मिट्टी ही तो है जिसमें,
वह ऊर्जा होती है,
जो एक बीज के अंदर छिपी हुई ना जाने,
कितनी बातों से दो-चार होती है।
फिर उन सारी बातों को दुनिया के सामने ,
मिट्टी ही लेकर सामने आती है।
यह बात एक बीज को,
तब समझ में आती है।
जब वह पौधा बनता है ,
पेड़ बनता है,
उसमें फूल पत्ती निकल आते हैं।
लेकिन हम इस छोटी सी बात को,
कभी नहीं समझ पाते हैं,
कि मरकर इस मिट्टी में मिल जाना,
फिर से हमारी ऊर्जा को बाहर ले आना,
एक बीज की तरह फिर से इस दुनिया में,
उगने के लिए मिट्टी का ,
एक प्रयास आरंभ हो जाना।
शायद बड़ा कठिन होता है,
यह समझ पाना।
कि मरकर हम कहीं नहीं जाते हैं ।
सिर्फ मिट्टी में मिलकर,
अपने अंदर एक बीज की तरह,
सोई हुई ताकत को फिर से जगाते हैं ।
और निकल पड़ते हैं इसी धरा पर फिर कहीं,
एक पौधा बनकर एक पेड़ बनकर ।
जब एक मां देती है एक बच्चे को,
इस दुनिया में जनकर।
इसीलिए मिट्टी के शरीर से मिट्टी में मिलने की,
इस कहानी को रोज याद कर लो।
और एक शरीर छोड़कर,
दूसरे शरीर को मिट्टी से निकलने की,
कहानी खुद अपने में भर लो ।
आलोक चांटिया "रजनीश"

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