Friday, June 9, 2023

हिमालय से निकली गंगा सी जिन्दगी ............

 हिमालय से निकली गंगा सी जिन्दगी ............

शहर से गुजरेगी मैली सी जिन्दगी ...........

कितने भी जतन खेलेंगे सब जिन्दगी ...........

खुद को पाक कर बनायेंगे कोठे सी जिन्दगी .........

हर छूने वालो में अपने को तलाशती जिन्दगी ....

जिन्दगी में खुद से दूर जाती जिन्दगी ...........

मिठास की तलाश में घर छोड़ आई जिन्दगी .........

खुद की लाश को बाचती अब जिन्दगी ............

थक हार के जिन बाहों में समायी जिन्दगी ........

खारी ही सही दागो संग समाती जिन्दगी ........

गंगा से गंगा सागर बनी क्या पाई ये जिन्दगी ............

खुद के मन से ना निकल पड़ना ये जिन्दगी .........

तुझसे अपने पापो को धोने देखो खड़ी हैं जिन्दगी .........................शुभ रात्रि

Thursday, June 8, 2023

और सांसों का अवशेष था

 मेरे पास खोने के लिए , 

इतना कुछ था कि, 

लोग आते गए , 

और लेकर चलते गए , 

पर कोई न देख पाया ,

 न समझ ही पाया , 

कि इन सब के बीच ,

 मैं अब भी शेष था , 

शायद ये मेरी हिम्मत , 

और सांसो का अवशेष था .............................

आप किसी को लूट कर खुश हो सकता है बर्बाद करके खुश हो सकते है लेकिन कटे पेड़ की जड़ से फिर पत्तियां निकल आती है और फिर वो रौशनी और हवा पाती है हा ये बात और है कि फिर से दरख्त बनने में समय लगता है 

डॉ आलोक चान्टिया

Wednesday, June 7, 2023

पेट की आग में हर शर्म जल कर राख हुई

 पेट की आग में हर शर्म जल कर राख हुई ,

घूँघट के अंधेरो में फिर आज बरसात हुई ,

गूंगो की बस्ती में घुंघरू बस बजते ही रहे ,

दर्द से सड़क पर मुलाकात अकस्मात् हुई .................

एक ऐसी लड़की जिस से आज मै ऐसी जगह मिला झा सोचा ना था और अपने अधिकारों से दरकती भारत माँ की भारत पुत्री भारत पुत्रो से तार तार हुई ....क्यों न ऐसे देश पर फक्र जहा घुंघरू की गूंज आज भी है .............जय भारत पाने गरिमा को जानिए ..........डॉ आलोक चान्टिया

मुझ में अकेलेपन का एहसास रहने लगा

 मुझमे अकेलेपन का एहसास रहने लगा .......

सच ये है कि अब साथ कोई रहने लगा ............

माना कि आलोक अंधेरो में नहीं आता ......................

पर एक साया रोज कुछ  कहने लगा ................

यूँ ही जिन्दगी में कब तक उकेरोगे मुझको ..............

कोई तो तेरी जुदाई का दर्द सहने लगा ................

इस दुनिया को मिटटी का खिलौना समझो ..................

साँसों से कोई बदन मुझे जिन्दा कहने लगा ...............

आज बारिश से सुकून पाया कुछ दिल है ......................

तेरे संग भीगने का सगल होने लगा ...............

कौन कहता है भिगोती नहीं आँखे ......................

मेरे दिल से होकर जब वो गुजरने लगा ...........

मुझमे अकेलेपन का एहसास होने लगा ...............

सच ये है कि अब साथ कोई रहने लगा .............................

कैसे कह दूं सुबह मुझे मयस्सर ना हुई

 कैसे कह दूँ सुबह मुझे मयस्सर ना हुई ,

कई कह दूँ पूरब आफ़ताब की ना हुई ,

पर ना जाने क्यों मन में बादल छाये ,

रौशनी तो दिखी पर कही रौशनी ना हुई l

आलोक चांटिया

Sunday, June 4, 2023

दरख्तों के आस पास आँचल का एहसास है ,

 दरख्तों के आस पास आँचल का एहसास है ,

जमीं में उलझी शबनम में ओठो की प्यास है ,

कोई बढ़कर हवाओ की तरह ही लिपट जाये ,

आफताब से प्यार में जैसे बादल के जज्बात है .........................

हर विपरीत परिस्थिति में जीवन से मोह्हबत करना आना चाहिए वरना बादल की क्या मजाल कि वो अपने प्रेम की बहो में सूरज को समेटने की गुस्ताखी करे | यही है आपके अधिकारों के जागने का मन्त्र , अखिल भारतीय अधिकार संगठन .........सुप्रभात

पर्यावरण की दशा

 मुझे काट कर दरवाजो में महफूज होते रहे  ,

मेरी ही छावं में लेट सुकून से तुम सोते रहे ,

जला कर मुझे खुद को रोज जिन्दा रखते हो ,

जान न पाए दरख्त बिन कितने तन्हा होते रहे  ................

आप अपने पुरे जीवन में उतनी आक्सीजन का प्रयोग करते है जितनी दो पेड़ अपने पूरे जीवन में निकालते है तो क्यों नही इस सबसे आसान से ऋण को पृथ्वी  पर जिन्दा रहते हुए ही उतार दीजिये और अपने आस पास दो पेड़ लगा दीजिये ....अखिल भारतीय अधिकार संगठन विश्व पर्यावरण दिवस पर आप से बस यही जाग्रति की उम्मीद करता है