Saturday, August 30, 2025

मिट्टी कब कहां यह देेखती है?- आलोक चांटिया "रजनीश"


 

मिट्टी कब कहां यह देेखती है?
कि किस बीज को उसने, 

अपने घर में जगह दे दिया है?
किसको उसने इस संसार में,
खिलने फैलने बढ़ाने का, 

अवसर दे दिया है।
मिट्टी को कहां पता होता है, 

कि किसी बीज से बाद में, 

उसके चारों तरफ कांटे निकलेंगे ?
या फूल निकलेंगे फल निकलेगा?
या सब्जी होगी या सिर्फ, 

पत्तियां ही पत्तियां होगी ?

मिट्टी तो बस सिर्फ और सिर्फ,
यह जानती है,
और कर्म के दायरे में,
यह मानती है,
कि उसे जो भी बीज,
प्रेम से मिल जाएगा।
उसी के लिए उसका हर, 

कर्तव्य प्रयास हो जाएगा।

प्रेम का यही अनूठा दर्शन, 

हर कहीं चल रहा है। 

इसीलिए मिट्टी से,
हर कोई डर रहा है।
हर कोई घर में मिट्टी को ,
बंद करके रख लेना चाहता है।
अनेको घेरा बनाकर उसे, 

रोक लेना चाहता है ।
क्योंकि मिट्टी को इस बात का,
कोई भी असर नहीं होता है।
कि जो भी उसे मिला है,
उससे खरपतवार पैदा होगा, 

या एक सुंदर सा फूल निकल जाएगा ।
इसीलिए मिट्टी के जीवन में, 

न जाने रोक-टोक के कितने अवसर,
समय के साथ आएगा ।
पर मिट्टी कभी भी इस,
दर्शन को लेकर कहां जी पाएगी?
बाद में क्या होगा?
वह कब इस बात से मतलब रखती है ?
वह तो सिर्फ उस एक,
बीज का इंतजार करती है। 

जिसके लिए वह नमी के साथ,
हर पल संवरती है।
हर पल जगती है।
और प्रेम का सत्य,
सभी के सामने रखती है 

आलोक चांटिया "रजनीश"

Friday, August 29, 2025

मिट्टी ही तो है जिसमेंआलोक चांटिया "रजनीश"


 मिट्टी ही तो है जिसमें,

वह ऊर्जा होती है,

जो एक बीज के अंदर छिपी हुई ना जाने,

कितनी बातों से दो-चार होती है।

फिर उन सारी बातों को दुनिया के सामने ,

मिट्टी ही लेकर सामने आती है।

यह बात एक बीज को,

तब समझ में आती है।

जब वह पौधा बनता है ,

पेड़ बनता है,

उसमें फूल पत्ती निकल आते हैं।

लेकिन हम इस छोटी सी बात को,

कभी नहीं समझ पाते हैं,

कि मरकर इस मिट्टी में मिल जाना,

फिर से हमारी ऊर्जा को बाहर ले आना,

एक बीज की तरह फिर से इस दुनिया में,

उगने के लिए मिट्टी का ,

एक प्रयास आरंभ हो जाना।

शायद बड़ा कठिन होता है, 

यह समझ पाना।

कि मरकर हम कहीं नहीं जाते हैं ।

सिर्फ मिट्टी में मिलकर,

अपने अंदर एक बीज की तरह,

सोई हुई ताकत को फिर से जगाते हैं ।

और निकल पड़ते हैं इसी धरा पर फिर कहीं,

एक पौधा बनकर एक पेड़ बनकर ।

जब एक मां देती है एक बच्चे को,

इस दुनिया में जनकर।

इसीलिए मिट्टी के शरीर से मिट्टी में मिलने की,

इस कहानी को रोज याद कर लो।

और एक शरीर छोड़कर, 

दूसरे शरीर को मिट्टी से निकलने की,

कहानी खुद अपने में भर लो ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Wednesday, August 27, 2025

दुनिया में एक अजीब सा, जादू चल रहा है - आलोक चांटिया "रजनीश"


