Thursday, July 31, 2025

सांसों के कोठे पर" — आलोक चांटिया “रजनीश”

 "सांसों के कोठे पर"

— आलोक चांटिया “रजनीश”


आरोपो के घुंघरू बाँधकर,

सांसों के कोठे पर नाच रहा हूं।

हर ओर नीलामी चल रही है,

कहीं बोली है, कहीं ठिठोली है।


रिश्तों की बड़ी अजीब हमजोली है —

ना जाने किसे क्या अच्छा लगता है,

पर कोई नहीं चाहता

कि ये घुंघरू चुप हो जाएं,

या कोई सीता अग्निपरीक्षा देकर

अमर कहलाए।


हर कोई अपने दामन में

हरिश्चंद्र को लिए घूमता है,

और किसी करण से इंद्र बनकर

कवच-कुंडल छीनता है।


पर जो दूसरों की खुशी में जीता है,

वह तो सांसों के कोठे पर भी

मुस्कुरा लेता है।


जब आरोप छलनी से भी ज्यादा

छेद दे जाते हैं,

तो मन पूछता है —

क्यों ये स्वर अब तक

घुंघरुओं में गूंजते जाते हैं?


जीवन की इस राह पर,

कर्म की कीच में लथपथ होकर भी

मैं प्रसन्न दिखता हूं,

क्योंकि हर नए आरोप के साथ

किसी का मन मयूर मचलता है।


यही तो जीवन की रसधार है —

संगीत की तरह।

यहां तो तबले के ऊंचे सुर में भी

गुस्सा बजता है,

और बिजली के लट्टू

झूठी चमक में खिले-खिले रहते हैं।


अभिमन्यु दम तोड़ता है

और हर दिशा से

उसे बस कौरव ही मिलते हैं।


भूखी मां हंसती रहती है,

कभी किसी से कुछ नहीं कहती —

अपनी छाती से अमृत देती रहती है।


उसी मां की खातिर,

कोठे पर भीष्म-सा गिरना

आसान हो जाता है।


हां, आरोपों के तीरों से

जीवन छलनी हुआ है,

पर कौन मार सकता है मुझे —

जब इच्छा मृत्यु का वरदान लिए

हर किसी के लिए जीता आया हूं?


हर पल यही संदेश दिया है —

कि यदि मानव होकर

दर्द नहीं सहा,

तो पशु से कैसे अलग कहलाओगे?


तो स्वीकार करो वो हिम्मत —

और आरोपों से हाथ मिलाकर

हंसते हुए साथ चलना सीखो।


एक कदम भोर की ओर -आलोक चांटिया "रजनीश"

 





"एक कदम भोर की ओर"


मर जाने की बात करके

तुम क्या जताना चाहते हो?

इस नश्वर दुनिया में आकर

इन शब्दों से क्या दिखाना चाहते हो?


तुम्हें क्यों लगता है

कि इस दुनिया में

किसी को तुम्हारी ज़रूरत नहीं है?

तुम रहो या ना रहो —

ये कोई शोहरत नहीं है।


असल में,

तुम्हें लगता है कि अब कोई

तुम्हें समझ नहीं पा रहा,

कोई एक पल का भी वक़्त

तुम्हारे लिए नहीं निकाल पा रहा।


इसीलिए तुम उस राह पर

चले जाना चाहते हो —

जहां एक दिन

हर किसी को

चाहे-अनचाहे पहुँचना होता है।


कोई चिता पर जलता है,

कोई ज़मीन में गड़ता है।

मान लिया,

दुनिया में कोई साथ नहीं दे रहा —

पर क्या तुम्हारा अंतस,

तुम्हारा मन

तुम्हारा साथ दे रहा है?


जब तुम अपने ही मन से हारने लगे हो,

तो इस दुनिया में

कैसे खुद को विजेता कह पा रहे हो?


यह दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती।

शेर भी खुद के लिए जीता है,

हाथी भी अपने लिए।

कौआ उड़कर पानी पीता है,

गिलहरी दौड़ती है, गौरैया उड़ती है —

हर कोई जीवन के एक दाने के लिए जीता है।


तो तुम क्यों सोच बैठे थे

कि कोई तुम्हारा हाथ पकड़कर

पूरे जीवन तुम्हें राह दिखाएगा?

और तुम्हारे सन्नाटे से भरे दरवाज़े पर

हर रोज़ कोई दस्तक देगा?


प्रकृति ऐसी कहानी नहीं लिखती।

और संस्कृति?

वो भी केवल सहारे का नाम नहीं —

साँसों से ज़्यादा कोई साथ नहीं होता।


आसमान में उड़ते पंछियों की तरह,

समुद्र में तैरते जीवों की तरह —

बस चलो, कर्मवीर बनकर चलो।


विश्वविजेता हो इस पृथ्वी के,

महामानव बनो —

कम से कम एक बार तो जीकर देखो।


जब अंत तय ही है,

तो क्यों न जीवन में

एक बार साँसों को

सचमुच का अर्थ दे दो?


एक बार —

बस एक बार

अपने भीतर "मानव" को पहचान कर जी लो।


अपनी मुट्ठी में

आत्महत्या के अंधेरे को

जोर से दबाओ —

और एक कदम…

बस एक कदम,

भोर की ओर चल पड़ो।


— आलोक चांटिया “रजनीश”


Wednesday, July 30, 2025

दर्द या ज्वालामुखी आलोक चांटिया "रजनीश"

 ज्वालामुखी


दर्द की असीम वेदनाओं को

तुम "ज्वालामुखी" कह

धरती से मुंह मोड़ कर

किधर चले जा रहे हो?


क्या यूँ ही,

बेवजह उसे आज

अपने सामने फटता हुआ पा रहे हो?


उसने कब चाहा था

कि तुम चलो

दहकते लावे पर?


कभी नज़र तो डालो —

अपने पाँवों के नीचे

कितनी कोमल, हरी घास

बिछाई थी उसने।


पर तुम कब समझ पाए

उसका समर्पण, उसका त्याग,

वो मौन भावना

जो बस यही चाहती थी —

तुम्हें हँसता हुआ देखना।


क्या तुम्हारे भीतर

उसके लिए कोई भावना थी कभी?

क्या अब समझ पा रहे हो

उसकी अंतहीन उपेक्षा की थकान?


अब वह ज्वालामुखी बन

फट रही है —

क्या इस रूप को भी

समझ पा रहे हो?


किसी को बार-बार

परीक्षा में डालना,

कहाँ की समझदारी है?


धरती का भी दिल धड़कता है —

शायद अब

तुम्हें यह अहसास हो रहा है।


उस बहते लावे में झुलस न जाओ —

इसी डर से

तुम खुद को बचाते फिर रहे हो।


काश,

कभी उसे भी

अपने जैसा समझ लेते —

आज क्यों

सिर्फ उसके विनाश को देखकर

चौंक रहे हो?


मुस्कुराहट देखकर

किसी को अंतहीन सुखी समझ लेना —

तुम्हारी सबसे बड़ी भूल है।


उस हँसी के पीछे

शायद कोई चुभता हुआ शूल हो —

क्या यह कभी सोचा?


क्या तुम्हारा ही दुख

सब कुछ था, आलोक?


उसके जीवन का अंधेरा

क्यों नहीं देख पाए?


अब जब जीवन मिला है,

तो बेचैन हो उठे हो —

क्या इसी को

मानव होने का अर्थ कहते हो?


— आलोक चांटिया "रजनीश"

Monday, July 28, 2025

आदमी न जाने कहां खो गया है- आलोक चांटिया "रजनीश"

