जो कट कर, बट कर भी,
मुस्कुराती रह जाए,
वही मां होती है,
बच्चे उसकी इस ,
हालत में भी खुश है ,
इसमें जो खुश रह जाए ,
वह मां होती है ।
मां का आंचल कट गया,
फट गया इससे ज्यादा,
चिंता खुद के हंसी की जब होती है ,
तब भी मां यह सोचकर,
प्रसन्न होती है ,
कि जो उसके बच्चे हैं,
वह उन्हीं की तो होती है।
मां कभी भी अपने ,
दर्द को कहां बताती है ?
बस उसके हिस्से में
अपने बच्चों के लिए,
जीने की बस बात ही आती है,
इसीलिए चाहे नदी हो,
धरती हो या देश,
बस वह मां ही कहलाती है।
जो मैली होकर भी,
कुचल कर भी,
और कट कर भी,
सिर्फ मुस्कुराती है ,
यह देखकर भी कि,
कोई उसकी परेशानी में,
सम्मिलित नहीं होना चाहता है ,
बस शब्दों में स्वतंत्रता दिवस के लिए,
खोना चाहता है,
वह भी मां भारती बनकर,
सारे दर्द समेटकर,
अपने आंचल में ,
बच्चों को समा ले जाती है।
शायद वह मां है ,
इसीलिए अंतिम गहराई के साथ,
वह सभी के साथ मुस्कुराती है,
हमारे लिए मां भारती बनकर आती है।
गंगा मां बनकर आती है।
धरती मां बनकर आती है।
हमारी जन्म देने वाली ,
मां बनकर भी आती है।
बस वह मां ही है ,
जो हर पल हमारे
स्वतंत्रता के लिए जी जाती है,
अपने हर दर्द पी जाती है
आलोक चांटिया "रजनीश"

No comments:
Post a Comment