मुट्ठी में अंधेरा
मैं अपना दर्द
किसी को बताता नहीं हूं।
हंसने के सिवा,
किसी के सामने आता नहीं हूं।
जानता हूं सभी के,
चेहरे पर उदासी ही तो छा रही है।
एक दर्द की लकीर भी,
खींची सी चली जा रही है।
हर कोई दूसरे को देखकर,
बस कुछ सुनाना चाहता है।
दर्द न जाने कितने
रूपों में बाहर आना चाहता है।
रोशनी में रहकर भी,
सभी अंधेरे में खड़े नजर आ रहे हैं।
टटोलते हुए न जाने,
किसे ढूंढते जा रहे हैं।
आंख है पर दिखाई,
कुछ भी नहीं दे रहा है।
समय यह कैसा,
सभी का इम्तिहान ले रहा है।
मनुष्य हंस सकता है,
जानते सभी हैं।
पर क्या चेहरे पर,
उन्हें लाते भी कभी हैं?
यह कौन सा श्राप मनुष्य
जीने के लिए विवश हो गया है?
आलोक फिर से मुट्ठी में,
अंधेरा लेकर रह गया है?
कौन गीता का अर्थ बताकर,
फिर अर्जुन को खड़ा करेगा?
कौन मोह से दूर ले जाकर,
जीवन का अर्थ कहेगा?
कब कोई भागीरथ मनुष्य के,
पूर्वजों की थाती को फिर से वर्तमान में लायेगा?
और एक बार फिर मनुष्य,
अपने कर्म पथ पर मुस्कुरा पाएगा?
— डॉ. आलोक चांटिया "रजनीश"
No comments:
Post a Comment