 आदमी न जाने कहां खो गया है

बंद कमरों में वह चुपचाप हो गया है

समझ नहीं पाता है कहां खोज कर

वह लाये आदमी होने की परिभाषा को

वह जिधर भी देता है

बेबसी उदासी कुछ मुट्ठी में

समेट लेने की चाहत

कोई संघर्षों से तो कोई

अपनों से ही हुआ है आहत

आदमी समझ कर कोई किसी से

बोला भी क्या हाल है अगर

तो एक शून्य को निहार थी आंखें

और एक प्रश्न होता है मगर

कौन हो तुम मेरा तुमसे मतलब क्या है

तुम मुझे चाहते क्या हो

आज कौन सा काम तुम्हारा मुझसे पड़ गया है 

जो तुम मेरे पास आ गए हो

क्यों बेवजह बैठकर मेरा

कीमती समय तुम खा गए हो

मुझे अभी ढूंढनी है अपने लिए दो रोटी

मैं कोई जानवर नहीं हूं जो

घर के बाहर रोज आराम से

मिल जाए मुझे दो रोटी

बेवक्त मेरे घर ऐसे मत आया करो

जहां मन करे वहां जाया करो

हताश खड़ा हुआ इन सारी बातों को

सुनकर देखता रहता है

समझ नहीं पाता कि सामने वाला

यह क्या कहता रहता है

वह तो सिर्फ आदमी की खोज में

यहां तक आया था

थोड़ी देर बैठेगा और मुस्कुराहट 

आपस की कुछ जिंदगी की

 बातें करके चला जाएगा

पर यहां तो आदमी को

उसने कही नहीं पाया था

अंत में उसे कहना पड़ता है

कि लगता है तुम्हारा समय बहुत कीमती है

 तुम बहुत व्यस्त हो

मैं गलत समय पर आ गया हूं

माफ करना किसी दिन मैं फिर आ जाऊंगा 

अगर तुम्हें समझ में आएगा

तो उस दिन ही मानव को पा जाऊंगा

और चुपचाप वह उस दरवाजे से

निकल जाता है जिसके भीतर घुस कर

वह जिसे आदमी समझ कर आया था

वहां पर एक शून्यता पाता है

समझ नहीं पा रहा है

कि आदमी आज कहां खो गया है

बंद कमरों में कितने आंसुओं के साथ

वह आलोक रो गया है

सुबह से शाम शाम से रात

रात से फिर सुबह सिर्फ दवा के ढेर के साथ

 अपने को जिंदा रखने के एहसास में

दो पैरों पर चलने वाला भाग चला जा रहा है 

अब उसे इससे भी नहीं मतलब

कि कौन मर जा रहा है

किसकी शादी हुई किसकी नहीं हुई

किसके घर खाना था

किसके घर खाना नहीं था

वह तो सिर्फ अपने को

ढूंढने में चला जा रहा है

उसे अब यह भी याद नहीं

कि इस पृथ्वी पर पशु जगत के बीच

उसकी परिभाषा मानव के रूप में दी गई थी 

इस मानव के अवतार के रूप में

हर धर्म में न जाने कितने आए थे

और उन्होंने जीवन की वह दर्शन

हम सबको पढ़ाए थे

जियो जीने दो के गीत

हमको सुनाये थे

पर अब तो लगता है कि वह सारे अवतार

और गीत कहीं अंधेरे में खो गए हैं

मानव अपने दबाव में ही

किसी अंधकार में खो गए हैं

अब खोज कर निकालना मानव को भी

इस दुनिया में एक काम हो गया है

आदमी किसे कहा जाए

यह भी एक प्रश्न हो गया है

आलोक चांटिया "रजनीश"


Thursday, July 24, 2025

सच को स्वीकार करो

 

आज जो रुपया दस तुमने बिना
खाना खाये परिवार के लिए बचाए हैं
वही परिवार आने वाले समय में
तुमसे पूछेगा यह रुपए कहां से आए हैं.                              परिवार मानने को तैयार ही नहीं हो पाएगा 

और अपने आप में ही सारे

अनैतिक सारे झूठ चोरी के आदर्श
आपके सामने ले आएगा
कि वह मान ही नहीं पाता है
कि कोई भूखा रहकर अपने
परिवार के लिए जिंदा रह सकता है
और बाल्मिकी बनने से पहले
रत्नाकर रह सकता है
भागते दौड़ते जीवन के पथ पर
कौन भला यह मान पाता है
इस दुनिया में कोई अपनों के खातिर
भूखा भी रह पाता है
परिवार के बोझ का संकेत समझकर
अगर तुम बिना शादी के खड़े रह जाओगे सच मानो कल तुम अभिमन्यु की तरह अपने को चक्रव्यूह में गिरा हुआ पाओगे लोग तुमसे सवाल पूछेंगे
कि जब तुम अपने जीवन में
किसी का सहारा नहीं बन सके
तो तुम क्या हमारे लिए कर पाओगे
उस समय तुम सिर्फ मौन रहकर
चुप रह जाओगे
क्योंकि तुम यहां समझ ही नहीं पाओगे
कि पशु जगत से आगे निकलकर
जिस मानव ने संस्कृति को बनाया
जिसके कारण तुम्हारे हिस्से में भी
सदाचार नैतिकता समर्पण आया
वह न जाने कहां
विलुप्त होता दिखाई देगा
हर कोई अपनी पीठ को खुद
दबाकर सर्वोच्चता ले लेगा
कोई नहीं मानेगा जानवर की तरह
सिर्फ प्रजनन की दुनिया से निकलकर
तुम सिर्फ मानव बनने की तरफ
उनके लिए बढ़ना चाहते थे
इसीलिए अपने संपूर्ण जीवन को
समर्पित कर देना चाहते थे
उनके लिए जो पशु जगत से
कुछ बेहतर होकर मानव की संस्कृति में भूख प्यास प्रजनन सभी के
रास्तों से होकर गुजरना चाहते थे
और तुम सिर्फ इस बात को
महसूस करके आदमी बनना चाहते थे
बस तुम्हारी गलती सिर्फ इतनी सी रही
कि तुम ना संयासी बन पाए
ना पशु से बेहतर कुछ
उस तरह के मनुष्य बन पाए
जो सभी बनना चाहते थे
इसीलिए तुम प्रश्नों की वर्षा से
अपने को भेदता हुआ पा रहे हो
अंधेरे में खड़े होकर ज्ञान के
आलोक की तरफ आ रहे हो
अब तुम्हारे भीतर से वह
मानव निकलना चाह रहा है
जिसमें द्वैत, अद्वैत ,विशिष्ट द्वैत ,
अवतार की सीमाओं पर अपने को पा रहा है पर इन सब से दूर अभी तुम्हें
शास्त्रार्थ के सागर से होकर निकलना होगा नैतिकता के समर में अब
तुमको कुछ तो बदलना होगा
आलोक चांटिया "रजनीश"

Wednesday, July 23, 2025

दर्द को समझना होगा- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

दर्द हर किसी के अंदर बस ठीक
उसी तरह से बहता रहता है
जैसे धरा के भीतर धधकता
आग का गोला चलता रहता है
भला कौन कहां जान पाता है
कि पृथ्वी अंदर न जाने कब से
इतनी ज्यादा झुलस रही है
बस हरियाली देखकर ही हम
यह मान लेते हैं कि वह
जीवन के अर्थ में मगन रही है
पर सच तो यही है
कि पृथ्वी के अंदर भी आग है
कंकड़ है पत्थर है
हम सिर्फ सतह पर हरियाली देखकर ही पृथ्वी के सच को समझने की
कोशिश करने लगते हैं
क्या कभी पृथ्वी के साथ
कुछ पल देकर उसके अंदर
झांकने की भी कोशिश करते हैं
शायद हमारी आंखों को सिर्फ
अपने सुख का अर्थ ढूंढने की
एक ऐसी आदत सी हो गई है
कि अंदर की सारी संवेदना
ना जाने कहां सो गई है
इसीलिए तो पृथ्वी के संवेदनाओं से दूर
हम सिर्फ उसकी सतह पर फैली
हरियाली उस पर बहती
नदियों के तरंगों के साथ अपने
जीवन की खुशी के लिए जीना चाहते हैं भला कहां एक पल उस
पृथ्वी के लिए जिसने हमें
जीवन का अर्थ दिया उसके साथ
कुछ पल भी रहना चाहते हैं
इसीलिए कोई नहीं जान पाता है
कि दर्द किसके अंदर बह रहा है
और चुपचाप वह हमारे सामने
क्या कह रहा है
हम तो सिर्फ आदमी का चेहरा देखकर उसको थोड़ी देर जी लेते हैं
भला उसके अंदर झांकने के लिए
कोई भी समय कहां देते हैं
दर्द की यह कहानी हर कहीं
हर समय से चल रही है
कहीं धरती अपने अंदर जल रही है
कहीं मानवता कुचल रही है
दर्द का यह पथ कोई आज
पहला नहीं सुन रहा हूं
मैं हर कहीं आलोक के भीतर
पग पग पर अंधेरा पा रहा हूं
दर्द को समझने के लिए हर कोई
समय निकालने की अगर
आदत डाल नहीं पाएगा
तो एक दिन धरती की तरह
हर किसी के अंदर ज्वालामुखी
हर पल फटता पाएगा
आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, July 22, 2025

कौन निकलना चाहता है आलोक चांटिया "रजनीश"

 हर दिन मेरे अंदर कोई चीखना चाहता है

न जाने वह कौन है जो

निकलना चाहता है बाहर

उसके अंदर एक तड़प है जुनून है

वह अब मेरे साथ रुकना नहीं चाहता है

वह चाहता है वह हर पल जी लेना

ताकि वह दे सके जो है उसे देना

उसके भीतर अब वह

संयम भी नहीं रह गया है

निरंतर चलते-चलते वह थक सा गया है

सोच रहा है कब तक

सिर्फ इस बात का इंतजार करते रहना होगा

 कि एक दिन मेरा भी अपना होगा

इसीलिए मेरे अंदर वह रोज

चीखने की कोशिश करता है

मेरी पकड़ में तिल तिल करके मरता है

वह नहीं चाहता है कि वह चुपचाप

बैठा बैठा रोज पूर्व से उगते हुए

सूरज को और शाम को डूबते हुए

सूरज को देखता रहे

और जीवन में भाग्य होता है

प्रारब्ध होता है बस इसको कहे

वह चाहता है अपने श्रम को

जी भर के जी लेना

ताकि कर्म पथ पर वह मानव था

इसका अर्थ चाहता है देना

इसीलिए वह मुझे छोड़ देना चाहता है

मेरे अंदर का मनुष्य

बाहर निकलना चाहता है

डर-डर कर जीने वाला आलोक

अब उसे अच्छा नहीं लगता है

किसी तरह मुट्ठी में दो रोटी

समेट लेने की बात अब वह नहीं करता है 

वह चाहता है की पूरी पृथ्वी को

वह वामन अवतार की तरह नाप डालें

और अपने भीतर अपने होने का

वह सारा अर्थ कह डाले

इसके लिए उसे मानव कहा जाता है

और वह इस पशु जगत में श्रेष्ठ

मानव बनकर आता है

इसीलिए उसकी चीख अब सीमा से

परे जाकर सुनाई दे रही है

अंदर मनुष्यता अपनी अंगड़ाई ले रही है

 शायद भोर का समय

अब आने जा रहा है

अंधेरे से दूर हर कोई आलोक

पाने जा रहा है

यही वह बेला है जब मनुष्य

मनुष्य को समझ पाएगा

और पृथ्वी पर अपने होने का अर्थ

तदर्थ करके नहीं उस शब्दार्थ को

भावार्थ के साथ दिखलाएगा

आलोक चांटिया "रजनीश"


