Friday, March 13, 2026

मैं क्यों नहीं समझ पाया डॉ आलोक चांटिया रजनीश

 कोई भी कभी भी

साथ नहीं आया

जब भी पलट कर देखा

खुद को अकेला पाया

पर हार नहीं सोचा

संसार में आने के लिए

मैं करोड़ के साथ चला था

मैं तो सिर्फ अकेला था

जो मां के गर्भ में

अपना अस्तित्व था पाया

वहां के निरंतर युद्ध में

मुझे अपने होने का

अर्थ दिखाना था

मां के हिस्से को

खुद के लिए पाना था

छोटी सी आयु

अस्तित्व का खतरा

सब कुछ जानकार भी

मैं कितनी बार

मां से टकराया था

तब जाकर गर्भ के

अंधेरों में मैंने अपना

यह अस्तित्व पाया था

फिर स्वीकारा सभी ने था

प्रसव पीड़ा के इंतजार में

हर कोई था

और एक दिन सबको

मैंने सुनाई भी थी

अपने किलकारी की कहानी

मैं कोई स्वर नहीं था

उस कहानी का जिसमें थे

राजा और रानी

जब उस अनंत पथ पर

मैं अकेला चला आया

तो फिर क्यों सोचता हूं

आज मैंने अपने को अकेला पाया 

जब भी पलट कर देखा

कोई भी पीछे नहीं था आया

यह सोच मुझे उस लड़ाई से

बार-बार क्यों दूर ले जाती है

जो मैंने गर्भ के अंधेरे में

अपने अस्तित्व के लिए लड़ा था

और यह सुंदर सा

जीवन था पाया

मैं पलट कर क्यों देखता हूं

मैं कितना अकेला हूं

और कौन है जो मेरे संग आया

एको अहं द्वितीयो नास्ति के

सिद्धांत पर चलने की

हिम्मत क्यों अब नहीं रह रही है 

भगवान भी होता है

इसको क्यों नहीं समझ पाया

अपनी सफलता की कहानी

अतीत में अस्तित्व के संघर्ष को

मैं क्यों भूल पाया

मैं मानव हूं मैं राम हूं

कृष्णा हूं ईसा हूं मूसा हूं

इतना सस भी क्यों नहीं समझ पाया 

पलट कर क्यों देखता हूं

मैं अकेला हूं और

मेरे संग कौन आया

आलोक चांटिया रजनीश


No comments:

Post a Comment