Monday, December 30, 2024

सिंदूर लगाने का दर्द -आलोक चांटिया


 


सिंदूर लगाने का दर्द



सिर्फ जमीन पर एक लकीर जब भी

 जहां भी खींच दी जाती है

 देखते-देखते ही वह टुकड़ा जमीन से 

निकल कर देश बना दी जाती है 

फिर क्यों नहीं समझते हम सूनी 

मांग में खींची हुई इन लकीरों को 

जिन लकीरों से निकालकर

 रिश्तो की कई रेखाएं खींच जाती हैं

 सिंदूर की इस लकीरों में हर दिन 

सुबह शाम लोग पढ़ते हैं 

सीमा के उस पार खड़ी लड़की की कहानी

 जो कभी इस घर की थी 

कभी उस घर की थी 

जिसको बचपन से यही समझा 

समझा कर दिखाया गया उसकी जवानी

कि बाप के घर पर ज्यादा 

अपना हिस्सा मत दिखाओ 

जिसके मांग का सिंदूर लगाओगी 

तब उसके घर जाना और वहां पर 

सारे सुख आराम पाओ 

वह भी इसी कल्पना में उड़ती इतराती 

बलखाती इंतजार करती रह जाती है

 एक सिंदूर का अपने जीवन में 

शहनाई दावत विदाई के साथ एक दिन

 अपनी मांग के सिंदूर में 

एक जिंदा आदमी ले आती है जीवन में 

पर वह आदमी भी तो मांग के

 सिंदूर से ही रिश्तो को

 तय करता हुआ मिल जाता है 

भला वह कब अपनी ससुराल को 

अपना घर मान पाता है 

और शायद वह सोचता भी सही है 

क्योंकि खींची गई सीमाओं पर 

लाली इतने खून की तरह फैल गई है 

कि अपनी ही घर की बेटी 

अपने ही घर में पराई हो गई है 

सिंदूर की सीमा के पार ससुराल में

 रहती हुई लड़की जब ससुराल को भी

 अपना घर मानकर जीने को

 विवश हो जाती है 

तो वहां भी कुछ आवाज़ 

वह अपने चारों ओर गूंजती हुई पाती है

 क्या तुम्हें तुम्हारी मां ने 

कुछ नहीं सिखाया 

तुम्हें किसी काम को करने का 

सऊर भी क्यों ना आया 

यह तुम्हारी ससुराल है यहां पर 

ठीक से तुम्हें रहना होगा 

समझ में आए तो रहो वरना अपने 

पीहर को ही तुम्हें अपना घर कहना होगा 

द्रोपती की तरह खड़ी एक औरत 

अपने चीर हरण को चुपचाप देखकर भी

करें तो क्या करें 

सिंदूर के दोनों तरफ खड़े रिश्तो को भी

 कैसे वह पार करें 

कभी-कभी तो सिंदूर में ढूंढ लेती है 

अपनी जिंदगी का वह दौर 

जब ना पीहर में ना ससुराल में

 वह पाती है कोई ठौर 

इसीलिए अब सिंदूर को लगाना

 दुनिया में बंद सा हो गया है 

पर जीने की चाहत में लड़की का जीवन

आलोक अकेला सा रह गया है

 वह मिट्टी की तरह चाहती है 

सबको प्यार, लगाव ममता लुटा देना 

इसके अलावा भला उसे 

किसी से और क्या लेना देना 

इसके अलावा भला उसे 

किसी और से क्या लेना देना ।

आलोक चांटिया

Saturday, December 28, 2024

आंख का कसूर -आलोक चांटिया

 

आंख


यह आंखें न होती तो,

 दुनिया जान ही न पाती ,

कि यह ठंडी हवाएं,

 कहां से हैं आती ,

यह आंखें न होती ,

तो जान न पाती ,

कि प्रकृति की खूबसूरती,

 कौन कैसे हैं पाती ,

आंखों का क्या है थक कर,

अक्सर सो भी जाती है ,

वहां भी सपने जीवन के,

कई अनोखे पाती हैं ,

चौक कर खोल देती हैं जब,

 पूर्व की तरफ से ,

कोई रोशनी पाती है,

 जानती है दरवाजे पर,

 एक दस्तक हो रही है ,

जब किसी को गलती से ही ,

सही अपना होता पाती हैं ,

कभी-कभी आंखों को लोग ,

गलत समझ जाते हैं ,

जब अपने इश्क के लिए,

 सूरदास बन जाती है ,

आंखें खुद अपने रास्तों पर,

 दौड़ती चली जाती हैं,

 कोई उन्हें अच्छा, कोई खराब,

 कोई चिपकने वाला, कोई घूरने वाला,

 कहता हुआ पाती है ,

पर आंखों का क्या है ,

जो देखते हैं उसी से ,

अंदर राम कृष्ण रावण की न जाने,

 कितनी तस्वीर बना लेती हैं,

 और समाज को सत्य, त्याग ,

समर्पण की मंदोदरी, सीता,

 रुक्मणी, राधा दे देती हैं l

 आलोक चांटिया

Thursday, December 26, 2024

शरीर की ऊर्जा का प्रदर्शन विचार है अखिल भारतीय अधिकार संगठन












 