Sunday, July 20, 2025

सुंदरता का श्राप आलोक चांटिया "रजनीश"

 


जो जितना सुंदर है उसका
जीवन उतना ही दूभर है
सुंदर हमको लगी पृथ्वी
देखो उसका क्या हाल है
सुंदरता में मिला है गुलाब जो
चारों तरफ उसकी भी रहता
हाथों का मकड़ जाल है
सुंदरता के खातिर तोड़ा जाता
हर दिन एक फूल है
सुंदर होने का उसको मिलता
यही एक शूल है
सुंदरता में आकर्षित करने का गुण
निहित होता है
इसीलिए मकरंद को लेकर
वह हर पल अपना जीवन जीता है
खींचता है ध्यान किसी भंवरे
तितली का हर पल
जानता है अगर समय से नहीं किया कर्म
तो फिर आने वाली पीढ़ी का
दुखदाई होता कल
इसीलिए पराग कण का लक्ष्य देकर
वह बुलाता है एक भंवरे को
और पराग को दूर तलक बिखर देना
कहता है उसे भंवरे को
क्योंकि जानता है सुंदरता है बहुत क्षणिक बस इसका अर्थ होता है तदर्थ
अक्सर इसी सुंदरता के कारण
वह हर हाथ से तोड़ा जाता है
कभी प्रियसी के बालों में गूंथा
तो कभी भगवान पर चढ़ जाता है
कभी शव की शोभा बढ़ाता
कभी पथ पर बिखर जाता है
सुंदरता का यही अर्थ
जब हमें समझ में आता है
तब तक मुट्ठी में अंधेरा
सिर्फ हमारे रह जाता है
सुंदरता मन की हो तो
जीवन अच्छा बनता है
सुंदरता बाहर की हो तो
जीवन हर पल हर कोई खनता है
इसीलिए जो भी भागा
सुंदरता को लेकर जागा
वह बस दुनिया को पकड़ने की
कोशिश करता रहता है
जो भीतर थी सुंदरता उसके
उससे भ्रमित ही रहता है
इसीलिए इस दुनिया में
सुंदरता के चक्कर में जो जाता है
उसके जीवन में सुख के कुछ पल आते हैं पर लंबा सुख ना पाता है
इसी सुंदरता को महसूस भी करके पृ
थ्वी की क्या दुर्गत हमने कर डाली है
जिस मानव को पैदा करके उसने
समझा था यह तो माली है
आज कठिन है जीवन इस धरा पर
मानव का इस कारण से
क्योंकि सुंदरता को बर्बाद किया
मानव ने अपने मारण से
सिसक रहा है मानव अब कैसे
जीवन अपना और धरा का बचा मैं पाऊं सुंदरता कर्म में होती
कैसे जग को मैं समझाऊं
असली सुंदरता क्या होती मानव
अब समझ गया है
भस्मासुर बनने से पहले
वह शिव अर्थ तक पहुंच गया है
आलोक चांटिया "रजनीश"

Saturday, July 19, 2025

तरल हीरा आलोक चांटिया "रजनीश"


 "तरल हीरा"

—आलोक चांटिया "रजनीश"


दर्द आंखों से क्यों बहता है,

दुनिया से ये क्या कहता है?

सब समझते हैं बस पानी है,

पर ये तो कोई कहानी है।


ये बहता है कुछ कहने को,

चुपचाप बहुत कुछ सहने को।

यूँ ही नहीं गिरता बाहर ये,

भीतर कुछ है जो करता क्षोभ।


मत समझो इसको पानी मात्र,

जो निकल गया यूँ बस यूँ ही।

ये दर्द का है तरल हीरा,

जिसमें छुपा है जीवन जी।


कभी कोई इसे पढ़ लेता है,

कभी कोई न समझ पाता है।

कोई कहता ढोंग-दिखावा,

पर ये दिल से निकल आता है।


आंसू इतनी आसानी से

नहीं छोड़ते शरीर को।

जब भीतर अपमान का जहर हो,

तब फूट पड़ते हैं नीर को।


आंखों से गिरता पानी जब,

‘आंसू’ बन जाता है नाम।

हर जीवन में आता क्षण ये,

कभी दर्द, कभी खुशियों का काम।


खुशी में भी आंसू बहते हैं,

फिर क्यों इनका अर्थ हमेशा दर्द है?

जब भी आते, जब भी गिरते,

दर्द का प्रतिबिंब बन बिखरते।


कहां इतना आसान है उस पार तक' जानाआलोक चांटिया "रजनीश"

 

कहां इतना आसान है उस पार तक जाना 

केवल सोच कर ही आदमी डर जाता है
तिल तिल करके मर जाता है
सुबह शाम रात दुपहरी सिर्फ
इसी चिंता में लगा रहता है
किस तरह से उसे पार है जाना
पार करना अगर इतना आसान होता
तो लोग नाव जहाज क्यों बनाकर
पानी में उतारते
हर पल अपने जीवन को सिर्फ
इसी चिंता में निखारते
कि किसी तरह से अगर मैं
आसानी से उस पार चला जाता
तो जीवन क्या होता है
इसको मान जाता
पर पार करने की इसी जुगत में
वह कभी यह जान भी नहीं पाता है
कि इस दुनिया में वह
मानव बनकर आया था
पशु जगत में जानवर से कहीं ऊंचा
अपने को श्रेष्ठ बताया था
पर आज उसकी मुट्ठी में डर के सिवा
कुछ भी नहीं रह गया है
बस उस पार जाना है
जिसे देखिए वही कहा गया है
उस पार जाने के लिए वह अपनी
मुस्कुराहट तक भूल चुका है
जो उसके अपने थे उनको भी
बहुत पीछे छोड़ चुका है
क्योंकि पार जाने की कश्मकश में
वह इतना उलझा हुआ है
उसे अपनी मुट्ठी में
अंधेरा होने का भ्रम हुआ है
इसीलिए वह न जाने कितना उजाला
सुबह से शाम तक पकड़ता रहता है
जब देखो सिर्फ एक ही बात कहता रहता है मुझे भी किसी तरह से उस पार जाना है अपने जीवन को अच्छा बनाना है
सांसों की नैया पर न जाने कितना
वह न्योछावर कर देना चाहता है
ताकि उस पार जाने में वह
सारे सुख पाना चाहता है
पर कई बार इसी उस पार जाने में
वह एक खोखला आदमी
बनकर खड़ा रह जाता है
क्योंकि पार जाने के लिए किसी से
कोई भी उसके पास ना नाता है
ना कोई आता है
इस दौड़ में वह इतना और इतना
अकेला रह जाता है
एक दिन जब उस पार जाने के लिए
वह उसे परम शक्ति को याद करता है
जिसे दुनिया को बनाया है
कहते हैं जिसके कारण ही पृथ्वी पर
जीवन का एक सुंदर सा अर्थ आया है
तब वह भी मुस्कुरा कर मानो
उसे यही कहता है
कि आज तक तुम सिर्फ पार जाने की
जुगत में ही तो लग रहे हो
कभी किसी भी पल
मेरी सुमिरन की भी बात कहे हो
आप जब तुम्हारे हाथ में वास्तव में
अंधेरे के सिवा कुछ भी नहीं रह गया है
तब उस पार जाने के डर से
तुम्हारे पास सिर्फ मेरा ही नाम रह गया है पर अब उस पार जाने का
वह प्राकृतिक सत्य तुम्हें अपनाना होगा
और मानव से दूर खड़े होने का अर्थ
तुम्हें आज समझाना होगा
कितना कुछ तुमने अवसर को
गंवा डाला पशु जगत में
अपने जीवन को तुमने हाला बना डाला
नहीं तो श्रेष्ठ मानव बनकर
तुम क्या नहीं कर सकते थे
उस पार की उलझन में
तुम मरने के सिवा सब कुछ कर सकते हैं 

आलोक चांटिया "रजनीश"

Wednesday, July 16, 2025

पत्थरों के पास भी एहसास जिंदा है आलोक चांटिया "रजनीश"

 