 दुनिया में एक अजीब सा, 

जादू चल रहा है ।

मूर्ति को लगाकर हर कोई,

 यही समझ रहा है ।

कि अब उसके घर भगवान,

आकर बैठ गए हैं।

पर धड़कते दिल चलती सांसों पर बैठे,

बुजुर्ग को वह कभी ,

भगवान समझ नहीं पाता है ।

उसके हिस्से में कभी भी स्वागत का,

वह स्वर नहीं आता है।

जिसमें भगवान के होने का,

आभास हो ,।

जिसके कारण हम सब, 

इस दुनिया में आए हैं। 

उनके लिए कृतज्ञता का, 

एहसास हो ।

कितनी आसानी से भगवान की बात करके, 

आदमी अपने को गणेश के सामने ही ,

झूठ मान लेता है।

क्योंकि जो सच है जो सर्वोच्च है,

उन गणेश की तरह ही माता-पिता को,

वह कहां भगवान का मान देता है?

आलोक चांटिया "रजनीश"


Friday, August 22, 2025

पिता हिमालय बन जाता है -आलोक चांटिया "रजनीश"


 इस दुनिया में रिश्ते न जाने कितने,

बनते हैं बिगड़ते हैं।

पर जिस रिश्ते की उंगली पकडकर,

आप इस दुनिया में आते है।

हर दुख मुसीबत में उसको ,

अपने सामने पाते हैं ।

वह सिर्फ और सिर्फ एक पिता होता है ।

जो अपने बच्चों के लिए जीता है ।

अपने बच्चों के लिए रात दिन मेहनत करता है ।

और फिर एक दिन अपनी बगिया के,

फूल की तरह उन्हें समाज के लिए तैयार करता है।

पर बदले में उसको क्या मिलता है ?

एक अकेलापन एक सन्नाटा और,

इस बात का दर्द कि,

कोई भी अपने पिता के इस त्याग को ,

कहां समझ पाता है ?

जिसे भी देखिए,

यह कहते हुए मिल जाता है।

कि यह कौन सा बहुत बड़ा काम है?

सभी करते हैं और यह सुनकर ,

एक पिता मुस्कुरा कर रह जाता है।

क्योंकि वह फिर भी अपने ,

बच्चों के लिए जी जाता है।

वह इसी में खुश हो जाता है,

कि उसके परिवार का नाम चलता रहेगा ।

आने वाली पीढ़ी में कोई तो उसे ,

सपने में मिलता रहेगा।

पिता का दिल इतना बड़ा हो जाता है ।

जिसमें पूरा परिवार समा जाता है ।

इसीलिए पिता कभी-कभी ,

अपना जन्मदिन भी भूल जाता है ।

क्योंकि उसके हिस्से में जिम्मेदारियां का,

एक ऐसा बोझ आता है। 

जिससे वह चाहकर भी, 

कभी नहीं निकल पाता है।

सांसों के रथ पर बैठा हुआ ,

ना जाने कितनी दूर निकल जाता है ?

और जब रुकता है तो एक सन्नाटा,

अकेलापन बुढ़ापा और अपने पास ,

कोई न बैठने वाला वातावरण पाता है ।

फिर भी पिता पिता रह जाता है ।

क्योंकि वह हम सबको बनाता है ।

वह बच्चों के लिए ब्रह्मा ,

विष्णु महेश हो जाता है। 

इसीलिए पिता समुद्र सा ,

गहरा बन जाता है। 

कभी-कभी हिमालय से ऊंचा हो जाता है।

आकाश की तरह ,

अपनी बाहों को पसारकर,

पूरे परिवार की खुशी बन जाता है ।

वह सिर्फ पिता होता है जो अपने,

दर्द को समेट कर सिर्फ, 

बच्चों के लिए जी जाता है।


आलोक चांटिया "रजनीश:


Thursday, August 21, 2025

रिश्ते मर गए आलोक चांटिया "रजनीश"


 शहर जल्दी मरा नहीं करते,

मरते हैं तो वह लोग, 

जिनको हमने जन्म के बाद से,

अपने चारों तरफ देखा है। 

जिनके लिए हमारे मन में, 

न जाने कितना लेखा जोखा है!

