Wednesday, January 28, 2026

मन इतना क्यों हारा है डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

 मन इतना क्यों हारा है

 डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


मन इतना क्यों हारा है?

क्या जीत सच में सहारा है?

दूर गगन का छोटा तारा,

क्या सच में कोई इशारा है?

पता नहीं क्या देखा जग में,

या जग ने मुझको क्या देखा?

क्यों हर सच अधूरा लगता,

जब प्रश्नों ने ही आँखें सेंका?

क्या अंधियारा बाहर फैला,

या भीतर ही विस्तार हुआ?

जिस डर को नाम न दे पाया,

क्या वही मेरा संसार हुआ?

मुट्ठी में जो कुछ भी आया,

क्या वह मेरा हो पाया है?

या पाने की इस हड़बड़ी में,

सब छिनता ही चला आया है?

क्या संतोष कोई वस्तु है,

जो थैले में भर लाई जाए?

या वह ठहराव की वह घड़ी है,

जिससे हम रोज़ ही घबराएँ?

सुबह से लेकर शाम तलक,

क्यों लगता कुछ छूट गया?

क्या समय मुझसे आगे निकला,

या मैं ही पीछे छूट गया?

जो देखा इन नैनों ने,

वह प्यारा क्यों न लग पाया?

क्या आँखें सच देख न सकीं,

या मन ने देखना ठुकराया?

हर जन क्यों दुखियारा दिखता,

क्या पीड़ा ही पहचान बनी?

या अपने ही अधूरेपन की,

परछाईं सबमें जान पड़ी?

अगर जीवन एक प्रश्न है,

तो उत्तर किससे माँगा जाए?

और अगर मौन ही सत्य है,

तो फिर यह चीख क्यों दोहराए?

— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश

Tuesday, January 27, 2026

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


 

सभ्यता के रास्ते और मनुष्य का द्वंद्व

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


पता नहीं
रास्ते कब तक हमारे साथ चलेंगे,
या हम ही कब तक
इन पत्थरों को प्रगति कहकर
अपने पैरों से पूजा करते रहेंगे।
सभ्यता ने हमें चलना सिखाया,
पर रुकना कभी नहीं सिखाया।
हर मोड़ पर एक नया नियम,
हर नियम के पीछे एक डर—
और डर के नाम पर
इतिहास की सबसे बड़ी इमारतें खड़ी कर दीं।
हमने रास्ते बनाए
ताकि जंगल पीछे छूट जाए,
पर जंगल हमारे भीतर
और घना होता चला गया।
मनुष्य ने कहा—
“मैं प्रकाश हूँ”,
और सभ्यता ने ताली बजाई।
पर उसी ताली की गूँज में
कई सदियों तक
अँधेरा चुपचाप ताली बजाता रहा।
यह आलोक की तरह
हर जगह, हर समय रहने की ज़िद है—
देखने की, समझने की,
और जवाबदेह बने रहने की।
पर सच यह है
कि हर प्रकाश के ठीक पीछे
अँधेरा खड़ा रहता है,
क्योंकि सभ्यता ने
प्रकाश को शक्ति बना दिया
और शक्ति ने अँधेरे को जन्म दे दिया।
हमने नैतिकता को किताबों में बाँध दिया,
और व्यवहार को सुविधा के हवाले छोड़ दिया।
यहीं से शुरू हुआ मानव द्वंद्व—
अंदर कुछ और, बाहर कुछ और;
आस्था मंच पर,
और विवेक बैकस्टेज में।
सभ्यता कहती रही—
“आगे बढ़ो”,
मनुष्य पूछता रहा—
“पर किस कीमत पर?”
और हर बार जवाब आया—
“इतिहास तय करेगा।”
पर इतिहास तो
हमेशा विजेताओं की स्मृति रहा है,
और हारने वालों की
अनकही चीख।
आज भी हम चल रहे हैं—
सड़कों पर नहीं,
विचारधाराओं पर।
हर विचार एक रास्ता है,
और हर रास्ता
किसी न किसी मनुष्य को
पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है।
यह द्वंद्व खत्म नहीं होगा,
क्योंकि यही मनुष्य होने की शर्त है।
जो इसे मिटाने निकलेगा,
वही सबसे ख़तरनाक सभ्यता बनाएगा।
शायद सवाल यह नहीं है
कि अँधेरा क्यों है,
सवाल यह है—
क्या हम अपने प्रकाश से
अँधेरे को देखने का साहस रखते हैं?
क्योंकि जिस दिन
मनुष्य ने अपने भीतर के अँधेरे को
सभ्यता की जिम्मेदारी मान लिया,
उसी दिन
रास्ते भी इंसानियत सीखेंगे,
और सफ़र भी
थोड़ा कम हिंसक होगा।

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"


Monday, December 29, 2025

अक्सर जब मैं, अकेला रह जाता हूं ,- डॉक्टर आलोक चांटिया रजनीश

 