पत्थरों के पास भी एहसास जिंदा है
हर दर्द सहकर किसी की मूर्ति को भी
अपने भीतर सजा लेते हैं
दुनिया उसे देखकर खुश होती है
किसी खुशी को वह अपना मान लेते हैं
कोई नाता न होते हुए भी
पानी के साथ ऐसे घुल मिल जाते हैं
कभी-कभी यही कठोर पत्थर
चिकने से स्फटिक बन जाते हैं
और इतना अवसर दे देते हैं
उस समय के प्रवाह में बहते पानी को
कि अपने को हरी हरी
कई से लिपटा हुआ कर जाते हैं
पत्थर कभी भी किसी का साथ देने में
अपने को इस कदर तोड़ लेते हैं
कि रेगिस्तान की बालू बनकर
किसी घर की बनती हुई दीवार से
खुद को जोड़ लेते हैं
शायद आदमी अपने को झूठ ही
पत्थर दिल कह कर समझाता है
भला उसे पत्थर का धड़कता दिल
रेत में बदलते जीवन
पानी के साथ अठखेलिया का अर्थ
कहां समझ में आता है
आलोक चांटिया रजनीश

दरवाजे की आह- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

दरवाजे की आह

दरवाजा ही तो है जो दुनिया में
हर व्यक्ति को अपने आप बता देता है
कि अंदर कोई है या नहीं है
वैसे तो दरवाजा भी चाहता है
कि उसको बताने के लिए ही ना रखा जाए
जो अंदर रह रहा है वह
बाहर ताला लगा कर जाए
जिससे दुनिया यह समझ जाए
कि अंदर कोई रह रहा है कि नहीं
पर अब तो दरवाजे में ताला लगाने के बाद भी
दरवाजा बंद है यह जाना नहीं जा सकता है
कोई अंदर बैठा है या नहीं
इसे भी माना नहीं जा सकता है
इसी जादू के कारण हर किसी ने
अपने घरों में दरवाजे लगा डाले हैं
और न जाने कैसे-कैसे भ्रम
लोगों के मन में डाले हैं
मजबूत कंक्रीट की दीवारों के बीच
लकड़ी का दरवाजा कमजोर जरूर होता है
पर इस कमजो दरवाजे से होकर
हर किसी का आना-जाना होता है
शायद दरवाजा दिल की तरह हो गया है
जहां हर कोई दस्तक दे देता है
और प्रेम के हस्ताक्षर बड़े आसानी से लिख देता है
कई प्रेम की कहानी भी
दरवाजे के पीछे भी लिखी जाती है
वरना सभ्यता संस्कृति में इन बातों की बात
खुलकर कहां की जाती हैं
दरवाजे पर किसी के हाथ के निशान
कभी भी नहीं दिखाई देते हैं
पर उन उंगलियों के निशान को
आप रोज सन्नाटे में जान लेते हैं
जो अब आपके घर नहीं आते हैं
आप जिनको अपने नजदीक नहीं पाते हैं
बंद कमरों में लिखे गए जीवन की आहट के
बहुत सारे स्वर ना जाने कहां गुम हो जाते हैं
जब आप उन सारे लोगों को
अब अपने जीवन में नहीं पाते हैं
जो दरवाजा पार करके
आपके जीवन में चले आते हैं
दरवाजा ही एक ऐसा दरबारी बनकर खड़ा रहता है
जो जानता है कौन-कौन इस घर में
कब-कब आया है
और उसने अपनी झोली में क्या-क्या पाया है
दरवाजा ही चुपचाप खुलता है बंद होता है
बाहर के रोशनी को रोक कर अंदर के अंधेरों में
वह जीवन के खिलखिलाहट में खोता है
पर वह किसी से कह भी नहीं सकता
कि उसने क्या देखा है
क्योंकि आदमी सदियों से
इस बात को जान गया था
सच कहूं तो यह मन भी गया था
कि पौधों में भी जान होती है
इसीलिए पेड़ों की हत्या करके
उसने दरवाजा बनाया था
जिंदा पेड़ों से उसे डर लगता था
इसीलिए एक मरे हुए दरवाजे को
अपने घर के अंदर लगाया था
आत्मा अजर अमर होती है
पर भला कौन उसे देख सकता है
वह चाहे भी तो किसी को क्या बता सकता है
इसीलिए पेड़ों को काटकर
उसका दरवाजा आदमी बना लाता है
और फिर चुपचाप बंद कमरे में
जिंदगी के हर गीत और
संगीत के साथ स्वरों पर पाता है
बड़ी बेबसी से अपनी हत्या के बाद भी
कटा हुआ पेड़ दरवाजा बनकर
आदमी के साथ रह जाता है
आदमी कहां तक जा सकता है
इसको चुपचाप सह लेता है
क्योंकि जानता है मार कर जब
उसने एक पेड़ को दरवाजा बना डाला है
तो फिर उसके पीछे जीवन में कुछ भी हो सकता है
क्योंकि जीवन सिर्फ अमृत नहीं एक हाला है
मैं भी कभी-कभी दरवाजे की तरफ देखता हुआ
सोचने लगता हूं
कभी-कभी तो पूरी पूरी रात जगता हूं
पर समझ नहीं पाता हूं
कि जो लोग चांदनी की तरह उजाला लेकर
मेरे घर दरवाजा पार करके आए थे
वह सन्नाटो में भला मेरे साथ क्या पाए थे
क्यों एक दूर तक फिर सन्नाटा फैलता चला गया
आदमी क्या है सिर्फ उसके और मेरे मन में रह गया
मेरी व्यथा को दरवाजा समझ भी रहा है
पर मरा हुआ खड़ा है
भला कैसे समझू क्या कह रहा है
पूरे शहर में न जाने कितने घरों में
दरवाजा के पीछे जिंदगी के
न जाने कितने खेल चल रहे हैं
मरा हुआ दरवाजा खड़ा है
और कुछ लोग अंदर मरे हुए चल रहे हैं
शायद दरवाजे को मार कर लगाने की सजा
मनुष्य को यहीं मिल गई है
कि कहीं ना कहीं चार दिवारी मैं लगे दरवाजे की
आह दर्द परेशानी निराशा उसको मिल गई है

आलोक चांटिया "रजनीश"

Monday, July 14, 2025

एक बहुत ही अजीब सा -समय आ जाता है- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

एक बहुत ही अजीब सा
-समय आ जाता है
सच कहूं तो मन और तन दोनों ही
अपने को असमंजस में पाता है
समझ नहीं पाता है कि अब क्या करूं
जिसकी वजह से मैं दुनिया को
अपने दिमाग में चलने वाले
विचारों से परिचय कराया है
और जिस दुनिया ने भी उन
विचारों को पढ़कर मुझको
थोड़ा बहुत समझा है और समझाया है
उन्हीं विचारों को उकेरने वाला
मेरे जाने के बाद भी मुझे अमर करने वाला
या सच कहूं कलम का सिपाही बनकर
जिस कलम के सहारे मैं अंधेरों में
आलोक के रूप में जाना जाता हूं
उस कलम की स्याही खत्म होने पर
एक हाहाकार अपने भीतर पाता हूं
जिस कलम ने मेरी उंगलियों को
सहारा देकर उसके अंदर छिपे हुए
शब्दों को पन्नों पर सजाया है
मुझ जैसे मनुष्य ने उसके हिस्से में क्या दे पाया है
आज जब उस पेन की आत्मा
स्याही के रूप में सूख गई है
या यूं कहूं मेरे स्वार्थ में खत्म हो गई है
तन की तरह खोखली कलम की कहानी
जहां पर आकर खत्म हो गई है
वहां पर अब मेरी उंगलियां
उस कलम को पकड़ना नहीं चाहती हैं
दूसरी कलम की खोज में
अपने को रखना चाहती हैं
समझ में नहीं आता है स्वार्थ का
यह कौन सा स्वर में सुन पा रहा हूं
आज अपने ही हाथों से उस कलम को
जिसने कल तक मेरा साथ दिया
मेरे साथ उंगलियों के संग चल चल कर
मुझे एक नाम हर पल दिया
उस कलम को सिर्फ स्याही
खत्म हो जाने के कारण मैं
एक कोने में डाल आया हूं
जीवन का यह कौन सा मंत्र है
और मनुष्य को मैं क्या पाया हूं
सिर्फ और सिर्फ अपने मतलब के लिए
सुबह से शाम तक उपयोग
उपयोग का मंत्र पढ़कर ही
आदमी आगे चला जा रहा है
यहां तक कि एक कलम को भी
मतलब के बाद भूला जा रहा है
कलम खामोशी के साथ इतना
लंबा साथ देने के बाद भी आदमी से
कुछ नहीं कहना चाहती है
शायद मानव की बनाई दुनिया संस्कृति में
वह अपना मोल प्रयोग होने के बाद जानती है
आलोक चांटिया "रजनीश"

मेरे टूटे-फूटे घर में अब- आलोक चांटिया "रजनीश"