कोई चाचा तो कोई चाची, 

कोई मामा कोई मामी,

कोई फूफा कोई बुआ, 

कोई भाई कोई भाभी, 

कोई भैया कोई मम्मी,

कोई पापा कोई मित्र,

तो कोई शत्रु बन जाता है। 

लेकिन जैसे-जैसे समय, बीतता जाता है।

और आयु का तना, 

मजबूत होता जाता है ।

वैसे वैसे शहर में न जाने, 

कितने रिश्ते खो जाते हैं। 

चाह कर भी हम ना देख पाते हैं।

ना याद कर पाते हैं। 

कभी-कभी किसी सड़क को,

देखकर लगता है।

यहां चाचा रहा करते थे। 

उस तरफ मोड़ पर मामा, रहा करते थे।

आगे कुछ दूर ही पर तो, बुआ रहती थी ।

जाती हुई सड़क पर,

दादी चला करती थी ।

पर अब तो कहीं कोई भी,

नहीं दिखाई देता है। 

बचपन में जिनके साथ, 

स्कूल में बैठकर खेला करता था।

खाना खाया करता था। 

वह अब जाने किस,

शहर में चले गए हैं ।

शायद अब सिर्फ यादों में रह गए हैं।

उन्हें भी अपनी शहर की, 

सड़क पर कहां पाता हूं? 

क्योंकि मैं रिश्तो के, 

नए-नए परिभाषा में चलने लगा हूं।

किसी ऑफिस में बाबू ,

तो कहीं अधिकारी कहीं पति,

कहीं जीजा कहीं साला भी तो बन गया हूं ।

अब इन्हीं के कर्तव्य में, इतना उलझा रहता हूं ।

कि जब मैं शहर में उग रहा था ,

और मेरे उगाने में न जाने कितने रिश्ते ,

मेरे चारों तरफ मुझे बचा कर रख रहे थे ।

वह सब तो अब चिता पर, 

या जमीन के नीचे ही रह रहे थे।

मैं ही अब ज्यादा लंबी नींद में सो गया हूं ।

तभी तो समय के साथ, 

रिश्तों से बहुत दूर हो गया हूं ।

रिश्ते शहर की हवाओं में अभी भी जिंदा है।

पर हम में से कोई कहां शर्मिंदा है?

क्यूंकि रिश्तो को जीने की लत,

अब किसी में नहीं रह गई है ।

बस किसी तरह जी लेना है,

इसी की जुगत रह गई है।

अब सिर्फ रिश्ते दिमाग में रह गए हैं।

किसी त्योहार किसी शादी तक,

सिमट के रह गए हैं। 

आदमी तो बस सरपट, 

भागता चला जा रहा है। 

सिंधु घाटी सभ्यता की तरह ,

कुछ अवशेष पर जीवन को टिका जा रहा है।

शहर की स्मृति में अक्सर मैं आ जाता हूं।

जब जिस शहर में पला  खेला,

वहां पर भी अपने को अकेला पाता हूं ।

रिश्तो की इन लताओं पर लिपट कर ही,

सभ्यता की दौड़ आज चली जा रही है।

बाप की उंगली बेटे के बिना,

मां का आंचल परिवार के बिना ,

एक अजीब सी कहानी कहती चली जा रही है।

 फिर भी मनुष्य को अपने को,

अलग दिखाने का गुमान, 

अभी भी दिखाई देता है। 

इसीलिए सब्जी वाला ठेला वाला,

रिक्शावाला कभी-कभी भैया की,

पुकार के साथ होता है। 

रक्षा से दूर हर बंधन, दिखाई देता है ।

जगता हुआ शहर ,

अब भी दिखाई देता है।

डर कर निकलता है।

पहले से ज्यादा आज का आदमी,

घर से बाहर मदद के लिए पुकारने पर,

कहां कोई अब खड़ा होता है ?