एकांत -आलोक चांटिया


 एकांत


मिट्टी के तन में कई बार, 

मैंने कई पौधे उगते देखे हैं ,

फलते फूलते फूल,

 खिलते देखे हैं ,

मिट्टी के तन में कई बार मैंने ,

लोगों को पानी डालते देखा है,

 ताकि उस पर उगते हुए पौधे,

  जीवन का मतलब समझ जाए ,

देखा है मैंने मिट्टी को थक कर,

 हार कर पौधों का साथ छोड़ते हुए,

 जो चाह कर भी अब ,

खेल नहीं सकते हैं प्रकृति में ,

हरियाली से मिल नहीं सकते हैं ,

सूख जाते हैं टूट जाते हैं ,

खत्म हो जाते हैं क्योंकि वह,

 अपने जीवन में मिट्टी का अर्थ,

 कभी समझ नहीं पाते हैं,

 मिट्टी में बहती स्त्री का मर्म,

 निगल नहीं पाते हैं ,

कभी भी मिट्टी में औरत को,

 ढूंढ पाते ही नहीं है ,

एक बार भी उसका एकांत ,

तोड़ने के लिए आते ही नहीं है,

 जब इस एक होने का ,

अंत हो जाता है ,

स्त्री की देह से निकलकर एक,

 पुरुष सूखकर मर जाता है ,

मिट्टी के कारण ही इस प्रकृति में,

 सब कुछ चल रहा है ,

जिस पल यह मान जाते हैं,

 उसी क्षण स्त्री के एकांत को ,

खुशियों के सागर में लेकर चले जाते हैं ।

 आलोक चांटिया


Friday, December 20, 2024

हर जीवन यही चाहता है -आलोक चांटिया


 

न जाने क्यों हर किसी का,
मन एक मोड़ पर आकर,
जरूर यह चाहता है,
कि कोई आकर कहे ,
मैं तुम्हें जानता हूं ,पहचानता हूं,
तुम्हारी हर बात हर,
काम को मानता हूं ,
भले ही वह एक शब्द,
कहकर चला जाए ,
भले ही कोई एक पेन किताब,
फूल देकर चला जाए,
बस बार-बार यही ,
कहकर चला जाए,
मैं तुम्हें जानता हूं, पहचानता हूं ,
इसी खोज में हर कोई,
भटक रहा है यहां वहां,
जहां-तहां न जाने कहां-कहां,
चिपक छिपक रहा है,
कब सुबह होती है ,
कब शाम होती है ,
वह जान ही नहीं पाता ,
बस खोजने में लगा है,
कि भला वह इस दुनिया में ,
क्यों क्या करने आता,
जो किया है उसे कोई,
जान नहीं पा रहा है,
इस बात की एक वेदना ,
वह हर पल अपने भीतर पा रहा है,
हर कोई बताना चाहता है,
दुनिया क्या है, समाज क्या है,
समाज के उस पार क्या है,
दुनिया के उस पार क्या है,
इसी की बिसात बिछाकर,
हर कोई बैठ रहा है,
कोई अपने को आचार्य,
कोई अपने को ज्ञानी,
कोई अपने को कथा वाचक,
कोई अपने को राजनीतिकार,
कोई अपने को शिक्षक कह रहा है,
पर चाहिता यही है,
कोई आकर कहे ,
मैं तुम्हें जानता हूं, पहचानता हूं,
और तुम्हारी हर बात को मानता हूं,
बस इतनी सी बात पर,
एक जीवन सार्थक हो जाने की,
बात हो रही है,
और इसी खोज में अंतहीन,
श्रृंखला में हर एक सांस खो रही है,
जबकि यह सच भी,
हर कोई जानता है,
मानता है, पहचानता है ,
कि जाने के बाद भला कौन,
किसको याद रखता है,
किसी की किसी बात को,
बार-बार हर मोड़ हर चौराहे,
हर रंग मंच पर रखता है,
कभी-कभी अगर याद आ जाए,
किसी को तो भले ही कहा जाता है,
वरना कौन किसके लिए,
यहां पूरा-पूरा जी पाता है,
फिर भी न जाने क्यों,
यही बात बार-बार कहता है,
कोई होता जो आकर कहे,
मैं तुम्हें जानता हूं ,पहचानता हूं ,
और तुम्हारी हर बात को मानता हूं,
जीवन की यही ललक,
जीवन का अर्थ रोज,
सबको बताती है,
पूरब की लाली, चांद की चांदनी,
बार-बार आलोक आती है,
और जीवन की एक कहानी,
पूरी पूरी खत्म हो जाती हैl
आलोक चांटिया

