सत्य का शब्दार्थ
आलोक चांटिया "रजनीश"
एक मिट्टी जिस बीज को,
उसके अस्तित्व के होने का,
आभास कराती है,
उसके अंदर की सारी प्रतिभा को,
अंकुरित करके इस,
संसार में सामने लाती है,
पर वह बीज भी अपनी ,
सुषुप्त क्षमताओं के प्रदर्शन के बाद भला,
कब मुड़ कर उस जमीन की ओर मुडता है,
या फिर अपनी हरी फूल पत्ती,
छाया के साथ उस मिट्टी से जुड़ता है?
वह तो मिट्टी को सिर्फ,
अपने अस्तित्व को ,
बचाने का काम दे जाता है ,
अपने पीछे अपनी जड़ को,
मिट्टी में छोड़ जाता है,
मिट्टी उस बीज के होने के ,
एहसास में जड़ को,
पकड़े रह जाती है,
और बीज की जीवन में,
उसके विशाल वृक्ष होने की,
कहानी चलती जाती है,
संसार जब भी देखता है तो,
उस वृक्ष को ही देखता है,
उसकी प्रशंसा करता है,
उसकी छाया का आनंद लेता है,
उससे हवन की संमिधा भी,
एकत्र कर लेता है ,
पर संसार उस मिट्टी को,
कभी नमन नहीं करता है,
जिसके सहारे बीज वृक्ष,
बनने की यात्रा पूरी करता है,
बस ऐसे ही जीवन की,
कहानी चलती रहती है,
जो किसी को भी आगे बढ़ाने का,
कार्य आलोक यहां पर करता है,
वह मिट्टी की तरह सबके,
सामने भी होता है,
पर गुमनाम सा ही मरता है।
पर गुमनाम सा ही मरता है।
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