Thursday, July 24, 2025

सच को स्वीकार करो

 

आज जो रुपया दस तुमने बिना
खाना खाये परिवार के लिए बचाए हैं
वही परिवार आने वाले समय में
तुमसे पूछेगा यह रुपए कहां से आए हैं.                              परिवार मानने को तैयार ही नहीं हो पाएगा 

और अपने आप में ही सारे

अनैतिक सारे झूठ चोरी के आदर्श
आपके सामने ले आएगा
कि वह मान ही नहीं पाता है
कि कोई भूखा रहकर अपने
परिवार के लिए जिंदा रह सकता है
और बाल्मिकी बनने से पहले
रत्नाकर रह सकता है
भागते दौड़ते जीवन के पथ पर
कौन भला यह मान पाता है
इस दुनिया में कोई अपनों के खातिर
भूखा भी रह पाता है
परिवार के बोझ का संकेत समझकर
अगर तुम बिना शादी के खड़े रह जाओगे सच मानो कल तुम अभिमन्यु की तरह अपने को चक्रव्यूह में गिरा हुआ पाओगे लोग तुमसे सवाल पूछेंगे
कि जब तुम अपने जीवन में
किसी का सहारा नहीं बन सके
तो तुम क्या हमारे लिए कर पाओगे
उस समय तुम सिर्फ मौन रहकर
चुप रह जाओगे
क्योंकि तुम यहां समझ ही नहीं पाओगे
कि पशु जगत से आगे निकलकर
जिस मानव ने संस्कृति को बनाया
जिसके कारण तुम्हारे हिस्से में भी
सदाचार नैतिकता समर्पण आया
वह न जाने कहां
विलुप्त होता दिखाई देगा
हर कोई अपनी पीठ को खुद
दबाकर सर्वोच्चता ले लेगा
कोई नहीं मानेगा जानवर की तरह
सिर्फ प्रजनन की दुनिया से निकलकर
तुम सिर्फ मानव बनने की तरफ
उनके लिए बढ़ना चाहते थे
इसीलिए अपने संपूर्ण जीवन को
समर्पित कर देना चाहते थे
उनके लिए जो पशु जगत से
कुछ बेहतर होकर मानव की संस्कृति में भूख प्यास प्रजनन सभी के
रास्तों से होकर गुजरना चाहते थे
और तुम सिर्फ इस बात को
महसूस करके आदमी बनना चाहते थे
बस तुम्हारी गलती सिर्फ इतनी सी रही
कि तुम ना संयासी बन पाए
ना पशु से बेहतर कुछ
उस तरह के मनुष्य बन पाए
जो सभी बनना चाहते थे
इसीलिए तुम प्रश्नों की वर्षा से
अपने को भेदता हुआ पा रहे हो
अंधेरे में खड़े होकर ज्ञान के
आलोक की तरफ आ रहे हो
अब तुम्हारे भीतर से वह
मानव निकलना चाह रहा है
जिसमें द्वैत, अद्वैत ,विशिष्ट द्वैत ,
अवतार की सीमाओं पर अपने को पा रहा है पर इन सब से दूर अभी तुम्हें
शास्त्रार्थ के सागर से होकर निकलना होगा नैतिकता के समर में अब
तुमको कुछ तो बदलना होगा
आलोक चांटिया "रजनीश"

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