 मेरे टूटे-फूटे घर में अब

कोई नहीं आना चाहता है

कुछ देर बैठकर ना सुस्ताना चाहता है

ना कुछ बताना चाहता है

उसे लगता है टूटा फूटा

घर लेकर जो बैठा है

उसके जीवन में जीने का आधार कैसा है

वह क्या जान पाएगा मेरा दर्द क्या है

मेरे जीवन की आवश्यकता है क्या है

इसीलिए शहर में फैले हुए कूड़े की तरह

हर कोई बचकर निकलना चाहता है

मेरे उस टूटी हुई दीवार के अंदर

भला कौन आना चाहता है

ऐसा नहीं है आते भी बहुत लोग हैं

हो सकता है वह भी अंदर से

दीवार की तरह टूटे-फूटे हुए हो

इसलिए वह दीवारों के बजाये

मुझे देखकर चले आते हो

अपनी टूटी-फूटी जिंदगी में शायद

कोई छोटा सा सुकून भी पाते हो

पर बहुत से ऐसे भी आकर गुजर जाते हैं

जो कभी किचन की दीवार तो कभी कमरे की

दीवार पर ही अपनी सारी बात समेट जाते हैं

देखते हैं उखड़े हुए प्लास्टर और सालों पहले

किए गए रंग रोगन को जो अब

अपनी जवानी को नहीं बुढ़ापे को दर्शाते हैं

शायद कमरे भी बूढ़े हो जाते हैं

यह मुझे नहीं मालूम कि कमरा भी

कभी शैशव अवस्था से जवानी और

बुढ़ापे की तरफ भी जाता है

पर जब सबकी बातें सुनता हूं

तो ऐसा सोचना मेरे भी दिमाग में आता है

कि क्या मेरा कमरा वास्तव में बूढ़ा हो गया है

या फिर मेरा कमरा गरीब हो गया है

क्योंकि कोई मुझे गरीब कहने से परहेज कर रहा है

शायद वह सीधे-सीधे मुझे अभी भी जिंदा कह रहा है इसीलिए वह मेरे टूटे-फूटे जीवन पर

प्रहार नहीं करना चाहता है

लेकिन मुझे सुनने के लिए मेरे टूटे-फूटे कमरे पर

अपना पूरा समय दे जाना चाहता है

एक पल भी यह बात नहीं करता

कि भूखे हो या कोई काम है

तुम्हारे जीवन का शेष

जिसमें मैं बन सकता हूं तुम्हारे लिए अशेष

वह तो बस जुटा रहता है किसी तरह

मन की भड़ास निकाल कर इस बात को बताने में

कि तुम कितने बर्बाद हो गए हो

क्योंकि कदाचित इस देश में

तुम हरिश्चंद्र का एहसास हो गए हो

तुम नहीं झुकना चाहते हो भगत सिंह

चंद्रशेखर राजगुरु की तरह

तुम लटक जाना चाहते हो फांसी के फंदे पर

अपने जीवन के मूल्यों के लिए

अपने कर्म पथ के सिद्धांतों के लिए

पर जिन्हें सिर्फ अपना जीवन

कीड़े मकोड़े की तरह की जीना है

उनको तो कोई ना कोई बहाना करके

मुझे मेरी बेबसी का एहसास कराना है

इसीलिए अक्सर या कहूं ज्यादातर

जो भी टूटे-फूटे अंतिम सांसों को लेते हुए

उस कमरे तक चला आता है

जहां पर उसे एहसास है कि

मेरे किसी भी काम के लिए

आलोक का उस बूढ़े कमरे से नाता है

वह जाकर अंतिम सांस लेती हुई

दीवारों के पीछे आकर बैठ जाता है

और बस पैसा क्या होता है

उसका मुझे एहसास करा जाता है

हर बैठने वालों को ना मैं चाय पिलाता हूं

ना नाश्ता कराता हूं ना ही जानना चाहता हूं

कि उनके स्वागत के लिए मैं क्या दे सकता हूं

मैं उनके दर्प को और अधिक मजबूत बना जाता हूं

जब उन्हें ऐसा लगता है कि

मैं उन्हें एक बिस्किट एक चाय नहीं पिला सकता हूं

तो उनके चेहरों की खुशी को

मैं अमीरी गरीबी के रेखांकन में पढ़ सकता हूं

ऐसा नहीं है कुछ को दुख भी होता है

वह चाहते हैं कि मैं अपने सिद्धांत

रास्ते तरीकों को बदल डालूं

और कुछ पल ही सही उस भौतिक दुनिया का

आदमी अपने को बना डालूं

आदमी होने की पहचान अगर भौतिक सुख ही है

तो फिर आदमी के जीवन में यह दुख ही क्यों है

मैं इस दर्शन के पीछे कभी भी किसी को

फूलती सांसों से चलने वाले कमरे पर

परेशान नहीं करता हूं

क्योंकि मैं जानता हूं

कि मेरे जीवन में इन्हीं दीवारों ने

हर पल मुझे एक आवरण से सजाया है

और इन्हीं के भीतर मैंने जीवन का वह अर्थ पाया है

जिसमें बाहर की दुनिया में

आज भी मेहमान बनकर खड़ा हूं

इसीलिए टूटी दीवारों उखड़ते प्लास्टर

और दम तोड़ते घर में मैं मुस्कुराता हुआ पड़ा हूं

मालूम सभी को है कि एक दिन उन्हें भी

दीवारों से बिस्तर से उठकर

दिशाओं का आवरण पहन कर

चिता पर लेटा दिया जाएगा

उनका सारा घमंड जलती हुई

चिता की अग्नि से भस्म होता जाएगा

पर आंख बंद करके आने वाले

उस सच को खुली आंखों से

महसूस कहां करना चाहते हैं

वह तो आज सिर्फ अपनी मुट्ठी में

बंद पैसों से ही आदमी को तौलना चाहते हैं

इसीलिए जानवर और आदमी की लड़ाई में

जानवर आज भी अपने मूल स्वरूप में

जानवर ही बनकर रह रहा है

पर आदमी तो यही नहीं जान पा रहा है

कि वह कब किस मोड़ पर कहां रह गया

अब वह अपने को खोजने का भी

कोई समय नहीं पा रहा है

आधुनिकता भौतिकता की दौड़ में भागता हुआ

वह सिर्फ अपनी मुट्ठी के चारों तरफ

पागल हुआ जा रहा है

किसी को गरीब किसी को बेबस कहकर

वह किसी तरह से रात में

अपनी नींद को बुला पा रहा है

क्योंकि उसका दाम भी उसको

सिर्फ मानव बनने के हिसाब में अब जिंदा रह गया है

वरना मानवता परोपकार दूसरों के लिए

जीने वाला मानव तो न जाने कहां रह गया है

आलोक चांटिया "रजनीश"

Sunday, July 13, 2025

मुझे मालूम है, वह झूठ बोल रहा है - आलोक चांटिया "रजनीश"

 🌿 कविता 


मुझे मालूम है, वह झूठ बोल रहा है


आलोक चांटिया "रजनीश"


मुझे मालूम है वह झूठ बोल रहा है,

दुनिया के रास्ते बस खोल रहा है।

उसे मालूम है कि कई झूठे मिलकर,

एक सच्चे को झूठा साबित कर देंगे —

और हम अपनी मुट्ठी में सब कुछ कर लेंगे।


फिर भी ज़मीन के भीतर से निकलने वाली आग के सहारे,

जब भी एक बीज अवसर पाता है,

वह अपने अंदर के सारे गुण

दुनिया को दिखा जाता है।

उसे चिंता नहीं है

कौन विभीषण बनकर रावण के विरोधी से जा मिला,

कौन जयचंद बनकर पृथ्वीराज को मौत दे गया,

कौन मीर जाफर बनकर गद्दारी की कहानी का गया।


क्योंकि उसे मालूम है —

उसके अंदर जो भी छिपा है,

उसे इस जगत को बनाने वाले ने

गलत नहीं बनाया।

इसलिए चुपचाप बस चलते रहना है,

किसी से कुछ कहना ही नहीं है।


कितना हल्का है सामने वालों का पन,

जब वे रोज कहते हैं:

“हम तुम्हें दो रोटी खिलाते हैं।”

हंसी भी आती है जब वे

भगवान से भी बड़े हो जाते हैं।


न जाने भगवान उनसे क्यों कहलवा रहा है,

क्या मेरे अंदर अभी भी कुछ रुका है

जिसे वह बाहर ला रहा है?

क्या वे चाणक्य के अपमान का अर्थ समझ पाएंगे?

क्या वे समाज को कभी चंद्रगुप्त जैसा महापुरुष दे पाएंगे?


क्योंकि अंतस की ज्वाला में झुलसते हुए

खुद को संभाल पाना

इतना आसान नहीं होता।

कभी-कभी उसकी तपन में

आदमी इतना खो जाता है

कि वह ध्रुव बनने का संकल्प भी नहीं ला पाता,

नचिकेता की तरह तर्क भी नहीं दे पाता,

बस भीष्म की तरह चुपचाप खड़ा रह जाता है।


जिसने अपनों के लिए खुद को नष्ट कर दिया,

बदले में बाणों की शय्या के अलावा क्या मिला?

गंगा की पवित्र धारा से जन्म लेने के बाद भी,

हर पल भीष्म प्रश्नों के घेरे में रहे,

पर कर्म के पथ पर हर मोड़ पर

वह अपने पराक्रम से मिले।


क्योंकि विचारों का क्या है?

कोई भी किसी के लिए कुछ भी कह सकता है।

कृष्ण को शिशुपाल गाली दे सकता है,

दुशासन द्रौपदी का चीर हरण कर सकता है —

पर क्या इससे जीवन का प्रवाह रुक सकता है?