Wednesday, December 18, 2024

मन के दरवाजे क्यों खोलते नहीं -आलोक चांटिया


 मन के द्वार क्यों खोलते नहीं,

 आहट सुनकर भी कुछ,

 क्यों बोलते नहीं ,

बढ़ाते अकुलाहट ही क्यों जा रहे हो,

 चुपचाप विलोप हो,

थोड़ा सा डोलते क्यों नहीं,

 आशा से हारा थका पथिक,

 तुम्हारे द्वारा तक चला आया है,

 जब दुनिया के हर दरवाजे पर,

 एक सन्नाटा एक बेरुखी,

 एक उपेक्षा अपने,

 हर दर्द के लिए पाया है,

तब यह सोचकर वह निकल पड़ा है, 

कोई समझे ना समझे तुझे तो,

 हर बात हर मर्म अपने,

 आप ही समझ आया है,

 फिर भी कर्म  की परिभाषा में क्यों,

 यहां नीरवता  सी छा रही है,

 क्यों नहीं मेरे अंतस में,

 तेरे होने की प्रतिध्वनि आ रही है, 

ऐसा कैसे हो सकता है,

 दुनिया की देखा देखी,

 तू भी करने लगा है ,

मेरे हर दर्द पर तू मौन रहने लगा है, 

उठो जागो देखो कैसा अत्याचार,

 अनाचार भ्रष्टाचार फैल रहा है,

 जिस दुनिया को तूने बनाया,

 उस दुनिया पर हर तरफ,

 रावण और कंस रह रहा है,

तू कहीं योग निद्रा में तो नहीं गया है, 

इसीलिए आज चल कर आया हूं,

 हे प्रभु तुझको यह बताने आया हूं, 

आत्मा परमात्मा के मिलन में,

 मैं तेरा हिस्सा यहां रह रहा हूं,

 मुझे जब दर्द हो रहा है,

 तब तुझसे कह रहा हूं,

 क्यों नहीं तू महसूस कर पा रहा है, 

जब तेरा ही हिस्सा तुझे,

 यह सब बता रहा है,

 ऐसे में ध्वनि सुनकर भी,

 तुम कुछ क्यों बोलते नहीं,

 जीवन के स्वर को बचाने के लिए,

 तुम अपने नेत्र क्यों खोलते नहीं,

 तुम अपने नेत्र क्यों खोलते नहीं l

आलोक चांटिया

अंधेरा कितना जरूरी है -आलोक चांटिया


 कितनी अजीब सी बात है,

 कि हर किसी के जीवन में,

 जरूर एक रात है,

 फिर भी हर कोई ,

उजाले के लिए ही बात करता है,

 उसी के लिए जीता है,

 उसी के लिए मरता है,

 जबकि बिना अंधेरे के ,

उजाले की बात बेमानी हो जाती है,

 भला कब आसमान में बिना,

 अंधेरे के तारों की बारात आती है, 

फिर भी चलता रहता है कि,

 जीवन में मेरे दुख क्यों आया ,

मेरा जीवन का पथ,

 कोई भी संघर्ष क्यों पाया,

 प्रसन्नता क्यों नहीं थिरकी,

 हमारे जीवन के आंगन में,

 क्यों नहीं हमारा पग,

 एक हिमालय सी ऊंचाई पाया,

 यही दर्द जब तक चलता रहता है,

 हर कोई तब तक,

 एक दुख में रहता है,

 अगर वह जान लेता मान लेता,

 और यह ठान भी लेता कि,

 वह कुछ भी कर सकता है तो,

एक बात वह जरूरी याद रखता,

 जब वह पूर्व की तरफ ,

पूरे जोश में तकता,

 कि आज जिस रोशनी को,

 वह आलोक देख रहा है,

 वह अंधेरे के रास्ते से ,

गुजर कर यहां तक आई है,

 तभी तो जिंदगी में घर के आंगन में,

 फूलों की बगिया में फसलों के खेतों में,

 एक प्यारी सी खुशबू आई है,

 जो यह सारी बातें समझ जाते हैं,

 वह अंधेरे के भी थोड़ा सा,

 जब तब करीब आते हैं l


आलोक चांटिया