फिर भी मानव ने अपने को,

बहुत अलग कर लिया है।

 रिश्ते को बनाना तोड़ना और स्वयं को,

अकेला दिखा कर भी सर्वश्रेष्ठ,

कहना सीख लिया है। 

खुदाई करके शहर के बहुत से अवशेष,

अस्थियां मिल भी जाती हैं।

पर जो रिश्ते हमने शब्दों में पुकारे थे ।

उनकी महक सिर्फ मिट्टी में आती है।

चार दिवारी के सन्नाटे में, 

जब रहने की बारी आती है।

तो शहर में खोए हुए रिश्तो की,

याद बहुत आती है।

रिश्तो की याद बहुत आती है।


आलोक चांटिया "रजनीश"


Wednesday, August 20, 2025

समुद्र ने कहा नदी से आलोक चांटिया "रजनीश"

 नदी पहाड़ों की उदासी का, 

एक साकार स्वरूप होती है।

जो बहती है रहती है,

 पहाड़ों से उतर कर,

जंगलों से निकलकर ,

गांव से होकर ,

वह समुद्र तक पहुंचना चाहती है।

शायद जो दर्द उसने बहते देखा है,

 पहाड़ के अंतस में,

उसे समुद्र को सुनाना चाहती है।

उसकी विशाल बाहों में समाना चाहती है।

पर उसे गुजरना पड़ता है नगर से होकर भी,

जहां की चका चौंध सभ्यता से,

वह भ्रमित हो जाती है। 

जब वह अपने को एक, 

अलौकिक सी दुनिया में पाती है ।

उसका यह भ्रम टूट भी जाता है जब ,

गंगा यमुना गोमती सरयू मैली हो जाती है ,

शहर नगर का अर्थ जब तक वह समझ पाती है।

तब तक तो अनर्थ की न जाने कितनी,

कहानी लिख जाती है। 

समुद्र को जाकर नगर की, 

कहानी जब सुनाती है।

तो समुद्र की भी अपनी बारी आती है ।

वह बताता है नदी से कि तुमने सिर्फ,

पहाड़ का दर्द लेकर इस संसार के,

रास्तों को जीने का प्रयास किया है ।

देखो इस संसार ने तुमको कैसा,

मेला होने का जहर दिया है ।

पर मैं तो चुपचाप एक किनारे बैठा था,

मानव से भला मैं कब ऐंठा था?

पर देखो आज समुद्र भी,

 बहुत लाचार हो गया है।

 बेचारा हो गया है ।

न जाने कितनों का हिसाब,

समुद्र से विलुप्त हो जाने का हो गया है।

अब राम को कोई तीर, 

नहीं चलना पड़ता है।

समुद्र से रास्ता मांगने के लिए,

कलयुग के मानव ने ,

स्वयं निश्चित कर लिया है,

 कि वह कैसे जिए?

समुद्र तो सिर्फ उसके आगे एक,

पानी का स्थान भर रह गया है ।

नदी तुमने तो मैली होकर सिर्फ,

नगर का अर्थ जान लिया है ।

मैंने तो न जाने कितने,

रत्न अपने मंथन से इनको दिया है।

फिर भी यह सोने की मुर्गी के अंडे की तरह,

मुझे रोज काट रहे हैं बांट रहे हैं।

युद्ध की आशंका में असंख्य परमाणु बम,

 तारपीडो युद्धपोत से ,

मेरा सीना चीर देते हैं ।

मेरे पास तो अब राम भी नहीं रह गए हैं!

जिनके सामने में हाथ, 

जोड़कर खड़ा हो जाता।

कम से कम स्वयं अपने लिए ,

और अपने अंदर समाये असंख्य,

जीव जंतुओं के लिए जी तो जाता?

किसको बताऊं कि पूरी पृथ्वी को बनाने वाला, 

भगवान भी इतना निरंकुश नहीं कभी रहा है।

जितना भस्मासुर होकर,

 मानव ने अपने को बार-बार कहा है ।

नदी तुम भी मैली हो गई हो।

मैं भी बर्बाद हो रहा हूं। 

शायद मनुष्य एक दिन, 

जब समझ पाएगा ।

तब इतनी देर हो जाएगी कि,

यह स्वयं अपने लिए प्रलय लायेगा ।

यह स्वयं अपने लिए प्रलय लायेगा ।

आलोक चांटिया "रजनीश"