भला कोई शब्दों से किसको हरा सकता है?


सच है — शब्द तीर से भी गहरे घाव कर जाते हैं।

जीते जी न जाने कितने रिश्ते मर जाते हैं।

फिर भी जो जानते हैं,

जो मानते हैं कि वे कहां खड़े हैं,

जो दुनिया को देने का प्रयास कर रहे हैं —

वे शरीर से जरूर मरते हैं,

पर आत्मा से अमर होते हैं।


इसीलिए अंधेरों को समेट कर,

आलोक को अपने अर्थ में समझना होगा।

चाहे सूर्य हो, चंद्रमा हो, तारे हों —

हमें अपने पथ पर हर पल

चमकना ही होगा।

Saturday, July 12, 2025

हर दीवार के पीछे- आलोक चांटिया "रजनीश"

 "


हर दीवार के पीछे एक सुंदर सी
दुनिया को लोग सजाकर रहते हैं
कुछ लोग उसे घर तो कुछ
उसे ड्राइंग रूम कहते हैं
पर सच यह है कि दीवार के पीछे की
यह दुनिया उस घर के लोगों के
दिमाग की कहानी सुनाती है
जो बिना कहे ही आने वाले
लोगों को बताई जाती है
कोई भी दीवार के पीछे सजी हुई
उस दुनिया को जिसे आप
ड्राइंग रूम भी कह जाते हैं
क्या कभी पढ़कर उस घर को
एक बार भी जान पाते हैं
कोई कोने में टीवी लगाता है
तो कोई कोने में गुलदस्ता लगाता है
कोई ड्राइंग रूम में घड़ी लगाता है
तो कोई घड़ी के बिना ही रह जाता है
कोई सोफा उत्तर की दिशा में लगता है
तो कोई ईशान कोण पर भगवान को बैठाता है
कोई कमरे में घुसने वालों से
जूता बाहर उतरने की बात कह जाता है
तो कोई कहता है ऐसे ही चले आईए
इन बातों का आना जाने से कोई नहीं नाता है
कोई घर के बाहर फुट पैड बढ़ा जाता है
और कोई कीचड़ में सने हुए जूते के साथ ही
किसी को अंदर बुला लाता है
कभी ध्यान से देख कर कोई भी नहीं समझ पाता है
कि पर्दों का एक सिलसिला उस
कमरों में कैसा आता है
जब सब कुछ पारदर्शी है खुला हुआ है
तो फिर पर्दा करके क्या बताया जाता है
क्या उस परदे के पार उस घर का सच रहता है
जो ड्राइंग रूम की कहानी अलग
और उस घर की कहानी अलग कहता है
क्या ऐसा करना यह भी बता जाता है
कि उस घर का सच वास्तव में
परदो के साथ ही छुप रह जाता है
इसीलिए हर दीवार के पीछे एक सुंदर सी दुनिया
जो कोई भी सजी हुई देखता है
वह सच में उस आदमी के दिमाग को देखता है
और अपने मन में उस घर की एक कहानी उकेरता है
इसीलिए ज्यादातर लोग हर घर की
सही कहानी नहीं जान पाते हैं
और जो सच नहीं है उसी को
सच मानकर जी जाते हैं
दीवारों के पीछे की यह कहानी
दुनिया के बारे में बता जाती है
कैसे एक आदमी की जिंदगी
दुनिया के सामने आती है
क्या किसी के घर जाकर आपने
कभी किसी का दिमाग पढ़ने की
कोई भी कोशिश की है या सिर्फ समय के साथ
समय बिताने की ही एक जुगत अपने की है
फिर आप कैसे कहते हैं किसी घर से
आप दिल से जुड़ गए हैं
क्या सच में आपकी सोच के कोई
निशान उस घर में रह गए हैं
आलोक चांटिया "रजनीश"

Thursday, July 10, 2025

आज शहर खाली-खाली से दिखा आलोक चांटिया "रजनीश"

 

आज शहर खाली-खाली सा दिखा
भीड़ तो बहुत थी पर
कोई अपना ना दिखा
मां क्या गई जैसे
दुनिया खाली हो गई
हर कोई अपने में मशगूल सा दिखा
लगा ही नहीं कभी साथ-साथ बैठे थे
हर कोई बहुत दूर बहुत दूर ही दिखा
हर डाल जो जुड़ी थी
पेड़ की जड़ों से आज तक
दरकने का एहसास हर किसी में दिखा
मिट्टी से जुड़ना क्यों जरूरी था जाना
सुलगती लकड़ी से था धुआ फिर उठा
बस नमी ही खो गई थी
सभी की आंखों से
आंसुओं के सैलाब में सब कुछ डूबा सा दिखा
जो कल तक अपने थे
आज अजनबी से मिले
मां के गर्भ का असली असर आज था दिखा
जो सो गई थी मिट्टी में
चुपचाप मुझे छोड़कर
उस आलोक के जिंदगी में अंधेरा फिर था दिखा
वह होती तो कहती
गुरु पूर्णिमा पर तुम आए थे
पर आज उस आवाज का सन्नाटा सा दिखा
सभी कहते हैं मां का जाना
कौन सी खास बात है
हर कोई उन्हें भूलने की जुगत में दिखा
आलोक चांटिया "रजनीश"

Wednesday, July 9, 2025

मैं जीवन से हार गया था आलोक चांटिया "रजनीश"

 

मैं जीवन से हार गया या
जीवन ही मुझे हार गया
क्यों अपनी सांसों को रोक गया
क्यों अपनी सांसों को ले गया
मैं तो पूरा-पूरा चलना चाहता था
मैं तो पूरा-पूरा होना चाहता था
न जाने वह क्या पढ़ना चाहता था
ना जाने मैं क्या पढ़ाना चाहता था
उठ गया हुआ मुझे कुछ इस तरह से
कि अपनी सांसों को छीन ले गया
चाहे जिस तरह से जीवन जीकर भी मैं हूं
यह उसको मालूम है
वह यह भी जानता है कि कितनी देर
बिना मेरी सांसों के तुम
इस दुनिया में रह पाओगे
क्योंकि बिना सांसों के तो
शरीर कुछ घंटे में सड़ने लगता है
फिर भला इस दुनिया के
लोगों के साथ कैसे चल पाओगे
यह तुम्हें सिर्फ इसलिए
आज तक सम्मान दे रहे थे
मान दे रहे थे क्योंकि मैं
तुम्हारे साथ चल रहा था
मैं तुम्हारे इस निष्प्राण देह से
हर पल तुम्हारे साथ निकल रहा था
पर देखो जब मैं पूरा-पूरा
तुम्हारे इस शरीर के घमंड को
छोड़कर चला गया हूं
कितना बेबस सा तुमको छोड़ गया हूं
फिर भी तुम आज तक कहते रहे
कि मैं मैं मैं ही सब सच का अर्थ हूं
बिना सांसों के सोचो कि
आज में कितना तदर्थ हूं
रहते हो मैं रूठा हूं या जीवन रूठा है
सच तो यह है कि दुनिया में आने का
अर्थ ही ज्यादातर सब झूठ है
तुम उसे झूठ को ही
जीने की आदत डाल चुके थे
उसको ही अपना सब कुछ मान चुके थे
इसलिए आज जब सांस
तुम्हारे जीवन से चली गई है
देखो जीवन कितनी बेबसी के साथ
इस दुनिया में रह गई है
कभी अगर तुमने सास और
जीवन को जोड़कर देख लिया होता
तो जीवन का अर्थ
सांसों के साथ जी लिया होता
पर आप जब सांसे तुम्हारे जीवन से चली गई हैं
तब तुमको जीवन का अर्थ समझ में आ रहा है
पर अब कर भी क्या सकते हो
क्योंकि मुट्ठी में तो सिर्फ अंधेरा आ रहा है
सिर्फ अंधेरा आ रहा है
इसलिए जब भी तुम अगली बार
इस दुनिया में आने की कोशिश करना
तो सिर्फ जिंदा रहकर ही मरना
ताकि जब इस दुनिया को
फिर से छोड़ कर जाओगे तो
जीवन और सांसों का अर्थ
दुनिया को बता जाओगे
केवल जागकर खाकर रहकर
सोकर जीवन बिताना जीवन नहीं होता है
जो इस दुनिया को और सुंदर बना दे
वही मानव होता है वही मानव जीवन होता है
आलोक चांटिया "रजनीश"

खुशी के हजार बहाने हैं -आलोक चांटिया "रजनीश"

 

