मन इतना क्यों हारा है
डॉ. आलोक चांटिया रजनीश
मन इतना क्यों हारा है?
क्या जीत सच में सहारा है?
दूर गगन का छोटा तारा,
क्या सच में कोई इशारा है?
पता नहीं क्या देखा जग में,
या जग ने मुझको क्या देखा?
क्यों हर सच अधूरा लगता,
जब प्रश्नों ने ही आँखें सेंका?
क्या अंधियारा बाहर फैला,
या भीतर ही विस्तार हुआ?
जिस डर को नाम न दे पाया,
क्या वही मेरा संसार हुआ?
मुट्ठी में जो कुछ भी आया,
क्या वह मेरा हो पाया है?
या पाने की इस हड़बड़ी में,
सब छिनता ही चला आया है?
क्या संतोष कोई वस्तु है,
जो थैले में भर लाई जाए?
या वह ठहराव की वह घड़ी है,
जिससे हम रोज़ ही घबराएँ?
सुबह से लेकर शाम तलक,
क्यों लगता कुछ छूट गया?
क्या समय मुझसे आगे निकला,
या मैं ही पीछे छूट गया?
जो देखा इन नैनों ने,
वह प्यारा क्यों न लग पाया?
क्या आँखें सच देख न सकीं,
या मन ने देखना ठुकराया?
हर जन क्यों दुखियारा दिखता,
क्या पीड़ा ही पहचान बनी?
या अपने ही अधूरेपन की,
परछाईं सबमें जान पड़ी?
अगर जीवन एक प्रश्न है,
तो उत्तर किससे माँगा जाए?
और अगर मौन ही सत्य है,
तो फिर यह चीख क्यों दोहराए?
— डॉ. आलोक चांटिया रजनीश


