Thursday, July 31, 2025

सांसों के कोठे पर" — आलोक चांटिया “रजनीश”

 "सांसों के कोठे पर"

— आलोक चांटिया “रजनीश”


आरोपो के घुंघरू बाँधकर,

सांसों के कोठे पर नाच रहा हूं।

हर ओर नीलामी चल रही है,

कहीं बोली है, कहीं ठिठोली है।


रिश्तों की बड़ी अजीब हमजोली है —

ना जाने किसे क्या अच्छा लगता है,

पर कोई नहीं चाहता

कि ये घुंघरू चुप हो जाएं,

या कोई सीता अग्निपरीक्षा देकर

अमर कहलाए।


हर कोई अपने दामन में

हरिश्चंद्र को लिए घूमता है,

और किसी करण से इंद्र बनकर

कवच-कुंडल छीनता है।


पर जो दूसरों की खुशी में जीता है,

वह तो सांसों के कोठे पर भी

मुस्कुरा लेता है।


जब आरोप छलनी से भी ज्यादा

छेद दे जाते हैं,

तो मन पूछता है —

क्यों ये स्वर अब तक

घुंघरुओं में गूंजते जाते हैं?


जीवन की इस राह पर,

कर्म की कीच में लथपथ होकर भी

मैं प्रसन्न दिखता हूं,

क्योंकि हर नए आरोप के साथ

किसी का मन मयूर मचलता है।


यही तो जीवन की रसधार है —

संगीत की तरह।

यहां तो तबले के ऊंचे सुर में भी

गुस्सा बजता है,

और बिजली के लट्टू

झूठी चमक में खिले-खिले रहते हैं।


अभिमन्यु दम तोड़ता है

और हर दिशा से

उसे बस कौरव ही मिलते हैं।


भूखी मां हंसती रहती है,

कभी किसी से कुछ नहीं कहती —

अपनी छाती से अमृत देती रहती है।


उसी मां की खातिर,

कोठे पर भीष्म-सा गिरना

आसान हो जाता है।


हां, आरोपों के तीरों से

जीवन छलनी हुआ है,

पर कौन मार सकता है मुझे —

जब इच्छा मृत्यु का वरदान लिए

हर किसी के लिए जीता आया हूं?


हर पल यही संदेश दिया है —

कि यदि मानव होकर

दर्द नहीं सहा,

तो पशु से कैसे अलग कहलाओगे?


तो स्वीकार करो वो हिम्मत —

और आरोपों से हाथ मिलाकर

हंसते हुए साथ चलना सीखो।


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