Thursday, August 14, 2025

मां की स्वतंत्रता आलोक चांटिया "रजनीश"


 जो कट कर, बट कर भी, 

मुस्कुराती रह जाए,

वही मां होती है,

बच्चे उसकी इस ,

हालत में भी खुश है ,

इसमें जो खुश रह जाए ,

वह मां होती है ।

मां का आंचल कट गया, 

फट गया इससे ज्यादा, 

चिंता खुद के हंसी की जब होती है ,

तब भी मां यह सोचकर, 

प्रसन्न होती है ,

कि जो उसके बच्चे हैं,

वह उन्हीं की तो होती है। 

मां कभी भी अपने ,

दर्द को कहां बताती है ?

बस उसके हिस्से में 

अपने बच्चों के लिए,

जीने की बस बात ही आती है,

इसीलिए चाहे नदी हो, 

धरती हो या देश,

बस वह मां ही कहलाती है।

जो मैली होकर भी,

कुचल कर भी,

और कट कर भी,

सिर्फ मुस्कुराती है ,

यह देखकर भी कि,

कोई उसकी परेशानी में, 

सम्मिलित नहीं होना चाहता है ,

बस शब्दों में स्वतंत्रता दिवस के लिए,

खोना चाहता है,

वह भी मां भारती बनकर, 

सारे दर्द समेटकर,

अपने आंचल में ,

बच्चों को समा ले जाती है। 

शायद वह मां है ,

इसीलिए अंतिम गहराई के साथ,

वह सभी के साथ मुस्कुराती है,

हमारे लिए मां भारती बनकर आती है।

गंगा मां बनकर आती है। 

धरती मां बनकर आती है। 

हमारी जन्म देने वाली ,

मां बनकर भी आती है।

बस वह मां ही है ,

जो हर पल हमारे 

स्वतंत्रता के लिए जी जाती है,

अपने हर दर्द पी जाती है

आलोक चांटिया "रजनीश"


Wednesday, August 13, 2025

भगवान का तनाव -आलोक चांटिया "रजनीश"

 भगवान को भी एक तनाव से होकर,

गुजरना पड़ रहा है।

कहीं  हिंदू तो कहीं मुसलमान,

ईसाई होना पड़ रहा है। 

कल तक उसे भी आप में भ्रम था,

कि वह तो कण-कण में व्याप्त है,

उसका नाम लेना ही हर, 

किसी के लिए पर्याप्त है। 

उसने ही इस संपूर्ण,

जगत को बनाया है।

सब कुछ तिनका तिनका,

 उसी के सहारे चलता है, 

उससे ही जीवन पाया है, 

और आज उसको भी एक लाइन,

और सीमा को पहचाना पड़ रहा है!

वह किस मानव के घर का है?

उसको बताना पड़ रहा है। 

धनुष तीर मुरली लेकर वह खड़ा होगा!

या फिर बिना किसी रूप रंग के खड़ा होगा?

उसे किसी क्रॉस पर लटक कर,

अपने को अवतार बताना होगा ?

भगवान सोचता है कई परीक्षा से होकर,

उसे भी दुनिया में आना होगा।

क्योंकि जिस मनुष्य पर भरोसा करके,

उसने अवतार का रास्ता  चुन लिया है,

उसे सीमाओं के दायरे में, 

इतना मनुष्य ने इतना कर  लिया है।

अब भगवान को  समझना पड़ता है,

कि उसके होने का रास्ता, 

किस-किस के घर के सामने पड़ता है?

अब भगवान की मुस्कुराने की बात,

कहां कोई करता है? 

भगवान को पकड़ कर, 

आदमी हंसता है,

यही सब देखकर भगवान, 

एक तनाव से गुजर जाता है ।

जब वह आदमी के अधीन, 

भगवान होकर भी अपने को पाता है !

आलोक चांटिया "रजनीश"


Wednesday, August 6, 2025

क्या सच में मानव, मानव रह गया है? — आलोक चांटिया "रजनीश"

 क्या सच में मानव, मानव रह गया है?

