Wednesday, September 2, 2026

मैं फूल हूं , मुझे तोड़ लेने का तुम्हारे पास,- डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 मैं फूल हूं ,

मुझे तोड़ लेने का तुम्हारे पास,

कोई मर्म ही नहीं है ,

तुम मानव हो,

तुम्हारे यहां तोड़ने के

निषेध का कोई धर्म ही नहीं है

तुम्हें सिखाया ही कहां गया है

कि पौधे में भी जान होती है

तुम एक फूल को तोड़कर

उसकी हत्या कर देते हो

पर विज्ञान को मानने और उसे

स्वीकार करने का जतन

तुम कब कर लेते हो

तुम तोड़ देते हो

मुझे तार तार कर देते हो

अपनों से बिछड़ कर मैं सिर्फ

तुम्हारी खुशी के लिए मर जाता हूं,

कभी किसी प्रेमिका के बालों में ,

तो कहीं भगवान के चरणों में चढ़ जाता हूं ,

अपने को मानव कहते हुए ,

मानव तुमको शर्म ही कहां आती है ?

इस पृथ्वी पर क्या कोई भी बात ,

ऐसी सुनी जाती है

जब किसी जानवर ने अपने प्रेम के लिए

अपनी पूजा के लिए

अपने सम्मान के लिए

किसी फूल की हत्या कर दी हो

फिर भी पशु जगत में

तुम सर्वश्रेष्ठ कहे जाते हो

मानव तुम तो संवेदन शून्य होकर,

पता नहीं क्यों किसी के लिए भी ,

नहीं जी पाते हो ?

मैं तो फूल हूं डाल से जुड़ा हूं,

डाल की खातिर निकल कर ,

पड़ा रह जाता हूं ।

पर तुम किस कीड़े मकोड़े पशु पक्षी को ,

अपने स्वाद के लिए नहीं मार डालते हो!

फिर भी अपने को धर्म परोपकार,

करुणा का प्रतिपालक मानते हो ,

तुम प्रकृति से, उस परम तत्व से ,

लगातार झूठ बोलते रहते हो ,

फिर भी अपने को हर पल धार्मिक कहते रहते हो!

 इसीलिए भगवान के सामने खड़े होकर भी ,

तुम दर्द में रह जाते हो ,

अपनी प्रार्थना आरती में न जाने ,

क्या-क्या कह जाते हो,

पर भगवान भी मुस्कुरा कर रह जाता है ,

जब तुमको वह अपने सामने पाता है !

क्योंकि मानव को तुम ,

ना जाने कहां छोड़ कर आए हो,

अपने अंदर एक रावण को

बसा कर ले आये हो।

इसीलिए हर दिन टूटा हुआ फूल भी ,

तुमको श्राप दे जाता है ,

और तुम्हारे हिस्से की वह सारी खुशी,

तुम्हारे ही सामने लेकर चला जाता है ।

तुम जान भी नहीं पाते कि तुमने,

किसी का ऐसा क्या बिगाड़ा है ,

जो तुम्हारे जीवन से भगवान ने,

हंसी खुशी प्रसन्नता शांति सब छीन लिया है !

पर क्या कभी तुमने हाथ फूल को,

तोड़ते हुए हाथ को एक बार भी ध्यान किया है ?

डॉ अलोक चांटिया रजनीश


No comments:

Post a Comment