कोई भी कभी भी
साथ नहीं आया
जब भी पलट कर देखा
खुद को अकेला पाया
पर हार नहीं सोचा
संसार में आने के लिए
मैं करोड़ के साथ चला था
मैं तो सिर्फ अकेला था
जो मां के गर्भ में
अपना अस्तित्व था पाया
वहां के निरंतर युद्ध में
मुझे अपने होने का
अर्थ दिखाना था
मां के हिस्से को
खुद के लिए पाना था
छोटी सी आयु
अस्तित्व का खतरा
सब कुछ जानकार भी
मैं कितनी बार
मां से टकराया था
तब जाकर गर्भ के
अंधेरों में मैंने अपना
यह अस्तित्व पाया था
फिर स्वीकारा सभी ने था
प्रसव पीड़ा के इंतजार में
हर कोई था
और एक दिन सबको
मैंने सुनाई भी थी
अपने किलकारी की कहानी
मैं कोई स्वर नहीं था
उस कहानी का जिसमें थे
राजा और रानी
जब उस अनंत पथ पर
मैं अकेला चला आया
तो फिर क्यों सोचता हूं
आज मैंने अपने को अकेला पाया
जब भी पलट कर देखा
कोई भी पीछे नहीं था आया
यह सोच मुझे उस लड़ाई से
बार-बार क्यों दूर ले जाती है
जो मैंने गर्भ के अंधेरे में
अपने अस्तित्व के लिए लड़ा था
और यह सुंदर सा
जीवन था पाया
मैं पलट कर क्यों देखता हूं
मैं कितना अकेला हूं
और कौन है जो मेरे संग आया
एको अहं द्वितीयो नास्ति के
सिद्धांत पर चलने की
हिम्मत क्यों अब नहीं रह रही है
भगवान भी होता है
इसको क्यों नहीं समझ पाया
अपनी सफलता की कहानी
अतीत में अस्तित्व के संघर्ष को
मैं क्यों भूल पाया
मैं मानव हूं मैं राम हूं
कृष्णा हूं ईसा हूं मूसा हूं
इतना सस भी क्यों नहीं समझ पाया
पलट कर क्यों देखता हूं
मैं अकेला हूं और
मेरे संग कौन आया
आलोक चांटिया रजनीश
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