— आलोक चांटिया "रजनीश"


मनुष्य को किसी भी तरह से

जानवर नहीं कहा जा सकता।

मनुष्य की श्रेणी में, भला

जानवर को कहाँ रखा जा सकता?


मनुष्य ने अपनी संस्कृति गढ़कर,

ना जाने कितने पीछे

जानवरों को छोड़ दिया है।

सभ्यता, संस्कृति, प्रगति की इस दौड़ में

किसने जानवर का नाम

आदमी के साथ लिया है?


जानवर—

जिनके यहाँ कोई संस्कृति नहीं,

सिर्फ प्रजनन की बिसात होती है,

पर घर-परिवार की बात नहीं।

ऋतु-काल में मिलते हैं,

फिर अपनी-अपनी राह चले जाते हैं।


लिविंग रिलेशन का यह दौर

प्रकृति में तो जानवरों के बीच चलता है,

पर अब यही रंग

मानव की बस्तियों में भी उतर आया है।

क्या यह प्रतिबिंब

जानवर होने का संकेत नहीं?

तो भला मानव

अपने को कैसे इस बिसात पर रख सकता है?


जानवर हर मौसम में

कोई नया हमसफ़र पा लेते हैं,

फिर समय बदलते ही

दूसरा साथी ढूँढ़ लेते हैं।

उन्होंने कभी विवाह की परंपरा नहीं डाली,

सिर्फ पैदा हुए बच्चों के

क्षणिक माली बनकर रह गए।


वह नहीं चाहते

आदमी की तरह स्थायी बंधन में रहना,

इसलिए जानवर—जानवर रह गए।

पर जानवर के जीवन का

यह लिविंग रिलेशन

जब मानव में आ गया—

तो सवाल उठता है:


क्या सच में

मानव, मानव रह गया है?

Tuesday, August 5, 2025

राम को कितना जानते हो? आलोक चांटिया "रजनीश"

 

राम को कितना जानते हो?
सोच कर देखो राम को कितना मानते हो?

 उन्होंने कब अपने किसी संघर्ष श्रम के लिए,

 अपना कर्म का पथ छोड़ा है?

सत्य के रास्तों को छोड़कर ,
अपने को कब कहां मोडा है?
चाहते तो दो पल में अपने पिता को,
जीवित कर सकते थे ,
अपनी मां को वैधव्य से रोक सकते थे,
पर मृत्यु लोक के नियमों से ,
उन्होंने अपने को दूर नहीं किया,
जो हो रहा था उसे स्वीकार कर लिया,
महलों में रहने का अवसर,
जब भी जब तक मिलता रहा,
जीवन इस सुख और वैभव में चलता रहा,
पर वह भी समय आया,
जब जंगलों की तरफ उन्हें जाना पड़ा,
कंदमूल फल खाकर झोपड़ी में रहकर,
जीवन बिताना पड़ा,
मर्यादा पुरुषोत्तम होकर सब कुछ,
चुटकी में अपने लिए कर सकते थे,
मां सीता का अपहरण भी हो जाने पर ,
उन्होंने कोई जादू से न जानने का प्रयास किया,
कि वह कौन है जिसने,
मेरी सीता का अपहरण किया,
मृत्यु लोक के सारी प्रक्रियाओं में,
उन्होंने पेड़ पौधे नर नारी वानर पक्षी,
सभी से यह जानने का प्रयास किया,
और फिर लंका की तरफ,
जाने का अभिप्राय किया,
चाहते तो चुटकी में मां सीता ,
उनके पास वापस आ सकती थी,
पर भला इससे पृथ्वी पर ,
श्रम और संघर्ष ही सत्य है ,
इसकी बात कैसे सच होकर आ सकती थी!

