा नहीं लगता है

किसी तरह मुट्ठी में दो रोटी

समेट लेने की बात अब वह नहीं करता है 

वह चाहता है की पूरी पृथ्वी को

वह वामन अवतार की तरह नाप डालें

और अपने भीतर अपने होने का

वह सारा अर्थ कह डाले

इसके लिए उसे मानव कहा जाता है

और वह इस पशु जगत में श्रेष्ठ

मानव बनकर आता है

इसीलिए उसकी चीख अब सीमा से

परे जाकर सुनाई दे रही है

अंदर मनुष्यता अपनी अंगड़ाई ले रही है

 शायद भोर का समय

अब आने जा रहा है

अंधेरे से दूर हर कोई आलोक

पाने जा रहा है

यही वह बेला है जब मनुष्य

मनुष्य को समझ पाएगा

और पृथ्वी पर अपने होने का अर्थ

तदर्थ करके नहीं उस शब्दार्थ को

भावार्थ के साथ दिखलाएगा

आलोक चांटिया "रजनीश"


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