एक निरंतर प्रवाह में हर कोई,
खेत को लेकर चला जा रहा है,
पैदल वाला गाड़ी वाला,
हवाई जहाज वाला ट्रेन वाला,
कोई भी ऐसा नहीं है जिसके हाथ में,
खेत का वरदान ना चल रहा हो ,
शाम को लौटते हुए हर कोई ,
चाहे जिस काम को करके आ रहा हो,
थका हारा चाहे जितना अपने को पा रहा हो!
लेकिन वह जानता है कि अपने हाथ में ,
हमें खेत को लेकर जाना है,
तभी तो दूसरे दिन का सूरज ,
भरे पेट के साथ देख पाना है ,
हाथों में लटके हुए उन खेतों की,
कहानी को हम कभी महसूस,
करना भी नहीं चाहते हैं !
हम तो बस अपने लिए चूल्हे पर बने हुए,
दो निवाला चाहते हैं ,
जो खेतों से निकल कर हमारे,
मुंह तक आ जाते हैं,
और हमें पूरा पूरा फिर से आदमी बना जाते हैं।
कौन ऐसा है जो सीना ठोक कर,
अमीरी गरीबी ऊंच-नीच,
धर्म जाति के मकड़ जाल में,
यह कह पाए कि हमें खेत की ,
कोई जरूरत ही नहीं है ,
हम तो बिना खेत को लिए हुए,
अपने घरों में आए ,
पर सच यह है कि खेत के इस वरदान को ,
देने वाला फटी धोती भीगे हुई पसीने में
लथपथ चुपचाप खेतों के वरदान को ,
मिट्टी से मॉल, बाजार में,
जाते हुए देखता रहता है ,
निकली हुई सीन की हड्डी,
फटे हुए कपड़े उजड़ी हुई दाढ़ी,
सूखे हुए कपोल भला कहां,
वह अपने मन की बात कोई कहता है ?
वह तो गरीबों का कंबल ओढ़ कर ,
अपने को ठिठुरन से बचना चाहता है!
टिमटिमाते तारों के बीच ,
मचान पर बैठकर खेतों को बचाना चाहता है।
अपने लिए बस उतना ही,
लागत का वहां पाना चाहता है,
जिससे अगले मौसम की फसल को ,
वह फिर अपने खेतों में पाना चाहता है,
इतनी हिम्मत ही उसमें कहां है?
जो वह किसी से भी आगे बढ़कर कह सके,
कि इस बार खेत से निकलने वाले,
वरदान को मैं तुम्हें कौड़ियों के मोल,
नहीं दे पाऊंगा।
मेरे मन में भी गाड़ी घोड़े पर,
चलने की ललक है,
मैं भला कब तक सपने में ,
महलों में रह पाऊंगा ?
एक बार मैं भी अपनी झोपड़ी से,
बाहर उस प्रगति का हिस्सा बनना चाहता हूं,
मैं भी तुम्हारी तरह ही खड़ा होना चाहता हूं।
मेरे खेतों के निकले हुए इस ,
समुद्र मंथन के रत्न को तुम मुझसे लेकर,
हीरे की तरह बेचते हो ,
और मुझे इस मिट्टी का फल कहकर ,
हर पल बाजार में नोचते हो,
मैं खड़ा होकर गुलाम की तरह,
तुम्हारे आगे बेबस लाचार सा ,
तुम्हारी बातों पर विश्वास करके,
मिट्टी के मोल तुम्हें सब ले जाने देता हूं ,
मिट्टी के दाम को ही तो तुमसे बस लेता हूं।
तुम उस मिट्टी को सोना बनाकर,
बाजार में माल में ठेलो पर,
मुंह मांगे दामों पर बेचते हो,
देखो शाम होते ही खेतों की महक को,
पॉलिथीन में हर किसी के हाथ में देखते हो!
पर कोई राह चलता राहगीर पथिक,
कभी यह समझ नहीं पाता है ,
कि वह रोज अपने साथ कहीं अंधेरे में ,
शहर से बहुत दूर बिना सुख,
सुविधाओं के खेतों से भूख की ,
नीलामी में जीते हुए जिसके फसल फल फूल,
अनाज, सब्जी को लेकर,
हर कोई अपने घर आता है,
बस पीछे वह किसान बहुत दूर छूट जाता है,
जिसके हिस्से में सिर्फ और सिर्फ,
बिन बरसात के छाए हुए बादल,
सूखी हुई धरती कर्ज के तले दबे हुए कंधे,
फटे हुए कपड़े और ना ,
जान पाने वाला भविष्य रह जाता है,
पर भला कौन एक बार भी,
उस किसान को भगवान मान पाता है,
जो मानव बनकर इस संसार में,
तो आ जाता है पर अपनी मुट्ठी में,
सिर्फ अंधेरा लेकर दूसरों की,
भूख प्यास के लिए एक मां की तरह,
अपनी छाती का अमृत खेतों से लाकर,
बस दूसरों को जीता हुआ,
देखकर खुश रह जाता है ।
उसकी मुट्ठी में आने वाले समय,
फसल और दूसरे दिन की सुबह का,
एक अनिश्चित अंधेरा रह जाता है,
आखिर पैसों वालों की दुनिया में ,
एक किसान पूरा-पूरा आदमी,
आलोक क्यों नहीं बन पाता है ?
आलोक चांटिया "रजनीश"

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