 सनातन होकर राम के अनुगामी होकर भी,
हम रात दिन अपने हर काम के लिए,
व्रत मनौती पूजा पाठ में उलझे रहते हैं।
भला अपने अंदर राम होने की बात,
कब किसी से कहते हैं?
राम को जब हम सब इस मृत्यु लोक में ,
जानने का प्रयास कर रहे हैं ,
तो फिर क्यों श्रम संघर्ष,
परेशानी से भाग रहे हैं?
राम का अर्थ ही कर्म की,
पूजा से होकर गुजर रहा है ,
पता नहीं मानव क्यों उसे ,
अब तदर्थ कर रहा है ,
उसे अब तदर्थ कर रहा है।
आलोक चांटिया "रजनीश"

थैली में खेत -आलोक चांटिया "रजनीश"


 एक निरंतर प्रवाह में हर कोई,

खेत को लेकर चला जा रहा है,

पैदल वाला गाड़ी वाला,

हवाई जहाज वाला ट्रेन वाला,

कोई भी ऐसा नहीं है जिसके हाथ में,

खेत का वरदान ना चल रहा हो ,

शाम को लौटते हुए हर कोई ,

चाहे जिस काम को करके आ रहा हो,

थका हारा चाहे जितना अपने को पा रहा हो! 

लेकिन वह जानता है कि अपने हाथ में ,

हमें खेत को लेकर जाना है,

तभी तो दूसरे दिन का सूरज ,

भरे पेट के साथ देख पाना है ,

हाथों में लटके हुए उन खेतों की,

कहानी को हम कभी महसूस,

करना भी नहीं चाहते हैं !

हम तो बस अपने लिए चूल्हे पर बने हुए,

दो निवाला चाहते हैं ,

जो खेतों से निकल कर हमारे,

मुंह तक आ जाते हैं,

और हमें पूरा पूरा फिर से आदमी बना जाते हैं।

कौन ऐसा है जो सीना ठोक कर,

अमीरी गरीबी ऊंच-नीच,

धर्म जाति के मकड़ जाल में,

यह कह पाए कि हमें खेत की ,

कोई जरूरत ही नहीं है ,

हम तो बिना खेत को लिए हुए,

अपने घरों में आए ,

पर सच यह है कि खेत के इस वरदान को ,

देने वाला फटी धोती भीगे हुई पसीने में

लथपथ चुपचाप खेतों के वरदान को ,

मिट्टी से मॉल, बाजार में,

जाते हुए देखता रहता है ,

निकली हुई सीन की हड्डी,

फटे हुए कपड़े उजड़ी हुई दाढ़ी,

सूखे हुए कपोल भला कहां,

वह अपने मन की बात कोई कहता है ?

वह तो गरीबों का कंबल ओढ़ कर ,

अपने को ठिठुरन से बचना चाहता है!

 टिमटिमाते तारों के बीच ,

मचान पर बैठकर खेतों को बचाना चाहता है। 

अपने लिए बस उतना ही,

लागत का वहां पाना चाहता है,

जिससे अगले मौसम की फसल को ,

वह फिर अपने खेतों में पाना चाहता है,

इतनी हिम्मत ही उसमें कहां है?

जो वह किसी से भी आगे बढ़कर कह सके,

 कि इस बार खेत से निकलने वाले,

वरदान को मैं तुम्हें कौड़ियों के मोल,

नहीं दे पाऊंगा।

मेरे मन में भी गाड़ी घोड़े पर,

चलने की ललक है,

मैं भला कब तक सपने में ,

महलों में रह पाऊंगा ?

एक बार मैं भी अपनी झोपड़ी से,

बाहर उस प्रगति का हिस्सा बनना चाहता हूं, 

मैं भी तुम्हारी तरह ही खड़ा होना चाहता हूं।

मेरे खेतों के निकले हुए इस ,

समुद्र मंथन के रत्न को तुम मुझसे लेकर,

हीरे की तरह बेचते हो ,

और मुझे इस मिट्टी का फल कहकर ,

हर पल बाजार में नोचते हो,

मैं खड़ा होकर गुलाम की तरह,

तुम्हारे आगे बेबस लाचार सा ,

तुम्हारी बातों पर विश्वास करके,

मिट्टी के मोल तुम्हें सब ले जाने देता हूं ,

मिट्टी के दाम को ही तो तुमसे बस लेता हूं।

तुम उस मिट्टी को सोना बनाकर,

बाजार में माल में ठेलो पर,

मुंह मांगे दामों पर बेचते हो,

देखो शाम होते ही खेतों की महक को,

 पॉलिथीन में हर किसी के हाथ में देखते हो!

