नदी पहाड़ों की उदासी का,
एक साकार स्वरूप होती है।
जो बहती है रहती है,
पहाड़ों से उतर कर,
जंगलों से निकलकर ,
गांव से होकर ,
वह समुद्र तक पहुंचना चाहती है।
शायद जो दर्द उसने बहते देखा है,
पहाड़ के अंतस में,
उसे समुद्र को सुनाना चाहती है।
उसकी विशाल बाहों में समाना चाहती है।
पर उसे गुजरना पड़ता है नगर से होकर भी,
जहां की चका चौंध सभ्यता से,
वह भ्रमित हो जाती है।
जब वह अपने को एक,
अलौकिक सी दुनिया में पाती है ।
उसका यह भ्रम टूट भी जाता है जब ,
गंगा यमुना गोमती सरयू मैली हो जाती है ,
शहर नगर का अर्थ जब तक वह समझ पाती है।
तब तक तो अनर्थ की न जाने कितनी,
कहानी लिख जाती है।
समुद्र को जाकर नगर की,
कहानी जब सुनाती है।
तो समुद्र की भी अपनी बारी आती है ।
वह बताता है नदी से कि तुमने सिर्फ,
पहाड़ का दर्द लेकर इस संसार के,
रास्तों को जीने का प्रयास किया है ।
देखो इस संसार ने तुमको कैसा,
मेला होने का जहर दिया है ।
पर मैं तो चुपचाप एक किनारे बैठा था,
मानव से भला मैं कब ऐंठा था?
पर देखो आज समुद्र भी,
बहुत लाचार हो गया है।
बेचारा हो गया है ।
न जाने कितनों का हिसाब,
समुद्र से विलुप्त हो जाने का हो गया है।
अब राम को कोई तीर,
नहीं चलना पड़ता है।
समुद्र से रास्ता मांगने के लिए,
कलयुग के मानव ने ,
स्वयं निश्चित कर लिया है,
कि वह कैसे जिए?
समुद्र तो सिर्फ उसके आगे एक,
पानी का स्थान भर रह गया है ।
नदी तुमने तो मैली होकर सिर्फ,
नगर का अर्थ जान लिया है ।
मैंने तो न जाने कितने,
रत्न अपने मंथन से इनको दिया है।
फिर भी यह सोने की मुर्गी के अंडे की तरह,
मुझे रोज काट रहे हैं बांट रहे हैं।
युद्ध की आशंका में असंख्य परमाणु बम,
तारपीडो युद्धपोत से ,
मेरा सीना चीर देते हैं ।
मेरे पास तो अब राम भी नहीं रह गए हैं!
जिनके सामने में हाथ,
जोड़कर खड़ा हो जाता।
कम से कम स्वयं अपने लिए ,
और अपने अंदर समाये असंख्य,
जीव जंतुओं के लिए जी तो जाता?
किसको बताऊं कि पूरी पृथ्वी को बनाने वाला,
भगवान भी इतना निरंकुश नहीं कभी रहा है।
जितना भस्मासुर होकर,
मानव ने अपने को बार-बार कहा है ।
नदी तुम भी मैली हो गई हो।
मैं भी बर्बाद हो रहा हूं।
शायद मनुष्य एक दिन,
जब समझ पाएगा ।
तब इतनी देर हो जाएगी कि,
यह स्वयं अपने लिए प्रलय लायेगा ।
यह स्वयं अपने लिए प्रलय लायेगा ।
आलोक चांटिया "रजनीश"
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