खुश रहने के हजार बहाने हैं
सभी के लिए उसके अपने-अपने मायने हैं
कोई जरूरी नहीं कोई
दूसरे को देखकर खुश ही हो जाए
वह हो सकता है उसके गिरते
आंसुओं पर खो जाए
किसी को किसी के गिरने पर मजा आ जाता है
और कोई सिर्फ इसलिए खुश हो जाता है
जब कोई दूसरा सजा पाता है
कहीं कोई एक रोटी के लिए भूखा रह जाता है
किसी को खुशी की तलाश में
दिन भर यही देखना रहता है कि
कौन जमाने भर के खुशियों को
अपने दामन में लपेट नहीं पाया है
अपने को थका कर पूरे दिन में
बस यही देखकर खुश हो पाया है
पर सभी एक जैसे नहीं होते हैं
कोई कोई बिल्कुल एक जैसे होते हैं
खुद भूखे रहते हैं दूसरे को खाना खिला देते हैं
खुद पैदल चलते हैं किसी का
सफर तय करा देते हैं
अपने लिए संघर्ष करते हुए
जिंदगी में चले जाते हैं
पर दूसरे के संघर्ष में कंधे से कंधा मिला जाते हैं
अपनी तमाम परेशानियों को दबा लेते हैं
सीने में चुपचाप दूसरों को जी लेते हैं
और दूसरे को खुशी कैसे मिलेगी
इसी में बस प्रयास में लगे रहते हैं
कई बार बहुत ऐसे लोग भी मिल जाते हैं
जो यह मान ही नहीं पाते
कि बिना पैसे की भी खुश रहा जा सकता है
कोई व्यक्ति बिना सुख के खुश रह सकता है
ऐसा भला कैसे हो सकता है
वह बार-बार पूछते हैं
कि भला बिना पैसे के कैसे कोई
अपने होठों पर हंसी ला सकता है
जरूर आदमी झूठ बोल रहा होगा
क्योंकि वर्षो से पैसे का यही सिलसिला चला आया है
कि जिसकी मुट्ठी में पैसा है वही खुश रह पाया है
रामकृष्ण की कहानी पढ़ कर भी
कोई अमल नहीं कर पाया है
खुशी के लिए पैसे की जरूरत कब होती है
किसी के लिए कर्म ही पैसा हो जाता है
और बस इतने से वह खुश रह पाता है
किसी के अंदर इस खुशी की
बात सुनना कहां चाहता है
वह तो बस पैसे पर ही अपनी
सारी बिसात बेचकर बैठ जाता है
और अपने में खुश रहने वाले को
एक झूठ का जीवन बता जाता है
पर खुश रहने वाला इस बात से भी खुश हो जाता है
कि चलो कोई तो उसे झूठा समझ कर खुश हो गया है
एक सुंदर सी नींद में इसीलिए सो गया है
कि वह आज एक सच्चे आदमी को झूठा बना पाया है
कृष्ण को चोर और राम को धोखा देने वाला समझ पाया है इसलिए खुश रहने के इस जतन को वह सही पाया है
आप भी यह देख सकते हैं
कि खुश रहने के कितने बहाने होते हैं
आपके लिए उसके मायने क्या होते हैं
आलोक चांटिया "रजनीश"

Tuesday, July 8, 2025

रोटी के जख्म -आलोक चांटिया "रजनीश"

 

रोटी के जख्म इतने गहरे होते हैं
उनके एहसास के इतनी पहरे होते हैं
कि हर किसी की नसीब में नहीं आती है
एक रोटी अक्सर दरवाजे के बाहर रह जाती है
अंदर आ ही नहीं पाती किसी का निवाला बनकर
रोटी कूड़े में पड़ी रह जाती है
कोई भूखा रह जाता है दीवारों के पीछे
किसी की आते सिकुड़ जाती हैं भूख के पीछे
पर हर कहीं रोटी न जाने कितनी बची रह जाती हैं
रोटी दौड़ती नहीं खुद लोग रह जाते हैं पीछे
इसीलिए कई बार हंसते हुए लोगों को देखा है
रोटी के पीछे भागते हुए देखा है
दौड़ते दौड़ते छाले पड़ जाते हैं
इतने गहरे जख्म हो जाते हैं
कि जब रोटी मुट्ठी में आती है
तो पसीने के कुछ दाग उसमें रह जाते हैं
खून से लथपथ होता शरीर कुछ और
जीने की आरजू ले चलता है
जब उसे कभी किसी से दो रोटी का साथ मिलता है
इसीलिए संबंधों की बाजार में वही
एक दूसरे के करीब रह जाते हैं
जो रोटी के साथ जीते हैं और मर जाते हैं
देता है साथ भी उनका कोई मन बेमन से
जो रोटी को उन तक पहुंचाते हैं
वरना लाख जानता है हर कोई
सच क्या है झूठ क्या है
पर रोटी को देखकर पता नहीं क्यों चुप रह जाते हैं
मर जाता है कोई बिना सच को निगले हुए
झूठ चलता रहता है बिना कुछ उगले हुए
पेट भी भरा भरा उन्हीं का रहता है
जिनके साथ में रोटी का साज रहता है
इसीलिए रोटी के जख्म इतनी गहरे हो जाते हैं
कि कई बार इसी रोटी के खातिर
अपने ही बहुत दूर हो जाते हैं
आलोक चांटिया "रजनीश"

धरती पर उगे हुए एक फल - आलोक चांटिया "रजनीश"

 

धरती पर उगे हुए एक फल
फूल के पौधे से ज्यादा तुम कुछ भी नहीं हो
बस तुम अगर यह समझ नहीं पाए
तो सच मानो तुम कहीं नहीं हो
एक फूल अपने रंग को जानता है
अपने ढंग को जानता है
वह मिट्टी से जुड़कर अपने अंदर के
उस वैभव को दुनिया को दिखाने लगता है
और अपने होने का अर्थ
इस दुनिया में बनाए रखता है
कैसे कहते हो तुम मनुष्य होकर
कुछ जानते ही नहीं तुम क्या करने आए हो
फिर भला तुम एक फूल के पौधे से
कैसे ऊंचे उठ पाए हो
वह तो जानता भी है कि वह
अपने साथ क्या लेकर आया है
क्या लेकर जाएगा
और मनुष्य होकर भी तुम्हें
यह पता नहीं कि इस दुनिया में आकर
मुट्ठी में क्या रह जाएगा
इसीलिए अपने को इस समझ से
बाहर निकालने की कोशिश कर डालो
और अपने अंदर के अहंकार को
इच्छा को कुछ इस तरह मार डालो
कि एक फूल की तरह जो तुम्हारे
अंदर उगने को निकलने को प्रयास कर रहा है
जिसकी महक से इस
दुनिया का हर मार्ग चहक रहा है
बस उतना ही अपना अर्थ
इस दुनिया में आने का तुम मान लो
और जाने से पहले सर्वश्रेष्ठ देने की ठान लो
क्यों अपने को उसे कटे हुए
पेड़ के ठूठ की तरह जिंदा रखना चाहते हो
जो अपना सारा काम करके चला गया है
और अभी भी अपने निशान से
अपने होने के सत्य को छोड़ गया है
क्या तुम किसी अपने ऐसे सत्य को
छोड़ने में सफल हो गए हो
मनुष्य सोच कर देखो एक फूल और
पेड़ से तुम कितने पीछे रह गए हो
तुम जानते भी नहीं कि तुम्हें
अपने भीतर से क्या निकालना है
तुम तो भाग्य प्रारब्ध पिछले जन्म के
भोग की बात कह कर मुंह छुपाते रहते हो
और फिर भी पशु जगत में
अपने को सर्वश्रेष्ठ मानव रहते हो
एक बार तो यह मान लो कि पृथ्वी पर
सभी जीव जंतु पेड़ पौधे अपने-अपने
करतब को दिखाने में आज भी तुमसे आगे खड़े हैं
बस तुम भी कुछ कर डालो
इसीलिए वह सब तुम्हारे पीछे पड़े है
क्योंकि तभी तो तुम सर्वश्रेष्ठ होने का अहम
सच करके दिखला पाओगे
और एक फूल की तरह सच में
अपने भीतर का रंग दुनिया को दिखला पाओगे
आलोक चांटिया "रजनीश"

Sunday, July 6, 2025

कोई जरूरी नहीं है हर बार -आलोक चांटिया "रजनीश"

  

कोई जरूरी नहीं है हर बार
एक पत्थर से सांप का
फन ही कुचलना पड़े
उसके भीतर फैले हुए
जहर से खुद को दूर करना पड़े
कई बार मनुष्य को भी
अपने अंदर पनप रही इच्छाओं के
जहर को कुचलना पड़ता है
सब जानते हुए भी तड़पना पड़ता है
अगर समय से उन इच्छाओं को
व्यक्ति मार नहीं पाता है
तो उसके हिस्से इच्छाओं का
वह जहर आता है
जो शरीर ही नहीं दिमाग को खा जाता है
इच्छाओं में तड़पता आदमी
कितने भी प्रयास करने के बाद
न बच पाता है ना आगे जा पाता है
उसके हिस्से में सिर्फ और सिर्फ
मौत का वही अंधेरा आता है
जो कभी-कभी एक सांप के
काटने से आदमी पाया जाता है
इसीलिए अक्सर परिस्थितियों के पत्थर से
आदमी अपनी इच्छाओं के
फन को कुचल डालता है
और मानव होते हुए भी अपने को
परिस्थितियों के साथ इस जीवन में पालता है
हर पल सोचता है कल की सुबह जब होगी
तो जिन इच्छाओं को जो
उसने दबाकर मार डाला है
जिसके कारण अंदर ही अंदर
दम तोड़ती इच्छाओं का हाला है
वह फिर से उसकी मुट्ठी से निकलकर
एक फूल की तरह उसके
चारों ओर खेलने लगेगी
और जिंदगी फिर से सुंदर सी
मुस्कान हंसने लगेगी
पर आस्तीन में सांप पालने की तरह
इच्छाओं को पालने से
कभी कुछ मिलता नहीं है
अगर यह समय से ना पहचान ली गई
तो कर्म के पथ पर आदमी संभलता नहीं है
आलोक चांटिया "रजनीश"