 पर कोई राह चलता राहगीर पथिक,

कभी यह समझ नहीं पाता है ,

कि वह रोज अपने साथ कहीं अंधेरे में ,

शहर से बहुत दूर बिना सुख,

सुविधाओं के खेतों से भूख की ,

नीलामी में जीते हुए जिसके फसल फल फूल, 

अनाज, सब्जी को लेकर,

हर कोई अपने घर आता है,

बस पीछे वह किसान बहुत दूर छूट जाता है,

 जिसके हिस्से में सिर्फ और सिर्फ,

बिन बरसात के छाए हुए बादल,

सूखी हुई धरती कर्ज के तले दबे हुए कंधे,

फटे हुए कपड़े और ना ,

जान पाने वाला भविष्य रह जाता है,

पर भला कौन एक बार भी,

उस किसान को भगवान मान पाता है,

जो मानव बनकर इस संसार में,

तो आ जाता है पर अपनी मुट्ठी में,

सिर्फ अंधेरा लेकर दूसरों की,

भूख प्यास के लिए एक मां की तरह,

अपनी छाती का अमृत खेतों से लाकर,

बस दूसरों को जीता हुआ,

देखकर खुश रह जाता है ।

उसकी मुट्ठी में आने वाले समय,

फसल और दूसरे दिन की सुबह का,

एक अनिश्चित अंधेरा रह जाता है,

आखिर पैसों वालों की दुनिया में ,

एक किसान पूरा-पूरा आदमी,

आलोक क्यों नहीं बन पाता है ?

आलोक चांटिया "रजनीश"


Monday, August 4, 2025

बिन पानी सब सून- आलोक चांटिया "रजनीश"


 

लगातार पानी की ठोकर से
पौधे भी गिर जाते हैं
सुंदर दिखने वाले फूल के लिए
पानी की बौछार शूल बन जाते हैं
गिर जाते हैं धरती पर इतने असहाय होकर सोचो जिनके जीवन में पानी नहीं है
नमी नहीं है वह कैसे जीते होंगे बेबस होकर पानी की बात करना
एक अजीब सी बात लगती है
अंदर की अंतरात्मा भला
इस बात पर कब जागती है
जानते सभी हैं कि आंखों में
पानी होना जरूरी है
बातों में नमी होना जरूरी है
करुणा का मतलब भी बातों में
पानी से होकर निकलता है
लेकिन कब किसी को पानी का
यह स्वर अपने जीवन में मिलता है
जब पानी से चोट खाकर फूल
धरती पर गिर जाते हैं
जरा सोच कर देखो जीवन में
जिसके पानी है उसकी जीत
बिना कहे हर ओर मिल जाते हैं
क्या जरूरत है उसे किसी
हथियार की किसी को जीतने के लिए
उसके जीवन में पानी है
किसी को भी जीतने के लिए
आलोक चांटिया "रजनीश"

Saturday, August 2, 2025

जिंदगी की किताब का एक पन्ना, हर रोज कोई बंद करता है,- आलोक चांटिया "रजनीश"

 जिंदगी की किताब का एक पन्ना,

हर रोज कोई बंद करता है,

इस भाषा के साथ,

कि कल की सुबह में वह फिर,

एक कोरा पन्ना लेकर खड़ा होगा,

और लकीरों की बातों से खुला होगा हाथ,

 इतना विश्वास करके जो आदमी,

रोज सो जाता है,

भला उसके हिस्से में हताशा निराशा ,

आत्महत्या कैसे आता है?

जरूर वह अपनी इस ताकत को,

या तो भूल गया है,

या फिर कहीं जीवन के,

समर में छोड़ गया है,

नहीं तो सुबह का भूला अगर,

शाम को घर आ जाए,

तो भूला कब कहलाता है?

आखिर मानव हताशा निराशा,

आत्महत्या से दूर अपने को,

रामकृष्ण मूसा ईशा मोहम्मद के,

अवतार वाले मनुष्य की,

पंक्ति में क्यों नहीं पाता है?

आलोक चांटिया रजनीश