अक्सर जब मैं,
अकेला रह जाता हूं ,
अपने आसपास,
किसी को भी नहीं पाता हूं, 

जो होते भी हैं सब ,
अपने लिए व्यस्त रहते हैं, 

एक भी पल ना मेरी ,
बात सुनते हैं,
बस अपनी ही रहते रहते हैं, 

ऐसे में फिर अपने में,
अपने को ढूंढने लगता हूं, 

बाहर की दुनिया से दूर ,
अपने भीतर मैं फिर जगता हूं,
पाता हूं पूरा आधा-आधा, 

अपनी मां को अपने भीतर, 

और पूरा आधा-आधा,
अपने पिता को ,
बस दोनों को पाकर,
मैं खुश हो जाता हूं,
यह मैं नहीं कह रहा हूं,

 विज्ञान कहता आया है, 

अनुवांशिकी यही समझा पाया है ,
आधे आधे गुण के ,
मिल जाने से ही,
एक बच्चा बन जाता है,
पर दुनिया में आने के बाद, 

वह भूल जाता है ,
कि उसके अंदर ही जब तक वह है,
उसकी मां उसके पिता, 

उसके साथ रहेंगे ,
जब भी वह अकेला होगा, 

तब उससे चुपचाप कहेंगे ,
हम तुम्हारे साथ रहते हैं,
क्यों चिंता करते हो ?
बस यही कहते हैं ,
और फिर मैं अपने अकेलेपन को ,
देखते ही देखते भूल जाता हूं,
जब मैं और मेरे माता-पिता को ,
सन्नाटो में अपने,
भीतर बात करते पाता हूं।
डॉ आलोक चांटिया रजनीश

साल नहीं, सार चाहिए डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

 

साल नहीं, सार चाहिए

डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

हर कोई आने वाले कल को ऐसे निहार रहा है,

जैसे आज उसे तिल-तिल कर मार रहा है।

उसे आशा है—कल जो दस्तक देगा द्वार,

वह ले आएगा कुछ, जो भर देगा जीवन का भार।

आशा के सहारे आदमी साँसें तो लेता है,

पर यह नहीं जानता—क्यों पृथ्वी पर रहता है।

दिन, महीने, साल बस गिनता ही जाता है,

कर्म का अर्थ जाने बिना जीता-मरता जाता है।

क्या उद्देश्य था जन्म का—किसने कभी पूछा?

या बस कैलेंडर पलटना ही जीवन का नुस्खा?

क्या किसी पशु ने किसी से यह कहा होगा,

“नौ साल की शुभकामनाएँ”—क्या ऐसा सुना होगा?

पशु जानता है कर्म बिना नाम जाने,

भाग्य सोया रहता है, श्रम के न जागने।

वह करता है जो करना उसे आया है,

उसने जीवन को उत्सव नहीं, कर्तव्य बनाया है।

फिर मनुष्य क्यों पशु से ऊपर उठने से डरे,

क्यों सिर्फ वर्षों की गिनती में जीवन सरे?

क्या वह बस साल बदलने को ही आया है,

या अपने होने का अर्थ समझने आया है?

जब तक कर्म से नहीं जुड़ेगी चेतना की डोर,

तब तक हर नया साल होगा बस एक और शोर।

साल नहीं बदलते—यदि मन वही पुराना है,

जीवन तब भी बोझ है, चाहे कल नया आना है।

Saturday, December 27, 2025

सभी के अपने-अपने , दर्द होते हैं ,- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 

सभी के अपने-अपने ,
दर्द होते हैं ,
दर्द हमेशा अपनों को ,
ढूंढता रहता है ।
अगर किसी अपने को,
पा भी जाता है ,
और अपना दर्द,
जैसे ही कहता है,
वह हैरान रह जाता है,
क्योंकि सामने वाले से टकराकर,
उसका दर्द वापस आ जाता है ।
और सामने वाले का ,
दर्द भी ले आता है ।
वह भी बताने लगता है कि, आजकल उसे कितना दर्द है,
उसकी जीवन की रातें, कितनी सर्द है ।
तब समझ में आता है कि,
हर कोई मुट्ठी बांध तो रहा है,
पर उसमें तो अंधेरा ही रह रहा है ।
कोई भी अपने दर्द के आगे, किसी दूसरे का ,
दर्द देख ही नहीं पा रहा है। जिसे भी देखो वह अपने,
सुख को भी दर्द कहता पा रहा है ।
क्योंकि अब उसे ,
इस बात का दर्द रहने लगा है,
कि जितना सुख ,
भगवान ने उसको दिया है,
वह पूरा नहीं दिया है ।
थोड़ा सा उसने रोक लिया है, अब दुनिया में जितना कुछ भी ,
अंधेरा दिखाई दे रहा है,
वह तो जलता हुआ ,
दर्द का दिया है,
जिसमें पढ़कर आदमी रास्ता भी,
नहीं खोज पा रहा है ,
जो आज जिंदा था कल,
वह आत्महत्या करके जा रहा है ।
क्योंकि उसे पूरी दुनिया में ,
या कहूं आदमी से भरी दुनिया में ,
कोई भी ऐसा नहीं मिला,
जिसको वह अपना दर्द सुना पाता !
और वह एक पल के लिए ही सही ,
उसके किसी काम आता ,
दर्द का जहर यूं ही,
बढ़ता चला जाएगा,
तो सचमुच एक दिन इस पृथ्वी पर,
फिर से जीवन का,
अर्थ समझा जाएगा ,
और हो सकता है ,
फिर से कोई एक अवतार, कोई एक भगवान कोई एक पैगंबर,
इस दुनिया में चला आएगा।
जो सिर्फ मुस्कुरा कर,
यह कह जाएगा कि,
दर्द के साथ जीने की ,
जो भी आदत डाल लेता है,
या अपने भीतर जो भी, अपना दर्द जी लेता है ,
वही तो राम कहलाता है,
वही कृष्णा कहलाता है ,
वही पैगंबर बन जाता है। भला दर्द के बिना,
कौन यहां रह पाता है?
और फिर दर्द में एक, मुस्कान निकलने लगेगी ,
और तपती धरती पर ,
जीवन की लकीर खिंचने लगेगी ।
आलोक चांटिया 'रजनीश'