Saturday, July 5, 2025

खुद की भूख के लिए-आलोक चांटिया रजनीश

 

खुद की भूख के लिए
दूसरे की भूख मिटाना पड़ता है
एक रोटी के लिए
दूसरे को रोटी पहुंचाना पड़ता है
बस इसी को दुनिया समझ कर
हर कोई जिए चला जा रहा है
सुबह जो उठा था आदमी
शाम तक बस मरा जा रहा है
एक अदद रोटी उसके जीवन में
अगर आ जाएगी तो उसे लगता है
जिंदगी थोड़ी बेहतर हो जाएगी इ
सीलिए उसने रोटी को
रोटी के साथ जीना सीख लिया है
अपने समय को रोटी के लिए दे दिया है
अब वह भूखे सारा सारा दिन
उस आदमी के लिए काम करता है
जिसने दूसरों की भूख के लिए
रोटी की दुकान खोल लिया है
और एक भूखे को रोटी पहुंचाने के लिए
किसी दूसरे भूखे को
अपने यहां काम दे दिया है
बस रोटी का यही मायाजाल
हर तरफ फैला हुआ है
कोई रोटी मंगा कर अमीर बन रहा है
कोई रोटी बेचकर जमीर रच रहा है
इन सब के बीच खड़ा एक आदमी
एक जगह से दूसरी जगह
रोटी के लिए जी भी रहा है मर भी रहा है
क्या यह सच आज सभी की
नजर में नहीं चल रहा है
बस रोटी का ही खेल है
इसके लिए हर कोई मचल रहा है
आलोक चांटिया रजनीश

Thursday, July 3, 2025

दुनिया में कोई कुछ भी नहीं जानता है- आलोक चांटिया "रजनीश"


 

दुनिया में कोई कुछ भी नहीं जानता है
बस उसने जो सीखा है
उसे ही सच मानता है
अनुकरण की प्रक्रिया में चलता रहता है
उसे ज्ञान हो गया है यह कहता रहता है
वह यह भी नहीं जानता कि
ज्ञान और सीखने में फर्क कितना है
ज्ञान को सीखना नहीं
वह अपने आप अंतर मन से जागृत हो जाता है
सीखने से तो सिर्फ शिक्षा मिलती है
और शिक्षा में जो भी बताया जाता है हमें
सिर्फ वही दिखाया जाता है
भला कौन जानता है कि
कोई व्यक्ति सही में कौन है
क्योंकि सच्चाई से तो हर कोई मौन है
सिर्फ उसके नाम के कारण हम
उस की आकृति दिमाग में बना लेते हैं
और हम उसे जानते हैं यह मान लेते हैं
ज्ञान तो तब है जब दुनिया में
एक ही नाम की हर वस्तु व्यक्ति
हमारे अंतर मन में नाम आते ही दिखाई देने लगे
और बिना कुछ जाने मानने लगे
इसीलिए जो यह कहता है कि
वह किसी शहर को जानता है
किसी देश को जानता है
किसी व्यक्ति को जानता है
नदी झील नाले पर्वत भूकंप
ज्वालामुखी ब्रह्मांड को जानता है
वह सभी झूठ बोल रहे हैं
उन्होंने सीखने की प्रक्रिया में
जो इकट्ठा कर लिया है
उसी से अपने को तौल रहे हैं
सच में हर व्यक्ति अज्ञान के
सहारे ही चलता रहता है
और वह सबसे बुद्धिमान है
इसी भ्रम में अपने को मानव कहता रहता है
आलोक चांटिया रजनीश

रास्ता हो ना हो कहीं भी -आलोक चांटिया "रजनीश"

 

रास्ता हो ना हो कहीं भी
फिर भी अगर प्रवाह निरंतर है
तो रास्ते बन ही जाते हैं
हम कहां कब गंगा के लिए
कोई रास्ते बनाते हैं
हिमालय की गंगोत्री से निकलकर
उसके जल रश्मियों का प्रवाह
एक अनकहे रास्ते बना जाते हैं
और फिर हम उस गंगा का
रास्ता भी समझ पाते हैं
उन रास्तों पर चलकर हम अमर हो जाते हैं
जरूरी नहीं हम हर पल
इसी बात का इंतजार करते रहे
कि हमें अभी कोई रास्ता
समझ में नहीं आ रहा है
मालूम नहीं हमारा जीवन
अब कब किधर जा रहा है
सिर्फ प्रवाह का ध्यान कर लेना ही
रास्ते का निर्माण हो जाएगा
एक बार अंतस में जब उस
प्रवाह का उद्दीपन आ जाएगा
रास्ते स्वयं ही बनते चले जाएंगे
और जीवन में गंगा जमुना सरस्वती
रेवा महानदी गोदावरी की तरह हम
अपने-अपने होने के अर्थ में
रहते चले जाएंगे
इसीलिए रास्तों का इंतजार करने की
आदत छोड़ देना है
सिर्फ अपने अंदर के प्रवाह को
अंदर से बाहर की तरफ दे देना है
आलोक चांटिया रजनीश

Wednesday, July 2, 2025

सिर्फ स्वयं को बचाने का नाम जीवन है-आलोक चांटिया "रजनीश"

 

सिर्फ स्वयं को बचाने का नाम जीवन है
यही एक प्रयास सभी के लिए संजीवन है
चाहे वह एक कोशिकीय प्राणी पैरामीशियम हो
यूग्लीना हो अमीबा हो
सभी सिर्फ अपने को बचाने के लिए
दो भागों में बट जाते हैं
तभी तो उनके जीवन में
जीवन के अर्थ सही स्वर पाते हैं
यही टूटना बिखरना बटना
एक कोशिकीय प्राणी से बहुकोशिकीय प्राणी में
न जाने कब बदलने लगा
और इस पृथ्वी पर तरह-तरह के
जीव जंतुओं का खेल चलने लगा
इस खेल का अंतिम परिणाम मानव हो गया
जिसमें हर घंटे कोशिका का बटना
उसके जटिल जीवन का पैमाना हो गया
आज भी मनुष्य जिंदा इसीलिए है
क्योंकि उसके शरीर में कोशिकाओं का
टूटना बिखरना मारना बटना चल रहा है
सच मानो यह खुद को बांटकर
जीने की आदत से ही जीवन का अर्थ
इस पृथ्वी पर चल रहा है
इसलिए किसी के बट जाने पर
किसी के अपने जीवन को चलाने के लिए
दूर चले जाने से परेशान होना छोड़ दो
कभी तो मृत्यु से ऊपर उठकर
जीवन का अर्थ टूटने से जोड़ दो
आलोक चांटिया "रजनीश"

हर विस्फोट सिर्फ एक विनाश के लिए नहीं आता है- आलोक चांटिया "रजनीश"

 

हर विस्फोट सिर्फ एक विनाश के लिए नहीं आता है
कभी-कभी वही विस्फोट सृजन का अर्थ बन जाता है
न जाने कब ब्रह्मांड में एक छोटा सा अणु
जब विस्फोट के साथ बिखरा था
तभी तो सौरमंडल का वह स्वरूप निकला था
जिसमें सूरज चांद तारे और न जाने क्या-क्या
हमारे सामने चले आए थे
पृथ्वी भी जीवन का सुंदर अर्थ लिए खड़ी थी
और हम उसमें अपना स्थान पाये थे
फिर कोई कैसे विस्फोट को सिर्फ
नकारात्मक अर्थ में देखता रह सकता है
यह विस्फोट किसी धरती के
जन्म का अर्थ भी तो हो सकता है
अभी भी ब्रह्मांड इस विस्फोट की
ऊर्जा से दौड़ा चला जा रहा है
हर दिन अंतिम एक रास्ता बनाता चला जा रहा है
शायद कभी इसी पृथ्वी की तरह
कोई और भी ग्रह जीवन का अर्थ समेट कर
हमारे सामने आ जाए और
रिश्तो का एक छोर पृथ्वी पर रहे
और दूसरा उस ग्रह तक चला जाए
क्या इतना सुंदर विस्फोट हम मनुष्य होकर
इस दुनिया में दिखा पा रहे हैं
या सिर्फ विस्फोट का अर्थ विनाश है
यही हर पल बता पा रहे हैं
प्रकृति के इस खेल को हम
समझना क्यों नहीं चाहते हैं
जियो और जीने दो के संदेश पर
बस सृजन के लिए रहना चाहते हैं
विस्फोट से क्यों मानव सभ्यता
समाप्त होने का अर्थ लेकर चलने लगी है
क्या उसे एक अणु की कहानी
पृथ्वी पर कहीं भी नहीं मिलने लगी है
क्यों नहीं सीख पा रहे हैं हम
अपने अंदर के विखराव से
एक सुंदर ब्रह्मांड की रचना करने का अर्थ
विस्फोट का अर्थ यह कैसा हम ले रहे हैं
कि पूरी पृथ्वी पर जीवन का अर्थ हो रहा है तदर्थ
आलोक चांटिया "रजनीश"