Sunday, December 21, 2025

औरत — रिश्तों की भाषा में- डॉ आलोक चांटिया "रजनीश"

 

औरत — रिश्तों की भाषा में

कितना अजीब-सा सुख चल रहा है,
जब पूर्णता का अर्थ लिए दुख चल रहा है।

पानी से हाथ धोते हुए,
वह जीवन का अर्थ ढूँढ रही है—
क्या इसी का नाम औरत है?
क्या यही सही है?

मिलकर मिला भी क्या,
कि मैं कुछ कर ही नहीं पाया—
क्या इसी का नाम रिश्ता है,
और यही निभाना आया?

यह तो सिर्फ़ दिखावा था,
जो सब कर रहे हैं—
झूठ को जी रहे हैं,
और झूठ ही मर रहे हैं।

वह ठंड से काँपती रही,
अँधेरे में—
आलोक के सामने।

फिर कौन-सा अर्थ प्रेम का,
किस अर्थ को मानें?
इसी खोखले जीवन को
हम रिश्ता कहते चले आए हैं।

दूर कहीं उसकी आँख का
एक कतरा—
आँसू—
हम कहाँ मिटा पाए हैं?

दर्द में मुस्कुरा कर,
बातों के बीच
बस इतना कह जाती है—
यही रिश्ते का सच है,
और औरत
बस इतनी ही रह जाती है।

डॉ आलोक चांटिया रजनीश

Monday, December 15, 2025

उसके हाथों का शहर — आलोक चांटिया “रजनीश


 

उसके हाथों का शहर

— आलोक चांटिया “रजनीश”

उसके हाथों ने शहर में
अनगिनत मकान बनाए हैं,
पर आज भी रात के
रैन बसेरे ही उसके हिस्से आए हैं।

रोटी की तलाश में वह
अपना गाँव छोड़ आया,
दो पैसे ज़्यादा मिलेंगे—
यही दर्शन वह साथ लाया।

अब न घर की रोटी मिलती है,
न घर जैसी कोई छत,
ऐसे न जाने कितने हाथों के हिस्से
आए हैं जीवन के अधूरे सच।

वह सोचकर कभी मुस्कुरा भी लेता है—
कि कल जब कुछ पैसा जुड़ जाएगा,
वह भी अपने लिए
एक छोटा-सा घर बना लेगा।

पर कौन जाने किसके हिस्से
कितनी सुबहें लिखी हैं,
किसके हिस्से धूप है
और किसके हिस्से सर्द रातें ही बची हैं।

उसने शहर में आज भी
अनगिनत मकान बनाए,
पर ठंड की लंबी रातें
आज भी रैन बसेरे में सिमट आए।

दूर से जलती रोशनियों को देखकर
वह भी खुश हो लेता है,
गाँव की मिट्टी के कमरों में
उसने भी न जाने कितने दीप जलाए है ।

वह सोचता है—
इसी पैसे से लोग “शहर के” कहलाते हैं,
गाड़ी-घोड़े चलाते हैं,
इज़्ज़त और नाम कमाते हैं।

पर वह जान ही कहाँ पाता है
कि मुट्ठी भर पैसों से
आज तक कितने लोग
सच में मुस्कुरा पाए हैं।

शहर में उसने
न जाने कितने मकान बनाए,
पर कितने मकान वालों ने
उसे सड़क पर जाते पहचान पाए?

सबके लिए वह बस
एक मज़दूर, एक मिस्त्री भर है,
पैसों की इस दुनिया में
हम आदमी कहाँ बन पाए हैं?

बिल्कुल हमारी तरह
संवेदना, प्यास और खुशी लिए जीने वाला,
हमारे घर को खड़ा करने वाला इंसान—
हम उसे इंसान कहाँ देख पाए हैं?